मनीष पांडेय-
उत्तर प्रदेश का DGP न बदलना पड़े इसलिए सरकार ने नया कानून बना डाला क्योंकि ये मामला उत्तर प्रदेश की कानून व्यस्था से जुड़ा हुआ था। सीएम खुद नहीं चाहते थे कि कोई ऐरा-ग़ैरा प्रदेश के डीजीपी की कुर्सी पर बैठे जो उनकी योजनाओं को धरातल पर न उतार सके।
अब आप जानकार हैरान हो जाएंगे कि सिर्फ डीजीपी ही नहीं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अफसर भी नहीं चाहते कि प्रदेश के मेडिकल कालेजों में स्थाई प्राचार्यों की नियुक्ति हो। उन्हें भी इन मेडिकल कालेजों में अपना चहेता प्राचार्य चाहिए जो उनकी उंगलियों पर नाचता रहे। जिस झांसी मेडिकल कॉलेज में हुए हादसे में बच्चों की जिंदगियां खत्म हो गई उसमें नियुक्त प्राचार्य डाक्टर नरेंद्र सिंह सेंगर पिछले चार साल से कार्यवाहक प्राचार्य के रूप में कार्य कर रहे हैं।

खेल समझिए, अरे पांच साल में तो सरकार बदल जाती है लेकिन स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव पार्थ सारथी सेन और किंजल सिंह अपने एक मेडिकल कालेज को स्थाई प्राचार्य नहीं दे पाए। एक बार पता करिएगा कि झांसी मेडिकल कालेज को चिकित्सा शिक्षा विभाग से पिछले चार साल में कितना बजट दिया गया है। मामला थोड़ा और खुलकर समझ में आ जायेगा।
सिर्फ झांसी मेडिकल कालेज नहीं बांदा मेडिकल कालेज, आजमगढ़ मेडिकल कालेज, बदायूं मेडिकल कालेज, गोरखपुर मेडिकल कालेज, प्रयागराज मेडिकल कॉलेज, आगरा मेडिकल कालेज, कन्नौज मेडिकल कॉलेज, आंबेडकर नगर मेडिकल कालेज, इन सभी में आज तक कार्यवाहक प्राचार्य तैनात हैं। क्या इन मेडिकल कालेजों में प्राचार्यों की तैनाती बृजेश पाठक ने रोक रखी है?
क्या कभी किसी अखबार या टीवी में आपने प्रमुख सचिव पार्थ सारथी या फिर किंजल सिंह का नाम पढ़ा है कि इनके कार्यकाल में 9 मेडिकल कालेज बिना स्थाई प्राचार्यों के चल रहें हैं?
अरे ज्यादा दूर न जाइए लखनऊ के कल्याण सिंह कैंसर इंस्टीट्यूट जिसे अखिलेश यादव ने बनवाया था उसका नाम बदलने के लिए तो अफसरों ने खूब गाजे बाजे के साथ आयोजन करवाया लेकिन पिछले तीन सालों से ज्यादा हो गया यहां एक स्थाई निदेशक तक नहीं तैनात कर पाए हैं ये स्वास्थ्य विभाग के अफसर।
पता करिए, क्या बृजेश पाठक ने रोक रखा है कि यहां तैनाती नहीं करनी? पिछले तीन सालों से पीजीआई के निदेशक डाक्टर आर के धीमान को इस इंस्टीट्यूट का अतिरिक्त प्रभार दे रखा है शासन में बैठे अफसरों ने, अगर थोड़ा सा ध्यान इधर दे देते तो ये उत्तर प्रदेश का नहीं बल्कि एशिया का सबसे बड़ा कैंसर इंस्टिट्यूट बनता और कैंसर मरीजों के लिए वरदान साबित होता।
पर किसे फर्क पड़ने वाला है, ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत हो जाए, एनआईसीयू में जलकर बच्चों की मौत हो जाए, हम उंगली सिर्फ वहीं उठाएंगे जहां हम सुरक्षित हैं। क्योंकि अगर सही जगह उठा दी तो सामने वाले उंगली तोड़ के फेंक देंगे। सूबे के मेडिकल कालेज सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं, लखनऊ में बैठे अफसरों के लिए नाम बनकर रह गए हैं जहां उन्होंने अपने प्यादे सेट कर रखे हैं, की जब भी यहां सरकारी फसल कटे तो उसका एक हिस्सा उनके घर पहुंच जाए।
सब भ्रष्ट हैं, लुटेरे हैं लेकिन जितनी रिसर्च मैंने अभी तक स्वास्थ्य विभाग में इस सरकार में की है, ब्रजेश पाठक कहीं से भ्रष्ट नहीं है और जो भी उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर आग उगल रहें है उन्हें लगाया गया है किसी मकसद के तहत। सुबह-सुबह उठकर बस इतना ही लिख पाया हूं। जल्दी ही कुछ नए कारनामे नए पात्रों के बारे में लिखूंगा जिनके बारे में आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि कुछ ऐसे लोग है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए, ऊपर गलत सूचनाएं देकर उत्तर प्रदेश की जनता का बेड़ा गर्क किए हुए हैं?
वैसे जाते-जाते एक सवाल पोस्ट के अंत में आपके लिए छोड़ता हूं, उत्तर प्रदेश के हर जिले में एक मेडिकल कालेज होना चाहिए? ये योजना बनाने वाला आईएएस अफसर आजकल कहां है? पता करिएगा कि उसे यूपी की नौकरशाही में बैठे रक्त पिशाचों ने कैसे ठिकाने लगाया? की अब इसने हर जिले में मेडिकल कालेज रूपी जमीन तो तैयार कर दी है पर इसमें फसल हम उगाएंगे। सच कड़वा होता है पर सच यही है कि सिस्टम को कुछ लोगों ने ऐसे मकड़जाल में फंसा दिया है जो उन्हीं के इशारे पर तक-धीना-धिन कर रहा है।



Rajesh Kumar Chaturvedi
November 18, 2024 at 7:47 pm
आप को जानकारी कम है सब पाठक जी का खेल है, जग जाहिर है।
Prof. Yogesh Sharma
November 19, 2024 at 3:28 pm
पहले इन दोनों अधिकारियों को जबरन रिटायर कर दिया जाना चाहिए।
Dr hargovind singh,ex director (vrs)
November 20, 2024 at 5:36 am
Kabil Dir dg inko pasand nahi h ,yes man aur kamau poot inko pasand h khara adami inko pasand nahi h
Ganesh
November 22, 2024 at 11:37 pm
कुछ इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण का भी है।
इंदिरा भवन स्थित इस पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल में विगत 8 अगस्त को चेयरपर्सन के रिटायर होने के,4 माह के पश्चात भी कोई नियुक्ति नहीं हुई है।साथ ही 10 में से केवल दो ही न्यायमूर्ति ,जिनमें एक उपाध्यक्ष और एक सदस्य कार्यरत हैं।और तो और हाइकोर्ट लखनऊ खंडपीठ के दो बार निर्देश दिए जाने के बावजूद भी किसी के कान में जूं नहीं रेंगी।मात्र एक लाइन के जवाब, कि “प्रक्रिया चालू है” कहकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।जनवरी के पहले सप्ताह के बाद,उक्त दोनों न्यायमूर्तिगण के भी रिटायर होने के बाद तो कोई भी शेष नहीं बचेगा।सभी 10 न्यायालय बंद हो जायेंगे।
पहले जो पिटीशन 6 माह में निपट जाती थीं,अब 2,3 साल में भी कुछ नहीं होता।हजारों पीड़ित याची समय से न्याय न मिलने से समय पर रिलीफ नहीं पा रहे हैं।अब कौन कहे