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सियासत

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को जब भी मौका मिलता है, सरदार वल्लभ भाई पटेल का अपमान करने से नहीं चूकते!

सत्येंद्र पी एस-

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को जब भी मौका मिलता है, सरदार वल्लभ भाई पटेल का अपमान करने से नहीं चूकते. आज कह रहे हैं कि सरदार पटेल अन्य रियासतों की तरह कश्मीर को भी भारत में मिलाना चाहते थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा होने नहीं दिया.

मैंने सरदार वल्लभ भाई पटेल की सारी जीवनियाँ पढ़ी हैं. सरदार पटेल के भाषण पढ़े हैं. कांग्रेस में पटेल की भूमिका पढ़ी है. कांग्रेस नाम के संगठन में सरदार पटेल के मूते चिराग जलता था. किसी की औकात नहीं थी कि पटेल को कांग्रेस में निर्देशित कर सके.

नेहरू प्रधानमन्त्री बने थे, क्योंकि वह महात्मा गाँधी की इच्छा थी. महात्मा गाँधी चाहते थे कि नेहरू पीएम बने इसलिए पटेल ने उन्हे प्रधानमन्त्री बना दिया. नेहरू की खुद की औकात नहीं थी कि वह पटेल को सुपरसीड करके प्रधानमन्त्री बन जाते.

नेहरू की कभी औकात ही नहीं रही कि वह पटेल को गाइड करें या उन्हे कुछ करने से रोक दें. कभी नहीं, मतलब कभी नहीं. नेहरू कभी भी कांग्रेस में पटेल से ताकतवर नहीं रहे.

संघियों ने पटेल को नीचा दिखाने का ठेका ले रखा है. यह बर्दाश्त के काबिल नहीं है. लेकिन यह दिन भी देखना पड़ रहा है. पटेल ने आर एस एस को नेस्तनाबूत कर दिया था, अब आरएसएस उसी का बदला ले रहा है.

सरदार वल्लभ भाई पटेल जिंदाबाद.लौह पुरुष को नमन. हम कृतज्ञ है कि आप जैसा व्यक्ति इस धरती पर आया.


दया शंकर शुक्ल सागर-

तो सवाल है इतने विरोधों के बावजूद गांधी ने पटेल के बजाए नेहरू को क्यों चुना? जैसे कि गांधी ने कहा था कि उनके पास इसकी कई वजहें हैं. लेकिन वह वजहें न किसी ने उनसे पूछी न उन्होंने किसी को बताई. कांग्रेस में तो किसी में हिम्मत नहीं थी कि वह बापू से पूछे कि सरदार पटेल जैसे योग्य नेता को छोड़कर आपने नेहरू को क्यों चुना? जबकि सब जानते थे कि पटेल लौह पुरुष हैं. उनके पांव जमीन पर मजबूती से स्‍थापित हैं. वे जिन्ना जैसे लोगों से उन्हीं की जबान में मोलभाव कर सकते हैं. उनसे जब पत्रकार दुर्गादास ने ये सवाल पूछा तो “गांधी ने माना कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष पटेल एक बेहतर ‘नेगोशिएटर’ और ‘आर्गनाइजर’ हो सकते हैं. लेकिन उन्हें लगता है कि नेहरू को सरकार का नेतृत्व करना चाहिए.

जब मैंने उनसे पूछा कि आप ये गुण पटेल में क्यों नहीं पाते हैं? इस पर गांधी ने हंसते हुए कहा कि- जवाहर हमारे कैम्प में अकेला अंग्रेज है. गांधी को लगा मैं संतुष्ट नहीं हूं तो उन्होंने कहा-जवाहर दूसरे नम्बर पर आने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे. वे अंतराष्ट्रीय विषयों को पटेल के मुकाबले अच्छे से समझते हैं. वे इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं. ये दोनों सरकारी बेलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल हैं-इसमें अन्तरराष्ट्रीय कामों के लिए नेहरू तथा राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे. दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे.” (दुर्गादास, बसु, इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर, पृ.230)।

गांधी के इस प्रेस इंटरव्यू से दो बातें निकल कर आईं. एक ये कि नेहरू नम्बर-2 नहीं होना चाहते थे जबकि गांधी को भरोसा था कि पटेल को नम्बर 2 होने में कोई एतराज नहीं होगा. और वाकई ऐसा ही हुआ. क्योंकि पटेल मुंह फुलाने की बजाए एक हफ्ते के अंदर फिर न केवल सामान्य हो गए बल्कि हंसी मजाक करने लगे. उनकी बातों पर हंसने वालों में खुद गांधी भी शामिल थे. दूसरी बात ये कि गांधी को लगता कि अपनी अंग्रेजियत के कारण सत्ता हस्तांतरण को नेहरू पटेल के मुकाबले ज्यादा बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं. क्योंकि महात्मा गांधी ने एक और मौके पर भी यही बात कही थी कि ‘जिस समय हुकूमत अंग्रेजों के हाथ से ली जा रही हो, उस समय कोई दूसरा आदमी नेहरू की जगह नहीं ले सकता. वे हैरो के विद्यार्थी, केम्ब्रिज के स्नातक और लंदन के बेरिस्टर होने के नाते अंग्रेजों को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं.’ (महात्मा, तेंदुलकर खंड 8 पेज 3) बता दें कि बचपन में नेहरू ने लंदन के हैरो पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की थी जिसमें केवल अभिजत्य अंग्रेजों के लड़के बढ़ते हैं. हैरो वो स्कूल था जिसमें कभी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंसटन चर्चिल पढ़े थे जो गांधी को ‘अधनंगा फकीर’ कह कर कोसते रहते थे.

यहां गांधी सही थे. बाहर की दुनिया में नेहरू का नाम आजादी की लड़ाई में गांधी के बाद दूसरे नम्बर पर था. न केवल यूरोपीय लोग बल्कि अमे‌रिकी भी नेहरू को महात्मा गांधी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते थे जबकि पटेल के बारे ऐसा बिलकुल ही नहीं था. पटेल को शायद ही कोई विदेशी गांधी का उत्तराधिकारी मानता हो. लंदन के कहवा घरों में बुद्धिजीवियों के बीच नेहरू की चर्चा होती थी. तमाम वायसराय और क्रिप्स समेत कई अंग्रेज अफसर नेहरू के दोस्त थे. उनसे नेहरू की निजी बातचीत होती थी.

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6 Comments

6 Comments

  1. Anugraha Narayan pandey

    November 2, 2025 at 5:56 pm

    Kya chutiyapa wala lekh likha hai bhai

  2. Pawan

    November 2, 2025 at 9:33 pm

    सरदार पटेल को भारत रत्न मिलने में कांग्रेसियों ने 50 साल का वक्त क्यों लगाया भारत की जनता पागल नहीं है सारी बात जानती है कांग्रेसियों में केवल नेहरू गांधी की चलती थी

  3. मुश्कानंद

    November 3, 2025 at 6:01 am

    नेहरू की राजनीतिक लालच सबको पता है, आजादी की लड़ाई में सबसे बड़े अंग्रेजो के।चाटुकार और दलाल थे नेहरू। नेहरू ने न जाने कितने क्रांतिकारियों को अंग्रेजो के साथ मिलकर फांसी या काला पानी की सजा दिलवाई ।सिर्फ सत्ता पाने के लिए

  4. Sivanarayan Nayak

    November 3, 2025 at 6:15 am

    Author sir.sardar patel ki bute not sardar patel ki mute.please correct 2nd paragraph.

  5. Keshwanand kothari

    November 3, 2025 at 8:28 am

    जब नेहरू का किसी से मुकाबला नहीं था फिर गाँधी ने देश का बँटवारा धर्म के नाम पर क्यों किया और अगर करवाया तो फिर देश को हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं बनाया

  6. Santosh Agrawal

    November 3, 2025 at 9:43 am

    यह पोस्ट पूर्वाग्रह ग्रसित है। सत्य को सत्य सत्य को सत्य बताने का प्रयास किया गया है।

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