
रियाज़ हाशमी-
जो साथ रहे या साथ छोड़ गए, सभी का शुक्रिया! कईं दिनों से सोच रहा हूं, बात कहां से शुरू करूं। बिना किसी भूमिका के डॉ नवाज़ देवबंदी का यह शेर और फिर अपनी बात।
वो रुलाकर हंस ना पाया देर तक, रोकर जब मैं मुस्कराया देर तक
गुनगुनाता जा रहा था इक फ़क़ीर, धूप रहती है ना साया देर तक
कईं सालों के बाद फेसबुक पर आया हूं। इसकी कई वजहें रहीं। सबसे महत्वपूर्ण है कि मैंने अपने बेरोजगारी के दिनों को स्टडी और रिसर्च के सहारे गुजारा। पूरे 10 सालों के बाद मेरी पत्रकारिता में नौकरी के लिहाज से स्थायित्व आया है। 2013 में दैनिक जागरण से त्यागपत्र देने के बाद पूरे एक साल घुमक्कड़ी की, अध्ययन किया और अपने पराए के भेद को परखा। फिर एक साल नौकरी की तलाश की, लेकिन कुछ अड़चनें अवसरों का रास्ता रोकती रहीं। इन्हें लांघ सकता था, लेकिन यह आदत में शामिल नहीं रहा। लिहाजा, मैंने फ्रीलांस पत्रकारिता के विकल्प को इसलिए चुना कि प्रबंधन के प्रति कोई जवाबदेही न रहे।
इंडिया टुडे में तत्कालीन संपादक श्री अंशुमान तिवारी और श्री मोहम्मद वक़ास के नेतृत्व में खूब अच्छी स्टोरीज की। इंडिया टुडे का एक अंक तो मेरे जीवन में हमेशा के लिए यादगार रहेगा, जिसमें कवर से लेकर भीतर तक मेरी एक साथ 6 बाइलाइन स्टोरीज प्रकाशित हुईं। इसी बीच अमर उजाला, मेरठ प्रबंधन ने मुझे संपादकीय सलाहकार के तौर पर नियुक्ति दी और यहां भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से 6 माह बाद ही इस्तीफा देना पड़ा।
कोरोनाकाल में जब नौकरियां जा रही थीं, तब घर बैठे मुझे देश के सबसे बड़े मीडिया हाउस ‘दैनिक भास्कर’ में बतौर फ्रीलांसर काम करने का मौका मिला। चार साल में अनगिनत उपलब्धियां इस संस्थान में अर्जित कीं। दिल्ली में किसान आंदोलन, हाथरस दुष्कर्म कांड, यूपी चुनाव- 2022 और जोशीमठ त्रासदी की दैनिक भास्कर में प्रकाशित ग्राउंड रिपोर्ट्स ने यूपी और उत्तराखंड के स्थापित अखबारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। नवंबर 2023 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में सिलक्यारा टनल हादसे की ग्राउंड रिपोर्ट्स, इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट्स और ब्रेकिंग रिपोर्ट्स का ऐसा सिलसिला चला कि करीब 15 दिनों तक निरंतर दैनिक भास्कर में आल एडीशन फ्रंट पेज की लीड स्टोरी प्रकाशित होती रही। चार सालों में यह तजुर्बा हो गया कि भास्कर में काम बोलता है, सिफ़ारिश नहीं और शायद इसी वजह से बिना किसी माईबाप के मैं भास्कर जैसे संस्थान में एक नई पहचान बना रहा था।
काफी सोच विचार के बाद 19 जनवरी 2024 को मैंने दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में बतौर सीनियर स्पेशल कॉरेसपोंडेंट ज्वाइनिंग की। दैनिक भास्कर प्रबंधन का मैं बेहद आभारी हूं। खासतौर पर इसलिए भी कि जिस नेचर का काम मैं चाहता था, मुझे मिला। ज्वाइनिंग के बाद कईं अच्छी नेशनल इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज कर चुका हूं, लेकिन अभी इससे ज्यादा करना है। जिनमें चुनावी बांड पर मेरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी ‘आमदनी चवन्नी, चंदा रुपैया’ हर किसी की ज़बान पर है। मैं सभी साथियों का दिल से शुक्रगुजार हूं, जो बुरे दौर में भी मेरे साथ खड़े रहे और हर तरह से मेरा सहारा बने। उन तमाम साथियों का भी दिल से शुक्रिया, जो मुझे आउटडेटेड मानकर साथ छोड़ गए या संपर्क में नहीं रहे। मैं उन लोगों को भी नहीं भूला, जो रास्ते में मुंह फेर लिया करते थे। शायद ऐसे साथियों और लोगों की बदौलत ही मैं मीडिया इंडस्ट्री में फिर से स्थायित्व हासिल कर सका। इनसे सीख न मिलती तो ज़िंदगी में कईं बड़ी ग़लतफहमियां साथ चलती रहती। रास्ता बदलने या मुंह मोड़ने वालों से अब क्या शिकवा। सब भले के लिए होता है।
आप सभी से एक गुजारिश है- अगर आप महसूस करते हैं कि नेशनल स्तर पर किसी खास विषय पर इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी की जा सकती है, तो आप मुझे तुरंत संदेश कर सकते हैं। इस मामले में वे तमाम साथी खासतौर पर मददगार हो सकते हैं, जो आरटीआई एक्ट के तहत जानकारियां हासिल करते हैं।
एक बार फिर आप सभी साथियों का दिल की गहराईयों से बेहद शुक्रिया। दुआ करें कि यह पारी लंबी चले और कभी किसी के आगे झुकना न पड़े। आप सबको भी ढेर सारी दुआएं। चलते-चलते एक नई खुशखबरी भी सुन लीजिए- इंटरनेशनल सब्जेक्ट पर एक किताब लिख चुका हूं, जल्द ही प्रकाशित होगी। दूसरी किताब लिख रहा हूं, जो अगले कुछ महीनों में पूरी हो जाएगी। और इस शेर के साथ बात खत्म-
मक़तल की तरफ आते, और तेज़ क़दम आते
आवाज़ तो दी होती, हम तेरी क़सम आते
ऐ जज़्बा-ए-खुद्दारी! झुकने ना दिया तूने
लिखने के लिए वर्ना सोने के क़लम आते
(मक़तल- क़त्ल करने का स्थान)


