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सुख-दुख

पत्रकारिता के दो अध्याय!

रंगनाथ सिंह-

ताजा रुझान के अनुसार ब्रिटेन में फाइनेंशियल टाइम्स जीत की तरह बढ़ रहा है। इतने बड़े अखबार को पहली ही लाइन में झूठ नहीं बोलना चाहिए था कि उनकी कोई तयशुदा तरफदारी नहीं है लेकिन यह अच्छी बात है कि उन्होंने इस बार साफ बता दिया कि वे किस तरफ हैं।

14 साल तक अपनी नापसन्द पार्टी को सत्ता में देखना किसी के लिए भी कष्टकारी हो सकता है। कष्ट से मुक्ति की कामना हर मनुष्य का अधिकार है। घाघ से घाघ मनुष्य अपनी इच्छाओं से जाहिर हो जाता है। एफटी भाई भी हो गये।

एक और बात, बाबा पर केस कचहरी वाली पिछली पोस्ट मैं वापस ले रहा हूँ। पोस्ट लिखते समय मुझे बाबा का पूरा नाम नहीं पता था। बाद में पता चला कि बाबा पूरी तरह सेकुलर हैं और सामाजिक न्याय को समर्पित हैं। जैसा कि एक राज्य सभा सांसद ने कहा कि हादसे होते रहते हैं। जैसा कि एक पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, सत्ताधारी के लिए काम करने वाले पत्रकार ऐसे सवाल पूछ रहे हैं। मैं भी इस मामले को अब वैसे ही देख रहा हूँ।

वैसे भी पत्रकारों के लिए उनके पापा जो खुद भी मुख्यमंत्री रहे हैं, सबसे अच्छे नेता रहे हैं। पत्रकारों को जितने पुरस्कार, फ्लैट और प्लॉट उन्होंने दिये उतने किसी अन्य सरकार ने दिये हों तो मान लीजिए कि ये मेरे पांचवी पास करने से पहले हुआ होगा।

यह भी याद दिलाना जरूरी है कि उनके जमाने में थाने और जिला मुख्यालय वाले भी पत्रकारों की ज्यादा इज्जत करते थे। पता नहीं, पत्रकारों के वे सुनहरे दिन लौटेंगे या नहीं लेकिन फिलहाल मैं वह पोस्ट वापस लेकर सामाजिक न्याय में अपना योगदान दे रहा हूँ।

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