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पूरी दुनिया में 75% महिला पत्रकारों को ऑनलाइन अब्‍यूज और हिंसा का सामना करना पड़ता है!

बेआवजों की आवाज ही निशाने पर : जवाबदेही किसकी?

निमिषा सिंह-

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा जो अंततः निर्भर करता है इस एक सवाल पर …हम आपके लिए क्या कर सकते हैं? हम पत्रकार उन लोगों की आवाज़ बनते है जिनके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा होता है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने में सशक्त बनाते हैं। सूचना के प्रसार के साथ-साथ हम मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करते है जिससे जवाबदेही तय करने में मदद मिलती है किन्तु बात जब पत्रकारों की सुरक्षा और उनके मानवाधिकार पर प्रहार की हो तो जवाबदेही किसकी?

निःसंदेह मौजूदा समय में पत्रकारिता उच्च जोखिम और कम वेतन वाली नौकरियों का पर्याय बन गई है। कार्य दिवसों और साप्ताहिक अवकाशों के मामले में काम करने की परिस्थितियाँ और निरंतर मिल रही धमकियां यकीनन हमारे लिए अप्रिय होती हैं बावजूद इसके हम डटकर सच के साथ खड़े हैं पर आखिर कब तक? ज्ञात हो कि पिछले दस वर्षों में देश में पत्रकारों पर हमलों और हत्याओं के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। सच्चाई और सच बोलने वालों को निरंतर निशाना बनाया जा रहा है। इस विषय के गंभीरता को देखते हुए गत सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 30 अगस्त 2025 को केरल एवं मणिपुर तथा 21 सितंबर 2025 को त्रिपुरा में अलग-अलग जगहों पर तीन पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमले के बारे में मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया और इसी क्रम में तीनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से दो सप्ताह के भीतर मामले पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा।

ज्ञात हो कि त्रिपुरा में एक पत्रकार पर कुछ बदमाशों ने लाठियों और धारदार हथियारों से उस समय हमला किया जब वह पश्चिमी त्रिपुरा के हेज़ामारा इलाके में एक राजनीतिक दल के वस्त्र वितरण कार्यक्रम में शामिल हो रहे थे। मणिपुर में सेनापथी ज़िले के लाई गांव में एक पुष्प उत्सव की कवरेज के दौरान एक पत्रकार को एयर गन से दो बार गोली मारी गई। केरल में थौदुपुझा के पास मंगट्टुकवाला में एक पत्रकार पर लोगों के एक समूह ने हमला किया। अफसोस कि इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर कई जानलेवा हमले हुए लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने उनका कोई संज्ञान नहीं लिया था।

खैर देर से ही सही किसी ने तो पत्रकारों की सुध ली। कहते है कि जब पत्रकार सच्चाई के लिए खड़े होते हैं, तो दुनिया उसके साथ खड़ी हो जाती है। अब यह सब बातें सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती है। सच्चाई तो यह है कि कई पत्रकार जान का खतरा देखते हुए संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने से अब पीछे हटने लगे हैं।

दुनिया भर में पत्रकारों की असुरक्षा के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स‘ के अनुसार, 1992 से अब तक 1400 से अधिक पत्रकारों की हत्या कर दी गई। उनमें से 890 से अधिक पत्रकारों के किसी भी हत्यारे को कभी न्याय के कटघरे में लाया तक नहीं गया। दोषियों पर कार्रवाई नहीं किया जाना उन्हें दंड से मुक्ति देने के ही समान है।

पिछले कुछ दशकों में भारत में बड़ी संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई जिनमें पिछले 20 वर्षों (2003-2022) में 1668 पत्रकारों की मौत दर्ज की गई है जो औसतन प्रति वर्ष 80 की दर से है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2025 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर कही गई टिप्पणी में लिखा है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की मीडिया एक अनौपचारिक आपातकाल की स्थिति में आ गई है।

सरकार से आलोचना करने वाले पत्रकारों को नियमित रूप से ऑनलाइन उत्पीड़न धमकी और शारीरिक हमले के साथ-साथ आपराधिक मुकदमों और मनमानी गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है। इस साल 2025 की शुरुआत छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चन्द्राकर की हत्या की खबर से हुई। 2025 में ही अन्य कई पत्रकारों की हत्या की रिपोर्ट आई जिनमें मुकेश चंद्राकर, राघवेंद्र बाजपेयी और एक ओडिशा के पत्रकार शामिल हैं। मुकेश चंद्राकर जिनका शव 3 जनवरी 2025 को, छत्तीसगढ़ में एक सेप्टिक टैंक में मिला था। जुलाई 2025 को ओडिशा के एक पत्रकार नरेश की कार पर हमला कर उनकी हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह सड़क ठेके से जुड़े भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। दैनिक जागरण के राघवेंद्र बाजपेयी जिनकी मार्च 2025 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

सितंबर 2025 को राजीव प्रताप नामक एक पत्रकार का शव उत्तराखंड की भागीरथी नदी में मिला। वह पिछले दस दिनों से लापता थे और कथित तौर पर एक स्वतंत्र पत्रकार थे जो मुख्य रूप से भ्रष्टाचार और सरकारी कुप्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर काम करते थे।

चिंताजनक है कि पिछले दस वर्षों में मारे गए पत्रकारों में ज्यादातर पत्रकार पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर सवाल उठा रहे थे। भारत में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए हैं लेकिन इन मामलों में सजा की दर कम है। यह एक गंभीर समस्या है जिस पर सरकार और समाज दोनों को ध्यान देने की ज़रूरत है। विगत कुछ वर्षों में पत्रकारों की हत्या और जानलेवा हमलों की सूची लंबी होती जा रही है।

2015 में फ्रीलांसर जगेंद्र सिंह जो अवैध रेत खनन पर काम कर रहे थे। पुलिस छापे के दौरान गंभीर रूप से जलने से उनकी मृत्यु हो गई थी। 2016 में उत्तर प्रदेश में जनसंदेश टाइम्स के रिपोर्टर करुण मिश्रा और बिहार में हिंदुस्तान के रिपोर्टर रंजन राजदेव की अवैध खनन गतिविधियों पर काम करने के कारण गोली मारकर हत्या कर दी गई। 2018 में मध्य प्रदेश में स्थानीय टीवी चैनल न्यूज़ वर्ल्ड के लिए रेत माफिया की रिपोर्टिंग कर रहे रिपोर्टर संदीप शर्मा को एक डंपर-ट्रक ने जानबूझकर कुचलकर हत्या कर दी। 2020 में लखनऊ में कंपू मेल स्थानीय समाचार पत्र के रिपोर्टर शुभम मणि त्रिपाठी जो माफिया द्वारा अवैध कब्जे पर सवाल उठा रहे थे। उनकी भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

मई 2022 में बिहार में सुभाष कुमार महतो एक स्वतंत्र पत्रकार को रेत माफिया पर उनकी रिपोर्टिंग के कारण उनके घर के बाहर चार अज्ञात हत्यारों ने सिर में गोली मार दी थी। यह सारी हत्याएं एक ईमानदार पत्रकार होने की कीमत और देश के प्रहरी की रक्षा करने में राष्ट्र की विफलता जैसे सवाल उठाती हैं। भारत में पत्रकारों की अक्सर भ्रष्टाचार, अपराध और शक्तिशाली लोगों या संगठनों के अनकहे सच को उजागर करने के कारण हत्या कर दी जाती है। संगठित अपराध और राजनेताओं के साथ उसके संबंधों को कवर करने का साहस करने वाले भारतीय पत्रकारों को हिंसा का सामना करना पड़ा है।

कुछ मामलों में अतिवादी राजनीतिक समूहों ने धार्मिक विचारधारा या धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध उनके रुख के कारण पत्रकारों को निशाना बनाया है। पत्रकारों के साथ कुछ भी हो सकता है। पत्रकारों को अगवा किया जा सकता है। धमकी दी जा सकती है या फिर जबरन गायब कराया जा सकता है। संघर्ष या समाचार घटनाओं को कवर करने वाले पत्रकारों को ख़ास तौर पर उग्र भीड़, धार्मिक संप्रदायों के समर्थकों, राजनीतिक दलों छात्र समूहों, यहां तक कि पुलिस द्वारा निशाना बनाया जाता है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के अनुसार पत्रकारों को अनुचित दबाव का सामना करना पड़ता है। 2025 की विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में से 159वें स्थान पर है। यह लगातार गिरती प्रेस स्वतंत्रता के कारण है। पिछले दस वर्षों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए नए खतरे भी उभरे है जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। साइबर उत्पीड़न, सुनियोजित नफ़रत भरे अभियान, ट्रोल और डीपफ़ेक पत्रकारों के काम को बदनाम करने के व्यापक हथियार बन गए है विशेष रूप से महिला पत्रकारों के विरुद्ध। महिला पत्रकार उन खतरों का सामना तो करती ही हैं जिनका सामना अन्य पत्रकार करते हैं साथ ही उन्हें कई अन्य तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है जिनमें ऑनलाइन और ऑफलाइन यौन उत्पीड़न, लैंगिक भेदभाव, घृणास्पद भाषण और शारीरिक हिंसा शामिल है।

महिला पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा के वैश्विक संकट का एक प्रतीकात्मक मामला भारत में देखा गया जहां कई महिला पत्रकारों को 2021 में सुली डील्स’ ऐप पर और फिर 2022 में बुल्ली बाई’ ऐप पर नीलामी के लिए सूचीबद्ध किया गया था। पूरी दुनिया में 75 फीसदी महिला पत्रकारों को ऑनलाइन अब्‍यूज और हिंसा का सामना करना पड़ता है। 18 फीसदी महिला पत्रकार सेक्‍सुअल वॉयलेंस यानी यौन हिंसा का शिकार होती हैं. यह कहना है यूनेस्‍को (Unesco) की एक नई रिपोर्ट का जिसमें 15 देशों की महिला पत्रकारों का सर्वे किया गया है।

मीडिया के इस पुरुष प्रधान पेशे में महिलाओं के साथ शुरुआत से दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा है। शोषण और अत्याचार के कई प्रकरण है जिसकी वजह से महिला पत्रकारिता के पेशे से दूर हो रही हैं। तहलका के पूर्व संपादक तेजपाल पर 2014 में अपने ही महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। एक अन्य मामले में जून 2014 में इंडिया टीवी एंकर शर्मा ने चैनल कैंपस के बाहर जाकर जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। उन पर वरिष्ठ सहयोगी द्वारा राजनेताओं और कारपोरेट जगत के बड़े लोगों से मिलने और गलत संबंध बनाने के लिए दवाब डाला जा रहा था। महिला पत्रकारों को ना केवल संस्थान के अंदर बल्कि रिपोर्टिंग के दौरान बाहर भी दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

गौरी लंकेश जैसी दबंग महिला पत्रकार की, 2017 में बेंगलुरु में गोली मारकर हत्या कर दी गई। सत्तारूढ़ दल से जुड़े अति-दक्षिणपंथी नेटवर्कों द्वारा अत्यधिक हिंसक ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होने के बाद सितंबर 2017 में बेंगलुरु में उनके घर के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह भारत में सबसे हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक था और इसके बाद कई विरोध प्रदर्शन हुए। सौम्या विश्वनाथन जिनकी हत्या 2008 में दिल्ली में कर दी गई थी। 2023 में, पांच लोगों को इस मामले में दोषी ठहराया गया था। 2010 में महिला पत्रकार निरुपमा पाठक की लाश कोडरमा में मिली ।

2017 दिल्ली में अपर्णा कालरा पर पार्क में सैर के दौरान जानलेवा हमला हुआ। गौरी लंकेश की हत्या के बाद से महिला पत्रकारों को एक सुरक्षित कामकाजी वातावरण उपलब्ध कराने के प्रयास जारी हैं परंतु कानून कम हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस ओर जल्द ही कोई ठोस कदम उठाया जा सकेगा। फिलहाल इस हेतु अलग से कोई कानून नहीं है। अभी ऐसे अपराधों को भारतीय दंड संहिता और कार्यक्षेत्र में महिलाओं के प्रति होने वाले यौन-शोषण अधिनिमय 2005 के अंतर्गत ही दर्ज किया जाता है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने 2025 के अभियान में भारत में पत्रकारों का सामूहिक उत्पीड़न भी शामिल है। इससे पूर्व 2015 में भी रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में पत्रकारों के लिए भारत को तीसरा सबसे खतरनाक देश बताया था। उस वर्ष देश में नौ पत्रकारों की हत्या हुई थी, जो युद्धग्रस्त सीरिया और इराक से पीछे था। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF)एक पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है जो दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

जहां तक सवाल है विभिन्न पत्रकार संगठनों का तो पत्रकारों के सभी प्रश्नों चाहे वह उनके रोजगार का हो या उनकी सुरक्षा का उनकी तरफ से खामोशी है।। कुछ पत्रकार मानते हैं कि अगर पत्रकार संगठन इसी तरह ख़ामोश रहे तो भविष्य में स्वतंत्र पत्रकारिता करने में और कठिनाई होगी। स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अब देखना यह है की पत्रकार कितनी एकजुटता से हालात का सामना करते हैं वरना रोज़ एक पत्रकार को निशाना बनाया जायेगा।

स्वतंत्र पत्रकारिता का धीरे-धीरे गला घोंट दिया जाएगा और नागरिकों के मुद्दे उठाने वाले ख़त्म हो जाएँगे। हालांकि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा के मामले को लेकर लगातार आवाज़ उठाया जाता रहा है। विरोध प्रदर्शन किया गया है पर सच्चाई यही है कि पत्रकारों को सुरक्षा की चुनौतियाँ झेलनी पड़ रही हैं। इन हालातों में पिछले सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमले का स्वतः संज्ञान लेना एक सकारात्मक पहल है।

हम पत्रकार जनता के सेवक होते हैं। हमारी सुरक्षा सिर्फ हमारा मुद्दा नहीं बल्कि लोकतंत्र और जनता के अधिकारों का भी मुद्दा है। जनता के पास पत्रकारिता को देने के लिए अगर कुछ है तो वह है उनका समर्थन। जनता का समर्थन एक पत्रकार को स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर काम करने की शक्ति देता है जिससे वह सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह ठहरा सके। मुमकिन है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर होने वाले राजनीतिक हमलों पर भी रोक लग सके।

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2 Comments

2 Comments

  1. Aditi

    November 2, 2025 at 9:44 am

    Its hard to work in News, First male staff dont want to hire, even out of 10 – 2 got hired, they face all this in whole career, no matter where you stand

  2. Shiv shankar Sarthi

    November 2, 2025 at 7:03 pm

    उम्दा लेख

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