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सुख-दुख

बनारस के अख़बार में पत्रकारिता की मेरी पहली सुबह!

रामधनी द्विवेदी-

पत्रकारिता में आना : जब मैंने मिर्जापुर के स्‍कूल को छोड़ने का फैसला लिया तो किसी को अच्‍छा नहीं लगा, न मेरे श्‍वसुर जी को न सास को और न ही मेरी पत्‍नी को। मैं सीधे मिर्जापुर से बनारस पहुंचा। वैसे एक दिन बाद शनिवार को आना ही था लेकिन मैं एक दिन पहले ही आ गया था। रात दस बजे अचानक मेरे पहुंचने पर लोग चौंक गए थे। सबने सोचा कि कुछ गड़बड़ हो गई। लगता है कि ससुर दामाद में नहीं पटी। असलियत यह थी कि मेरा मन वहां नहीं लग रहा था और मैं श्‍वसुर जी से एडजस्‍ट भी नहीं कर पा रहा था। अकेले रहने की व्‍यवस्‍था नहीं हो पा रही थी। एक दिन ससुराल में रहने के बाद मैं दूसरे दिन गांव आ गया। वहां भी लोग आश्‍चर्य में पड़ गए कि मैं मास्‍टरी छोड़ कर क्‍यों चला आया। नवंबर का महीना था। मैं पूरी तरह खेती में रमने की तैयारी करने लगा। खेती के गुर सीखने की कोशिश करने लगा।

मेरे दादा जी जिनका नाम सिरताज दुबे था लेकिन दाहिने हाथ में अंगूठे के पास एक अतिरिक्‍त अंगुली होने के कारण लोग उन्‍हें छांगुर दुबे कहते, तब जीवित थे। वे किसानी के मेरे पहले गुरू थे। उनके बारे में इसके पहले मैं विस्‍तार से लिख चुका हूं। एक साल पहले कानपुर से गांव आने पर मैंने उनसे ही खेती का ककहरा सीखा था। खरीफ का सीजन खत्‍म हो गया था और रबी की तैयारी शुरू हो गई थी। मैं भी उसमें लग ही रहा था कि नवंबर के आखीर में बनारस से मेरी पत्‍नी के फूफा जी का पत्र आया। वह मुझे बहुत अधिक चाहते थे। उन्‍होंने लिखा कि मैंने तुम्‍हारी रुचि की नौकरी की पृष्‍ठभूमि तैयार कर दी है। यहां से एक नया अखबार निकलता है-जनवार्ता, उसमें प्रशिक्षु उपसंपादक की भर्ती होनी है। मैंने तुम्‍हारी ओर से आवेदन कर दिया है। उसमें एक लिखित परीक्षा होगी, उसके बाद नियुक्ति होगी।

तब तक मैं अखबार के नाम पर कानपुर से निकलने वाले दैनिक जागरण और बनारस के आज को ही जानता था। कानपुर में रहने के कारण हम लोगों की आदत जागरण ही पढ़ने की थी। अंग्रेजी में सिर्फ नेशनल हेराल्‍ड का ही नाम सुना था। वह भी इसलिए क्‍योंकि उसमें ही उन दिनों यूपी बोर्ड का रिजल्‍ट छपता।

मैं उनके पत्रसे न तो उत्‍साहित हुआ और न ही निराश, क्‍योंकि तब तक मैं जानता ही नहीं था कि उप संपादक क्‍या होता है और उसे क्‍या काम करना होता है। लेकिन फूफा जी के इस पत्र ने ही मेरे पत्रकार होने की नींव तैयार, की तब तक मैं कुछ तुकबंदी करने की कोशिश करता था, और उपन्‍यास- कहानी पढ़ने में रुचि लेता था। उन्‍हें लगा होगा कि इसकी शायद लिखने पढ़ने में रुचि है—मैने अपने इंटर की पढ़ाई के दिनों में जासूसी उपन्‍यास लिखने की कोशिश की थी, जो 15-20 पेजों के आगे नहीं बढ़ पाया।

अचानक एक दिन जनवरी 1973 के शुरू में फूफा जी का पत्र आया कि तुम्‍हें कोई सूचना गई कि नहीं। यहां 18 जनवरी को परीक्षा है। शायद यह पत्र 18 जनवरी के कुछ समय पहले ही मिला था और मैं 18 की सुबह बनारस पहुंच गया। फूफाजी मूझे लेकर जनवार्ता के कार्यालय काशीपुरा गए। जब हम लोग उसकी सीढि़यां चढ़ रहे थे तो दो लोग ऊपर से नीचे आते मिले। उन्‍होंने हम लोगों के आने का मकसद पूछा और हमारे बताने पर उन्‍होंने पराड़कर भवन जाने के लिए कहा, जहां परीक्षा होनी थी। हम लोग वहां पहुंचे। मुझे बनारस के भूगोल की कोई जानकारी नहीं थी।

फूफा जी ही मुझे लेकर पराड़कर भवन पहुंचे जो काशी पत्रकार संघ का दफ्तर था। बाद में पता चला कि जो दो लोग मुझे जनवार्ता की सीढि़यों से उतरते मिले थे, उनमें एक श्री ईश्‍वरदेव मिश्र और दूसरे श्री हनुमान प्रसाद शर्मा थे, जिन्‍हें लोग मनु शर्मा के नाम से जानते थे। वह जनवार्ता में प्रतिदिन संपादकीय पेज पर एक कविता संकटमोचन नाम से लिखते थे जो बाद में पता चला। वह जनसत्‍ता के पत्रकार हेमंत शर्मा के पिता थे।

पराड़कर भवन में मेरी तरह कुल 40 लोग प्रशिक्षु पत्रकार बनने आए थे। इससे पता चलता है कि बेरोजगारी उस समय भी आज की ही तरह थी। हमें पराड़कर भवन के हाल में बैठाया गया। एक पेपर दिया गया जिसमें एक अंग्रेजी से हिंदी और एक हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद, कुछ सामान्‍य ज्ञान के सवाल और एक टुकड़ा हिंदी में यह लिखने के लिए कि आप पत्रकार क्‍यों बनना चाहते हैं। समय दो घंटे का था और कठिन अंग्रेजी शब्‍दों के लिए शब्‍दकोश भी दिया गया। मैंने तय सीमा के पहले ही कापी जमा कर दी। चूंकि मैने (बायोलॉजी) से बीएससी किया था और उस समय विज्ञान की किताबें हिंदी में नहीं होती थीं, इसलिए अंग्रेजी में साइंस पढ़ने से अंग्रेजी बहुत अच्‍छी नहीं तो खराब भी नहीं थी।

मेरी शादी हो चुकी थी और शादी में मुझे उपहार में अन्‍य सामान के अलावा बुश कंपनी का एक ट्रांजिस्‍टर मिला था। मेरी आदत बीबीसी सुनने की हो गई थी। रात साढ़े सात बजे वाले कार्यक्रम में दो दिन पहले ही पत्रकारिता के महत्‍व पर एक वार्ता प्रसारित हुई थी। मुझे उसकी बातें याद थीं जो उस दिन की परीक्षा में काम आईं। बीबीसी सुनने की आदत ने सामान्‍य ज्ञान के सवाल हल करने में मदद की। उस दिन पहली बार मैंने जाना कि देश-दुनिया के बारे में जानकारी रखना कितना उपयोगी होता है। बाद में समझ में आया कि पत्रकार के लिए अपना ज्ञान बढ़ाते रहना, उसकी सफलता का पहला मंत्र है। लिखित परीक्षा लेने के बाद वहीं इंटरव्‍यू भी हुआ। उसमें सर्वश्री ईश्‍वरदेव मिश्र, श्‍यामा प्रसाद शुक्‍ल प्रदीप, हनुमान प्रसाद शर्मा मनु, ईश्‍वरचंद्र सिन्‍हा और जनवार्ता मालिक बाबू भूलन सिंह भी थे।

इंटरव्‍यू के लिए अकार आदि से नाम बुलाए गए। मेरा नाम र से था, इसलिए मेरा नंबर बाद में आया। जैसा सभी इंटरव्‍यू में होता है, जो भी बाहर निकलता उससे अंदर पूछे गए सवालों के बारे में पूछा जाता। जब मेरा नंबर आया तो मुझसे आधा घंटा से अधिक बात की गई-पढ़ाई के बारे में, परिवार के बारे में, शादीके बारे में, सौ रुपये में कैसे खर्च चलेगा आदि आदि—वह हमें सौ रुपये महीने देने वाले थे और छह महीने बाद इसे दो सौ रुपये करने का वादा किया गया था–जो पूरा नहीं हुआ। छह महीने बाद सिर्फ 25 रुपये बढ़े थे।

खैर, इंटरव्‍यू में मनु शर्मा जी ने एक रोचक सवाल पूछा–कहते हैं कि इंसान का पूर्वज बंदर है, इसपर आपका क्‍या कहना है। मैने जो उत्‍तर दिया वह आज भी याद है।

मैने कहा– वैज्ञानिक यह तो नहीं कहते कि इंसान का पूर्वज बंदर है। लेकिन डार्विन नामक वैज्ञानिक ने दुनिया के जीवजंतुओं के अध्‍ययन के बाद विकासवाद का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया, उसके अनुसार धरती पर जितने भी जीव हैं, उनमें शारीरिक संरचना में मनुष्‍य के सबसे निकट जो प्राणी लगता है, वह एप है जो वानरों की एक उन्‍नत प्रजाति है। इससे उनका अनुमान लगाया गया कि बहुत मुमकिन है, यही एप विकास की प्रक्रिया में आगे चलकर मानव हो गए हों। लेकिन यह प्रक्रिया लाखों साल में हुई होगी क्‍योंकि मेरे दादाजी लगभग सौ साल के, पिता जी 50 साल के और 25 साल का मैं हूं—और इनमें से किसी ने किसी बंदर को आदमी होते नहीं देखा है।

बाद में डा अरविंद मिश्र के सौजन्‍य से, इलाहाबाद विवि में जब वह रिसर्च स्‍कालर थे और मैं अमृत प्रभात में विज्ञान पर पेज निकालने के क्रम में उनसे मिला तो डिस्‍मांड मोरिस की किताब पढ़ने को मिली- नेकेड एप, जिसमें मनुष्‍य और वानर (एप) के आचार व्‍यवहार की तुलना की गई है और बताया गया है कि मनुष्‍य बहुत कुछ अपने आचार-व्‍यवहार में वानर की तरह ही है।

मेरे आखिरी वाक्‍य पर जोर की हंसी हुई। मनु शर्मा ने कहा–क्‍या बात कही। भूलन सिंह शायद काफी देर से बैठे रहने से ऊब रहे थे। उन्‍हानें जल्‍द फैसला लेने के लिए कहा जिसपर प्रदीप जी ने कहा– कल काशीपुरा दफ्तर में सुबह साढ़े दस बजे मिलिए। ईश्‍वरदेव जी ने कहा–वहीं जहां सुबह मिले थे। मैं सबसे नमस्‍ते कर बाहर आ गया। बाहर कुछ और प्रत्‍याशी बैठे थे। मेरा इंटरव्‍यू लंबा चला था। फूफा जी भी बाहर इंतजार कर रहे थे। मैं उनके साथ ससुराल चला गया। उनसे इंटरव्‍यू की बात बताई तो उन्होंने कहा कि तुम्‍हारा सेलेक्‍शन हो गया, नहीं तो कल दफ्तर में न बुलाते। मेरे मन को भी ऐसा ही लगा। काफी बाद में समझ में आया कि जब इंटरव्‍यू में बाद में सूचना देने को या पत्र (आजकल ई मेल करने) से सूचित करने को कहा जाए तो समझना चाहिए कि मामला ठीक नहीं है, और बात नहीं बनी।

मैं जब चंडीगढ़ से हिंदी ट्रिब्‍यून खुलने के पहले उसके लिए इंटरव्‍यू देने गया था तो पूरी बात पक्‍की हो जाने के बाद आवास या भत्‍ता देने पर बात अटक गई। मैं उनकी कालोनी में आवास मांग रहा था, वे खाली न होने की बात कह रहे थे और उसके बदले डेढ़ सौ रुपये भी देने पर तैयार नहीं थे (1978 में) और मुझसे प्रभु भाटिया ने जो चीफ एडीटर थे और इंटरव्‍यू में भी बैठे थे, कहा कि आपको सूचना दी जाएगी और मैं महीनों उनकी सूचना का इंतजार ही करता रहा।

बाद में जब मैंने पत्र लिखा तो उसके जवाब में उन्‍होंने कहा कि आपको तो संकेत दे दिया गया था। तब समझ में आया कि आपको बाद में बताया जाएगा या आपके पास मेल जाएगी का आशय क्‍या होता है।

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