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जानिये, पत्रकारिता या पत्रकार की निष्पक्षता कब संदिग्ध हो जाती है!

शीतल पी सिंह-

पत्रकारिता के बारे में मेरी राय… पत्रकार की सीमा इस बात पर निर्भर करती है कि उसका प्राथमिक कर्तव्य क्या है: तथ्यों को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करना और जनता को सूचित करना। पत्रकार का मुख्य कार्य सवाल पूछना, तथ्यों की जांच करना, और समाज को सटीक, विश्वसनीय जानकारी प्रदान करना है। उसे सत्ता, राजनीतिक दलों, या नेताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सवाल उठाने चाहिए, न कि उनकी नीतियों को निर्देशित करने या सलाह देने की भूमिका निभानी चाहिए।

पत्रकार को अपनी व्यक्तिगत राय या पक्षपात से बचना चाहिए। उसका काम तथ्यों को बिना तोड़-मरोड़ के प्रस्तुत करना है, न कि किसी राजनीतिक दल या नेता का समर्थन या विरोध करना।

पत्रकार का दायित्व है कि वह जनता को सही और प्रासंगिक जानकारी दे। सलाह देना या नीति निर्माण में हस्तक्षेप करना उसकी भूमिका से बाहर है, क्योंकि इससे उसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।

पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों (जैसे, सत्य, निष्पक्षता, और स्वतंत्रता) का पालन करना अनिवार्य है। सलाह देना या किसी दल के लिए रणनीति बनाना पत्रकारिता के दायरे से बाहर जाता है और इसे प्रचार या लॉबिंग के रूप में देखा जा सकता है।

पत्रकार का राजनीतिक दलों या नेताओं को सलाह देना उचित नहीं है। ऐसा करने से:

  • उसकी निष्पक्षता संदिग्ध हो सकती है।
  • जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता कम हो सकती है।
  • पत्रकारिता का उद्देश्य, जो है सत्ता को जवाबदेह बनाना, कमजोर पड़ सकता है।

हालांकि, कुछ संदर्भों में, जैसे विश्लेषणात्मक लेखन या संपादकीय में, पत्रकार सामाजिक या नीतिगत मुद्दों पर सुझाव दे सकते हैं, लेकिन यह भी सामान्य जनहित के लिए होना चाहिए, न कि किसी विशिष्ट दल या नेता के लिए।

पत्रकार को सवाल पूछने, तथ्यों को उजागर करने, और जनता को सूचित करने तक सीमित रहना चाहिए। सलाह देना या राजनीतिक रणनीति में शामिल होना पत्रकारिता की मूल भावना के खिलाफ है और इससे उसकी स्वतंत्रता व विश्वसनीयता को नुकसान पहुँच सकता है।

(इस पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है और बिना अभद्रता के आपका यह अधिकार सुरक्षित है कि आप मेरी भी आलोचना करें जो मुझे खुद को दुरुस्त करने में मदद करेगी। फ़ेसबुक और अन्य सोशल मीडिया के प्लेटफार्म मेरी नागरिक के रूप में हस्तक्षेप को प्रतिबिंबित करते हैं, इसे पत्रकारिता में न शामिल करें। यहां मैं कुछ इतर भी करता हूं।)


महावीर प्रसाद-

पत्रकारिता टेलिविजन चैनलों पर तो बिल्कुल ही खत्म हो चुकी है, Navika Kumar Sushant Sinha Rubika Liyaquat Amish devgan पूरा रिपब्लिक भारत, इंडिया टीवी को क्या कोई ३० मीनट लगातार देख सकता है। पत्रकारिता बिल्कुल ही खत्म हो गई है।

आशुतोष पांडेय-

सर आज की पत्रकारिता मे सूचना बची ही नहीं प्रोपोगेंडा चलता है.. सुबह एक पर्ची थमा दी जाती है दिन भर उसी के आसपास घूमती है पत्रकारिता.. बहुत अफ़सोस होता है सर आज की पत्रकारिता को देख कर.. मैं ये मानता हूँ कोई भी निष्पक्ष नहीं हो सकता लेकिन इतना one sided भी नहीं होना चाहिए कम से कम अपना धर्म तो ईमानदारी से निभाए… आपलोगों को सुनकर बहुत अच्छा लगता है सर

मनोज रैदास-

पत्रकार कभी निष्पक्ष नही हो सकता। उसे चिर विपक्ष में ही रहना चाहिए । विपक्ष यानि जनता का पक्ष ही उसका पक्ष होना चाहिए। पत्रकार को यदि सरकारों का पक्ष सही लगने लगे तो उसे मान लेना चाहिए कि अब वो पत्रकार नही रहा।

मनोज रैदास कबीर यहां संदर्भ तथ्यों की निष्पक्षता से है। जैसे चुनाव कवर कर रहे हों और बीजेपी जीत रही हो तो उसको हारता हुआ बताने की स्टोरी गढ़ना (इसलिए कि आपके विचार से विपरीत है)! यदि आप तथ्यों के प्रति ईमानदार होते हैं तो अपने आप जन पक्षधर हो जाते हैं (नारा न लगाने के बावजूद)! – शीतल पी सिंंह

रामानंद राय-

आपके लेख में आपने पत्रकारिता की असली परिभाषा और दायरे को बहुत स्पष्ट किया है। लेकिन आज जो “गोदी मीडिया” हो रहा है, वह ठीक इसके उलट है।

जहाँ पत्रकार का काम सवाल पूछना और सत्ता को जवाबदेह ठहराना होना चाहिए, वहाँ गोदी मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय जनता से सवाल पूछ रहा है। वे विपक्ष को कठघरे में खड़ा करते हैं, लेकिन सत्ता से असुविधाजनक प्रश्न गायब रहते हैं।

जहाँ पत्रकार को तथ्यों को बिना तोड़-मरोड़ के पेश करना चाहिए, वहाँ गोदी मीडिया तथ्यों से ज़्यादा “नैरेटिव” गढ़ने और उसे आगे बढ़ाने में व्यस्त है। कई बार खबरें आधी-अधूरी या एकतरफ़ा तरीके से दिखाई जाती हैं ताकि सत्ता के पक्ष में माहौल बने।

जहाँ पत्रकार को तटस्थ और स्वतंत्र होना चाहिए, वहाँ आज कई चैनल और अख़बार सत्ता के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। वे न सिर्फ नेताओं की नीतियों को जस्टीफाई करते हैं, बल्कि कई बार उन्हें सलाह भी देते नज़र आते हैं—जो कि आपके लिखे अनुसार पत्रकारिता का असली काम नहीं बल्कि प्रचार और लॉबिंग की श्रेणी में आता है।

आपने सही कहा—पत्रकार का काम “सलाहकार” या “रणनीतिकार” होना नहीं है। लेकिन गोदी मीडिया ने पत्रकारिता को उसी में बदल दिया है। वे जनता को सूचित करने की बजाय, सत्ता को बचाने और विपक्ष को घेरने का काम कर रहे हैं।

यानी, आज की पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा अपने नैतिक सिद्धांतों (सत्य, निष्पक्षता और स्वतंत्रता) से भटक गया है। और यही कारण है कि लोगों का भरोसा मीडिया से उठ रहा है।

असली पत्रकारिता वही है जो आपने लिखा- सत्ता से असहज सवाल पूछना, जनता को तथ्य देना, निष्पक्ष और स्वतंत्र रहना.. बाक़ी सब प्रचार है, और प्रचार कभी भी पत्रकारिता नहीं हो सकता।

नवेद शिकोह-

पत्रकारों की तीन किस्में हैं-

1- दस फीसद आप जैसे निष्पक्ष,निर्भीक, निरपेक्ष, संतुलित और हर पार्टी और हर दौर की सरकार में सरकार की कमियों को बयां कर पत्रकारिता का फर्ज निभाने वाले।

2- 60 फीसद वे पत्रकार जिन पर उनकी पेशेवर मजबूरियां या स्वार्थ इतना हावी है कि वो हर सरकार में सरकार के संगे बन कर पत्रकारिता का बलात्कार करते हैं। बिन पेंदी के लोटे। जैसा कि पिछले एक दशक में तमाम कांग्रेसी और समाजवादी पत्रकार अब भाजपाई पत्रकारों का चरित्र निभा रहे हैं।

3- तीस प्रतिशत ऐसे पत्रकार हैं जो अपनी चाहत और विचारों के गुलाम बन कर पत्रकारिता करते हैं।

जो कांग्रेस को देशहित में मानता है वो हमेशा भाजपा के खिलाफ रहा, चाहे भाजपा सत्ता में हो या विपक्ष में। जो भाजपा को राष्ट्रवादी मानता है वो हमेशा कांग्रेस के खिलाफ दिखा। कांग्रेस जब सत्ता में थी तब भी और कांग्रेस विपक्ष में है अब भी।

पंकज श्रीवास्तव-

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से नत्थी है इसलिए न्याय के पक्ष में सक्रिय हस्तक्षेप उसकी खूबी रही है। भेड़ और भेड़ियों के बीच निष्पक्षता निरर्थक है। गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकार शिरोमणि कहलाते हैं पर निष्पक्ष नहीं थे। नमक आंदोलन के समय संयुक्त प्रांत के कांग्रेस अध्यक्ष थे और अपने ‘प्रताप’ प्रेस में भगत सिंह को शरण लेते थे। समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व पर आँच आये या कहीं अन्याय हो तो पक्षधरता ज़रूरी है। हाँ, तथ्यों की पवित्रता होनी चाहिए, हर हाल में।

सुशील ओझा-

आपने सही मुद्दा उठाया है। निष्पक्षता केवल पत्रकारिता में ही अपेक्षित नहीं है हर संस्थान केलिए आवश्यक है। निष्पक्षता समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार से आरंभ होती है। इसके अभाव में परिवार बिखरता है।

निष्पक्षता के अभाव में न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका की छबि न केवल धूल धूसरित होती है समाज देश और समाज के ताना-बाना का क्षरण होने लगता है। पत्रकारिता तो समाज और सामाजिक संरचना का थर्मामीटर है, एम आर आई है। इसे बोलता आईना भी कहा जाता है। आईना कभी झूठ नहीं बोलता है।

सुबह-सुबह चाय के साथ समाचारपत्र जब सामने आए तो उसके हेडलाइंस में न केवल सच्चाई की झलक हो उसका सम्पादकीय एम आर आई का रिपोर्ट हो– सटीक, विश्वसनीय, तथ्यात्मक। पत्र और पत्रकार समाज और सत्ता के बीच संवाद का माध्यम है। और यह जोखिम से भरा हुआ है। क्योंकि निष्पक्ष पत्रकार सत्ता की आंख की किरकिरी होता है। आंख में वह गड़ता है।

संवैधानिक संस्थाएँ यदि जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध न हो तो पत्र और पत्रकार को बहुत मूल्य चुकाना होता है। पत्रकारिता वस्तुतः किसी बोर्डर पर युद्धरत सिपाही के जीवन से कम जोखिम भरा नहीं होता है। अनेक पत्रकार आज इस दंश को झेल रहे हैं।

प्रिंट मिडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मिडिया दोनो औद्योगिक घरानो से पोषित होते हैं। औद्योगिक घरानों का अपना हित-अहित होता है और वह सरकार तथा सत्ता से प्रभावित होता है। ऐसे में पत्रकारिता की निष्पक्षता प्रभावित होती है। जब बड़े बड़े मिडिया संस्थान प्रदूषित होने लगे तो यूट्यूबर अस्तित्व में आ गये। इन पर भी सरकार की बक्र दृष्टि है।

जोखिम का दूसरा नाम ही जीवन है। जीवन संघर्ष है। आपका न्यूज और व्यूज दोनो ही विश्वसनीय है। अच्छा लगता है।

राम त्रिपाठी-

शासन सत्ता की नीतियों की आलोचना जब भी पत्रकार करता है, तो परोक्ष रूप से वह एक मॉडल भी पेश करता है, जो शायद सलाह के दायरे में ही आता है। व्यक्तिगत सलाह पत्रकारिता में नुकसानदायक है या यूं कहे कि वह पत्रकारिता नहीं है। मगर जब भी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा, तो वह जिस नैतिकता की गुहार लगाती है वह भी सलाह के दायरे में ही आता है। बेशक उसे सीधे रूप से सलाह ना कहा जाए।

पत्रकारिता को लेकर उठाए गए, रखे गए मानक बेहद प्रासंगिक हैं।

पत्रकारिता से के मानदंडों से भटकाव की स्थिति तभी शुरू हो जाती है जब कोई पत्रकार किसी विषय पर अध्ययन, चिंतन और वैचारिक के समझ के बगैर खुद को ज्ञानी समझ राग अलापने लगता है। यह इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों में एंकर की जो भूमिका है, मेरे नजरिए से यह पत्रकारिता के किसी भी मानदंड को पूरा नहीं करती है। यह खुद ही जज बन जाते हैं।

पत्रकार जज नहीं है। वह किसी चीज को अच्छा या बुरा नहीं कह सकता है। उसे तथ्य रखने हैं और इतना स्पेस देना है कि आम जनमानस अपने विचार से संवाद करते हुए निर्णय ले सके की क्या गलत है क्या सही है। इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों के एंकर आपसी संवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ते हैं। आज के समय में बहुत पहले ही संवाद हीनता का राज है। संवाद हीनता समाज में तभी आती है जब तानाशाही तत्वों का वर्चस्व होता है।

तानाशाही दौर में पत्रकारिता भी मुखर होती है। उसे होना चाहिए। वरना खुद को पत्रकार कहलाने के कोई मायने नहीं बचते हैं।

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2 Comments

2 Comments

  1. प्रदीप शुक्ल

    September 10, 2025 at 10:45 am

    भारतीय मीडिया—सच के साधक या संदेह के स्रोत?

    1. प्रेस स्वतंत्रता: भारतीय मीडिया किस मोड़ पर है?

    * Reporters Without Borders (RSF) के World Press Freedom Index 2025 में भारत 151वें स्थान पर है, जो कि पिछले वर्ष के 159वें स्थान से थोड़ी सुधार के बावजूद चिंताजनक स्थिति है।
    * RSF ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत लोकतंत्र में “प्रेस स्वतंत्रता के संकट” का सामना कर रहा है—जिसमें पत्रकारों पर हमले, मीडिया की राजनीतिक झुकाव, और भय का माहौल शामिल है।
    * RSF के आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक, विधायी, सामाजिक, और सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण से भारत की प्रेस स्वतंत्रता लगातार कमजोर हो रही है।

    2. मीडिया पर जनता का भरोसा: गिरते ग्राफ की कहानी

    * टीवी समाचार चैनलों पर भरोसा केवल 13% है, जबकि अखबारों पर 31% और ऑनलाइन मीडिया पर उससे भी कम लोगों का भरोसा है।
    * Ipsos Trust Survey (2025) बताता है कि मीडिया में सरकार और न्यायपालिका की तुलना में जनता का भरोसा काफी कम—केवल 35% है।

    3. यूट्यूब और सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों का बाजार

    * PIB फैक्ट-चेक यूनिट ने दिसंबर 2023 में 9 यूट्यूब चैनलों को चिन्हित किया जिनके 83 लाख से अधिक सब्सक्राइबर थे, और जो संवैधानिक पदाधिकारियों के कथन गर्भित रूप से दर्शा रहे थे।
    * जनवरी 2023 में देश की 6 यूट्यूब चैनलों (जैसे Nation TV, Samvaad TV, आदि) को बंद कर दिया गया था—उनके पास कुल मिलाकर 20 लाख सब्स्क्राइबर थे और उनकी वीडियो व्यूज़ 51 करोड़ से अधिक।
    * अगस्त 2023 में फिर 8 चैनलों (जैसे SPN9 News, Educational Dost आदि) पर कार्रवाई हुई—इन चैनलों के सब्स्क्राइबर मिलाकर 23 मिलियन, और व्यूज़ करोड़ों में थे।
    * नकली खबरों में ‘सरकारी योजनाओं का बंद होना’, ‘ईवीएम बैन’, ‘आगामी चुनाव की घोषणा’ जैसी जानकारी शामिल थी।
    * सोशल मीडिया पर सचेल संवाद जैसे वीडियो (‘मीट-स्ट्रीट स्टाइल’), असल में कई बार प्लांटेड पार्टी वर्कर्स से तैयार किए गए होते हैं—जो दर्शकों को गलत दिशा में प्रभावित करते हैं।

    4. अभद्र सूचना: गहराती समस्याएँ

    * वर्ष 2025 में जब Operation Sindoor हुआ, सोशल मीडिया पर भारतीय सेना पर आत्मघाती हमलों और पाक-हमलों की फ़र्जी खबरें फैलीं। PIB फैक्ट-चेक ने इन खबरों को पूरी तरह गलत करार दिया।
    * The Guardian की रिपोर्ट बताती है कि भारत-पाक सीमा पर फेक जगहों और पुरानी फुटेज से निर्मित नकली स्थितियाँ सोशल मीडिया पर फैल कर तनाव बढ़ाने का कारण बनीं—मीडिया की भूमिका की समीक्षा को ज़रूरी बनाती हैं।
    * इसके अलावा चुनाव समय में Bollywood सितारों (आमिर खान, रणवीर सिंह) की AI जनित deepfake वीडियो भी वायरल हुए थे, जो विपक्ष का समर्थन दिखा रहे थे; बाद में ये फर्जी साबित हुए।

    5. मीडिया की चुनौती और जनता की भूमिका

    * प्रेस की स्वतंत्रता कमजोर हो रही है — RSF की रैंकिंग और सरकारी दबाव बढ़ने से यह स्पष्ट होता है।
    * भरोसा ख़तरे में है — टीवी, प्रेस और सोशल मीडिया सभी पर जनता का भरोसा गिरा है।
    * फर्जी खबरों का उद्योग — यूट्यूब और सोशल मीडिया पर misinformation पहले से अधिक पैठ बना चुका है।
    * सच की रक्षा जनता की जिम्मेदारी — वास्तविक रिपोर्ट चाहने वाले अख़बार पढ़ें, तथ्य-तलाशी करें, और स्वतंत्र पत्रकारों का समर्थन करें। मीडिया तभी सुधरेगा जब जनता की मांग विवेकपूर्ण और सत्य की होगी।

  2. पीयूष शुक्ला

    September 10, 2025 at 6:55 pm

    गर्दन बाईं ओर मुड़ी हो या दाईं ओर गर्दन टेढ़ी ही कहलाएगी। निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए सीधी गर्दन होना जरूरी है। लेकिन बाएं वाले दाएं वाले को “गोदी/दलाल” जैसे विशेषणों से संबोधित करते हैं दाएं वाले बाएं वाले को “गद्दार” कहते हैं। असल में दोनों गुट गफलत के दलदल में हैं।दोनों में कोई फर्क नहीं है।

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