पिछलग्गू बने एमपी के प्रमुख हिंदी अखबारों ने इस मुद्दे पर कलम चलाने का दुस्साहस नहीं दिखाया

नए मंत्रालय की घोषणा कर खुशियों का दिवास्वप्न दिखाते मुख्यमंत्री शिवराज….मान गए.. क्या नायाब तरीका खोज निकाला है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने अपनी रिआया को खुशहाल बनाने का.. खुशियाँ बांटने के लिए हैप्पीनेस मंत्रालय खोलने की घोषणा कर डाली। इसे घोषणा वीरता के लिए बदनाम मुख्यमंत्री का गरीब जनता के साथ एक और क्रूर मज़ाक नहीं तो क्या कहें..? यह तो हो नहीं सकता कि मुख्यमंत्री को यह इल्म न हो कि महज मंत्रालय खोल देने से खुशहाली लाना मुमकिन नहीं..! यदि यही खुशहाली लाने का रामबाण होता तो उनसे ज्यादा सयाने नेता प्रधानमंत्री मोदी मुख्यमंत्री रहते कम से कम गुजरात मे तो इसे आजमा ही चुके होते..!

कुल मिलाकर यह जनता को भरमाने का शिगूफ़ा ही नजर आता है कि सरकार उनकी खुशहाली के लिए चिंतित है और लगातार कुछ ना कुछ करती ही रहती है. ऐसी ही लोक लुभावनी घोषणा 40-45 साल पहले तब के मुख्यमंत्री स्वर्गीय श्यामाचरण शुक्ल ने भी की थी। उन्हें भी रातोंरात भिखारियों के कल्याण की सूझी और गांधी जयंती के शुभदिन एक सरकारी आदेश के द्वारा पूरे प्रदेश में [तब छत्तीसगढ़ नहीं बना था] भीख मांगने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

यदि सिर्फ कानून बना देने और नया विभाग खोल देने भर से खुशहाली आती तो अनुसूचित जाति/ जनजाति विभाग, महिला सशक्तिकरण और बाल कल्याण विभाग, किसान कल्याण विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग तथा इनके अधीन काम करने वाले ढेरों निगम, मण्डल और आयोगों के मार्फत इन तबकों और क्षेत्रो मे गज़ब की खुशहाली आ चुकी होती. प्रदेश में सरकारी स्कूल-कालेजों और सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा से सब वाकिफ हैं और किसानों द्वारा ख़ुदकुशी की घटनाएँ आम हैं। बलात्कार में मध्यप्रदेश सबसे ऊपर है और महिलाओं तथा बच्चों के गायब होने और उनकी तस्करी मे भी पीछे नहीं है.. यह किसी विरोधी नेता का आरोप या मीडिया की खबर नहीं बल्कि खुद राज्य के गृहमंत्री ने विधानसभा में जानकारी दी है।

नया मंत्रालय बनाने का सीधा मतलब नए मंत्रियों और अफसरों के लिए काम का बंदोबस्त, बंगला-गाड़ी नौकर-चाकर,एसी ऑफिस और देर सबेर इनके तहत बनने वाले निगम-मण्डल मे चुके हुए नेताओं का पुनर्वास होता है.. अफसोस है पूरी तरह सरकार के पिछलग्गू बन चुके प्रदेश के प्रमुख हिन्दी अखबारों ने इस मुद्दे पर भी कलम चलाने का दुस्साहस नहीं दिखाया. उनके संपादकीय राहुल गांधी के बयान, चीन के दुराग्रह और कोलकाता की दुर्घटना का ही पोस्टमार्टम करने में व्यस्त रहे.

भोपाल से श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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