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प्रभात खबर भागलपुर संस्करण के चार वर्ष पूरे होने पर मुंगेर कार्यालय में संगोष्ठी आयोजित

: जनसरोकार की पत्रकारिता से ही बचेगी मीडिया की साख :  प्रभात खबर भागलपुर संस्करण की सफलता पूर्वक चार वर्ष पूरे होने पर मुंगेर कार्यालय में ‘‘क्या हो पत्रकारिता की दिशा’’ विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी. यह संगोष्ठी ऐसे समय में आयोजित की गयी. जब मीडिया पर अनेक तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं अगर बाजारवाद की स्थिति हावी है. बहुत सारे विचारक यह कहते हैं कि मुनाफे का कोई चरित्र नहीं होता है. बावजूद इसके इस बहस के माध्यम से अपनी जन आकांक्षाओं को टटोलने का प्रयास किया गया.

: जनसरोकार की पत्रकारिता से ही बचेगी मीडिया की साख :  प्रभात खबर भागलपुर संस्करण की सफलता पूर्वक चार वर्ष पूरे होने पर मुंगेर कार्यालय में ‘‘क्या हो पत्रकारिता की दिशा’’ विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी. यह संगोष्ठी ऐसे समय में आयोजित की गयी. जब मीडिया पर अनेक तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं अगर बाजारवाद की स्थिति हावी है. बहुत सारे विचारक यह कहते हैं कि मुनाफे का कोई चरित्र नहीं होता है. बावजूद इसके इस बहस के माध्यम से अपनी जन आकांक्षाओं को टटोलने का प्रयास किया गया.

संगोष्ठी के आरंभ में प्रभात खबर के ब्यूरो प्रभारी राणा गौरी शंकर ने अखबार के अबतक के सफर को विस्तार से रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि जनसरोकार की पत्रकारिता की दिशा में प्रभात खबर अपनी अग्रणी भूमिका निभा सके. यह जानने और समझने की दिशा में आज का आयोजन महत्वपूर्ण होगा. सूचना एवं जनसंर्पक विभाग मुंगेर प्रमंडल के उपनिदेशक कमलाकांत उपाध्याय ने कहा कि पिछले तीन दशक से अखबार और समाचार की दुनिया से वे रू-ब-रू होते रहे हैं. खबरों के तेवर से सरकार को वाकिफ भी कराते हैं. प्रभात खबर के कई लोग पत्रकारिता की दुनिया में मील के पत्थर हैं. जहां तक मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह समाज के साथ चले तथा समुदाय के हित में व्यक्तिगत भावना का बलिदान करे. मीडिया समाज, राजनीति तथा व्यवस्था के सच को बेनकाब करने में अपनी अहम भूमिका अदा करे. कभी-कभी छोटी खबर भी महत्वपूर्ण कार्य कर जाती है.

स्वतंत्र पत्रकार कुमार कृष्णन ने कहा कि कुछ घरानों तक मीडिया के सिमटने के बावजूद आज भी बहुत सारे ऐसे अखबार हैं जो लोकतांत्रिक चेतना के संवाहक के रूप में काम कर रहे हैं. उनमें प्रभात खबर का महत्वपूर्ण नाम है. मीडिया में पूंजी अनिवार्यता है. लेकिन आवारा पूंजी का प्रवेश देश और समाज दोनों के लिए घातक है. बाजार केंद्रित व्यवस्था में संवेदनशीलता खत्म हो रही है उस स्थिति में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ संवेदनशीलता और जवाबदेही कायम रखने की जरूरत है. लाभ के साथ-साथ शुभ का भी रखना होगा ख्याल. प्रसिद्ध साहित्यकार अनिरुद्ध सिन्हा ने कहा कि आज इलेक्ट्राॅनिक व प्रिंट मीडिया के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती साख को बचाये रखना है. उदारीकरण के फलस्वरूप बाजारवाद और प्रतिबद्धता में अभाव आया है. आज जिस मूल्यहीनता के  दौर से समाज गुजर रहा है उस स्थिति में पत्रकारिता को जिम्मेदार और जनसरोकार से युक्त बनाने की जरूरत है. तभी पत्रकारिता अपने उद्देश्य को पूरा कर पायेगा. लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है. वह न सिर्फ लोगों के बीच सूचना उपलब्ध कराती है बल्कि समाज को नई राह भी दिखाती. इसलिए जरूरी है कि पत्रकारिता निष्पक्ष व पारदर्शी हो.

आरडी एंड डीजे कालेज के प्राध्यापक प्रो. शब्बीर हसन ने कहा कि जनमत बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका एवं मूल्यहीनता के दौर में मुद्दे आम लोग नहीं बल्कि एक खास वर्ग तय करता है. जिसके पास पूंजी की ताकत है. लेकिन उससे अलग हट कर प्रभात खबर ने अपनी अलग पहचान बनायी है. ज्वलंत मुद्दे को लगातार स्थान मिल रहा है. विज्ञान और संचार की आधुनिकतम तकनीक के साथ-साथ यह जमाना पारदर्शिता के लिहाज से तीनों मुद्दों पर अखबार की नजर रहनी चाहिए. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पत्रकारिता गरीबों की आवाज बन कर उभ्ररें. साथ ही सामाजिक ताना-बाना बरकरार रहे और अंध विश्वास को जगह नहीं मिले.

बैद्यनाथ गल्र्स हाई स्कूल की पूर्व प्राचार्या डा. मृदुला झा ने कहा कि पत्रकारिता का आजादी के समय सिर्फ एक लक्ष्य था देश को आजाद कराना. पत्रकारों ने अपनी कुरबानी देकर यह सफलता हासिल की और नवनिर्माण में भी भूमिका निभायी. संक्रमण काल के दौर में मूल्य घटे हैं तथा हिंसक वातावरण में बढ़ोतरी हुई है. इसके कारण सकारात्मक चीजों को स्थान नहीं मिल पाता. क्योंकि  टीआरपी सनसनी खेज खबरों से रहता है. सनसनी खेज की वजह मूल परख खबरों से समाज को  बेहतर दे पायेंगे. साथ ही लोगों में नैतिक मूल्यों एवं राष्ट्रीयता की भवना को जागृत कराने के लिए काम होना चाहिए.

भरतीय रेडक्रास सोसाइटी के सचिव जयकिशोर संतोष ने कहा कि समाज की स्थिति का प्रभाव जिस तरह से हर वर्ग के लोगों पर पड़ा है उसी तरह उसने पत्रकारिता को भी प्रभावित किया है. इस कारण पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट आयी है और हिंसा के दौर में अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की खतरा भी बढ़ी है. हिंसक वर्ग और शासक वर्ग तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पर आमदा है. किस तरह से अभिव्यक्ति का गला घोंटा जाय. ऐसे में स्वतंत्र पत्रकारिता की मर्यादा को कायम रखने की जरूरत है.

अधिवक्ता कृष्णानंद भरती  ने कहा कि मीडिया में विविधता और बहुलता का दायरा घटा है. हकीकत यह है कि कुछ खास लोग ही तय करते हैं कि न्यूज क्या है. उन्होंने कहा कि भूमिहीन,  दलितों और गरीब तबके की आवाज बननी चाहिए. उन्होंने कहा कि मीडिया के खबरों का व्यापक असर होता है. गलत सूचनाएं लोगों तक यदि पहुंचती है तो उसका विपरीत असर होता है. साथ ही विश्वसनीयता भी घटती है. विश्वसनीयता को बचाना एक बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा कि प्रभात खबर पत्रकारिता के साथ-साथ लोगों को ज्ञान भी विकसित कर रहा है. आज जब हिंदी के प्रति उपेक्षा का भाव है वैसी स्थिति में प्रभात खबर हिंदी कैसे सुधारें जैसे स्तंभ् को देकर राष्ट्र वार्ता के  प्रति अलख जगाये हुआ है.  इस अवसर पर वीरेंद्र कुमार, त्रिपुरारी कुमार मिश्रा, नील कमल श्रीवास्तव मुख्य रूप से मौजूद थे.

आनंद की रिपोर्ट.

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