सिद्धार्थ अरोड़ा सहर-
बीते 4 सालों में एस जयशंकर जी जहाँ भी गए और इनसे सवाल हुआ कि रूस या अमेरिका के बीच भारत किसका पक्ष लेगा, तो इन्होंने जवाब दिया कि भारत को किसी पक्ष की ज़रूरत नहीं है, भारत अपने आप में एक पक्ष है। हम कबतक दो देशों में से एक कि सुप्रेमसी मानते रहेंगे?

कहते हैं जब तेज़ गति से आगे बढ़ना हो तो अकेले दौड़ना पड़ता है पर दूर तक, लम्बा सफ़र करना हो तो सबको साथ लेकर चलना होता है।
भारत पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान और अपना अलग व्यापार बना रहा है। भारत ने कई मौकों पर डॉलर सुप्रेमसी को भी नकारा है तो अब जंग की घड़ी में इन सारी बातों का लौटकर हमें ही काटना कोई हैरानी की बात नहीं है।
जब पश्चिमी देश रूस पर हर तरह के बैन लगा रहे थे तब भारत ने रूस से व्यापार कम करने की बजाए बढ़ाया ही था। आज भी बेहतर से बेहतर करने की कोशिश है। रूस बिलाशक भारत का साथी है, पर वो चीन से तो बिगाड़ नहीं सकता न और चीन पाकीस की मदद न करे ये भी नहीं हो सकता क्योंकि साउथ एशिया में भारत की सुप्रेमसी बढ़ने से कोई रोक रहा है तो वो पाकीस के टुच्चे जैश और लश्कर ही हैं। फिर इस्लामिक देश भले ही ट्वीट न करें, पर टर्की की तरह बैक हैंड से हेल्प तो कर ही सकते हैं और करेंगे ही करेंगे।
ये एक ऐसा पैराडॉक्स है जिसका सिरा ढूंढने निकलें तो जहाँ से चले हैं फिर वहीं पहुँच जायेंगे।
आपको लगान याद है? उसमें राजा बने कुलभूषण खरबंदा गाँव वालों से कहते हैं कि “ये गोरी चमड़ी वाले अपने बाप के सगे नहीं होते”
भरत के माथे की फाँस है पीओके, उधर इज़राइल की छाती का पत्थर है गाज़ा, वहीं चीन की आँख की किरकिरी बना हुआ है ताइवान, रूस के यूँ तो दस टुकड़े पहले ही हैं, लेकिन यूक्रेन अभी लम्बे समय तक चलने वाला क्लेश बन चुका है।
वहीं वेस्ट की तरफ देखिए, इंग्लैंड आयरलैंड स्कॉटलैंड आदि का मसला ऑलमोस्ट सॉल्व हो गया है। फ्रांस जर्मनी आदि यूरोपियन देशों के मसले बिल्कुल ख़त्म हैं। अमेरिका कनाडा को अपना ही स्टेट मानता है। यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया के आसपास भी कोई भसड़ नहीं है।
इन वाइट हैं तो टाइड हैं के एजेंडा से मिडिल ईस्ट कुछ हद तक बचा है क्योंकि उनके पास तेल है, बिजनेस है और उन्होंने इज़राइल से सीधे धाय धाय करने की तौबा कर ली है। चार पैसे दे देते हैं, पर कॉन्फ्लिक्ट में नहीं पड़ते।
ये कॉन्सपिरेसी सदियों पुरानी है कि एशिया में शांति बहाल नहीं होने देंगे। पीओके भारत में आ गया, चीन भारत और रशिया बिना किसी किंतु परंतु के साथ हो गए तो इन गोरों को पूछेगा ही कौन?
कड़वा सच है कि यूएन जैसे ढकोसले शांति तो चाहते हैं पर सिर्फ अपने इलाके में, ईस्ट में शांति के लिए पहल होते देखने में इनकी मौत आती है इसलिए ये हर छिटपुट वॉर के एक हफ्ते बाद जागते हैं, जब इन्हें लगता है कि लॉन्ग टर्म मैप चेंज हो सकते हैं; इनका ह्यूमन राइट जाग जाता है।
फिर भी, भारत की हर सम्भव कोशिश होनी चाहिए (थी) कि POK का मसला हल हो, हर हाल में हो। हालाँकि भारत में कोई एडोल्फ नहीं बैठा है कि सिर्फ अपनी ज़िद पूरी करने के लिए पूरी दुनिया को जंग में झोंक दे, इसलिए अगर विश्वयुद्ध को टालने के लिए सीज़फायर हुआ है तो ये फ़ैसला सही ही है, पर अपना मक़सद अपना मेनिफेस्टो भूल जाएं, ऐसा शीर्षनेतृत्व भी किसी काम का नहीं है। अभी भी समय है, कश्मीर का मसला हल होना चाहिए ताकि योरप की तरह भारत में भी दीर्धकालिक शांति स्थापित हो सके।
आदरणीय जयशंकर जी, अब दिखाइए अपनी कूटनीति, बताइए कि भारत अपने आप में एक पक्ष है तो क्यों है? कैसे है? कबतक तक है? देश पूरे सब्र के साथ इंतेज़ार कर रहा है।
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