कुछ दिन पहले ही नौकरी की तलाश में मैंने दिल्ली में दस्तक दिया था, तभी मेरे एक पुराने मित्र ने एक अलग क्षेत्र में काम करने की सलाह दी क्योंकि अभी-अभी उसने झारखण्ड विधानसभा में उसके रिपोर्टिंग के दौरान कुछ नए – नवेले संपर्क बने थे जो चुनाव के ठेकेदारों के लिए काम करते थे। चुनाव – प्रबंधन… ये नाम नया नहीं था मेरे लिए लेकिन जिस कम्पनी का नाम बताया वो बिल्कुल ही नया था, संभवतः इससे पहले कभी सुना नहीं था।
नाम था ‘पॉलिटिकल संपर्क’ जिसके संपर्क में आकर अभूतपूर्व अनुभव हुआ, जो मैं दुबारा गलती से भी न करना चाहूं।
मैंने सोचा दिल्ली विधानसभा चुनाव में काम करके कुछ ऐसे अनुभव लूं जिससे इस क्षेत्र में कुछ संभावना तलाश सकूं। खानापूर्ति अनुसार साक्षात्कार देने के लिए आम आदमी पार्टी के एक प्रत्याशी के तथाकथित वॉर ऑफिस में बुलाया गया और ठीक उसके कल से मेरे समेत अन्य जो लोग थे उन्हें फील्ड एसोसिएट की जिम्मेदारी दी गई।
16 हजार की पगार बगैर किसी छुट्टी के (हालांकि कि बाद में पता चला की 4 छुट्टी उम्मीदवार के तरफ से दी जानी थी) तय हुआ। थोड़ा अनुभव करने की चाह में मैं ना चाहते हुए भी राजी हो गया। विदित हो कि इन सारे प्रकरण में किसी भी प्रकार की कोई कागजी खानापूर्ति ना हुई और न कोई मेल पर ऑफर लेटर मिला। दो – तीन दिन के बाद से मुझे एहसास हो गया था कि चीजें कुछ ठीक नहीं है। हमें क्षेत्र में लोगों से फोन नंबर एकत्रित करने, वोटर आईडी की स्थिति जानने, पम्पलेट बांटने और उम्मीदवार के पक्ष में लोगों से वोट अपील करने की जिम्मेदारी दी गई।
यक़ीनन क्षेत्र में हर परेशानी का सामना करना पड़ा, कहीं-कहीं तो लोगों ने गालियां भी दी फिर भी खुद को पैदल कई किलोमीटर चला कर सैंकड़ों घर विजिट करके उसका जीपीएस कैमरे से फोटो खींच कर बकायदा खुद को रगड़ते रहे। फिर हम सभी को घर-घर जाकर महिला सम्मान और बुजुर्ग संजीवनी कार्ड बनाने के लिए संदेश देने के साथ ही 150 कार्ड बनाने की सीमा तय की गई जो तकनीकी खानापूर्ति करने के साथ कभी संभव न था क्योंकि कई महिलाओं के पास फोन न होने पर काफी समय लगता था तो कभी वोटर लिस्ट में नाम ही नहीं मिलते थे।
हाई-प्रोफाईल इलाकों में सामने से महिलाओं ने मना कर दिया। जब ये बात अपने प्रबंधन के वरिष्ठ कार्यकारिणी को बताया तो उन्होंने सीधा – सीधा फर्जी तरीके से महिला अथवा पुरुष हो सभी के कार्ड बनाने और संख्या की खानापूर्ति को पूरा करने पर बल दिया। जब इसका विरोध किया तो अचानक पूरी की पूरी टीम को हटा दिया गया बिना एक रुपए का भुगतान किए।
भुगतान को लेकर लगातार हम लोगों को तारीख बताई गई पर 15 दिन बीत जाने पर जब मैं स्वयं उम्मीदवार के पास गया तो भौचक रह गया। मुझे जानकारी मिली की पैसे आपके कैम्पेनिंग करने वाली कंपनी को दे दिया गया। फिर मैंने पॉलिटिकल संपर्क के कुछ लोगों से संपर्क साधा तो लगातार हम लोगों को गुमराह करते रहे फिर जब मैंने मीडिया में जाने की धमकी दी तब जाकर जैसे तैसे काट-छांट कर थोड़े बहुत पैसे दे दिए जबकि अचानक हटाने पर हम लोगों को ससम्मान एक महीने की सैलरी मिलनी चाहिए थी, लेकिन जितनी मिली उतने को लोगों ने भारी मन से स्वीकार कर मुझे धन्यवाद दिया।
ऊपर में मैंने किसी उम्मीदवार के नाम की चर्चा नहीं की क्योंकि मेरा मानना है कि पॉलिटिकल संपर्क जैसी फरेबी कंपनी (बिहार, झारखंड और असम के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा लोगों का) न केवल हम जैसे युवाओं से फरेब करती है बल्कि मालदार उम्मीदवार से पैसा लेकर उन्हें फर्जी आंकड़ा देकर गुमराह करती है और बीच में दलाली का अच्छा पैसा बनाती है। मेरे लिखने का मकसद यही था कि यदि इलेक्शन कैंपेनिंग में आप जॉब करते हैं या इंटर्नशिप करते हैं तो ऑफर लेटर जरूर मांगे, यदि काम दो या तीन महीने का है तो साप्ताहिक पेमेंट लें।
राजनीतिक नेताओं से या ऐसे लोग, जिन्हें लगता है कि ऐसे प्रबंधन वाली कंपनी की आवश्यकता है तो कंपनी को देख – परख कर चुने। बेहतर होगा कि अपने स्तर से लोगों को अपने प्रबंधन में शामिल करें और किसी के हक का पैसा ना मारे।
(कंपनी द्वारा पीड़ित एक युवक द्वारा भड़ास को भेजे गए मेल पर आधारित)


