
प्रभाकर मणि तिवारी-
धीरे-धीरे अखबार यानी पूर्वांचल प्रहरी को एक साल पूरे हो गए थे. इस बीच, कुछ नए लोग भी अलग-अलग जगह से आए थे. लेकिन अमूमन जैसा होता है शुरुआती दौर में सहकर्मियों के बीच बेहद मेलजोल होने के बावजूद समय बीतने के साथ राजनीति और कड़वाहट भी बढ़ने लगी थी. इस बीच, दफ्तर के दो साथियों के सौजन्य से हमारे संपादक कृष्ण मोहन अग्रवाल का कांट्रैक्ट नहीं बढ़ा और उनको मजबूरन गुवाहाटी छोड़ कर जाना पड़ा.
उनसे पहले रामदत्त त्रिपाठी और विनोदानंद ठाकुर जैसे लोग जा चुके थे. दफ्तर के कुछ साथियों की निगाह संपादक की कुर्सी पर थी. यह वैसे लोग थे जो सक्रिय रिपोर्टिंग नहीं करना चाहते थे. सो, उनके लिए संपादक की कुर्सी सबसे महफूज जगह थी.
इस दौरान मैं प्रादेशिक से लेकर दूसरे तमाम पेजों का जिम्मा भी संभालता रहा और रिपोर्टिंग भी करता रहा. दूसरी ओर, मैंने दिल्ली से छपने वाली तमाम पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था. हमारे मालिक-सह-संपादक जीएल अग्रवाल को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी.
उस समय चाय कंपनियों पर उग्रवादी संगठन अल्फा के कसते शिकंजे की खबरें भी आने लगी थी. मैंने एक रात घर पर बैठ कर इसी पर लेख लिखा और साप्ताहिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे को कुरियर से भेज दिया. उस समय रंगीन तस्वीरों के लिए टीपी यानी ट्रांसपेरेंसी का इस्तेमाल होता था. पांच रुपए में वह लेख भेज कर मैं उसे भूल गया था. हां, तब कंप्यूटर नहीं था. हाथ से ही लिखा था.
दफ्तर की लाइब्रेरी में तमाम पत्रिकाएं आती थी. अगले सप्ताह लाइब्रेरियन गौरी मेरे पास साप्ताहिक हिंदुस्तान का अंक लेकर आई और कहा कि तिवारी जी आपका बड़ा लेख छपा है. मुझे बेहद हैरत हुई. खोल कर देखा तो दो पन्ने पर रंगीन तस्वीरों के साथ मेरा लेख छपा था.
शीर्षक था—असम के चाय बागानों पर मंडराया उल्फा का साया. तब दिल्ली के ज्यादातर पत्रकार इस संगठन को उल्फा ही लिखते थे. आज के दौर में इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. तब बिना जान-पहचान के लेख भी छप जाते थे और दिल्ली जाने पर किसी भी संपादक से मुलाकात भी बेहद सहज थी. अब तो बाकायदा अपाइंटमेंट लेना होता है.
खैर, उसके बाद हर महीने कुछ न कुछ छपता रहा. मृणाल जी और वहां कार्यरत सुनील पांडे ने पत्र लिख कर कई लेख मंगाए. साथ ही दैनिक हिंदुस्तान में भी संपादकीय पेज पर छपने लगे मेरे लेख. उसके अलावा धर्मयुग में भी असम समेत पूर्वोत्तर पर कई लेख छपे. उन लेखों की प्रतियां अब करीब चार दशक बाद शायद ही मिले.
मृणाल जी से उस समय बने संबंध आज तक कायम हैं. पहला लेख छपने के करीब दो दशक बाद प्रधान संपादक रहते उन्होंने मुझे कोलकाता में हिन्दुस्तान के प्रमुख संवाददाता के तौर पर नौकरी भी आफऱ की थी. लेकिन विभिन्न वजहों से मैंने ज्वाइन नहीं किया. वह अलग कहानी है.
मेरी पत्नी भी उन दिनों लिखती थी. तो, साप्ताहिक हिंदुस्तान के अलावा धर्मयुग, सरिता, मुक्ता और गृहशोभा के अलावा मनोरमा में भी पूर्वोत्तर की संस्कृति, विरासत और त्योहारों पर उनके कई लेख छपे. एक दौर ऐसा भी था जब हर महीने लिखने से होने वाली आय पूर्वांचल प्रहरी से मिलने वाले वेतन से दोगुनी ज्यादा हो गई थी. हिंदुस्तान समूह का भुगतान उस समय भी काफी अच्छा था. एक लेख के कम से कम छह सौ रुपए. दैनिक हिन्दुस्तान के संपादकीय पेज पर छपे लेखों का भी भुगतान इतना ही मिलता था.
उसके बाद तो सहकर्मियों में भी ईर्ष्या बढ़ने लगी. हालत यह हो गई कि जो भी दिल्ली जाता, सबसे पहले हिंदुस्तान के दफ्तर में ही पहुंचता. ज्यादातर लोगों ने एकाध लेख लिखने के बाद तौबा कर ली. लेकिन मेरा लिखना-छपना जस का तस रहा. दफ्तर में काम करने वाली लड़कियों की भी शादी होने लगी थी और कई प्रेम कहानियां फलने-फूलने से पहले ही मुरझाने लगी थी. जीवन इसी तरह बढ़ता रहा.
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जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-6) : रिटायरमेंट से 2 साल पहले क्यों छोड़ा जनसत्ता?


