
प्रभाकर मणि तिवारी-
पत्रकारानामा सीरीज पर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है. गुवाहाटी के दौर की यादों का सिलसिला जारी रहेगा. लेकिन यह लेख उसके करीब 30 साल बाद का है. दरअसल, आज यानी 23 सितंबर को जनसत्ता की नौकरी छोड़े मुझे पांच साल पूरे हो जाएंगे. इसलिए लगा कि पहले वही लिखना चाहिए. पहले भी लिख सकता था. लेकिन मैंने कूलिंग पीरियड की नैतिकता निभाई है जो आजकल बड़े प्रशासनिक और संवैधानिक पदों से रिटायर होने वाले लोग भी नहीं निभाते. खैर, पढ़ें उन हालात के बारे में जिनकी वजह से रिटायर होने से करीब दो साल पहले ही जनसत्ता से इस्तीफा देना पड़ा था, 28 साल की नौकरी के बाद.
सितंबर, 2019 का महीना था. पश्चिम बंगाल में सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा की तैयारियां चरम पर थी. मुझे परिवार समेत दिसंबर में एलटीए पर राजस्थान के दो सप्ताह के दौरे पर जाना था. तो उसकी भी तैयारी चल रही थी. इसके साथ ही बेटी की शादी की भी कुछ जगह बातचीत चल रही थी. सोच रहा था कि नौकरी में रहते-रहते इस जिम्मेदारी से भी मुक्त हो जाऊं. तब तक कोरोना की कहीं कोई आहट नहीं थी.
23 सितंबर को दफ्तर पहुंचने के कुछ देर बाद डीजीएम वी. श्रीनिवासन ने बुलाया. मुझे लगा कि कोई काम होगा. दफ्तर में माहौल काफी मित्रतापूर्ण था. जनसत्ता में संपादकीय के बाकी तमाम लोग रिटायर हो चुके थे. अब मैं वेतन आयोग का अकेला स्थायी कर्मचारी बचा था. वहां पहुंचते ही डीजीएम ने कहा- बॉस, आपका तबादला हो गया है, लखनऊ.
मुझे सुन कर भारी हैरत हुई. जनसत्ता में तबादले की परंपरा तो रही नहीं कभी. हालांकि मेरा दो-दो बार हो चुका था. ऊपर से जिसके रिटायर होने में दो साल का वक्त हो, उसके तबादले का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता.
मैंने तबादले का पत्र लिया. उसमें लिखा था कि मुझे एक अक्तूबर को लखनऊ संस्करण में ज्वाइन करना है. यानी 23 सितंबर मेरा कोलकाता के दफ्तर में आखिरी दिन था. कुछ देर के लिए तो समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए. अव्वल तो फिलहाल कोलकाता छोड़ने लायक परिस्थिति नहीं थी. ऊपर से तबादला भी उस जगह जहां जनसत्ता का कोई स्टाफ नहीं था और न ही वहां दफ्तर में जनसत्ता के लिए कोई कुर्सी थी. माजरा साफ था. कंपनी मुझसे छुटकारा पाना चाहती है. वरना अगर संस्करण चलाने की मंशा हो तो भला इकलौते स्थायी कर्मचारी का तबादला कौन करता है.
कुछ देर बाद, मैंने संपादक मुकेश भारद्वाज को फोन किया. लेकिन उन्होंने अपने आदत के अनुरूप फोन नहीं उठाया. उसके बाद उनके निजी सचिव अमर छाबड़ा से बात की और संपादक को मेल किया. संपादक का तो कोई जवाब नहीं आया. लेकिन बाद में अमर छाबड़ा ने बताया कि कंपनी लखनऊ में किसी को भेजना चाहती है. मैंने कहा, अगर ऐसा ही था तो दिल्ली से लखनऊ ज्यादा करीब है, कोलकाता से क्यों? इस पर वो चुप रह गए.
उसके बाद दिल्ली में तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख अनिल बंसल को फोन किया. फिर कहीं से नंबर लेकर यूनियन के पदाधिकारी पीयूष वाजपेयी को. सबने देखते हैं, का भरोसा दिया. उस दिन काम का तो मूड नहीं था. फिर भी कुछ खबरें लिखी और घर लौट आया. घर पर बताते ही पत्नी और बेटी ने एक स्वर में कहा कि वहां नहीं जाना है नौकरी छोड़ दीजिए. लेकिन अचानक मझधार में नौकरी छोड़ना भी इतना आसान नहीं था. एक तो लखनऊ जनसत्ता में मजीठिया आयोग वेतनमान के तहत ग्रुप पांच में था. यानी वहां जाते ही वेतन कम हो जाता और ऊपर से दो-दो जगह के खर्चे. साथ ही कोलकाता से ढंग का ट्रेन कनेक्शन नहीं.
कुछ महीनों बाद जिस तरह वहां कोरोना की वजह से लोगों को सड़कों पर दम तोड़ते देखा था, उससे लगा कि लखनऊ नहीं जाने का फैसला मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन फैसलों में से एक था.
खैर, अब दफ्तर जाना नहीं था. इस बीच, अलग-अलग बातचीत में वाजपेयी जी का कहना था कि आप लखनऊ ज्वाइन कर यूनियन का सदस्य बन जाइए और फिर आपका केस अदालत में दायर कर देते हैं. दूसरी तरफ अनिल जी का कहना था कि अगर आपने अदालत में केस किया तो पीएफ और ग्रेच्युटी रुक जाएगी, आदि आदि…कुछ दिनों बाद अनिल जी ने संपादक के हवाले बताया कि उन्होंने आपका नाम नहीं सुझाया था. लखनऊ में किसी को रखना था तो प्रबंधन ने आपका तबादला कर दिया. यह दलील चाहे किसी की भी रही हो, निश्चित रूप से गले के नीचे उतरने वाली तो नहीं थी. मेरे मन में उसी समय यह ख्याल आया कि इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा. इतना निश्छल भोलापन और ऐसी दलील!
बहरहाल, घर में रहते हुए आगे की योजना बनने लगी. पहले तो कोई सवा महीने मेडिकल छुट्टियां बाकी थी. उनको लेकर घर पर रहने लगा. इस बीच, कुछ जगह से फ्रीलांसिंग के बारे में बात हुई. कुछ लोगों ने केस करने की सलाह दी. मेरा मामला एकदम फिट था. केस करता तो तबादला रुक जाता. लेकिन मैंने केस करने की बजाय इस्तीफा देने का फैसला किया. इस बीच, मुंबई से एचआर प्रमुख को भेजे मेल का जवाब आया कि आप स्वस्थ हो जाने के बाद लखनऊ ज्वाइन कर लें. लेकिन अब काहे की ज्वाइनिंग.
31 अक्तूबर, 2023 को मेरा आखिरी कार्य दिवस था. हालांकि 23 सितंबर के बाद मैं दफ्तर नहीं गया. अपना इस्तीफा भीम से ही भेजा था. मैंने ठान लिया था कि अब दफ्तर जाना ही नहीं है. इसी वजह से मेरे बकाया आदि घर तक ही भिजवा दिया गया.
संपादक ने तो कभी फोन या मेल किया ही नहीं, उनके करीबी हो चुके जनसत्ता दिल्ली के पत्रकार संजय शर्मा, जो कोलकाता संस्करण में ट्रेनी के तौर पर भर्ती हुए थे, ने भी फोन करना बंद कर दिया. पहले हफ्ते में दो बार तो फोन कर ही लेते थे. शायद डर होगा कि मुझसे बात करने पर नौकरी खतरे में नहीं पड़ जाए. आखिर ठेके की नौकरी की कुछ मजबूरियां भी होती हैं.
कुछ जगह लिखने-पढ़ने की बात हो गई थी. सोचा था कि दिसंबर में राजस्थान दौरे से लौटने के बाद जनवरी से इसकी शुरुआत करूंगा. इसके साथ ही तय हुआ कि फिलहाल घरवालों और करीबी परिजनों को इस्तीफे के बारे में नहीं बताना है. खामख्वाह परेशान हो जाएंगे. उसके बाद के वर्षों में खूब घूमा-फिरा. इस बीच, बेटी को बिट्स पिलानी से एमबीए की डिग्री दिलाई. बेंगलुरु में नौकरी में सेटल किया और बीते साल दिसंबर में काफी धूमधाम से शादी भी कर दी.
मुझे जनसत्ता के पूर्व सहयोगी संजय कुमार सिंह से भी काफी प्रेरणा मिली, जिन्होंने नब्बे के दशक में ही नौकरी छोड़ दी थी और उसके बाद अनुवाद और मुक्त लेखन से सफलतापूर्वक घर चला रहे थे. कुछ और लोगों ने भी साथ दिया. लेकिन अफसोस यह है कि उनमें उस जनसत्ता का कोई नहीं था जिनके साथ करीब तीन दशकों तक काम किया. बाद में तो लोगों ने फोन करना भी बंद कर दिया. लेकिन ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोय’ की तर्ज पर इसे ही दुनिया का दस्तूर मानते हुए अब भी लिखने-पढ़ने का सफर जारी है.
पिछला भाग…
जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-5) : अख़बार के अजब-गज़ब किरदार!


