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सुख-दुख

उधर से आवाज प्रभाष जी की थी- ‘अश्क जी, एडिटरी हो रही है कि मैनेजरी?’

ओमप्रकाश अश्क-

संभवतः 2005-06 की बात है। प्रभात खबर का सिलीगुड़ी संस्करण कोलकाता से ही मेरी निगरानी में निकल रहा था। वैसे कार्यकारी संपादक बन कर मैं कोलकाता से रांची आ गया था। सिलीगुड़ी में संपादकीय प्रभारी के रूप में दिलीप दूगड़ सहयोग कर रहे थे। प्रभाष जोशी जी के सिलीगुड़ी जाने की जानकारी मिली तो मैंने उन्हें उनके कार्यक्रम के बढ़िया कवरेज की हिदायत दी और उनसे मिल कर दफ्तर आने के लिए आग्रह करने को कहा।

दिलीप जी उनसे मिले, दफ्तर आने का आग्रह किया और प्रसंगवश मेरे बारे में भी जानकारी दे दी। वे दफ्तर आए और दिलीप जी को मुझसे बात कराने को कहा। फोन पर दफ्तर आने की उनकी रजामंदी की जानकारी दिलीप ने पहले ही मुझे दे दी थी। मैं भी तय समय पर लैंड लाइन फोन के पास ही बैठा था। घंटी बजी तो फोन उठाया। उधर से आवाज प्रभाष जी की थी- ‘अश्क जी, कैसे हैं? एडिटरी हो रही है कि मैनेजरी?’ इस सवाल पर मेरी मनोदशा का आप अनुमान लगा सकते हैं।

मैं न सच बोल पाने की स्थिति में था और न प्रख्यात पत्रकार के आगे झूठ बोलने का पाप ही मोल लेना चाहता था। सो, बीच का जवाब सोचा और सरेंडर की मुद्रा में सिर्फ इतना ही कहा- ‘भैया, आप तो सब जानते हैं।’ इस जवाब से वे शायद संतुष्ट नहीं हुए। उनके पहले सवाल पर मेरा जवाब सुनने के बाद उनकी अगली लाइन थी- ‘पंडित जी, एडिटरी ही काम आएगी।’

प्रभाष जोशी जी

यहां यह बताना जरूरी है कि 1991 में जोशी जी ने बच्छावत वेतनमान के ग्रेड 1A में एक इंक्रीमेंट के साथ जनसत्ता के दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ के बाद कोलकाता से शुरू हो रहे जनसत्ता के अगले संस्करण में उपसंपादक नियुक्त किया था। उपसंपादक और संपादक के बीच तब तीन लेवल का फर्क था। सब एडिटर से चीफ सब एडिटर और उसके बाद न्यूज एडिटर और तब संपादक होता था।

प्रभाष जी प्रधान संपादक थे तो उनके अंडर में सीधे स्थानीय संपादक आते, जो अलग-अलग एडिशन में अलग-अलग होते। इसलिए उनसे मेरी कोई करीबी संभव थी ही नहीं। फिर भी उन्होंने मुझे मेरे उपनाम से संबोधित किया! मसलन उन्हें उनके द्वारा नियुक्त सभी लोगों के नाम याद रहते थे!!

हां, यह भी बताना जरूरी है कि उसके पहले प्रभाष जोशी से पटना में मैं प्रभात खबर के स्थानीय संपादक की हैसियत से मिल चुका था। उस मौके की कहानी भी बड़ी रोचक है। यह प्रसंग पसंद आया तो उसका भी विस्तारित ब्योरा दे दूंगा।

आज जीविका चला रहा हूं तो उनकी उसी सलाह से कि- ‘एडिटरी ही काम आएगी।’ आज शहर में घर चलाने भर का लिख कर कमा ले रहा हूं तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी जी की सीख ही है। भाई संजय स्वतंत्र Sanjay Swatantra जी की वाल पर प्रभाष जी की 16वीं पुण्यतिथि की जानकारी मिली तो मुझे यह प्रसंग याद आया। सादर नमन!

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