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आज के अखबार : प्रधानमंत्री 3.5 करोड़ की आबादी वाले घाना में, आठ करोड़ वोटर वाले बिहार की खबर नहीं

आज की इन खबरों से मीडिया और सरकार की प्राथमिकता समझिये, विश्वगुरू बनने का लक्ष्य साधने की कोशिशों पर गौर कीजिये। दो जजों के खिलाफ मामले हैं। सरकार एक के मामले में जल्दबाजी में है और दूसरे पर गजब की सुस्ती दिख रही है।

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साढ़े तीन करोड़ से भी कम आबादी वाले घाना की संसद के विशेष सत्र को संबोधित किया। यह खबर आज दिल्ली में अखबारों के पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज में यह लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर तीन कॉलम में इसकी फोटो और खबर है। द हिन्दू में यह सेकेंड लीड है और शीर्षक है, वैश्विक दक्षिण आवाज समकालीन विश्व की प्रगति की कुंजी है : प्रधानमंत्री। अमर उजाला में आज दो पहले पन्ने हैं। दूसरे पहले पन्ने की लीड है, “स्थिर व समृद्ध विश्व में योगदान देगा मजबूत भारत : पीएम मोदी”। इस खबर का उपशीर्षक है, घाना की संसद में कहा, दोनों देशों ने सहे उपनिवेशवाद के जख्म, पर आत्मा थी आजाद। आप जानते हैं कि दिल्ली में विपक्ष ने संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की तो मानसून सत्र की घोषणा समय से पहले कर दी गई और विशेष सत्र नहीं हुआ। आज दिल्ली के इन अखबारों ने घाना की विशेष संसद को संबोधित करने की उपरोक्त खबरें छापी हैं। आबादी के लिहाज से घाना एनसीआर से छोटा है और पर्याप्त छोटा है। दिल्ली से थोड़ा ही बड़ा है। यही नहीं, 140 करोड़ की आबादी वाले देश के बिहार राज्य में आठ करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। वहां चुनाव होने हैं। वहां मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण चल रहा है और 2003 के बाद पहली बार हो रहा है। इसमें शामिल करने के लिए चुनाव आयोग ने नई शर्तें रखी हैं। विपक्षी गठबंधन के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग जाकर चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की अपनी बात की और प्रेस कांप्रेंस कर सबको बताया पर कल खबरें पहले पन्ने पर नहीं के बराबर थीं। दूसरी ओर, निष्पक्ष और स्वायत्त चुनाव आयोग की खबर यह भी थी कि उसने सिर्फ पार्टी प्रमुखों से बात करने की शर्त रखी। 

आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड है, “गांव दर गांव एक ही रोना है : हमारे पास सिर्फ आधार है…. हम वो कागज कहां से लायें जो चुनाव आयोग मांग रहा है”। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग जो मनमानी कर रहा है उसमें लाखों लोग मतदाता सूची में शामिल होने से रह जायेंगे। इसका कारण न सिर्फ चुनाव आयोग की नई शर्तें होंगी बल्कि समय कम होना भी है। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है। हालत यह है कि चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप है। विपक्षी दलों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त की बातचीत में उनके रवैये पर निशाना साधते हुए कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा है कि हम गलत पते पर चले गए थे। चुनाव आयोग को अपनी बिल्डिंग में बैठने की जरूरत नहीं है। भाजपा का एक बड़ा मुख्यालय है उन्हें वहीं एक फ्लोर लेकर बैठना चाहिए। यह सब दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है बल्कि घाना की खबर है क्योंकि प्रधानमंत्री वहां हैं। उन्हें घाना का सर्वोच्च सम्मान मिला है। नवोदय टाइम्स में सम्मानित किये जा रहे प्रधानमंत्री की फोटो के साथ चार कॉलम की खबर है। तीन कॉलम में इसका  शीर्षक है, “भारत-घाना संबंध समग्र साझेदारी तक बढ़े”। इसका हाईलाइट किया अंश है, “भारत जितना मजबूत होगा दुनिया को उतना सशक्त बनायेगा : मोदी”।  कहने की जरूरत नहीं है कि भारत को मजबूत करने के लिए एक योग्य और सक्षम नेतृत्व की जरूरत है। अभी दो लोगों की टीम काम से ज्यादा चुनाव प्रचार में व्यस्त रहती है। प्रधानमंत्री आठ करोड़ वोटर वाले बिहार की चिन्ता छोड़कर साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाले देश में सम्मानित हो रहे हैं और देश में उसी का प्रचार चल रहा है। इसमें अंतरराष्ट्रीय छवि निखारने की कोशिशें शामिल हैं।

महाभियोग की कार्रवाई

आज की एक और दिलचस्प खबर है – सरकार न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई तेज करेगी। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है, शीर्षक में विपक्ष के साथ लिखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर पीछे की ओर चार कॉलम में है। केंद्रीय मंत्री (मंत्रालय नहीं लिखा है) किरेन रिजिजू के हवाले से छपी इस खबर के शीर्षक में लिखा है, विपक्ष न्यायमूर्ति वर्मा को बर्खास्त करने के कदम का समर्थन कर रहा है, महाभियोग का प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी। इंडियन एक्सप्रेस में यह सिंगल कॉलम में है। दि एशियन एज में भी यह सिंगल कॉलम में है लेकिन शीर्षक है, न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के सरकारी कदम का विपक्ष ने समर्थन किया। द हिन्दू में यह लीड है। उपशीर्षक से बताया है कि इसके लिए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कराने की प्रक्रिया जल्दी ही शुरू होगी। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने यह जानकारी दी है और कहा है कि विपक्षी दलों ने इस पहल का समर्थन किया है। तथ्य यह भी है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही जज शेखर कुमार यादव के विवादित बयान का भी एक मामला है। न्यायमूर्ति वर्मा के घर पर नकदी उनकी अनुपस्थिति में उनके घर के रिहायशी हिस्से से अलग ऐसे हिस्से में देखी गई जहां आग लग गई थी और जहां बाहरी लोगों की भी पहुंच थी। सरकार को इस मामले में कार्रवाई की जल्दी है जबकि न्यायमूर्ति ने नकदी के बारे में जानकारी होने से इनकार किया है और उसे उनका होने का कोई सीधा सबूत नहीं है, पुलिस ने कोई जांच नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट की जजों की समित ने जांच कर गुप्त रिपोर्ट दी थी जो लीक हो गई और उसमें भी कोई ठोस सबूत नहीं है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति यादव ने सांप्रदायिक भाषण दिया है, उससे इनकार नहीं किया है और सुप्रीम कोर्ट उसका संज्ञान ले चुका है। यह बयान विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में दिया गया था। खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ आंतरिक जांच शुरू करने वाला था लेकिन राज्यसभा सचिवालय से एक पत्र मिलने के बाद इसे रोक दिया गया। पत्र में बताया गया था कि इस मामले में कार्रवाई राज्यसभा में लंबित है। असल में विपक्ष ने महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था जिसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। राज्य सभा के अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति ने कहा है कि वे संबंधित हस्ताक्षरों का सत्यापन करवा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी सरकार ने न्यायपालिका की स्वायतत्ता लगभग खत्म कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की पहली और अब तक की आखिरी प्रेस कांफ्रेंस के बावजूद अनुकूल फैसला करने वाले जजों को ईनाम देने, जजों को पटरी पर लाने की कोशिशों और दबावों के किस्से सार्वजनिक होने, एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के घर जाकर पूजा करने और उसका वीडियो सार्वजनिक करने की प्रधानमंत्री की कार्रवाई और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से संबंधित मामले में जज रहे ब्रिज गोपाल हरकिशन लोया की संदिग्ध मौत की जांच न होने देने और उस मामले में दिये गये तर्कों को न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में नहीं मानने जैसे ढेरों उदाहरण हैं। जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम पद्धति की आलोचना खुले आम होती रही है और यह काम उपराष्ट्रपति तक ने किया है और सबको पता है कि सरकार जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाना चाहती है। इसके लिये या इसके साथ सरकार न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की स्वायतत्ता को खत्म करती दिख रही है बल्कि अपनी सर्वोच्चता भी कायम करने में लगी है। इसके लिए लेख लिखे-लिखवाये जा रहे हैं और व्हाट्सऐप्प पर भी प्रसारित किये जा रहे हैं। 

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