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‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ पत्रकारिता को बचाने की जिम्मेदारी पत्रकारों पर!

प्रदीप मांढरे-

कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता और पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार 12 अक्टूबर को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी पौन घंटे की स्पीच में आरोप लगाए कि केंद्र की मोदी सरकार सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 को लगातार कमजोर करती जा रही है. उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एमए की डिग्री को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए आरटीआई एक्ट में संशोधन किए गए हैं. इसलिए डाटा प्रोटक्शन एक्ट में संशोधन किया गया है.

विपक्षी नेता ने जानकारी दी कि केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त का पद लम्बे समय से खाली है. 2 साल से 7 केंद्रीय सूचना आयुक्त के पद रिक्त हैं. जयराम रमेश का दावा है कि शासन में पारदर्शिता लाने, अफसरों में जवाबदेही लाने, जनता के हाथ में जानकारी देने के उद्देश्य से आज से ठीक 20 साल पहले मनमोहन सरकार ने आरटीआई कानून देश के लिए लाया था.

अपनी बात खत्म होते ही जयराम रमेश कहने लगे कि पत्रकार सिर्फ आरटीआई के बारे में ही प्रश्न करेंगे. किसी पत्रकार ने पी. चिदंबरम के बयान पर कि ऑपरेशन ब्लू स्टार गलती थी, पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि सिर्फ आरटीआई के बारे में ही पूछें. जब कुछ और प्रश्न आए तो जयराम रमेश झल्लाकर ओन्ली आरटीआई… ओनली आरटीआई बोलने लगे.

अब यहां प्रश्न उठता है कि जब कांग्रेस के प्रवक्ता ने अपनी बात पूरी विस्तार से कह दी तो वह क्यों पत्रकारों पर थोपना चाह रहे हैं कि सिर्फ आरटीआई के बारे में ही पूछें.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने अभी तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं ली है. यह सच भी है, लेकिन पक्ष – विपक्ष के जो बड़े नेता पत्रकार वार्ता बुलाते हैं, वे कौन से उत्तर देते हैं?

कुछ समय पूर्व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘वोट चोर’ विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस ली थी. पत्रकार सवाल ही नहीं पूछ पाए थे. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक महीने पहले ग्वालियर में कृषि विश्वविद्यालय में अधिकृत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. अपना लंबा बयान पढ़ा और उठकर चल दिए. इसमें प्रदेश में इन्वेस्टमेंट आने का दावा था. पत्रकार सवाल पूछते ही रह गए. सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के मध्यप्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने अभी तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं ली है. आजकल बड़े नेताओं में ट्रेंड हो गया है कि बाइट दो और सवाल मत लो.

कुछ समय पहले भाजपा के ग्वालियर के युवा नेता देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर रामू ने इस्कॉन द्वारा आयोजित भगवान जगन्नाथ यात्रा पर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. जब उनकी पूरी बात हो गई तो ग्वालियर हलचल ने उनसे कनाडा मसले पर उनके वायरल हुए वीडियो के बारे में पूछा तो नाराज होकर रामू कहने लगे कि आज के दिन आपको यह विषय पूछना ही नहीं चाहिए. इस पर कभी और विस्तार से जवाब दूंगा.

हकीकत यह है कि ‘और कभी’ रामू जैसे बड़े नेता – प्रभावशाली नेता ना तो मिलते हैं, ना फोन अटेंड करते हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके द्वारा दी गई जानकारी को ध्यान से सुनकर पत्रकार यदि उनसे जुड़े प्रश्न पूछ रहा है तो इसमें क्या गलत हो गया?

धीरे-धीरे खत्म होती ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ पत्रकारिता के लिए पत्रकार ही जिम्मेदार हैं. वे विरोध ही नहीं जताते कि उन्हें प्रश्न पूछने से क्यों रोका जा रहा है?

जयराम रमेश से पत्रकारों को बोलना था कि आपकी बात हमने सुन ली, नोट कर ली. छापेंगे भी. अब हमारे प्रश्नों को आप नज़रअन्दाज क्यों कर रहे हो? आप क्यों तय करोगे कि सिर्फ आरटीआई के बारे में ही पूछो?

नेताओं की बाइट लेते समय भी पत्रकारों को पहले स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए कि आपको हमारे सवालों का जवाब भी देना है. बल्कि अब तो समय आ गया है की प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही पत्रकार अपने प्रश्न दाग दें.

‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ पत्रकारिता को पत्रकार ही बचा सकते हैं.

लेखक, ग्वालियर हलचल सांध्य दैनिक के संपादक हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Subodh

    October 16, 2025 at 8:47 am

    पर पत्रकार अब बचें ही कहां हैं?

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