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प्राइम टाईम अंधेरे का सदमा… इस समय इस प्राइम टाइम की सख़्त जरूरत थी

Preety Choudhari : मैंने आदत के तौर पर टीवी देखना दस बारह साल पहले ही छोड़ दिया था ,यानि रवीश कुमार जब से अपने ब्लाग पर टी वी नहीं देखने की सलाह दे रहे हैं उससे बहुत पहले ही. मैं अच्छी तरह जानती थी कि मैं टीवी क्यों नहीं देखती …रवीश कुमार ने पत्रकारिता की इस कालिमा को पेश कर अपने ज़मीर को थोड़ा सुकून बख़्शा है या उसे और किकरत्व्यविमूढ़ कर दिया है पता नहीं पर इतना ज़रूर है कि इस समय इस प्राइम टाइम की सख़्त जरूरत थी.

Preety Choudhari : मैंने आदत के तौर पर टीवी देखना दस बारह साल पहले ही छोड़ दिया था ,यानि रवीश कुमार जब से अपने ब्लाग पर टी वी नहीं देखने की सलाह दे रहे हैं उससे बहुत पहले ही. मैं अच्छी तरह जानती थी कि मैं टीवी क्यों नहीं देखती …रवीश कुमार ने पत्रकारिता की इस कालिमा को पेश कर अपने ज़मीर को थोड़ा सुकून बख़्शा है या उसे और किकरत्व्यविमूढ़ कर दिया है पता नहीं पर इतना ज़रूर है कि इस समय इस प्राइम टाइम की सख़्त जरूरत थी.

Kashyap Kishor Mishra : प्राइम टाईम अँधेरे का सदमा… लखनऊ में एक महिला का बलात्कार हुआ था और उसकी तस्वीरें मीडिया में वायरल थीं, उस तस्वीर को देखकर मै दहल उठा था, मै कई दिन शॉक स्टेट में रहा, पर खूब सारे लोगों नें उस तस्वीर को सभ्यता के प्रतिकूल माना और उसे दिखाए जाने से परहेज की बात की। चार दिनों पहले, लखनऊ में ही, मुख्यमंत्री निवास से सटे इलाके में एक बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर फेंकी लाश बरामद हुई, इस खबर नें हमें झकझोर दिया, मेरी पत्नी इतना डर गई कि उसने बिटिया के ट्यूशन जाने पर रोक लगा दी, क्योंकि वहाँ वह अकेले जाती थी।

लखनऊ में कहीं भी जाईये, भिखारी बच्चों के गिरोह आपको घेर लेते हैं, कई बार सुबह आठ बजे के करीब वेव सिनेमा हाल के बाहर खड़े होकर मैं खामोशी से उनकी गतिविधियों का जायजा लेता हूँ, कई बार इन लड़कों में एकाध लड़के ऐसे भी नजर आ जाते हैं, जो कुछ वक्त बाद भिखारी भले लगे, पर उस वक्त धंधे में एकदम नए लगते हैं, ये बच्चे कहाँ से आते हैं, कौन हैं वो लोग जो दिल्ली से पहले गाज़ियाबाद और छोटे छोटे स्टेशनों पर सुबह सुबह इन बच्चों को रुमाल में कुछ भींगा कर बेचते हैं, जिसे ये बच्चे नौजवान औरते खरीद कर लम्बी लम्बी साँस भीतर तक खींच कर सूँघते हैं।

राह चलते कहीं भी, कभी भी मेरी नज़र घूमती है और कुछ न कुछ ऐसा जरूर दीख जाता है, जो मुझे सदमा पहुँचाने का पर्याय होता है, इस मुल्क में कदम कदम पर दुःख दुर्भाग्य भूख भेदभाव ताड़ना और ऐसे ही भावों से भरी तस्वीरें सजीव तैरती रहती है। कल रवीश कुमार नें अपने स्लॉट में नौ बजे टीवी पर कुछ भी दिखानें के बजाय सिर्फ अंधेरा दिखाया, यह लिखते हुए, कि यह अंधेरा ही आज की सच्चाई है। इस अंधेरी तस्वीर को देखकर बहुत से लोग हिल गए, खूब सारे लोग सदमे में हैं।

मैं हैरत में हूँ! वाकई हैरत में हूँ! उन सभी भाई बहनों से मेरा विनम्र आग्रह है, एक बार अपने दिल को टटोलकर देखिए, क्या यह अंधेरा आपके आस पास पसरे अँधेरे से जादा घना है? क्या कभी कभार भी आपने अपने चारो तरफ एक मनुष्य की तरह निगाहें डाल कर देखा है? क्या आप अपने चारो तरफ की सच्ची तस्वीरों से सदमे में आए हैं? अपने दिल को टटोलिएगा, जबाब भी आपको खुद को देना है, यदि रोज रोज अपने परिवेश की सच्चाई से आपको सदमा नहीं होता, तो जितना झूठा रवीश कुमार का प्राइम टाईम अंधेरा था उतना ही झूठा उससे हिलोर मार रहा आपके भीतर का सदमा है। आपका दिन शुभ हो!

प्रीति चौधरी और कश्यप किशोर मिश्र के फेसबुक वॉल से.

रवीश कुमार के जिस अंधेरे वाले प्राइम टाइम शो की बात हो रही है, उसे आनलाइन देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=shZf-NrSbu0


मूल पोस्ट :

भारतीय टीवी पत्रकारिता के फील्ड में एनडीटीवी और रवीश कुमार ने इतिहास रच दिया

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