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नकवी जी की नज़र “ठरकी धृतराष्ट्र” शब्द पर पड़ी तो उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई, प्रोड्यूसर की नौकरी जाते-जाते बची!

न्यूज़ चैनलों के न्यूड चैनल बनने की कहानी!

संजय सिन्हा-

न्यूज़ चैनल, न्यूड चैनल ………….

हाथ में बंदूक हो तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि जब चाहे, जहां चाहे दाग दी जाए। जेब में पेन हो तो इसका अर्थ भी यह नहीं होता कि जहां जो मन आया लिख दिया जाए। मुंह में जुबान होने का अर्थ भी यह नहीं होता कि जब जो मन हुआ बोल दिया जाए।

मनुष्य भले ही आज़ाद पैदा होता है, लेकिन उसे जंजीरों की मर्यादा को भी समझना चाहिए। जंजीरें हर बार गुलामी नहीं होतीं, कई बार वे अनुशासन भी होती हैं।

आप यह पढ़कर सोच रहे होंगे कि संजय सिन्हा को क्या हुआ, जो सुबह-सुबह बिफरे बैठे हैं। असल में मुझे आज अपने पुराने बॉस कमर वहीद नकवी जी की याद आ रही है। एक घटना याद आ रही है, जब आजतक में काम कर रहे एक प्रोड्यूसर ने एक कॉमेडी शो बनाते हुए स्लग लिख दिया था – ठरकी धृतराष्ट्र।

नकवी जी की नज़र इस शब्द पर पड़ी तो उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। इतनी कि उस प्रोड्यूसर की नौकरी जाते-जाते बची। उन्होंने समझाया था कि ठरकी गाली है। न्यूज़ चैनल की पहुंच घर-घर तक है। हम कुछ भी लिख सकते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि हम कुछ भी लिख दें। माना कि यह टीवी न्यूज़ चैनलों में गिरावट का काल है, फिर भी थोड़ी मर्यादा ज़रूरी है।

सच यह है कि न्यूज़ चैनलों में गिरावट की शुरुआत हो चुकी थी। इंडिया टीवी ने इस गिरावट की नींव अपने चैनल लॉन्च से ही रख दी थी। जब अन्य चैनलों के पत्रकार सरकारी विभागों का भ्रष्टाचार उजागर कर रहे थे, तब इंडिया टीवी ने शक्ति कपूर का स्टिंग किया और सुर्खियों में छा गया।

लोगों को मज़ा आया कि सिनेमा का कलाकार लड़कियों को फिल्मों में रोल दिलाने के नाम पर यह सब करता है। शक्ति कपूर देश के रोल मॉडल नहीं थे। वे आसान निशाना थे। और भी कई रहे होंगे, लेकिन उनकी चर्चा की आवश्यकता नहीं।

यहां बस इतना बताना ज़रूरी है कि वही समय था, जब टीवी न्यूज़ चैनलों का पंजाब केसरीकरण शुरू हुआ। पंजाब केसरी रंगीन अखबार था। चटपटा। नाई की दुकान पर बैठा ग्राहक उसे मज़े लेकर पढ़ता था कि वीरू की प्यारी बसंती किस पर नैन मटका रही है और जय की राधा का क्या हाल है।

वह एक अलग दर्शक वर्ग था। मैं उन दिनों जनसत्ता में था। संपादक जी की नज़र हम पर रहती थी कि हम कितने अखबार रोज़ पढ़कर दफ्तर आते हैं। यकीन मानिए, उसमें कभी पंजाब केसरी का नाम नहीं था। उन्होंने हमें एक बार भी नहीं टोका कि पंजाब केसरी में यह खबर छपी है, हमारे अखबार में क्यों नहीं।

इंडिया टीवी जब शुरू हुआ, तब उसके पास आजतक जैसे स्रोत नहीं थे। उसे बाज़ार में अपनी जगह बनानी थी। उसने वही किया, जो नहीं करना चाहिए था। और आजतक, सबसे बड़े न्यूज़ चैनल का खिताब पाने के बाद भी, इंडिया टीवी के जाल में फंस गया।

और भी कई घटनाएं घटीं (जिनकी चर्चा अभी स्थगित), लेकिन सच्चाई यह है कि आजतक टीआरपी की दौड़ में नंबर दो और तीन पर आ गया था। और उसी दबाव ने आजतक को इंडिया टीवी की नकल करने के लिए प्रेरित किया।

उन्हीं दिनों की बात है। एक गैर पत्रकार सज्जन आइडिया लेकर आए कि हमें स्लग में इंडिया टीवी को कॉपी करना चाहिए। उनसे सीखना चाहिए कि कैसे रोचक भाषा लिखी जाए। उदाहरण था – “धोनी का छह इंच मचाएगा धमाल।”

इंडिया टीवी पर क्रिकेट शो में चले इस स्लग से वे सज्जन इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सीईओ के सामने एक प्रेज़ेंटेशन पेश कर दिया था। उन दिनों हमें ऑफिस में पढ़ाया जाने लगा कि ऐसा लिखो कि दर्शक चिपक जाए।

उसी दौर में चला था “ठरकी धृतराष्ट्र।” हम गुड़ खा रहे थे, लेकिन गुलगुले पर मामला बिगड़ गया। बेचारा प्रोड्यूसर, न्यूज डाइरेक्टर की डांट खाकर वीडियोकोन टावर के पीछे गुप्ता जी के ढाबे में बैठकर भड़ास निकाल रहा था।

“मैंने तो सोचा था ठाकुर बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा। यहां तो नौकरी जाने की नौबत आ गई।” मैंने कहा था, टीआरपी का दबाव है इसलिए धोनी के छह इंच बल्ले वाले प्रेज़ेंटेशन बिक गए, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि कुछ भी लिख दो।

यह सच है कि हमने यमराज से मिले गजराज की लाइव मौत दिखाई, कुंजी लाल की आत्महत्या दिखाकर और बिना ड्राइवर की गाड़ी चलाकर अपने काम में स्थायी दाग लगा लिया है। फिर भी इतना ध्यान रखना ज़रूरी है कि हम न्यूज़ चैनल हैं, न्यूड चैनल नहीं।

उसने कहा था, “संजय सर, ठरकी तो सामान्य शब्द है। हम लोग आम भाषा में बोलते हैं।” मैंने कहा, “नहीं। ठरकी का अर्थ होता है कामुक, छिछोरा, हवस में डूबा आदमी। यह गाली ही है।”

उसने कहा, “अजब हाल है। न लिखो तो नौकरी जाए, लिखो तो नौकरी जाए। हमसे कहा जाता है कि हम दूरदर्शन नहीं हैं।”

याद आया। हम उन दिनों दूरदर्शन को दो तरह से गाली देते थे। पहला, वह सरकारी भोंपू है और हम क्रांतिकारी। दूसरा, वह वनीला स्वाद है और हम स्ट्रॉबेरी-चॉकलेट फ्लेवर से लैस हैं। लंबी कहानी छोटी।

हमने न्यूज़ चैनलों में कैंसर को पनपने दिया। और उस दौर का कैंसर अब चौथे चरण पर पहुंच चुका है। यह सच है कि अब सारे प्राइवेट न्यूज़ चैनल ऐसे बन गए हैं जिन्हें परिवार के साथ बैठकर बिल्कुल नहीं देखा जा सकता। दूरदर्शन बचा था। वही सरकारी भोंपू। वनीला स्वाद वाला।

सुना कि दूरदर्शन ने पर्यावरणविद और रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक (भले ही वे अभी जेल में हैं) पर प्रसारित एक शो में उन्हें ‘बेवफ़ा सोनम’ कहकर संबोधित किया।

दो बातें साफ हैं। अब सारे प्राइवेट न्यूज़ चैनल सरकारी भोंपू हो गए हैं। दूरदर्शन अब इंडिया टीवी और आजतक बन गया है।

संजय सिन्हा यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कहीं वही ज्ञानी, जिसने हमें मीटिंग में धोनी के छह इंच वाला प्रेज़ेंटेशन दिया था, दूरदर्शन तो नहीं पहुंच गया। अगर पहुंच गया है, तो मैं अपने परिजनों से अनुरोध करता हूं कि अब दूरदर्शन की पहुंच अपने बच्चों से दूर करें। नहीं तो किसी दिन आप घर में अपने ही बच्चों से सुनेंगे- “पापा ठरकी, चाचा ठरकी।” और आप उन्हें टोक भी नहीं पाएंगे। क्योंकि बच्चे ने यह कहां से सीखा? वनीला स्वाद वाले सरकारी तंत्र से।

नोट: सोनम बेवफ़ा है एक दस रुपए के नोट पर लिखा जुमला था। यह अपने समय में इतना वायरल हुआ था कि सोनम नाम बेवफाई का पर्याय बन गया था। सोनम वांगचुक अगर अपराधी हैं तो कानून (सरकार) को अपना काम करने दें। दूरदर्शन के पत्रकार (पत्रकार शब्द लिखते हुए शर्म आ रही है) को कम से कम टोकने वाला (रोकने की औकात न भी हो) एक नकवी होना चाहिए। जंजीरें हर बार गुलामी नहीं होतीं, कई बार वे अनुशासन भी होती हैं।

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