यूपी पुलिस के सीओ आशुतोष मिश्रा की कारस्तानी : पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेंद्र तिवारी को छह साल जेल कटवा दिया

04 सितम्बर 2009 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में महेंद्र कुमार की हत्या हुई जिसमे अनिल कुमार त्रिपाठी नामजद हुए और पिच्चू मिश्रा आरोपों के घेरे में आये. विवेचना के दौरान विवेचक सीओ अजीतमल आशुतोष मिश्रा ने जबरदस्ती पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र चंद्रशेखर को पुच्ची मिश्रा बताते हुए 11 सितम्बर 2006 को गिरफ्तार कर इटावा जेल भेज दिया जबकि वे जानते थे कि यह पिच्चू मिश्रा नहीं है.

धर्मेन्द्र तिवारी के खिलाफ आरोप पत्र भी लग गया और वे छह साल से ऊपर जेल में रहे. वे 07 अक्टूबर 2012 को तब छूटे जब अपर सत्र न्यायाधीश, औरैया ने 06 अक्टूबर के अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि वह पुच्ची मिश्रा नहीं, धर्मेन्द्र तिवारी हैं. जज ने तमाम बैनामे, परिवार रजिस्टर, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे ताम साक्ष्य को देखने के बाद यह आदेश दिया था.

जेल जाने के पहले धर्मेन्द्र तिवारी के पास 10 पहिये के दो ट्रक थे और 30-40 हज़ार प्रति माह की अच्छी आमदनी थी पर इस दौरान उनका पूरा कारोबार ख़त्म हो गया और आज वे पैसे-पैसे के मोहताज हैं. उनका घर गिर गया है और 11 साल का बच्चा मात्र तीसरे क्लास में है.

अब आईपीएस अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उनकी लड़ाई को उठाते हुए इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा है और कोर्ट के आदेश के आधार पर श्री धर्मेन्द्र को पुलिस द्वारा फर्जी फंसाए जाने के सम्बन्ध में कम से कम पांच करोड़ मुआवजा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है.

Spent 6 years in jail on police action, 5 crore compensation sought  

One Mahendra Kumar was murdered on 04 September 2009in Anantram, police station Ajitmal, district Auraiya in which Anil Kumar Tripathi was named accused and Picchu Mishra’s name came in light. During investigation, then CO Ajitmal Ashutosh Mishra arrested Dharmendra Kumar Tiwari son of Chandrashekhar calling him Picchu Mishra on 10 September 2006, while definitely knowing that he is not Picchu, who was sent to Etawah jail.

Later Chargesheet was submitted against Picchu Mishra, with Dharmendra remaining in jail and facing trial for more than 6 years. He was released from jail on 07 October 2012 only after orders of ADJ Auraiya dated 06 October which clearly stated that this man was Dharmendra Tiwari and not Picchu Mishra. The Judge based his order on several sale deeds, family register, vehicle registration certificate, driving licence, voter identity card, ration card and such other fundamental documents.

Before going to jail Dharmendra Tiwari had two 10-tyre trucks and his monthly income was Rs. 30-40,000. During this period, his income evaporated, his house got dilapidated and today his 11 year son is studying only in class 3.

Now IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have taken up his cause, writing to National Human Rights Commission, to order a compensation of Rs. 5 crores for Sri Dharmendra and appropriate legal action and delinquent police officers.

Dear Amitabh Thakur,

The Commission has recieved your complaint and it has assigned diary number as 1519251

with the following details:-

Victim
Dharmendra Kumar Mishra
Address
s/o Late Chandrashekhar Tiwari, r/o Mandir Mahewa, ps Bakewar, district- Etawah
Incident dated
01/01/1900
Incident Type
ILLEGAL ARREST
Incident Place
Auria
AURIA , UTTAR PRADESH

NHRC, New Delhi, INDIA.

मूल पत्र….   

सेवा में,
मा० अध्यक्ष महोदय,
मा० राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
नयी दिल्ली

विषय- श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र स्व० चंद्रशेखर तिवारी निवासी मंदिर महेवा, थाना बकेवर, जनपद इटावा के साथ हुए घोर मानवाधिकार उल्लंघन में उन्हें समुचित मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित करने विषयक  

महोदय,
हम आपके समक्ष एक ऐसा प्रकरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमे हमें प्राप्त अभिलेखों और हमें बताये तथ्यों के अनुसार एक व्यक्ति को पुलिस अफसरों द्वारा जानबूझ कर दूसरा व्यक्ति दिखा कर हत्या जैसे गंभीर मामले में जेल भेज दिया गया और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी प्रेषित कर दिया गया जिसका नतीजा यह रहा कि वह पूर्णतया निर्दोष व्यक्ति पुलिस अफसरों के जानने-समझने के बाद भी छः वर्ष से अधिक अवधि के लिए जेल में निरुद्ध रहा जिस दौरान उसका पूरा कारोबार नष्ट हो गया, उसकी बीवी और बच्चे सड़क पर आ गए और उस समय लाखों का वह आदमी आज पैसे-पैसे को मोहताज है.

यह व्यक्ति तब जेल से छूट पाया जब सत्र न्यायलय के सामने यह पूरी तरह साबित और स्थापित हो गया कि वह मुकदमे में प्रकाश में आया व्यक्ति नहीं है बल्कि एक दूसरा पूरी तरह अनजान आदमी है जिससे उस मुकदमे का दूर-दूर तक कोई भी वास्ता नहीं था बल्कि जिसे मात्र कुछ पुलिस अफसरों की व्यक्तिगत लालच ने जेल तक पहुंचा दिया था.

उपरोक्त अभिलेख और तथ्यों के आधार पर हमारी दृष्टि में यदि मा० आयोग ने इस मामले में संज्ञान लेकर इस पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा दिलाने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित किये जाने का कार्य नहीं किया तो यह न्याय की दृष्टि से निश्चित रूप से घातक होगा.

प्रकरण यह है कि दिनांक 04/09/2005 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में श्री महेंद्र कुमार पुत्र श्री आशाराम निवासी रूपसाहब मुदैना, थाना अजीतमल, जनपद औरैया की हत्या हुई जिसके सम्बन्ध में मु०अ०स० 235/2005 धारा 302, 307, 504 आईपीसी तथा 3(2)(5) एससी एसटी एक्ट का मुक़दमा थाना अजीतमल पर श्री आशाराम द्वारा पंजीकृत कराया गया. इसमे श्री अनिल कुमार त्रिपाठी पुत्र श्री रामस्वरुप नामजद हुए. विवेचक सीओ अजीतमल श्री अजय प्रताप सिंह द्वारा प्रारंभ की गयी जिसमे लगातार कई विवेचक बदले और श्री वंशराज सिंह यादव, सीओ अजीतमल इसके विवेचक हुए.

श्री वंशराज ने वादी श्री आशाराम के बयान दिनांक 03/10/2005 (विवेचना का परचा संख्या VI) के आधार पर तीन अज्ञात व्यक्तियों के नाम प्रकाश में लाये- श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा,  थाना बकेवर, इटावा, श्री बृजेश मिश्रा पुत्र श्री बीर मिश्र निवासी निवासी बम्हौरा, थाना बकेवर, इटावा तथा श्री राजीव पुत्र श्री बदन निवासी बहेड़ा थाना बकेवर, इटावा.

इसके बाद श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल ने दिनांक 01/11/2005 को इसकी विवेचना ग्रहण की. दिनांक 20/12/2005 को उपरोक्त चारों (श्री अनिल कुमार त्रिपाठी, श्री बृजेश मिश्रा, श्री राजीव चौधरी और श्री पुच्ची मिश्रा) के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया.
इस समय तक श्री धर्मेन्द्र तिवारी कहीं प्रकाश में नहीं थे और उनसे इस मामले का कोई साबका नहीं पड़ा था. श्री धर्मेन्द्र तिवारी के अनुसार उनको पहली बार इस मामले की जानकारी दिनांक 10/09/2006 को रात करीब दस बजे उस समय हुई जब ये अपने घर मंदिर महेवा, थाना बकेवर के बाहर खड़े थे. उसी समय अचानक पुलिस की जीप आई और श्री धर्मेन्द्र को पकड़ कर थाने ले गयी. घर पर पकड़ने के पहले कोई बात नहीं बताई. जीप में कहा कि थाने चलिए, आपके खिलाफ वारंट है. अजीतमल थाने पर पुलिसवालों ने बताया कि श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा के नाम से वारंट है, उसकी जगह आपको हाज़िर होना पड़ेगा. श्री धर्मेन्द्र ने इसका प्रतिवाद किया. उस समय तक उनके भाई श्री जीतेन्द्र तिवारी भी थाने आ गए थे. उन्होंने भी इसका प्रतिवाद किया तो पुलिसवालों ने उनको भी थाने पर बैठा लिया. कहा कि इसे थाने पर हाज़िर होना पड़ेगा नहीं तो श्री जीतेन्द्र को भी झूठा केस लगा कर बंद कर देंगे.

श्री धर्मेन्द्र का कहना है कि कोई विकल्प नहीं होने पर दोनों भाई थाने पर चुपचाप बैठे रहे. सुबह श्री धर्मेन्द्र को थाने की जीप पर बैठा पर औरैया कोर्ट ले गए और श्री पुच्ची मिश्रा दर्शा कर मा० न्यायालय में हाज़िर करा दिया. श्री धर्मेन्द्र ने मा० सीजेएम, औरैया से कहा कि वे पुच्ची मिश्रा नहीं हैं धर्मेन्द्र कुमार तिवारी हैं लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गयी और श्री धर्मेन्द्र को जेल भेज दिया गया.

अभिलेखों के अनुसार पुलिस की यह कार्यवाही श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल के कार्यकाल में उनके निर्देशों और आदेशों पर हुई. इसके बाद श्री धर्मेन्द्र इटावा जेल भेज दिए गए. श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ ने एससीडी पर्चे (केस डायरी) में कहीं भी श्री धर्मेन्द्र को कहीं से भी गिरफ्तार करना नहीं दिखाया बल्कि केस डायरी में लिखा कि श्री पुच्ची मिश्र मा० न्यायालय में हाज़िर हुए और उनका बयान लिया जा रहा है जबकि श्री धर्मेन्द्र के अनुसार वास्तविकता यह थी कि उन्हें पिछली रात उनके घर से अजीतमल थाने की पुलिस उठा कर ले आई थी. श्री आशुतोष मिश्रा ने दिनांक 11/09/2006 के केस डायरी में लिखा कि पुच्ची मिश्र से अपराध के बारे में पूछा गया तो पुच्ची मिश्र ने कहा कि वे अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखेंगे.

इस प्रकार तथ्य बताते हैं कि श्री आशुतोष मिश्र ने श्री पुच्ची मिश्र का जो नाम दिनांक 03/10/2005 को श्री वंशराज यादव के विवेचना के समय श्री आशाराम के बयान में आया था, उसे दिनांक 10/09/2006 को मनमर्जी श्री पुच्ची की जगह श्री धर्मेन्द्र को स्वतः ही श्री पुच्ची बना दिया गया और उन्हें स्थानीय पुलिस किए द्वारा गिरफ्तार करा कर मा० न्यायालय में पेश कर जेल भिजवा दिया गया. श्री धर्मेन्द्र को आज तक यह नहीं पता कि विवेचक श्री आशुतोष ने ऐसा क्यों किया और ऐसा करने के पीछे उनका क्या मकसद था या क्या मजबूरी थी पर श्री धर्मेन्द्र को इतना अवश्य ज्ञात है कि उन्हें श्री पुच्ची के स्थान पर पकड़ कर मा० न्यायालय लाया गया और उसके बाद वे जेल भी भेज दिए गए.

श्री आशुतोष ने दिनांक 16/09/2006 को इस मामले में श्री पुच्ची के नाम पर जेल में निरुद्ध श्री धर्मेन्द्र सहित सभी अभियुक्तगण के खिलाफ आरोपपत्र मा० न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया और इसके बाद नतीजा यह रहा कि श्री धर्मेन्द्र छः साल तक बिना किसी कारण, बिना किसी दोष के जेल में सड़ते रहे और इस बीच उनका परिवार, उनका कारोबार और वे स्वयं पूरी तरह बर्बाद होते गए. इसके बाद ट्रायल के समय श्री धर्मेन्द्र बार-बार मा० न्यायालय आते रहे और उनकी पुकार भी धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में होती रही और मा० न्यायालय के आर्डर शीट पर भी वे श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी के नाम से ही हस्ताक्षर करते थे. इस प्रकार मा० न्यायाधीश सहित सभी अधिवक्तागण और पुलिस वाले यह जानते थे कि यह व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र हैं पर इसके बाद भी उन्हें श्री पुच्ची के रूप में जेल में रहना पड़ा और दर्जनों बार मा० न्यायालय में सबों की जानकारी के बाद भी श्री पुच्ची के रूप में आना पड़ा.

इस मामले में सपूर्ण सत्यता तब सामने आई जब मा० न्यायालय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अ0एक्स कैडर, ।। औरैया श्री के पी सिंह, एचजेएस द्वारा सत्र परीक्षण सं0-155/2006 में दिनांक 06/10/2012 को आदेश पारित किया गया. मा० न्यायालय के आदेश ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया. मा० न्यायालय के आदेश ने यह पूरी तरह स्थापित और सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति पिछले छः साल से जेल में निरुद्ध था वह श्री पिच्चु मिश्रा नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी है. उदहारण के लिए मा० न्यायलय ने अपने आदेश के पृष्ठ 24 के तीसरे प्रस्तर में कहा- “यहीं पर अब प्रश्न यह उठता है कि जो अभियुक्त पुच्ची मिश्रा के नाम से प्रकरण में परीक्षित हो रहा है क्या वह धर्मेन्द्र तिवारी है या पुच्ची मिश्रा है। बचाव पक्ष की ओर से जो भी साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं उन साक्ष्यों के आधार पर यह साबित है कि अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी है न कि पुच्ची मिश्रा है। अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के तमाम दस्तावेजीय साक्ष्य उसके द्वारा प्रस्तुत भी किया गया है.”

आदेश के पृष्ठ 25 से लगायत पृष्ठ 27 तक कई ऐसे अभिलेखों और गवाहों का उल्लेख किया गया है जो निर्विवादित रूप से स्थापित कर देते हैं कि निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं श्री धर्मेन्द्र थे. उदहारण के लिए मा० न्यायालय ने कहा-“बचाव पक्ष (अभियुक्त पुच्ची मिश्रा) द्वारा अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के निम्नलिखित दस्तावेजीय साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं जिससे उसका नाम पुच्ची मिश्रा नहीं है बल्कि धर्मेन्द्र तिवारी लिखा है। परिवार रजिस्टर प्रदर्श ख-1 को डी0डब्लू0-2 केशव सिंह ने साबित किया है जिसमें परिवार की मुखिया बैकुण्ठी देवी दर्ज है। परिवार रजिस्टर के पेज संख्या-120 से लेकर 121 पर क्रम संख्या-416 पर बैकुण्ठी देवी व उनके बाद प्रेमादेवी, जितेन्द्र कुमार, सुषमा देवी, धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर, सागर पुत्र धर्मेन्द्र कुमार आदि दर्ज है। चन्द्रशेखर के दो लड़के धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार लिखा है। धर्मेन्द्र का उर्फियत में कोई नाम नहीं लिखा है। पुच्ची मिश्रा भी उर्फियत में दर्ज नहीं है। धर्मेन्द्र की पत्नी का उर्फियत में नाम रश्मि दर्ज है। डी0डब्लू0-2 ने यह भी कहा है कि उर्फियत में नाम यदि पुच्ची मिश्रा होता तो अवश्य दर्ज होता। गवाह ने आगे यह भी कहा है कि दौरान पड़ताल मैंने बैकुण्ठी देवी के परिवार के पुरूष सदस्यों के बारे में धर्मेन्द्र व जितेन्द्र के बारे में जानकारी की तो पता चला कि ये ब्राहम्ण जाति के त्रिपाठी लिखते हैं। मिश्रा लिखने की कोई जानकारी नहीं मिली। प्रदर्श ख-1 को अपने हस्तलेख, हस्ताक्षर में बैकुण्ठी देवी के परिवार रजिस्टर को जारी करना साबित किया है। इस परिवार रजिस्टर से भी धर्मेन्द्र का पुच्ची मिश्रा साबित होना नहीं पाया जाता। इसी प्रकार डी0डब्लू0-1 दिवाकर पाण्डेय ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत महेवा थाना बकेबर जिला इटावा ने भी अपनी शहादत में कहा है कि बैकुण्ठी देवी के चन्द्रशेखर लड़के थे जिनके दो लड़के जितेन्द्र व धर्मेन्द्र हैं। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र को पहचानता है। 10-15 दिन वर्ष पूर्व बृजेश मिश्रा का परिवार रहता था, उनके दो लड़के पुच्ची मिश्रा व गुड्डू मिश्रा थे। पुच्ची 12-13 साल का तथा गुड्डू 2-3 वर्ष का रहा होगा। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी का नाम पुच्ची मिश्रा नहीं रहा न उन्हें पुच्ची मिश्रा कह कहर पुकारा जाता है। धर्मेन्द्र तिवारी व जितेन्द्र तिवारी का कोई उपनाम भी नहीं है। धर्मेन्द्र के पास ट्रक का व्यापार करते हैं। ग्राम प्रधान होने के नाते उनके व उनके परिवार के बारे में जानता हूं। डी0 डब्लू0-3 अतिबल सिंह रजिस्ट्रार कानूनगो ने भी भारत निर्वाचन आयेाग द्वारा जारी पहचाना पत्र (निर्वाचन कार्ड) नं0-यू0पी0/66/303/402113 प्रदर्श ख-4 एवं एस0डी0ए0म भर्थना द्वारा धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर के नाम दिनांक 01.05.1995 को जारी होना साबित किया है। इसी प्रकार डी0डब्लू-4 लाखन सिंह, वरिष्ठ लिपिक, ए0आर0टी0ओ0 कार्यालय इटावा ने भी एल0एम0वी0 लाइसेंस नंबर-44445 प्रदर्श ख-3 व धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर के नाम दिनांक 14.07.2000 को जारी होना साबित किया व उस पर धर्मेन्द्र कुमार की फोटो लगी होना भी साबित किया है। लाइसेन्स का नवीनीकरण दिनांक 09.05.06 से दिनांक 08.05.09 तक किया जाना व पुनः फोटो धर्मेन्द्र की लगवाना साबित किया है। नवीनीकरण पर तत्कालीन ए0आ0टी0ओ0 श्रीमती रचना यद्वंशी के हस्ताक्षर भी साबित किया। यह भी कहा कि धर्मेन्द्र कुमार की नई फोटो मिलाकर नवीनीकरण किये थे। इसी गवाह द्वारा लाइसेन्स बुक में लगी फोटो को हाजिर अदालत अभियुक्त की फोटो होना तथा गाड़ी पंजीयन रजि0 में गाड़ी नम्बर-यू0पी0 75एफ/8641 का पंजीकरण धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर तहसील भर्थना जिला इटावा के नाम होना आर0सी0 फार्म नंबर-23 में पंजीकृत स्वामी धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर व आर0सी0 प्रदर्श ख-5 उक्त ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर का होना पंजीयन रजिस्टर प्रदर्श ख-6 पर ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेख का नाम होना साबित यिा है। इसी प्रकार डी डब्लू0-5 मनोज कुमार अस्थाना निबन्धक लिपिक ने भूमिंख्या-354/2 में से 17 डिस0 का विक्रयनामा /24 भाग क अखिलेश कुमार के पक्ष में दिनांक 01.11.199 तहरीर किया जाना व बैनामे के दस्तावेज पर धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार पुत्रगण चन्द्रशेखर मूल निवासी टकरूपुरा की फोटो लगा होना साबित किया है। फोटो पर जिेन्द्र कुमार व धर्मेन्द्र कुमार के नाम अंकित होना कहा है। का0 सं0-100 ख/10 दस्तावेज की सतय प्रतिलिपि प्रदर्श ख-7 को साबित किया है। दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति आज न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है कहा है। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है, का कथन किया। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो को देख कर अदालत में मौजूद अभियुक्त जो कस्टडी में जेल में लाया गया है, की धर्मेन्द्र कुमार के नाम पर पहचान की ओैर कहा कि मेरे दस्तावेज में धर्मेन्द्र कुमार की फोटो मुल्जिम धर्मेन्द्र से मेल खाती है। इसी प्रकार डी0डब्लू0-6 बाल भ्यासी जिसे अभियोजन के अनुसार घटना स्थल पर वरवक्त घटना मौजूद होना कहा जाता है, ने बयान में पुच्ची मिश्रा निवासी मोहल्ला नरायनपुर जिला औरैया द्वारा गोली चलाना कहा है। धर्मेन्द्र को भी जानता है, कहा है। हाजिर अदालत अभियुक्त की पहचान धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में किया और प्रकरण में गोली चलाने वाले व्यक्ति को पुच्ची मिश्रा बताया जिसकी कद काठी धर्मेन्द तिवारी से भिन्न बताया।“

मा० न्यायालय ने स्पष्ट कहा- “जो कार्य अभियोजन द्वारा कार्यवाही शिनाख्त कराना चाहिये था उस कार्य का निर्वहन बचाव पक्ष की ओर से किया गया है, उसकी ओर से तमाम सबूत पेश किये गये हैं जो यह साबित करते ही नहीं बल्कि उससे स्पष्ट रूप से निर्विवाद रूप से यही साबित होता है कि प्रकरण में विचारित तथा कथित पुच्ची मिश्रा, धर्मेन्द्र तिवारी है। यही अभियोजन के चक्षुदर्शी साक्षी बाल भ्यासी जो डी0डब्लू-6 के रूपमें बचाव पक्ष ने परीक्षित कराया है, उसके साक्ष्य से भी साबित होता है।“

मा० न्यायलय ने कहा- “जब इस तथ्य का साक्ष्य अभियोजन ने प्रस्तुत किया है कि पुच्ची मिश्रा ने गोली चलायी थी तब अभियुक्त धर्मेन्द तिवारी नहीं पुच्ची मिश्रा ही है यह साबित करने का भार अभियोजन पर था जबकि अभियोजन के इस दायित्व को बचाव पक्ष द्वारा निर्वहन करते हुए साबित किया गया है कि अदालत में जिसका विचारण हो रहा है व व्यक्ति पुच्ची मिश्रा नहीं धर्मेन्द तिवारी है। धर्मेन्द तिवारी होने का तमाम दस्तावेजी साक्ष्य भी उसकी ओर से दाखिल करके साबित भी किया गया है।“

मा० न्यायलय के उपरोक्त समस्त टिप्पणी इस बात को निर्विवादित रूप से स्थापित करते हैं कि जेल में निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि उनके नाम पर श्री धर्मेन्द्र थे. मा० आयोग के समक्ष प्रस्तुत इस वाद/शिकायत का मूल आधार भी मा० अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, आर एक्स कैडर-II, औरैया का आदेश दिनांक 06/10/2012 है. उपरोक्त आदेश के आधार पर मा० न्यायलय द्वारा निकले गए निष्कर्ष की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति पुलिस की गलती (जानबूझ कर अथवा अनजाने) के कारण ही छः वर्ष तक प्रताड़ित हुआ, लगातार जेल में रहा, उसकी पत्नी और बेटा सड़क पर आ गए और उसका पूरा व्यवसाय चौपट हो गया.

श्री धर्मेन्द्र के अनुसार जिस समय वे गिरफ्तार किये गए थे उस समय उनकी उम्र 28-29 वर्ष की थी. वे एकदम युवा थे और उनके अनंत संभावनाएं थीं. उनके मन में काफी कुछ करने की तमन्ना और जज्बा था.उन्होंने हाल में दो नयी गाड़ियां दस पहिया ट्रक ख़रीदा था. उन्होंने महेवा कसबे का जिला पंचायत से तहबाजारी का ठेका भी 3.66 लाख रुपये में लिया था जिससे उन्हें लगभग 6-7 लाख रुपये साल की आमदनी की उम्मीद थी. वे हर माह लगभग 35-40 हज़ार रुपये कमा ले रहे थे. उस समय उनके एक ट्रक की कीमत 14 लाख रुपये थी जिसकी आज के समय कीमत पच्चीस लाख रुपये के आसपास होगी. इस तरह एक युवा आदमी, जिसकी युवा पत्नी और ढाई साल का बच्चा था,  उसे पुलिस ने दूसरा आदमी, जिससे उनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही कोई लेना-देना था, बना कर उसके घर से फर्जी पकड़ कर हत्या का मुलजिम बना दिया और इसके साथ ही उसका सब कुछ बर्बाद हो गया. श्री धर्मेन्द्र, उसकी पत्नी और बच्चे का तीन लाख का बीमा जस का तस पड़ा रह गया क्योंकि घर में खाने के लाले पड़ गए थे, बीमा कौन जमा करता. आज श्री धर्मेन्द्र का बेटा ग्यारह साल का हो गया है पर पिता के गाइडेंस के बिना वह कक्षा तीन में पढने को मजबूर है. पत्नी भी इस हादसे से पूरी तरह से टूट चुकी है. इस बीच श्री धर्मेन्द्र का महेवा स्थित घर भी गिर गया, पूरा खंडहर हो गया, उसे बनाने वाला कोई नहीं था. आज श्री धर्मेन्द्र के बच्चे उसके कानपुर स्थित भाई श्री जितेन्द्र के घर में रहने को मजबूर हैं जबकि स्वयं श्री धर्मेन्द्र भाई श्री जितेन्द्र के महेवा स्थित घर में रहते हैं और वे स्वयं भी अर्ध-विक्षिप्त अवस्था में न्याय के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं. इसी दौरान उन्हें कुछ लोगों ने हमारे बारे में भी बताया तो वे यहाँ चल कर आये हैं.

ऊपर लिखी सभी बातों के बाद हमारी दृष्टि में यह मा० आयोग का कर्तव्य हो जाता है कि श्री धर्मेन्द्र और उनके परिवार के साथ पूर्ण न्याय किया जाए. हमारी दृष्टि में इसके कम से कम दो अनिवार्य अंग होने चाहिए-

1. श्री धर्मेन्द्र को पुलिस के गलत कार्यों के कारण होने वाले समस्त कठिनाईयों, परेशानियों, अन्याय, कारावास आदि और उनके परिवार के साथ घटित समस्त दुर्व्यवस्थाओं और दुर्दशा के लिए उन्हें राज्य की ओर समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए. जहां तक हम समझ पा रहे हैं और जहां तक उपरोक्त तथ्य इंगित कर रहे हैं, यह मुआवजा कम से कम पांच करोड़ रुपये होना चाहिए

2. श्री धर्मेन्द्र की इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार समस्त पुलिसकर्मियों के विरुद्ध समस्त आवश्यक विधिक और प्रशासनिक कार्यवाही की जाए

हमें विश्वास है कि मा० न्यायालय के उपरोक्त आदेश के आलोक में मा० आयोग इस प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए इसमें तत्परता के साथ सम्पूर्ण न्याय करेगा क्योंकि यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का एक अत्यंत ज्वलंत प्रकरण दिख पड़ता है.

पत्र संख्या-AT/Complaint/86/15                                  
दिनांक- 27/02/2015

डॉ नूतन ठाकुर
अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

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