पुलिस सिर्फ एक धोखा है, इससे विश्वास उठाना ही आपके लिए शुभ होगा!

कार की टक्कर के बाद पत्रकार तड़पता रहा, पुलिस वाला पास भी नहीं आया… दोस्तों, अपने अनुभव के आधार पर पुलिस को लेकर अपनी बात रख रहा हूं। 11 अक्टूबर की रात लगभग 11:30 पर लखनऊ के सेंट फ्रांसिस स्कूल के पास एक तेज रफ़्तार वैगन आर ने पीछे से मेरी बाइक पर जोरदार टक्कर मारी और वो तेजी से निकल गया। अपनों के आशीर्वाद से मेरी जान तो बच गई लेकिन शरीर पर चोट आई थी। लेकिन दिल पर गहरा घाव वो पुलिसकर्मी दे गया, जो दूर से यह सब देखता रहा। लेकिन उसने करीब आकर ये देखने की जहमत तक नहीं उठाई कि इतनी तेज टक्कर होने के बाद घायल बाइक सवार यानि मैं, जिंदा हूं या मर गया। बन्दे ने पास की दूकान से गुटखा ख़रीदा, खाया और निकल गया।

इसके बाद अब मेरी सोच पुलिस वालों को लेकर बिलकुल बदल गई है। जबसे पत्रकारिता में आया हूं, हमेशा पुलिसकर्मी से जुडी जब भी कोई वसूली, रिश्वतखोरी की खबर आती या फिर किसी और कारणों से उन पर उंगली उठती तो मुझे लगता कि कुछ पुलिसवालों की वजह से सभी को गलत ठहरा दिया जाता है। लेकिन पहले सीएमएस चौक के पास हुए एक्सीडेंट जिसमें घायल की जान पुलिसकर्मी की लापरवाही से गई, और फिर अपने साथ हुए हादसे में एक पुलिसकर्मी का गैर-संवेदनशील रवैया देख कर इनसे विश्वास उठ गया है।

अब सिर्फ एक चीज समझ आई कि अपने भरोसे रहिए… ये पुलिस वाले किसी के भी सगे नहीं हैं। ये भी समझ में आ गया कि आखिर फरियादी दबंगों की देहरी पर क्यों जाते हैं, थाने क्यों जाने से डरते हैं। मित्र, आप सबको मेरी तरह से बिन मांगी एक सलाह है। जान लीजिए, ध्यान दीजिए, याद रखिए…. पुलिस सिर्फ एक धोखा है… इस धोखे से आपका विश्वास उठना-उठाना ही आपकी सेहत के लिए शुभ होगा।

Regards,
ashish sharma ‘rishi
lucknow
mo- 09721921921
rishimantra@gmail.com

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बस्तर पुलिस ने देशबंधु अखबार के ब्यूरो चीफ देवशरण तिवारी को फर्जी मामलों में फंसाया

रायपुर । बस्तर में ईमानदार और निरपेक्ष पत्रकारों पर हमले जारी हैं। इस बार पुलिस ने षड्यंत्र कर तीन माह पुराने मामले में देशबंधु बस्तर के ब्यूरोचीफ व छत्तीसगढ़ सरकार के अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार देवशरण तिवारी का नाम चालान पेश करते समय न केवल आरोपियों की लिस्ट में जोड़ा बल्कि उन्हें फरार भी बताया है। ज्ञात हो कि तीन माह पूर्व बस्तर परिवहन संघ के दो गैंग के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इस पूरे मामले को लेकर देवशरण ने खुद लगातार समाचार कवरेज किया था। देशबंधु कार्यालय के ठीक बगल में स्थित बस्तर परिवहन संघ के कार्यालय को सील करते समय पुलिस ने पंचनामा में देवशरण का भी हस्ताक्षर कराया था।

यही नहीं, इन तीन माह में देवशरण को पुलिस विभाग के कई पत्रकार वार्ता में भी बुलाया गया पर पुलिस ने कोर्ट में झूठा चालान पेशकर उन्हें फरार बताया है। देवशरण तिवारी को पिछले वर्ष पीयूसीएल की ओर से मानवाधिकार की पत्रकारिता के लिए निर्भीक पत्रकारिता सम्मान दिया गया था। दक्षिण बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह का मानना है कि देवशरण खुद सरकारी अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार हैं पर उनसे कोई पूछताछ किये बिना गंभीर आपराधिक प्रकरणों में उन्हें सह आरोपी बनाए जाने के पीछे बस्तर में बनाये गए डरावने माहौल के बीच भी बिना डरे उनके द्वारा की जा रही निर्भीक पत्रकारिता ही है। प्रभात सिंह खुद भी पिछले वर्ष तीन माह जेल होकर आए हैं और अभी जमानत पर हैं। इनके अलावा तीन और पत्रकार पिछले वर्ष नक्सली सहयोगी बता का जेल भेजे गए थे, जिसमे अनवर खान और सोमारू नाग बाईज्जत बरी हो गए जबकि संतोष यादव अभी जमानत में हैं।

पत्रकार देवशरण ने बताया कि सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम, सीपीआई नेता मनीष कुंजाम और सोनी सोरी पर हमले की रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस द्वारा बनाये गए संगठनों के कई पदाधिकारियों ने उन्हें कई बार फंसाये जाने की धमकी दी थी। देवशरण के अनुसार पुलिस ने जिस गैंगवार के मामले में उसे आरोपी बनाया है उसमें एक पक्ष का प्रमुख मनीष पारेख है जो बदनाम और भंग हो चुके सामाजिक एकता मंच का प्रमुख और स्थानीय विधायक का भाई है। अग्नि और सामाजिक एकता मंच के द्वारा पूर्व आईजी के सरंक्षण में जब सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों पर हमले किये जा रहे थे और आतंक का माहौल बनाया गया था, तब देवशरण ही उन इक्के दुक्के पत्रकारों में शामिल थे जो सच को देश के सामने ला रहे थे।

ज्ञात हो कि बस्तर और पूरे प्रदेश में पत्रकारों को फर्जी मामलों में फंसाकर डराए जाने के खिलाफ पिछले वर्ष प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर आंदोलन किया था, तब प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने प्रतिनिधि मंडल से बात करते हुए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति की घोषणा की थी। इस समिति की पिछले एक साल में अभी तक किसी बैठक होने की खबर नहीं है। तय हुआ था कि इस समिति द्वारा जांच के बाद ही किसी पत्रकार के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया जा सकेगा।

इस सम्बंध में बस्तर पुलिस अधीक्षक शेख आरिफ ने बताया कि गैंगवार प्रकरण का चालान शुक्रवार को न्यायालय में पेश किया गया है। इस प्रकरण में कोई आरोपी पत्रकार भी है, यह उनकी जानकारी में नहीं है। उन्होंने बताया कि अभी वे जगदलपुर से बाहर हैं। अतः आकर ही बता पाएंगे कि पत्रकार के खिलाफ प्रकरण निर्धारित प्रक्रिया से हुई है या नहीं। उन्होंने सरकार द्वारा पत्रकारों की गिरफ्तारी को लेकर कोई उच्चस्तरीय समिति बनाये जाने की जानकारी होने से इनकार किया।

आप नेता सोनी सोरी ने बस्तर पुलिस पर पत्रकारों डराने के लिए षड्यंत्र करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि खुलेआम षड्यंत्र कर फर्जी तरीके से तीन माह पुराने मामले में पत्रकार देवशरण को फंसाकर बस्तर पुलिस ने जता दिया है कि उन्हें रमन सरकार द्वारा बनाये किसी समिति की परवाह नहीं है। प्रदेश में पिछले दो वर्ष से संघर्ष कर रहे पत्रकार सुरक्षा संयुक्त संघर्ष समिति जुड़े तामेश्वर सिन्हा ने इस मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र का मामला दर्ज करने और पत्रकार देवशरण के खिलाफ मामला तत्काल वापस लेने अन्यथा प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। बस्तर आईजी का मोबाइल नंबर 9425595544, पुलिस अधीक्षक का मोबाइल नंबर 9479194003 और पत्रकार देवशरण तिवारी का मोबाइल नंबर 9009988019 है।

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कोई मीडिया वाला अगर पत्रकारिता न कर रहा हो और गाड़ी पर प्रेस लिखवाए हो तो क्या वो भी जेल जाएगा?

Dinesh Choudhary : इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला गौरतलब है। आप प्रेसवाले नहीं हैं और प्रेस लिखते हैं तो चारसौबीसी के मामले में जेल जा सकते हैं। पर आप प्रेस वाले हैं और पत्रकारिता न कर कुछ और करते हैं, तब कौन-सा मामला बनता है?

थिएटर एक्टिविस्ट और जर्नलिस्ट दिनेश चौधरी की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार जी, खोटे सिक्के अकेले पुलिस महकमे की टकसाल में ही नहीं ढलते, कुछ आपके पेशे में भी होंगे!

रवीश कुमार की चिट्ठी पढ़ कर यूपी के एक प्रादेशिक पुलिस अधिकारी ने लिखा जवाबी खत… भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी द्वारा रवीश के पत्र का समुचित जवाब ये रहा….

रवीश जी के ख़त का उत्तर..

प्रिय रवीश जी,

आपका ख़त पढ़ा। उसमें सहमत होने की भी जगह है और संशोधनों की भी। यह आपके पत्र का जबावी हमला कतई नहीं है। उसके समानांतर हमारे मनो-जगत का एक प्रस्तुतीकरण है। मैं यह जबाबी ख़ुतूत किसी प्रतिस्पर्धा के भाव से नहीं लिख रहा हूँ। चूँकि आपने भारतीय पुलिस सेवा और उसमें भी खासकर (उत्तर प्रदेश) को संबोधित किया है, इसलिए एक विनम्रतापूर्ण उत्तर तो बनता है। यूँ भी खतों का सौंदर्य उनके प्रेषण में नहीं उत्तर की प्रतीक्षा में निहित रहता है। जिस तरह मुकुल का ‘मुस्कराता’ चेहरा आपको व्यथित किये हुए है (और जायज़ भी है कि करे), वह हमें भी सोने नहीं दे रहा.. जो आप ‘सोच’ रहे हैं, हम भी वही सोच रहे हैं। आप खुल कर कह दे रहे हैं। हम ‘खुलकर’ कह नहीं सकते। हमारी ‘आचरण नियमावली’ बदलवा दीजिये, फिर हमारे भी तर्क सुन लीजिये। आपको हर सवाल का हम उत्तर नहीं दे सकते। माफ़ कीजियेगा। हर सवाल का जवाब है,पर हमारा बोलना ‘जनहित’ में अनुमन्य नहीं है। कभी इस वर्दी का दर्द सिरहाने रखकर सोइये, सुबह उठेंगे तो पलकें भारी होंगीं। क्या खूब सेवा है जिसकी शुरुआत ‘अधिकारों के निर्बंधन अधिनियम’ से शुरू होती है! क्या खूब सेवा है जिसे न हड़ताल का हक़ है न सार्वजनिक विरोध का.. हमारा मौन भी एक उत्तर है। अज्ञेय ने भी तो कहा था..

“मौन भी अभिव्यंजना है
जितना तुम्हारा सच है, उतना ही कहो”

हमारा सच जटिल है। वह नकारात्मक भी है। इस बात से इनकार नहीं। आप ने सही कहा कि अपने जमीर का इशारा भी समझो। क्या करें? खोटे सिक्के अकेले इसी महकमे की टकसाल में नहीं ढलते। कुछ आपके पेशे में भी होंगे। आपने भी एक ईमानदार और निर्भीक पत्रकार के तौर पर उसे कई बार खुलकर स्वीकारा भी है। चंद खोटे सिक्कों के लिए जिस तरह आपकी पूरी टकसाल जिम्मेदार नहीं, उसी तर्क से हमारी टकसाल जिम्मेदार कैसे हुई?

हम अपने मातहतों की मौत पर कभी चुप नहीं रहे। हाँ सब एक साथ एक ही तरीके से नहीं बोले। कभी फोरम पर कभी बाहर, आवाजें आती रही हैं। बदायूं में काट डाले गए सिपाहियों पर भी बोला गया, और शक्तिमान की मौत पर भी। पर क्या करें, जिस तरह हमें अपनी वेदना व्यक्त करने के लिए कहा गया है, उस तरह कोई सुनता नहीं। अन्य तरीका ‘जनहित’ में अलाउड नहीं। मुक्तिबोध ने कहीं लिखा है कि

“पिस गया वह भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच
ऐसी ट्रेजेडी है नीच”

मुकुल और संतोष की इस ‘ट्रेजेडी’ को समझिये सर। यही इसी घटना में अगर मुकुल और संतोष ने 24 आदमी ‘कुशलतापूर्वक’ ढेर कर दिए होते, तो आज उन पर 156 (3) में एफआईआर होती। मानवाधिकार आयोग की एक टीम ‘ओन स्पॉट’ इन्क्वायरी के लिए मौके पर रवाना हो चुकी होती। मजिस्ट्रेट की जाँच के आदेश होते। बहस का केंद्र हमारी ‘क्रूरता’ होती। तब निबंध और लेख कुछ और होते।

आपने इशारा किया है कि ’झूठे फंसाए गये नौजवानों के किस्से’ बताते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा के खंडहर ढहने लगे हैं। यदि कभी कोई डॉक्टर आपको आपकी बीमारी का इलाज करने के दौरान गलत सुई (इंजेक्शन) लगा दे (जानबूझकर या अज्ञानतावश), तो क्या आप समूचे चिकित्सा जगत को जिम्मेदार मान लेगें? गुजरात का एक खास अधिकारी मेरे निजी मूल्य-जगत से कैसे जुड़ जाता है, यह समझना मुश्किल है।

हमने कब कहा कि हम बदलना नहीं चाहते। एक ख़त इस देश की जनता के भी नाम लिखें कि वो तय करे, उन्हें कैसी पुलिस चाहिए। हम चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं कि बदल दो हमें। बदल दो 1861 के एक्ट की वह प्राथमिकता जो कहती है की ‘गुप्त सूचनाओं’ का संग्रह हमारी पहली ड्यूटी है और जन-सेवा सबसे आखिरी। क्यों नहीं जनता अपने जन-प्रतिनिधियों पर पुलिस सुधारों का दबाव बनाती? आपको जानकार हैरानी होगी कि अपने इलाकों के थानेदार तय करने में हम पहले वहां के जाति-समीकरण भी देखते हैं! इसलिए नहीं कि हम अनिवार्यतः जाति-प्रियता में श्रद्धा रखते हैं। इससे उस इलाके की पुलिसिंग आसान हो जाती है। कैसे हो जाती है, यह कभी उस इलाके के थानेदार से एक पत्रकार के तौर पर नहीं, आम आदमी बनकर पूछियेगा। वह खुलकर बताएगा। भारतीय पुलिस सेवा का ‘खंडहर’ यहीं हमारी आपकी आँखों के सामने बना है। कुछ स्तम्भ हमने खुद ढहा लिए, कुछ दूसरों ने मरम्मत नहीं होने दिए।

जिसे खंडहर कहा गया है, उसी खंडहर की ईंटें इस देश की कई भव्य और व्यवस्थित इमारतों की नींव में डाल कर उन्हें खड़ा किया गया है। मुकुल और संतोष की शहादत ने हमें झकझोर दिया है। हम सन्न हैं। मनोबल न हिला हो, ऐसी भी बात नहीं है। पर हम टूटे नहीं हैं। हमें अपनी चुप्पी को शब्द बनाना आता है हमारा एक मूल्य-जगत है। फूको जैसे चिंतक भले ही इसे ‘सत्ता’ के साथ ‘देह’ और ‘दिमाग’ का अनुकूलन कहते हों, पर प्रतिरोध की संस्कृति इधर भी है। हाँ, उसमें ‘आवाज’ की लिमिट है और यह भी कथित व्यवस्था बनाये रखने के लिए किया गया बताया जाता है।

यह सही है कि हम में भी वो कमजोरियां घर कर गयी हैं जो जमीर को पंगु बना देती हैं। One who serves his body, serves what is his, not what he is’ (Plato) जैसी बातों में आस्था बनाये रखने वाले लोग कम हो गए हैं। पर सच मानिए हम लड़ रहे हैं। जीत में आप लोगों की भी मदद आवश्यक है। पुलिस को सिर्फ मसाला मुहैया कराने वाली एजेंसी की नजर से न देखा जाए।

जो निंदा योग्य है उसे खूब गरियाया जाये, पर उसे हमारी ‘सर्विस’ के प्रतिनिधि के तौर पर न माना जाये। हमारी सेवा का प्रतिनिधित्व करने लायक अभी भी बहुत अज्ञात और अल्प-ज्ञात लोग हमारे बीच मौजूद हैं जो न सुधारों के दुकानदार हैं और न आत्म-सम्मान के कारोबारी।

मथुरा में एकाध दिन में कोई नया एस पी सिटी आ जायेगा। फरह थाने को भी नया थानेदार मिल जायेगा। धीरे धीरे लोग सब भूल जाएंगे। धीरे धीरे जवाहर बाग फिर पुरानी रंगत पा लेगा। धीरे धीरे नए पेड़ लगा दिए जायेंगे जो बिना किसी जल्दबाजी के धीरे धीरे उगेंगे। सब कुछ धीरे धीरे होगा। धीरे धीरे न्याय होगा। धीरे धीरे सजा होगी। हमारी समस्या किसी राज्य का कोई एक इंडिविजुअल नहीं है। हमारी समस्या रामवृक्ष भी नहीं है। हमारी समस्या सब कुछ का धीरे धीरे होना है। धीरे धीरे सब कुछ उसी तरह हो जायेगा जो मुकुल और संतोष की मौत से पहले था।

सर्वेशर दयाल सक्सेना ने भी क्या खूब लिखा था-

“…धीरे-धीरे ही घुन लगता है, अनाज मर जाता है।
धीरे-धीरे ही दीमकें सब कुछ चाट जाती हैं।
धीरे-धीरे ही विश्वास खो जाता है, साहस डर जाता है,
संकल्प सो जाता है।

मेरे दोस्तों मैं इस देश का क्या करूँ
जो धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है?
भरी बोतलों के पास खाली गिलास-सा पड़ा हुआ है।
मेरे दोस्तों!
धीरे-धीरे कुछ नहीं होता, सिर्फ मौत होती है।
धीरे धीरे कुछ नहीं आता, सिर्फ मौत आती है
सुनो ढोल की लय धीमी होती जा रही है।
धीरे-धीरे एक क्रान्ति यात्रा, शव-यात्रा में बदलती जा रही है।”

इस ‘धीरे-धीरे’ की गति का उत्तरदायी कौन है। शायद अकेली कोई एक इकाई तो नहीं ही होगी। विश्लेषण आप करें। हमें इसका ‘अधिकार’ नहीं है। जो लिख दिया वह भी जोखिम भरा है। पर मुकुल और संतोष के जोखिम के आगे तो नगण्य ही है। जाते जाते आदत से मजबूर, केदारनाथ अग्रवाल की यह पंक्तियाँ भी कह दूँ जो हमारी पीड़ा पर अक्सर सटीक चिपकती हैं …

‘सबसे आगे हम हैं
पांव दुखाने में
सबसे पीछे हम हैं
पांव पुजाने में
सबसे ऊपर हम हैं
व्योम झुकाने में
सबसे नीचे हम हैं
नींव उठाने में’

मजदूरों के लिखी गयी यह रचना कुछ हमारा भी दर्द कह जाती है। हाँ, मजदूरों को जो बगावत का हक़ लोकतंत्र कहलाता है उसे हमारे यहाँ कुछ और कहा जाता है। इसी अन्तर्संघर्ष में मुकुल और संतोष कब जवाहर बाग में घिर गए,उन्हें पता ही नहीं चला होगा। उन्हें प्रणाम।

उम्मीद है आपको पत्र मिल जायेगा।

धर्मेन्द्र
भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश)

लेखक भारतीय पुलिस सर्विस (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी हैं।


रवीश कुमार का भारतीय पुलिस सेवा के नाम एक पत्र इस प्रकार है….

प्रिय भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश),

उम्मीद है मुकुल द्विवेदी की मौत के सन्नाटे का कुछ कुछ हिस्सा आप सभी के आस पास भी पसरा होगा। उनकी यादें रह रहकर आ जा रही होंगी। कोई पुरानी बात याद आ रही होगी, कुछ हाल की बात याद आ रही होगी। ट्रेनिंग के समय अकादमी की चोटी से हैदराबाद देखना याद आ रहा होगा। किसी को मथुरा दर्शन के बाद वहाँ की ख़ातिरदारी याद आती होगी। कुछ आदर्श याद आते होंगे। बहुत सारे समझौते याद आते होंगे।

मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा कि एक पीपीएस अधिकारी मुकुल द्विवेदी की मौत हुई है। मुझे सब इंस्पेक्टर संतोष यादव की मौत का भी उतना ही दुख है। उतना ही दुख ज़ियाउल हक़ की हत्या पर हुआ था। उतना ही दुख तब हुआ था जब मध्य प्रदेश में आईपीएस नरेंद्र कुमार को खनन माफ़िया ने कुचल दिया था। दरअसल कहने के लिए कुछ ख़ास है नहीं लेकिन आपकी चुप्पी के कारण लिखना पड़ रहा है। ग़ैरत और ज़मीर की चुप्पी मुझे परेशान करती है। इसी वजह से लिख रहा हूँ कि आप लोगों को अपने मातहतों की मौत पर चुप होते तो देखा है मगर यक़ीन नहीं हो रहा है कि आप अपने वरिष्ठ, समकक्ष या कनिष्ठ की मौत पर भी चुप रह जायेंगे।

मैं बस महसूस करना चाहता हूँ कि आप लोग इस वक्त क्या सोच रहे हैं। क्या वही सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूँ? क्या कुछ ऐसा सोच रहे हैं जिससे आपके सोचने से कुछ हो या ऐसा सोच रहे हैं कि क्या किया जा सकता है। जो चल रहा है चलता रहेगा। मैं यह इसलिए पूछ रहा हूँ कि आपके साथी मुकुल द्विवेदी का मुस्कुराता चेहरा मुझे परेशान कर रहा है। मैं उन्हें बिलकुल नहीं जानता था। कभी मिला भी नहीं। लेकिन अपने दोस्तों से उनकी तारीफ सुनकर पूछने का मन कर रहा है कि उनके विभाग के लोग क्या सोचते हैं।

मैंने कभी यूपीएससी की परीक्षा नहीं दी। बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं था इसलिए किसी प्रकार का भ्रम भी नहीं था। जब पढ़ना समझ में आया तब तक मैं जीवन में रटने की आदत से तंग आ गया था। जीएस की उस मोटी किताब को रटने का धीरज नहीं बचा था। इसका मतलब ये नहीं कि लोक जीवन में लोकसेवक की भूमिका को कभी कम समझा हो। आपका काम बहुत अहम है और आज भी लाखों लोग उस मुक़ाम पर पहुँचने का ख़्वाब देखते हैं। दरअसल ख़्वाबों का तआल्लुक़ अवसरों की उपलब्धता से होता है। हमारे देश की जवानियाँ, जिस पर मुझे कभी नाज़ नहीं रहा, नंबर लाने और मुलाज़मत के सपने देखने में ही खप जाती हैं। बाकी हिस्सा वो इस ख़्वाब को देखने की क़ीमत वसूलने में खपा देती हैं जिसे हम दहेज़ से लेकर रिश्वत और राजनीतिक निष्ठा क्या क्या नहीं कहते हैं।

मैं इस वक्त आप लोगों के बीच अपवादस्वरूप अफ़सरों की बात नहीं कर रहा हूं। उस विभाग की बात कर रहा हूँ जो हर राज्य में वर्षों से भरभरा कर गिरता जा रहा है। जो खंडहर हो चुका है। मैं उन खंडहरों में वर्दी और कानून से लैस खूबसूरत नौजवान और वर्दी पहनते ही वृद्ध हो चुके अफ़सरों की बात कर रहा हूँ जिनकी ज़िले में पोस्टिंग होते ही स्वागत में अख़बारों के पन्नों पर गुलाब के फूल बिखेर दिये जाते हैं। जिनके आईपीएस बनने पर हम लोग उनके गाँव घरों तक कैमरा लेकर जाते हैं। शायद आम लोगों के लिए कुछ कर देने का ख़वाब कहीं बचा रह गया है जो आपकी सफलता को लोगों की सफलता बना देता होगा। इसलिए हम हर साल आपके आदर्शों को रिकार्ड करते हैं। हर साल आपको अपने उन आदर्शों को मारते हुए भी देखते हैं।

क्या आप भारतीय पुलिस सेवा नाम के खंडहर को देख पा रहे हैं? क्या आपकी वर्दी कभी खंडहर की दीवारों से चिपकी सफ़ेद पपड़ियों से टकराती है? रंग जाती है? आपके बीच बेहतर, निष्पक्ष और तत्पर पुलिस बनने के ख़्वाब मर गए हैं। इसलिए आपको एसएसपी के उदास दफ्तरों की दीवारों का रंग नहीं दिखता। मुझे आपके ख़्वाबों को मारने वाले का नाम पता है मगर मैं मरने और मारे जाने वालों से पूछना चाहता हूँ। आपके कई साथियों को दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में कमिश्नर बनने के बाद राज्यपाल से लेकर सांसद और आयोगों के सदस्य बनने की चाह में गिरते देखा हूँ। मुझे कोई पहाड़ा न पढ़ाये कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ आपको ये इनाम आपके हुनर और अनुभव के बदले देती हैं।

आप सब इस व्यवस्था के अनुसार हो गए हैं जो दरअसल किसी के अनुसार नहीं है। आप सबने हर जगह समर्पण किया है और अब हालत ये हो गई कि आप अपने ग़म का भी इज़हार नहीं कर सकते। गर्मी है इसलिए पता भी नहीं चलता होगा कि वर्दी पसीने से भीगी या दोस्त के ग़म के आँसू से। मुझे कतर्व्य निष्ठा और परायणता का पाठ मत पढ़ाइये। इस निष्ठा का पेड़ा बनाकर आपके बीच के दो चार अफसर खा रहे हैं और बाकी लोग खाने के मौके की तलाश कर रहे हैं।

मामूली घटनाओं से लेकर आतंकवाद के नाम पर झूठे आरोपों में फँसाये गए नौजवानों के किस्से बताते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा के खंडहर अब ढहने लगे हैं। दंगों से लेकर बलवों में या तो आप चुप रहे, जाँच अधूरी की और किसी को भी फँसा दिया। आपने देखा होगा कि गुजरात में कितने आईपीएस जेल गए। एक तो जेल से बाहर आकर नृत्य कर रहा था। वो दृश्य बता रहा था कि भारतीय पुलिस सेवा का इक़बाल ध्वस्त हो चुका है। भारतीय पुलिस सेवा की वो तस्वीर फ्रेम कराकर अपने अपने राज्यों के आफिसर्स मेस में लगा दीजिये। पतन में भी आनंद होता है। उस तस्वीर को देख आपको कभी कभी आनंद भी आएगा।

रिबेरो साहब के बारे में पढ़ा था तब से उन्हीं के बारे में और उनका ही लिखा पढ़ रहा हूँ। बाकी भी लिखने वाले आए लेकिन वो आपके नाम पर लिखते लिखते उसकी क़ीमत वसूलने लगे। पुलिस सुधार के नाम पर कुछ लोगों ने दुकान चला रखी है। इस इंतज़ार में कि कब कोई पद मिलेगा। मैं नाम लूं क्या? एक राज्य में बीच चुनावों में आपके बीच के लोगों की जातिगत और धार्मिक निष्ठाओं की कहानी सुन कर सन्न रह गया था। बताऊँ क्या? क्या आपको पता नहीं? अभी ही देखिये कुछ रिटायर लोग मुकुल की मौत के बहाने पुलिस सुधार का सवाल उठाते उठाते सेटिंग में लग गए हैं। ख़ुद जैसे नौकरी में थे तो बहुत सुधार कर गए।

आपकी सीमायें समझता हूँ। यह भी जानता हूँ कि आपके बीच कुछ शानदार लोग हैं। कुछ के बीच आदर्शवाद अब भी बचा है। बस ये पत्र उन्हीं जैसों के लिए लिख रहा हूँ और उन जैसों के लिए भी जो पढ़ कर रूटीन हो जायेंगे। इन बचे खुचे आदर्श और सामान से एक नई इमारत बना लीजिये और फिर से एक लोक विभाग बनिये जिसकी पहचान बस इतनी हो कि कोई पेशेवर और निषप्क्ष होने पर सवाल न उठा सके। अपनी खोई हुई ज़मीन को हासिल कीजिये। अकेले बोलने में डर लगता है तो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बोलिये।

इसके लिए जरूरी है कि आप पहले मथुरा के ज़िलाधिकारी और एसएसपी से यारी दोस्ती में ही पूछ लीजिये कि आखिर वहाँ ये नौबत क्यों आई। किसके कहने पर हम ऐसे सनकी लोगों को दो से दो हज़ार होने दिये। वे हथियार जमा करते रहे और हम क्यों चुप रहे। क्या मुकुल व्यवस्था और राजनीति के किसी ख़तरनाक मंसूबों के कारण मारा गया? क्या कल हममें से भी कोई मारा जा सकता है? मुकुल क्यों मारा गया? कुछ जवाब उनके होंठों पर देखिये और कुछ उनकी आँखों में ढूंढिये। क्या ये मौत आप सबकी नाकामी का परिणाम है? मथुरा के ज़िलाधिकारी, एसएसपी जब भी मिले, जहाँ भी मिले, आफ़िसर मेस से लेकर हज़रतगंज के आइसक्रीम पार्लर तक, पूछिये। ख़ुद से भी पूछते रहिए।

पता कीजिये कि इस घटना के तार कहाँ तक जाते हैं। नज़र दौड़ाइये कि ऐसी कितनी संभावित घटनाओं के तार यहाँ वहाँ बिखरे हैं। राजनीतिक क़ब्ज़ों से परेशान किसी ग़रीब की ज़मीन वापस दिलाइये। संतोष यादव और मुकुल द्विवेदी के घर जाइये। उनके परिवारों का सामना कीजिये और कहिये कि दरअसल साहब से लेकर अर्दली तक हम अतीत, वर्तमान और भावी सरकारों के समझौतों पर पर्दा डालने के खेल में इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि हम सभी को मरा हुआ मान लिया जाना चाहिए। हम सबको जीते जी मुआवज़ा मिल जाना चाहिए।

नहीं कहने की लाचारी से निकलिये साहब लोग। रिटायर लोग के भरोसे मत रहिए। बोलने की जगह बनाइये। आपकी नौकरी हमारी तरह नहीं है कि दो मिनट में चलता कर दिये गए। हममें से कई फिर भी बहुत कुछ सबके लिए बोल देते हैं। आप सरकारों के इशारों पर हमारे ख़िलाफ़ एफ आई आर करते हैं फिर भी हम बोल देते हैं। राना अय्यूब की गुजरात फाइल्स मँगाई की नहीं। आप कम से कम भारतीय पुलिस सेवा के भारतीय होने का फ़र्ज तो अदा करें। आप हर जगह सरकारों के इशारों पर काम कर रहे हैं। कभी कभी अपने ज़मीर का इशारा भी देख लीजिये।

तबादला और पदोन्नति के बदले इतनी बड़ी क़ीमत मत चुकाइये। हम सही में कुछ राज्यों के राज्यपालों का नाम नहीं जानते हैं। कुछ आयोगों के सदस्यों का नाम नहीं जानते हैं। इन पदों के लिए चुप मत रहिए। सेवा में रहते हुए लड़िये। बोलिये। इन समझौतों के ख़िलाफ़ बोलिये। अपने महकमे की साख के लिए बोलिये कि मथुरा में क्या हुआ, क्यों हुआ। बात कीजिये कि आपके बीच लोग किस किस आधार पर बंट गए हैं। डायरी ही लिखिये कि आपके बीच का कोई ईमानदारी से लड़ रहा था तो आप सब चुप थे। आपने अकेला छोड़ दिया। भारतीय प्रशासनिक सेवा हो या पुलिस सेवा सबकी यही कहानी है।

वरना एक दिन किसी पार्क में जब आप रूलर लेकर वॉक कर रहे होंगे और कहीं मुकुल द्विवेदी टकरा गए तो आप उनका सामना कैसे करेंगे? यार हमने तुम्हारी मौत के बाद भी जैसा चल रहा था वैसा ही चलने दिया। क्या ये जवाब देंगे? क्या यार हमने इसी दिन के लिए पुलिस बनने का सपना देखा था कि हम सब अपने अपने जुगाड़ में लग जायेंगे। मैं मारा जाऊँगा और तुम जीते जीते जी मर जाओगे। कहीं मुकुल ने ये कह दिया तो!

आप सभी की ख़ैरियत चाहने वाला मगर इसके बदले राज्यपाल या सांसद बनने की चाह न रखने वाला रवीश कुमार इस पत्र का लेखक हैं। डाकिया गंगाजल लाने गया है इसलिए मैं इसे अपने ब्लाग कस्बा पर पोस्ट कर रहा हूँ। आमीन!

रवीश कुमार

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यूपी में जंगलराज : लाख रुपये न देने पर पुलिस वालों ने पीटकर मार डाला और लाश हवालात में टांग दिया

यूपी की संभल पुलिस का बर्बर चेहरा… युवक की हवालात में मौत… परिजनों ने पुलिस पर लगाया हत्या का आरोप… हवालात के शौचालय में फाँसी पर झूलता मिला युवक का शव… पुलिस अधीक्षक ने थाना प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियो को किया निलंबित… मजिस्ट्रेटी जाँच के दिए आदेश… परिजनों ने काटा हंगामा…. भारी पुलिस बल मौके पर तैनात… कई थानों की पुलिस को बुलाया गया…  

संभल की थाना धनारी पुलिस पर एक युवक की हत्या का आरोप लगा है. 11 अप्रैल को धनारी थाने में एक किशोरी के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था. पीड़ित पक्ष ने चार लोगों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवाया था. चार लोगो में एक राम नरेश यादव भी शामिल था. राम नरेश जनपद अलीगढ़ का रहने वाला था. इसी कड़ी में देर रात धनारी पुलिस ने अलीगढ़ के थाना गंगोइ के ग्राम रतलोइ में दबिश दी. मौके से पुलिस को युवती तो बरामद हुई नहीं पर पुलिस राम नरेश को गिरफ्तार कर लाई.

युवक को थाने पर लाकर पूछताछ की. पुलिस का कहना है जब हमने हवालात में देखा तो युवक दिखाई नहीं दे रहा था. जब हमने अंदर जा कर देखा तो युवक हवालात के शौचालय में फाँसी के फंदे पर लटका हुआ था. दूसरी ओर मृतक राम नरेश के परिजनों का कहना है कि इन्होंने ही राम नरेश की हत्या की है. परिजनों का कहना है कि इन्होंने एक आरोपी को एक लाख रुपये लेकर छोड़ दिया था और हमसे भी एक लाख रुपये की मांग कर रहे थे. एक लाख रुपय नहीं देने पर इन्होंने हमारे भाई की हत्या कर उसको फाँसी का रूप दे दिया.

वहीं शाम होते होते मामले को शांत करने के लिए एसपी सम्भल अतुल सक्सेना ने कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी ब्रजेश यादव समेत सात पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया. साथ ही पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश भी दे दिए हैं. वहीं इस घटना को लेकर एक बार फिर उत्तर प्रदेश का जंगलराज सुर्खियों में है. शव का पंचनाम भर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. नीचे दिए गए वीडियोज में परिजनों और एसपी संभल के बाइट के साथ साथ पूरे मामले को समझने के लिए पर्याप्त विजुअल हैं.

https://youtu.be/cI_zfgIGpl8

https://youtu.be/dwqpqK-qpRc

https://youtu.be/qMg2FLkbv-4

https://youtu.be/JkP6HE-1gp0

https://youtu.be/vpxdjsrHrR0

संभल से मोहम्मद सद्दाम की रिपोर्ट. संपर्क : 9997331892 और 9528571125

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बलिया में सिपाही ने की अवैध वसूली की शिकायत तो एसपी ने किया सस्पेंड, आहत सिपाही ने दिया इस्तीफा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नरही थाने के पिकेट पर हो रही अवैध वसूली की शिकायत करना एक सिपाही को महंगा पड़ गया. एसपी ने शिकायत करने वाले सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. इससे आहत निलम्बित सिपाही ने पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद को अपना त्याग पत्र भेज दिया है. उसने जान-माल की सुरक्षा की गुहार भी की है.

नरही थाने पर चंद दिनों पहले तैनात हुए सिपाही संतोष कुमार वर्मा का कहना है कि 03 जनवरी की रात 09 बजे से भरौली चेक पोस्ट पर उनकी ड्यूटी लगी थी. वे जब ड्यूटी पर पहुंचे तो वहां एक व्यक्ति द्वारा अवैध गाड़िया चेक पोस्ट से पार करायी जा रही थी. इसका विरोध करते हुए सिपाही संतोष कुमार ने उक्त व्यक्ति को पकड़कर थाने के एसएचओ को सूचित किया. एसएचओ मौके पर पहुंचे और उक्त व्यक्ति को आजाद करते हुए सिपाही संतोष को ही जबरिया थाने लेकर चले आये.

जब इसकी शिकायत सिपाही ने एसपी से की तो एसएचओ रामरतन सिंह भड़क गये. सिपाही का आरोप है कि एसएचओ ने उसे न सिर्फ गालियों से नवाजा, बल्कि उसके मुंह पर जबरदस्ती शराब गिराकर पीएचसी के चिकित्सक से मेडिकल भी करवाया. हद तो तब हो गयी जब एसपी अनीस अहमद अंसारी ने सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. सिपाही पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा है. विभाग से मिले इस प्रतिदान से आहत और निलम्बित सिपाही ने अपना त्याग पत्र पुलिस हेड क्वार्टर को भेज दिया. सिपाही ने कहा कि वह रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल लूँगा लेकिन पुलिस की नौकरी नही करूँगा क्योकि यहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

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बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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यूपी पुलिस रातों रात इतनी बहादुर हो गई कि उसको पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटना भी आ गया! …आखिर क्यों!!

उत्तर प्रदेश पुलिस ने आगरा में कई पत्रकारों को जमकर लाठियों से पीटा और उनको घायल कर दिया। बताया जाता है कि उनके कैमरे तक तोड़ दिय गये। पत्रकार असली थे या नक़ली..? दलाल थे या ईमानदार..? कवरेज कर रहे थे या ब्लैकमेल…? हो सकता है कुछ लोगों के मन में इस दखद समय में इसी तरह के विचार आ रहे हों! हो सकता है कि कुछ प्रेस क्लबों में शराब के नशे मे धुत कुछ कथित क़लम के सिपाही सरकार को गिराने से लेकर एक एक को देख लेने का प्लान भी बना भी चुके हों!

इस शर्मनाक हादसे के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की जितनी भर्त्सना की जाए कम है और पत्रकारों के हक़ में खड़ा होने में अब भी देर की जाए तो सबसे बड़ी शर्म की बात है। लेकिन इस मौक़े पर एक सवाल का जवाब आप सभी से मांगने की गुस्ताखी करना चाहता हूं,…! कि इस स्थिति के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? क्या अपराधियों के आगे चूहा साबित होने वाली और प्रेस कांफ्रेसों में बड़े बड़े दावे करके पत्रकारों से छपवाने वाली पुलिस रातों रात इतनी बहादुर हो गई कि उसको पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटना भी आ गया?

नहीं क़तई नहीं! पुलिस को बहादुर बनाया हमारे ही कुछ कथित पत्रकार साथियों ने..! शाम को एक बोतल और कभी कभी घर के लोगों को घुमाने के लिए मांगी जाने वाली कार या फिर थोड़ा बहुत मंथली पाने पत्रकारों को आप न जानते हों..! तो हर शहर के कुछ पत्रकारों से मालूम कर लेना… लंबी फहरिस्त मिल जाएगी। ये वही जमात है, जो पुलिस की  प्रेस कांफ्रेंस में पुलिस की तरफ से बतौर प्रवक्ता बनकर असल सवालों को पूछने वालों को चुप करने का ठेका लिये रहती है। भले ही किसी चैनल में काम करें या न करें… भले ही उनके कथित चैनल को बंद हुए जमाना हो गया हो मगर पुलिस के साथ इनकी जत्थेदारी शहरभर में जानी जाती है।

अगर किसी पगले या जुझारू पत्रकार ने सच्चाई लिख भी दी तो पुलिस से पहले खुद ही उसका खंडन करना इनकी ड्यूटी होती है। हर शहर के लिए दावा है मेरा…. अगर आपके शहर में जांच करा दी जाए तो 98 फीसदी पत्रकारों के पास न तो किसी चैनल का आई कार्ड होगा न कोई नियुक्ति पत्र। न किसी को सैलरी मिलती होगी न ही कोई नंबर एक की आमदनी। लेकिन उनके ठाठ बाट आपको दंग करने के लिए काफी होंगे।

किसी की सुनी सुनाई बात नहीं करता मैं। न ही किसी पर आरोप लगाना यहां मेरा मक़सद है। लेकिन सिर्फ चार साल पहले 3 मई 2011 को गाजियाबाद प्रशासन ने कथिततौर पर तत्तकालीन मायावती सरकार के इशारे पर गाजियाबाद के एक पत्रकार के खिलाफ चंद मिनट के अंदर कई थानों में कई एफआईआर दर्ज कर डाली थीं। वो पत्रकार जिसने सहारा और इंडिया टीवी सहित कई राष्ट्रीय चैनलों पर बतौर एंकर और कॉरसपॉंडेंट और पे रोल पर रहते हुए लगभग 17 साल कार्य किया हो। जिस पत्रकार के हाथों नियुक्त किये गये दर्जनों लोग देश के कई शहरों में कार्यरत हों।

जिस पत्रकार का दावा हो कि देशभर में कोई एक इंसान अपने बच्चों कसम खाकर बता दे कि किसी से उसने रिश्वत या एक रुपया भी लिया हो। उसी पत्रकार के खिलाफ गाजियाबाद प्रशासन ने न सिर्फ झूठी एफआईआर दर्ज करा दीं बल्कि उसके परिवार को प्रताणित किया। और सरकार के खिलाफ खबर न लिखने के लिए मजबूर करने के लिए घर की लाइट और पानी तक काट दिया। उस पत्रकार झुकने के बजाए एक माह तक जनरेटर चलाया। पत्रकार का पागलपन सिर्फ इतना है कि उसने प्रशासन के आगे झुकने के बजाय हाइकोर्ट की शरण ली और कई साल तक लड़ने के बाद प्रशासन की पोल खोल दी। पत्रकार का हौंसला जीता….उसके साथियों का भरोसा जीता।

लेकिन अफसोस इस सारी लड़ाई के बीच शहर के कई पत्रकार प्रशासन के भ्रष्ट सिस्टम के सामने दीवार की तरह खड़े होकर प्रशासन के करप्ट लोगों के लिए काम करते रहे। कई ने लिखित में एफिडेविट दिये। कई दलालों ने प्रशासन के करप्ट लोगों को कहा कि कुछ नहीं होगा। ऐसे बहुत पत्रकार घूमते हैं।  ये कहानी नहीं बल्कि मेरे अपने साथ होने वाली घटना है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कई पत्रकारों को पुलिस ने फंसाया दबाव बनाया। जो झुक गया ठीक नहीं तो जाओ जेल। अपने जनून और पागलपन के दमपर भड़ास चलाने और भारतीय पत्रकारिता को एक नया आयाम देने वाला यशवंत नोएडा पुलिस के हाथों प्रताड़ित किया गया। मुझ सहित कितने पत्रकारों ने इसको आंदोलन बनाया? इस मामले में सबसे ज्यादा खुद को सबसे ज्यादा दोषी मानते हुए भले ही मैं यह बहाना कर लूं कि मैं खुद उन दिनों पुलिस से बचने और अदालत के चक्करों मे फंसा हुआ था।

लेकिन सच्चाई यही है कि आगरा की घटना अचानक नहीं हुई। ये कतई नहीं माना जा सकता कि आगरा में जो कुछ हुआ अचानक हो गया। इस सबके लिए पुलिस से ज्यादा हम सब दोषी हैं। आगरा में पुलिस के हाथों जो कैमरे और पत्रकारों के हाथ पैर टूटे हैं वो पुलिस की लाठी से नहीं बल्कि पत्रकारों की खुद की लापरवाही, गलती और दलाली का नमूना भर है।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं। सहारा टीवी, इंडिया टीवी, डीडी आंखो देखी, इंडिया न्यूज़ समेत कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में oppositionnews.com में कार्यरत हैं।

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स्कूल यूनीफार्म में नाबालिग छात्रा ने थाने में पुलिस वालों को चाय पिलाया (देखें वीडियो)

देश के प्रधानमंत्री भले चाय बेच चुके हों और चाय बेचने का बार बार गर्व से जिक्र करते हों लेकिन उनके पीएम बनने के बाद भी बाकी चाय वालों की जिंदगी में अच्छे दिन नहीं आ पाए हैं. स्कूली ड्रेस में एक नाबालिग छात्रा चाय बेचने की मजबूरी के कारण थाने में पुलिस वालों को चाय पिलाने पर मजबूर है, वह भी फ्री में. बाल अधिकार जैसे कानून के होने के बावजूद खुद पुलिस वाले इसकी सरेआम धज्जियां उड़ाते हं. आजमगढ़ क्षेत्र के डीआईजी, बलिया के पुलिस अधीक्षक और गड़वार थाना के पुलिस कर्मी इसी कक्षा चार की छात्रा के हाथों दी गई चाय को चुस्कियां लेकर पीते रहे.

बलिया के गड़वार थाने का दौरा करने डीआईजी राम रतन श्रीवास्तव पहुंचे. उन्होंने पुलिस अधिकारियों के साथ थाना गड़वार में मीटिंग की. बाहर स्कूल ड्रेस में एक नाबालिग छात्रा पुलिस वालों को घूम- घूम कर चाय पिलाताी रही. कक्षा 4 में पढ़ने वाली इस 10 वर्षीय लड़की का कहना है कि पुलिस वालों ने उसे चाय के बदले पैसे तक नहीं दिए. वो हर दिन थाने में पुलिस वालों को चाय देने आती है. घटना के बारे में डीआईजी से पूछा गया तो उनका कहना था कि चाय बेचने वाली बच्ची के पिता के खिलाफ लेबर एक्ट के तहत मुकदमा होना चाहिए पर उन पुलिस वालों के खिलाफ क्या कार्यवाई की जायेगी जो बच्ची के हाथों चाय लेकर पीते रहे, इस सवाल पर वे चुप्पी साध गए.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

https://www.youtube.com/watch?v=5hnc_pY7onU

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https://www.youtube.com/watch?v=72yzXLKU4K4

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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दिल्ली पुलिस ने झूठी खबर पर जागरण को थमाया नोटिस

दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी राजन भगत ने दैनिक जागरण के संपादक को प्रेषित एक लिखित स्पष्टीकरण में आगाह किया है कि वह अपने संवाददाता को विभाग के संबंध में अनधिकृत खबरें न देने की ताकीद करें। साथ ही, दैनिक जागरण में “आप की खबरें करती हैं लोगों का मनोरंजन: भीम सेन बस्सी” शीर्षक से प्रकाशित समाचार पर हमारा पक्ष ठीक से प्रकाशित करें। 

उन्होंने अखबार के संपादक को अपने पत्र में बताया कि आप ने अपने समाचार पत्र में 26 जुलाई 2015 को पृष्ठ 6 पर उपरोक्त शीर्षक से खबर प्रकाशित की है, जो पुलिस आयुक्त भीम सेन बस्सी से मुख्य सवांददाता राकेश कुमार सिंह के साक्षात्कार का अंश बताया गया है। हाल में दैनिक जागरण के सवांददाता से ऐसा कोई साक्षात्कार नहीं हुआ है। यह खबर मात्र सवांददाता की कल्पना की उपज है। उन्होंने संपादक को आगाह किया है कि वह संवाददाता को आइंदा ऐसी खबरें न देने की हिदायत के साथ ही पुलिस विभाग स्पष्टीकरण तत्काल प्रकाशित करें। 

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पुलिसकर्मी ने अपने पैंट की जीप खोल पत्रकार को जलील किया

केरल : यहां के एक पत्रकार से अभद्रता कर रहे पुलिस कर्मी ने अपने पैंट की ज़िप खोल दी. मीडिया में मामला सुर्खियों में आने पर पता चला कि पुलिसकर्मी एक्सिडेंट के बाद एक व्यक्ति को पीट रहे थे। पत्रकार मोहम्मद रफी ने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया। इस पुलिस वाले आग बबूला हो गए। 

मोहम्मद रफी के मुताबिक पुलिस वालों ने उसके साथ ऐसी गंदी हरकत उस वक्त की, जब दुर्घटना के बाद एक व्यक्ति को पुलिस वाले पीट रहे थे। उन्होंने उसे रिकॉर्ड कर लिया। पुलिस वाले जिसे पीट रहे थे, उसके कपड़े भी फाड़ दिए।

जब पुलिस कर्मियों ने रफी से वीडियो अपने हवाले करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद पुलिस ने रफी को प्रताड़ित किया। वह हरकत भी कैमरे में कैद हो गई। पुलिस ने उल्टे रफी के ही खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली। 

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आंखो देखी : ये मीडिया का आपातकाल नहीं तो और क्या है!

13 जुलाई, रात के लगभग दस बज चुके थे। मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजी। हमारे दैनिक जागरण के सहयोगी रमेश मिश्र का फोन था। उन्‍होंने कहा, क्षेत्राधिकारी द्वितीय डॉक्‍टर अनूप सिंह ने बुलाया है। राष्‍ट्रीय सहारा कार्यालय परिसर में। मैंने तुरंत अपनी मारुति वैन निकाली और हम राष्‍ट्रीय सहारा के मुख्‍य द्वार पर पहुंच गए। चारों ओर पुलिस ही पुलिस। कहीं पीसीआर तो कहीं पुलिस की बुलेरो। यही नहीं, पुलिस के वज्र वाहन समेत कई बड़े वाहन खड़े थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई बड़ा दंगा हो गया हो। बिना किसी बात के उत्‍तर प्रदेश पुलिस को इस तरह से सक्रिय होते पहली बार देखा।

वहां सहारा कर्मचारियों के चेहरे पर भय और आशंका के साथ उत्‍साह का अद्भुत संगम नजर आ रहा था। टीवी चैनल के कुछ ऐंकर अपना काम छोड़ कर सड़क पर आ गए थे। लोग एकदूसरे से तरह-तरह की आशंकाएं जता रहे थे। कोई कह रहा था-रात 12 बजे के बाद पुलिस आंदोलनकारियों को उठा ले जाएगी। कुछ लोग कह रहे थे-आज तालाबंदी की घोषणा कर दी जाएगी। इसी आशंका के चलते टीवी चैनल की महिला कर्मचारी अपने बैग और दराज से अपने अन्‍य जरूरी सामान निकाल कर ले जा रही थीं कि कहीं तालाबंदी हो गई तो सामान कार्यालय परिसर में ही फंस जाएगा। यहां तक कि कुछ लोग खाने के लिए जो चना लाए थे, उसे भी निकाल कर ले जा रहे थे। कहीं पर महिला कर्मचारी को अपने नवजात शिशु के साथ बेचैन होते देखा।

कुछ लोग तो यहां तक कह रहे थे-बाप रे बाप, इतनी बड़ी सेना। आखिर किस लिए—कर्मचारियों का हक मारने के लिए। जब कोई अशांति नहीं है तो आखिर इतनी पुलिस फोर्स की क्‍या जरूरत थी। पुलिस फोर्स यदि इतना सक्रिय हो जाती तो उत्‍तर प्रदेश में अपराध की दर कम हो सकती थी। कुछ लोग कह रहे थे-लखनऊ से फरमान जारी होने के कारण भारी पुलिस बल एकत्र हुआ था।

कार्यालय परिसर के बाहर ही पता चला कि अंदर डॉक्‍टर अनूप सिंह कर्मचारियों के बीच प्रवचन कर रहे हैं। लेकिन कर्मचारियों पर प्रवचन का असर कहां होने वाला था। सबकी एक जैसी हालत थी- भूखे भजन न होइ गोपाला। यह लो अपना कंठी माला। इसी बीच अनूप बाबू बाहर निकले। वह कर्मचारियों को यही समझा रहे थे- अखबार बंद हो गया तो 75 फीसदी लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी। मेरे कहने से मात्र आठ दिन और काम कर लो। पैसा मिल जाएगा। लेकिन कर्मचारी कह रहे थे- प्रबंधन से हमारा भरोसा उठ चुका है। 

इस पर अनूप साहब धमकाने के मोड में आ गए। उन्‍होंने कहा- हिंसा हुई तो एक हजार कर्मचारियों के लिए डेढ़ हजार पुलिस फोर्स आ जाएगी। इस पर कर्मचारियों ने कहा- हिंसा की तो कोई बात ही नहीं है। हमने अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण ढंग से काम बंद कर रखा है और आगे भी काम बंद रहेगा, जब तक कि भुगतान का कोई ठोस आश्‍वासन नहीं मिल जाता। जो होगा, देखा जाएगा।

इस परिदृश्‍य से 1975 के आपातकाल की याद ताजा हो आई, जब पुलिस बल के जरिये मीडिया की जुबान को ताला लगा दिया गया था। आज पुलिस, प्रशासन और सरकार सब मीडिया मालिकों के पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे। मेरे पुराने मित्र रतन दीक्षित कहा करते थे- प्रेस को सरकार से उतना खतरा नहीं है, जितना अखबार मालिकों से है, लेकिन आज पत्रकारिता को हर ओर से खतरा नजर आ रहा है। आखिर यह मीडिया का आपातकाल नहीं तो और क्‍या है।

श्रीकांत सिंह के एफबी वाल से

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बाराबंकी पुलिस कांड : दोषियों के खिलाफ होगी सख्त कार्रवाई – पुलिस महानिदेशक

लखनऊ। बलात्कार करने में नाकाम बाराबंकी पुलिस द्वारा थाने में पेट्रोल छिडक कर जलाई गयी पत्रकार की मां की हत्या की घटना पर उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने की कडी निंदा की है। एसोसिएशन की लखनऊ इकाई के एक प्रतिनिधि मण्डल ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव को एक ज्ञापन देकर मांग की है कि घटना में शामिल आरोपी एसओ और दरोगा को तत्काल गिरफ्तार किया जाय व घटना की सी0बी0आई0 से जांच कराई जाय।

पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव ने पत्रकारों के प्रतिनिधिमण्डल के सामने ही बाराबंकी के एस0पी0 को फोन कर निर्देश दिये कि वह हर हाल में तीन दिन के अन्दर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही  करें तथा कृत कार्यवाही से उन्हे तत्काल अवगत करायें।

एसोसिएशन के पत्रकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री जी के मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश देने मात्र से मृतका को न्याय नही मिलेगा। स्थानीय पुलिस प्रशासन के अपने-अपने पदों पर बने रहते घटना की निष्पक्ष जांच संभव नही है। प्रश्न यह है कि दोषियों को निलम्बित करते समय उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं की गयी ? इस पूरे प्रकरण में सरकार की संवेदनहीनता सामने आ रही है।

बाराबंकी के पुलिस अधीक्षक यह तो स्वीकार कर रहे है कि एस.ओ., एस.आई ने अभद्रता की, किन्तु वह अपने मातहतो को बचाने के लिए यह भी साबित करने पर उतारू है कि महिला ने खुद आग लगायी। यह भी संज्ञान में आया है कि मृतिका के पति ने बताया हैै कि  उसे थाने से छोडने के लिए पुलिस ने उनकी पत्नी से थाने पर एक लाख मांगे गए थे और एसओ तथा दरोगा द्वारा अनुचित आचरण भी किया गया था जिसके बाद महिला एसओ के कमरे से जलती हुई निकली थी। ज्ञात हुआ कि महिला ने मृत्युपूर्व बयान में भी यही बातें कही थीं।

एसोसिएशन के पत्रकारों का कहना है कि जिन पर आमजन की सुरक्षा की जिम्मेदारी है वहीं कानून व्यवस्था को धता बताते हुए आमजन पर कहर बन कर टूट रहे है। शाहजहांपुर में पत्रकार जगेन्द्र को जलाने की आरोपी पुलिस एक बार फिर बाराबंकी में पत्रकार की मां के साथ अभद्रता करने, थाने में जलाने के आरोपों के घेरे में है।

 शाहजहांपुर में भी पत्रकार के हत्या के आरोपी पुलिसकर्मी निलम्बित है उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई, बाराबंकी में भी हत्या के आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं, पुलिस ने निलम्बन की कार्यवाही जरूर कर दी है।

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि पीडि़त परिवार को 30 लाख रूपये मुआवजा, परिवार के किसी एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी और पूरे प्रकरण की सी.बी.आई. द्वारा जांच कराई जाय।

पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव को ज्ञापन देने के लिए उत्तर प्रदेेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला के साथ वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार,भाषा के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी, वरिष्ठ पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र, सर्वेश कुमार सिंह,वीरेन्द्र कुमार सक्सेना, सुनील त्रिवेदी, लखनऊ इकाई के कोषाध्यक्ष मंगल सिंह,उपाध्यक्ष सुशील सहाय,मंत्री अनुराग त्रिपाठी,सहित अनेक पत्रकार शामिल थे।

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पत्रकार की मां को फूंकने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन

बाराबंकी के कोठी थाने में पत्रकार की मां को जलाने के विरोध में पत्रकारों ने जिला पंचायत सभागार में बैठक कर आरोपी पुलिस कर्मियों के खिलाफ जमकर गुस्से का इजहार किया। घटना की पुरजोर मजामत की और एक मिनट का मौन रखकर मृतक की आत्मशांति के लिए दुआ की। 

इसके बाद पत्रकारों ने काली पट्टी बांधकर अपना विरोध जताया और आईजी लखनऊ जोन जकी अहमद, डीआईजी फैजाबाद मंडल विजय कुमार गर्ग, कमिश्नर फैजाबाद मंडल, डीएम बाराबंकी योगेश्वर राम मिश्रा, एसपी बाराबंकी से कार्रवाई की फरियाद की। पत्रकारों ने प्रशासन को ज्ञापन देकर तत्काल दोषी पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर जेल भेजने की मांग की। 

इस मौके पर सीनियर पत्रकार अखिलेश ठाकुर, सैयद रिजवान मुस्तफा, रणधीर सिंह सुमन, प्रदीप सारंग, बाबाजी, आसिफ हुसैन जर्नलिस्ट, आजमी रिजवी, परवेज, भूपेंद्र मिश्रा सहित बड़ी तादाद में जिले के पत्रकार मौजूद रहे। 

वरिष्ठ पत्रकार आजमी रिजवी के एफबी वाल से

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पत्रकारों पर पुलिस लाठी चार्ज, क्षुब्ध पत्रकारों और शिक्षकों ने धरना दिया

भबूआ, कैमूर : पिछले दिनो यहां जच्चा-बच्चा की मौत के बाद परिजनों ने शव सदर अस्पताल के सामने रखकर सड़क जाम कर दिया। पुलिस ने जमकर लाठियां चलाईं । फोटो लेने के दौरान कई मीडिया कर्मियों पर भी लाठियां बरसीं। कई पत्रकार घायल हो गए। 

घटना से क्षुब्ध पत्रकारों का एक शिष्ट मण्डल एसपी सुनील कुमार नायक से मिला। एसपी ने दोषी पुलिस कर्मियों पर कारवाई करने का आश्वासन दिया है। घटना के अगले दिन शनिवार को युवा जोश के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों पर लाठी चार्ज को लेकर जिला मुख्यालय पर एक दिवसीय धरना दिया। पत्रकारों ने कहा कि लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ पर हमला हुआ है। ऐसे पुलिस कर्मियों को निलम्बित नहीं, बर्खास्त किया जाना चाहिए। बिहार शिक्षक संघ ने भी पत्रकारों के पक्ष में धरना देते हुए कहा कि ये सुशासन का राज नहीं,  कुशासन है। पत्रकार पीटे जा रहे हैं। पूरा शिक्षक संघ 09 जुलाई को पटना में धरना देगा। सभा की अध्यक्षता युवा जोश के अध्यक्ष विकास उर्फ़ लल्लू पटेल ने की। सभा को प्रसून गुड्डू, दीपक बच्चन सहित कई लोगों ने सम्बोधित किया।

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जगेंद्र को फूंकने में नेता, अपराधी, पुलिस और पत्रकार की साजिश

मृत्‍योपरान्‍त किसी व्‍यक्ति को वास्‍तविक पहचान दिलाते हुए शहीद के तौर पर सम्‍मानित करना और अपने पापों का सार्वजनिक क्षमा-याचना करते हुए पश्‍चाताप करना बड़ी बात माना जाती है। इतिहास तो ऐसे मामलों से भरा पड़ा हुआ है, जब सरकार या किसी समुदाय ने किसी को मार डाला, लेकिन बाद में उसके लिए माफी मांग ली। ठीक ऐसा ही मामला है शाहजहांपुर के जांबाज शहीद पत्रकार जागेन्‍द्र सिंह और उसके प्रति मीडिया के नजरिये का। इसी मीडिया ने पहले तो उसे ब्‍लैकमेलर और अपराध के तौर पर पेश किया था। फेसबुक आदि सोशल साइट पर अपना पेज बना कर खबरों की दुनिया में हंगामा करने वाले जागेन्‍द्र सिंह को शाहजहांपुर से लेकर बरेली और लखनऊ-दिल्‍ली तक की मीडिया ने उसे पत्रकार मानने से ही इनकार कर लिया था। लेकिन जब इस मामले ने तूल पकड़ लिया, तो मीडिया ने जागेन्‍द्र सिह को पत्रकार के तौर पर सम्‍बोधन दे दिया।

लेकिन इस प्रकरण पर मीडिया और सरकार का नजरिया निष्‍पाप नहीं है। मीडिया तो अब उन लोगों पर निशाना लगाने को तैयार है, जिन्‍होंने जागेन्‍द्र सिंह को पत्रकार मानने के लिए बाकायदा जेहाद छेड़ा है। खबर मिली है कि लखनऊ के ही कुछ स्‍वनामधन्‍य पत्रकारों का एक गिरोह मुझ पर भी हमला करने की साजिश कर रहा है। बहरहाल, उधर सरकार ने जागेन्‍द्र की हत्‍या के 8 दिनों तक मुकदमा तक दर्ज नहीं कराया। बाद में नौ जून को एफआईआर दर्ज हो गयी, लेकिन उसके पांच दिन कोतवाल समेत पाचं पुलिसवालों को मुअत्‍तल किया गया। लेकिन आज तक न राज्‍यमंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्‍त कर उसे जेल भेजा गया और न ही अन्‍य अपराधियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। पत्रकार बिरादरी की यूनियनें तो इस मसले पर बिलकुल चुप्‍पी साधे हुए हैं।

अब आइये हम दिखाते हैं ऐसे शहीदों को मृत्‍योपरान्‍त सम्‍मान दिलाने की चन्‍द घटनाएं

मामला एक:- 

30 मई 1431 को जॉन ऑन ऑर्क की उम्र सिर्फ 19 साल थी, जब फ्रांस पर काबिज अंग्रेजी हुकूमत ने उसे डायन करार देते हुए उसे जिन्‍दा जला दिया था।

वह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बाकायदा जेहाद छेड़े हुए थी। वह चार्ल्स सप्तम के राज्याभिषेक के दौरान पकड़ी गयी और कॉम्पियैन में इन्हें अंग्रेजों ने पकड़ा था। लेकिन २४ साल बाद चार्ल्स सप्तम के अनुरोध पर पोप कॅलिक्स्टस तृतीय ने इन्हें निर्दोष ठहराया और शहीद की उपाधि से सम्मानित किया। 1909 में इन्हें धन्य घोषित किया गया और 1920 में संत की उपाधि प्रदान की गई।

मामला दो:- 

कोपरनिकस 16वीं शताब्दी में बाल्टिक सागर के तट पर स्थित फ़ॉर्मबोर्क गिरजा घर में रह कर काम किया करते थे। ब्रह्माण्‍ड की धुरी पर काम कर रहे कोपरनिकस पूर्वोत्तर पोलैंड के एक चर्च में काम कर रहे थे, लेकिन चर्च को उनके सिद्धांत बेहद नागवार लगे, सो उसे चर्च में ही दफ्न करने की साजिश की थी। बाद में 70 साल की उम्र में कॉपरनिकस के देहांत के बाद उन्‍हें चर्च द्वारा सम्‍मानित किया गया। .

मामला तीन: 

यही हालत थी गैलीलियो की, जब उन्‍होंने ऐलान किया कि यह ब्रह्माण्‍ड पृथ्‍वी की धुरी पर नहीं, बल्‍िक सूरज की धुरी पर घूमता है। इस पर चर्च खफा हो गया और सन-1633 में 69 वर्षीय वृद्व गैलीलियो को हुक्‍म दिया कि वह अपने इस जघन्‍य अपराध की माफी मांगे। अपने सिद्धांत पर अड़े गैलीलियो ने यह हुक्‍म नहीं माना तो चर्च ने उन्हें जेल में डाल दिया। यहीं पर उनकी मौत हो गयी। लेकिन इसके बाद चर्च ने उनकी मौत को अपराध माना और चर्च ने इसके लिए बाकायदा माफीनामा जारी कर दिया।

ताजा मामला:- 

अब बताइये ना, कि क्‍या जॉन ऑफ ऑर्क, कोपरनिकस और गैलिलियो से कम निकला हमारे शाहजहांपुर का जांबाज पत्रकार जागेन्‍द्र सिंह ?

अब तो इन लोगां के खिलाफ पूरा का पूरा चर्च और ईसाई बिरादरी खडी हुई थी, लेकिन यहां शाहजहांपुर में तो उत्‍तर प्रदेश और शाहजहांपुर के रहने वाले उप्र सरकार के दबंग मंत्री, जोरदार नेता, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक-काेतवाल ही नहीं, बल्कि जिले की पूरी की पूरी पत्रकार बिरादरी ही उसके हत्‍या पर आमादा करते और साजिश करती दिखी। पत्रकारिता-बिरादरी ने तो यह जानते हुए भी जागेन्‍द्र की हत्‍या की साजिश चल रही है, उसे पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया और उसे केवल दलाल और ब्‍लैकमेलर ही ढिंढोरा मचाया। इसी साजिश के तहत श्रमजीवी पत्रकार संघ के सदस्‍यों ने 30 मई-15 को पत्रकारिता दिवस के नाम पर एक भव्‍य समारोह आयाेजित किया, जिसमें उप्र सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा को मुख्‍य अतिथि बनवा लिया, जिस पर हत्‍या, बलात्‍कार और दीगर बेहिसाब आरोप आयद हैं।

इतना भी होता तो भी गनीमत थी। इन लोगों ने जागेन्‍द्र सिंह को पत्रकार तक मानने से इनकार कर दिया था। 

लेकिन जागेन्‍द्र सिंह ने खुद की हत्‍या को बर्दाश्‍त कर तो लिया, लेकिन सत्‍य को किसी भी कीमत पर नहीं ठुकराया। नतीजा, उसे नेता-अपराधी-पुलिस और पत्रकार की साजिश में पेट्रोल डाल कर फूंक डाला गया।

मगर मेरी सबसे बडी चिन्‍ता और घृणा का विषय तो हमारी पत्रकार बिरादरी ही है। कुत्‍ते भी अपने लोगों पर होने वाले हमलों पर पुरजोर हमला करते हैं, लेकिन हमारे पत्रकार तो कुत्‍तों से भी शर्मनाक हरकत कर गये। जो जांबाज था, उसे पत्रकार ही नहीं माना। चाहें वह शाहजहांपुर के पत्रकार रहे हों, या फिर लखनऊ और दिल्‍ली के पत्रकार। बेहिसाब पैसा डकार चुके इन पत्रकारों ने तो खुल कर ऐलान तक कर दिया था कि जागेन्‍द्र सिंह पत्रकार नहीं, बल्कि फेसबुक का धंधेबाज था। 

लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्‍भा माने जानने वाले इन लोगों की आंख तो तब खुली, जब मैंने इस पूरे मामले में हस्‍तक्षेप किया और इस रोंगटे खडे कर देने वाले इस दाह-काण्‍ड का खुलासा करते हुए साबित करने की कोशिश की कि जागेंन्‍द्र सिंह अगर पत्रकार नहीं था, तो देश और दुनिया का कोई भी पत्रकार खुद को पत्रकार कहलाने का दावा नहीं कर सकता है। 

देश-विदेश के पत्रकारों ने इस पर हस्‍तक्षेप किया और फिर मामला खुल ही गया। हालांकि मेरे प्रयास के चलते किसी की भी जान वापस नहीं आ सकती थी, लेकिन जागेन्‍द्र सिंह के दाह-काण्‍ड को लेकर हुई मेरी कोशिशें रंग लायीं और आखिरकार लोगों ने जागेन्‍द्र सिंह को पत्रकार मान ही लिया। मुझे सर्वाधिक खुशी तो अपने इन प्रयासों को फलीफूत होते हुए महसूस हो रही है, जब कल टाइम्‍स ऑफ इण्डिया और आज हिन्‍दुस्‍तान व दैनिक जागरण समेत कई अखबारों ने जागेन्‍द्र सिंह को बाकायदा एक जुझारू पत्रकार के तौर पर मान्‍यता दे दी है। ठीक वैसे ही जैसे जॉन आफ ऑर्क, कॉपरनिकस और गैलिलियो जैसे महान सत्‍य-विन्‍वेषकों के साथ उनके विरोधियों ने अपने झूठ को स्‍वीकर कर उन्‍हें जुझारू विज्ञानी के तौर पर स्‍वीकार कर लिया था। 

दोस्‍तों, यह इन पराम्‍परागत समाचार संस्‍थान यानी अखबार और न्‍यूज चैनलों की जीत नहीं है। अगर आप समझ रहे हों कि यह सफलता मेरे प्रयासों की भी जीत है तो यह भी ऐसा नहीं है। बल्कि यह तो आप की जीत है, आपके प्रयासों की जीत है, आपके हौसलों की जीत है, आपके समर्थन की जीत है, आपके प्रश्रय की जीत है, आपकी सर्वांगीण कोशिशें की जीत है।

मतलब यह कि, मेरे अजीज दोस्‍त, तुम जीत चुके हो। चलो, इसी जीत के जश्‍न में एक कप कॉपी पिला दो मेरे दोस्‍त….।

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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यूपी के आला पुलिस अफसरों ने खाकी को चुल्लू भर पानी में डुबोया

उत्तर प्रदेश में खाकी अपनी करतूतों के चलते अक्सर ही शर्मसार होती रहती है, लेकिन जब भ्रष्टाचार के आरोप विभाग के मुखिया पर ही लगे तो हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। खाकी पर अबकी से उसके दो ‘हाकिमों’ (पूर्व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) के कारण दाग लगा है। दोनों डीजीपी ने अपनी तैनाती के दौरान ट्रांसफर-पोस्टिंग को धंधा बना लिया।

इस धंधे से इन अधिकारियों ने करोड़ों की दौलत बटोरी। आगरा के जालसाज सपा नेता शैलेंद्र अग्रवाल से हाथ मिला कर प्रदेश के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एसी शर्मा के साथ-साथ एएल बनर्जी ने डीजीपी रहते खूब मनमानी की। यह राज खुलता भी नहीं लेकिन शैलेंद्र जब पुलिस की ही नजरें टेड़ी हुईं तो उसके मोबाइल ने भ्रष्टाचार का सारा राजफाश कर दिया। जिससे पता चला कि कथित सपा नेता ने प्रदेश भर के दारोगाओं के प्रमोशन डीजीपी एएल बनर्जी और एसी शर्मा से कराए, जिसमें प्रत्येक का रेट आठ लाख रुपये तय था। कभी इन पुलिस महानिदेशकों के अधीन काम कर चुके पुलिस के अधिकारी कहते हैं शैलेन्द्र और दोनो तत्कालीन हाकीमों के बीच करीब 3.20 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ। 

प्रदेश में सपा सरकार में बड़े पैमाने पर दारोगाओं के प्रमोशन हुए। इनमें रेग्यूलर के सात आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी हुए थे। जेल में बंद शैलेंद्र अग्र्रवाल इन प्रमोशन के लिए डीजीपी और दारोगाओं के बीच की कड़ी बन गया था। उसकी नजदीकी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दोनों हाकिमों ने 15 अक्टूबर 2014 को मोबाइल पर एसएमएस के जरिए ही तबादलों के रेट तय कर दिये।शैलेंद्र ने एसएमएस के  जरिये तबादले का रेट सात लाख रुपये रखने का प्रस्ताव रखा तो डीजीपी ने एक लाख और बढ़ा दिए। अब तक की जांच से खुलासा हुआ है कि सपा नेता के माध्यम से प्रदेश में करीब 40 दरोगाओं को प्रोन्नति देकर इंस्पेक्टर बनाया गया।ये सभी वे दारोगा थे जो प्रमोशन के लिये अधिकतर मानकों को पूरा तो करते थे लेकिन छोटी-मोटी जांचों के कारण या तो उनके प्रमोशन की फाइल बंद पड़ी थी या उसकी गति धीमी थी।परंतु सपा नेता के बीच में पड़ते ही  इन सभी फाइलों ने रफ्तार पकड़ ली और इन दरोगाओं को प्रमोशन भी मिल गया।सूत्रों के अनुसार 40 दारोगाओं से लिए पूर्व डीजीपी को 3.20 करोड़ रुपये दिए गये। इसके अलावा शैलेंद्र ने अपना कमीशन अलग से वसूला। 

गौरतलब हो आईजी (नागरिक सुरक्षा) अमिताभ ठाकुर ने  बनर्जी व शर्मा पर पोस्टिंग, प्रमोशन और गंभीर अपराधों की जांच बदलवाने के नाम पर 7-25 लाख रुपये तक की घूस लेने का आरोप लगाया था। आईजी ने आगरा में गिरफ्तार किए गए जालसाज शैलेन्द्र अग्रवाल के लैपटॉप व मोबाइल फोन की फरेंसिक जांच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर ये आरोप लगाए थे। कानून व्यवस्था का राज स्थापित करने और अपराध पर अंकुश लगाने का दायित्व निभाने वाले शीर्ष पुलिस अधिकारी जब इस तरह घपलों-घोटालों के आरोपों से घिरे हांेगे तो इनके द्वारा अपना कर्तव्य कितनी निष्ठा से निभाया जाता होगा ? बहरहाल,इस मामले में अंतिम जांच परिणाम क्या आएंगे और किस गति को प्राप्त होंगे, यह भविष्य के गर्भ में है किंतु जितने तथ्य उजागर हुए हैं, उससे न केवल पूरा विभाग शर्मसार हुआ है बल्कि सरकार भी अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से बच नहीं पा रही है।आगरा जेल में बंद एक दलाल नेता दो पूर्व महानिदेशकों के साथ मिलकर पुलिस महकमे में पैसे लेकर प्रोन्नति के काम में लगा था। पहले राज खुला कि उसके संबंध एक पूर्व पुलिस महानिदेशक से थे लेकिन अब जांच आगे बढ़ी तो एक और पूर्व महानिदेशक से भी संबंध उजागर हुए हैं। हालांकि, पहले दोनों ने ही अपने संबंध से इन्कार किया पर जब तथ्य सार्वजनिक हुए तो कहा कि उसके संबंध सभी से थे। उसका अक्सर पुलिस मुख्यालय आना जाना था। अफसर उसके साथी और कनिष्ठ उसके दबाव में रहते थे।वैसे,यह नहीं कहा जा सकता कि पूरा महकमा ही दागदार है। आखिर, दलाल नेता को जेल पहुंचाने और दलाली के तथ्य उजागर करने वाले भी इसी महकमे के लोग हैं।

ओहदेदार पदों पर बैठे खाकी वर्दी वालों द्वारा महकमें को कलंकित किये जाने से आईपीएस एसोसियेशन को अपनी छवि की चिंता सताने लगी है जो जायज भी है।मामला खुलने के बाद निष्पक्ष जांच और ऐसे दागी अफसरों को चिह्न्ति कर जेल भिजवाने की जिम्मेदारी अब सरकार पर ही है।अफसरों की पोस्टिंग और प्रमोशन को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे दोनों पूर्व डीजीपी के खिलाफ आईपीएस एसोसिएशन ने भी मोर्चा खोल दिया है। गाजियाबाद के एसएसपी धर्मेन्द्र यादव ने एसोसिएशन से दोनों अधिकारियों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की मांग की थी। इसके बाद एसोसिएशन ने बैठक बुलाई और मसले पर चर्चा हुई।एसोसिएशन ने मुख्य सचिव व डीजीपी से दोनों अफसरों के खिलाफ जांच करवाकर कार्रवाई की मांग की है। आईपीएस एसोसिएशन के सदस्य धर्मेन्द्र यादव ने संगठन के सचिव आईजी एसटीएफ सुजीत पांडेय को पत्र लिख कर मांग रखी है कि एसोसिएशन की मीटिंग में भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में आए दोनों पूर्व डीजीपी के नाम उजागर किए जाएं और उनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जाए।मीटिंग के बाद एसोसिएशन के उपाध्यक्ष जाविद अहमद और सचिव सुजीत पांडेय ने मुख्य सचिव आलोक रंजन और डीजीपी एके जैन से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम का पुरजोर समर्थन करती है।जबकि डीजीपी एके जैन ने भी डीआईजी रेंज आगरा लक्ष्मी सिंह के साथ जालसाज शैलेन्द्र अग्रवाल और उससे जुड़े मुकदमों व शिकायतों पर हो रही कार्रवाई व जांच की समीक्षा की। उन्होंने डीआईजी रेंज को निर्देश दिए हैं कि आरोपित किसी भी स्तर का हो, उसे बख्शा नहीं जाए। 

बात शैलेन्द्र की कि जाये तो वह दो पूर्व डीजीपी का ही दलाल नहीं था, बल्कि उसके फंदे में एक दर्जन से ज्यादा आईएएस व आईपीएस थे। शैलेंद्र ने आम लोगों को ठगा तो अफसरों को भी तगड़ी चपत लगाई।आम लोग तो मुकदमा लिखाने आगे आ भी गए लेकिन अफसर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। अभी तक शैलेंद्र के खिलाफ 27 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। इसमें एक मुकदमा लखनऊ निवासी रिटायर डीआईजी अनिल दास की पत्नी संगीता दास ने लिखाया था। आगरा में तैनात रहे एक आईएएस के दो करोड़ रुपये शैलेंद्र डकार गया था। पैसा नंबर दो का था इसलिए वे तगादा नहीं कर पाए।शैलेन्द्र ने कई बड़े नेताओं को भी अपने जाल में फंसा रखा था। सपा के अलावा बसपा के शासन में भी उसकी खूब धमक थी। सूत्रों की मानें तो लखनऊ के एक होटल में उसके नाम से हमेशा कमरे बुक रहते थे। वहां सिर्फ शैलेंद्र अग्रवाल का नाम लेना होता था।शैलेंद्र पहले गिफ्ट देकर अफसरों से दोस्ती करता था। फिर वह उन्हें अपनी आलू की स्कीम समझाता था। भरोसा देता था कि पैसा तो मैं लगा दूंगा, बस कुछ काम आप करा देना। उसके बदले जो रकम आएगी वह उसे आलू स्कीम में लगा देगा। बदले में नंबर एक में फर्म के चेक से रुपए देगा। अफसर उसके झांसे में फंस जाते थे। वह अफसरों की पत्नियों को भी महंगे उपहार देता था।शैलेन्द्र गनर के साथ चलता था और बसपा राज में भी उसने अपने आप को आलू का करोबारी बन कर अपने पैर सत्ता के गलियारों में पसार रखे थे।

इस संबंध में पुलिस महकमे के रिटायर्ड अफसरों का कहना  था कि  सरकारें चाहें किसी भी दल की हों,वह डीजीपी की तैनाती पुलिस सुधार के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ और अपने करीबियों को फायदा पहुंचाने के लिए करती हैं। तीन साल के कार्यकाल में सात डीजीपी बदले जाएंगे तो ऐसे ही आरोप लगेंगे। एक और दो माह के लिए डीजीपी बनाए जा रहे हैं। ईमानदार अफसरों को सिर्फ इसलिए डीजीपी नहीं बनाया जा रहा है कि वे सरकार के मुताबिक काम नहीं करेंगे। रिटायर डीजीपी श्रीराम अरुण का कहना है कि पहली बार डीजीपी स्तर के अफसर पर इस तरह आरोप लगे हैं। जब तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक तय प्रक्रिया और साफ छवि वालों को नहीं चुना जाएगा तब तक हालात नहीं सुधरेंगे।वहीं एक अन्य रिटायर पुलिस अफसर का कहना है कि उत्तर प्रदेश में अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप मायने नहीं रखते हैं। करीब 18 साल पहले आईएएस असोसिएशन ने तीन सबसे भ्रष्टतम अफसरों को चुनकर उनकी सूची जारी की थी। लेकिन इनमें से दो को सरकार ने मुख्य सचिव के पद से नवाज था। इसी तरह आईपीएस अफसरों में भी है। कई अफसरों को तमाम आरोपों में घिरे होने के बाद भी महत्वपूर्ण तैनातियां दी गईं। अयोग्य होते हुए भी डीजीपी बनाया गया। एक अन्य रिटायर पुलिस अफसर का कहना था कि जब विश्व की सबसे बड़ी फोर्स का मुखिया ही भ्रष्ट हो जाएगा तो फोर्स का क्या होगा। पुलिस में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहते हैं।पूर्व डीजीपी एसी शर्मा पर डीजीपी रहने के दौरान भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। अलीगढ़ पीएसी में तैनात डिप्टी एसपी बीके शर्मा ने आरोप लगाया था कि डीजीपी एसी शर्मा पोस्टिंग के नाम पर घूस लेते हैं। बीके शर्मा का आरोप था कि जब वह घूस नहीं दे पाए तो कुछ दिन के अंदर ही उनका पांच बार तबादला किया गया।

शैलेन्द्र के समाजवादी पार्टी का नेता होने की लगातार चर्चा के बीच सपा के प्रवक्ता और मंत्री राजेन्द्र चैधरी ने सफाई दी है कि शैलेन्द्र से सपा का कोई लेना-देना नहीं है, न ही शैलेन्द्र समाजवादी पार्टी का नेता है।वहीं भाजपा का आरोप है कि बिना सरकारी मदद के कोई व्यक्ति तबादला-पोस्टिंग का इतना बड़ा नेटवर्क नहीं चला सकता है।

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पुलिस को ‘दबंग दुनिया’ के मालिक किशोर वाधवानी की तलाश?

इंदौर के अखबार ‘दबंग दुनिया’ के मालिक किशोर वाधवानी इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। खबर है कि वाधवानी ने अपने उज्जैन ब्यूरो चीफ महेश पांडे पर आरोप लगाते हुए काम से हटा दिया था! इस बात की सूचना उन्होंने अखबार में महेश पांडे के खिलाफ ‘दबंग दुनिया’ में विज्ञापन छापकर दी। 

इसके खिलाफ महेश पांडे ने कोर्ट की शरण ली और किशोर वाधवानी पर मानहानी का मुकदमा उज्जैन न्यायालय में दर्ज  करवा दिया! इसके बाद उज्जैन के माधवनगर थाने की पुलिस उनकी तलाश में बीते शुक्रवार को इंदौर में उनके घर और आफिस पहुंची। भनक लगते ही वाधवानी इंदौर से गायब हो गया। 

शनिवार को भी पुलिस ने आफिस में तलाशी ली। परेशान वाधवानी ने तुरंत गीत दीक्षित का ट्रांसफर भोपाल से उज्जैन कर दिया। इंदौर में अखबार का प्रसार का काम देखने वाले राजू पाठक को महेश पांडे से समझौता करने को कहा है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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दरोगा के सीने में गोली मारी, सिपाही पर भी हमला

आगरा : बदमाशों ने दारोगा सुधीर कुमार को गोली मारकर घायल कर दिया और सिपाही पर पत्थरों लाठियों से हमला कर घायल कर दिया। घायल दारोगा और सिपाही थाना निबहोरा में तैनात हैं और मुकद्दमों में वांछित अपराधी विनोद पर गैर जमानती वारंट तामील करने आज रात उसके गांव शाहवीर गए थे। 

दारोगा और सिपाही का जैसे ही गावँ में विनोद से सामना हुआ, वांछित विनोद ने दारोगा पर जान से मारने की नीयत से गोली चला दी। दरोगा सुधीर  ने भी गोली चलाने  का प्रयास किया लेकिन पिस्टल में गोली फंस गयी और  फायर नहीं  हो सका। गोली दारोगा के सीने में दाहिनी तरफ घुस गयी और विनोद के साथियों ने सिपाही पर हमला बोल दिया। घायल दारोगा और सिपाही को आनन फानन आगरा के सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज उपचार के लिए भर्ती कराया गया। प्राथमिक उपचार के बाद दारोगा को निजी अस्पताल इलाज के लिए ले जाया गया।

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FORMER SCRIBE DIES WHILE TRYING TO CHARGE LAPTOP

Mumbai : A former journalist died of electrocution while trying to connect his laptop charger to an extension board at his home in Vashi. The Vashi police are probing which one of the electrical appliances plugged into the board caused the faulty current. 

Sunil BS, 31, who earlier worked with Mint newspaper, was from Bangalore and was working in a PR firm in Mumbai. He was living with a flatmate in a rental apartment. 

Sunil returned from his morning jog and was working on his laptop around noon. He tried to connect his laptop to the extension board which was already connected to the main switch board when he was electrocuted. Sub Inspector Vinaya Kamble said, “Sunil also had a glass of a drink in his hand, which we suspect might have acted as a conductor.” 

Sunil’s flatmate immediately called an ambulance and rushed Sunil to the municipal hospital close by, where he was declared dead on arrival. Police sources said that the laptop was a Sony laptop and was approximately three and a half years old. MMB

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सोशल मीडिया में उछले गैंगरेप कांड को पुलिस ने झूठा करार दिया

धर्मशाला (हिमाचल) में गत दिनों पहले हुए गैंगरेप की जांच में एसआईटी को कुछ भी नहीं मिला है। पुलिस ने घटना को झूठा करार दिया है। पुलिस का दावा है कि उसने शिकायतकर्ता तथा  कथित पीडि़ता दोनों को ढूंढ़ निकाला है। 

पुलिस महानिदेशक संजय कुमार ने कहा है कि धर्मशाला में कथित दुष्कर्म मामले में शिकायतकर्ता और पीडि़त छात्रा तक पुलिस पहुंच गई है। पुलिस के मुताबिक शिकायतकर्ता ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि वे किसी के कहने पर प्रधानाचार्य के पास बलाल्कार की शिकायत लेकर पहुंची थी। पुलिस उस व्यक्ति के नाम का खुलासा जल्द करेगी। वहीं, संबंधित छात्रा  और उसके परिवार ने भी बलात्कार या यहां तक कि किसी मामूली घटना से भी मना कर दिया है। प्रधानाचार्य ने शिकायत लेकर आने वाली युवती को पहचाना है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया में यह मामला सामने आया था कि धर्मशाला कॉलेज में किसी छात्रा से गैंगरेप हुआ है और उसकी जान खतरे में है। ऐसी शिकायत किसी युवती ने प्राचार्य से की। प्राचार्य ने जब कहा कि लिखित में दो, तो वह गायब हो गई। बताया जा रहा था कि कथित पीडि़ता के माता-पिता नहीं हैं। यह भी बताया गया था कि उसकी हालत गंभीर है। बाद में ऐसी अफवाहें भी फैली कि पीडि़ता की मौत हो गई। इसके बाद प्रदेश सरकार ने एसआईटी का गठन किया और एडीजीपी ने जांच की।

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उत्तर प्रदेश में 17 एडिश्नल एसपी बदले, सुभाषचन्द्र बने नए एटीएस एसएसपी

उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच जिलों के एसपी समेत 15 आईपीएस के तबादले कर दिए हैं। लखनऊ के एसएसपी की नियुक्ति पर ऊहापोह बना हुआ है। प्रदेश में कुल 17 एडिश्नल एसपी के कार्यक्षेत्र बदल दिए गए। सुभाष चन्द्र दुबे को एटीएस का एसएसपी नियुक्त किया गया है। 

गृह विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार आईजी ट्रैफिक दीपक रतन को आईजी ईओडब्ल्यू बनाया गया है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर पुलिस अकादमी, मुरादाबाद के आईजी दीपक शर्मा को आईजी राज्य मानवाधिकार बनाया गया है। डीआईजी रेंज फैजाबाद संजय कक्कड़ को डीआईजी भ्रष्टाचार निवारण संगठन बनाया गया है। उनके स्थान पर डीआईजी कार्मिक विजय कुमार गर्ग को फैजाबाद भेजा गया है। 

उपनिदेशक ट्रैफिक दीपक कुमार को 32वीं वाहिनी पीएसी का सेनानायक बनाया गया है। अभिसूचना मुख्यालय में तैनात सुभाष चन्द्र दुबे को एसएसपी एटीएस बनाया गया है। भर्ती बोर्ड में तैनात अनीस अहमद अंसारी को एसपी फतेहपुर बनाया गया है। एसपी एसटीएफ (वेस्ट) बबलू कुमार को एसपी शाहजहांपुर के पद पर तैनाती मिली है। यहां तैनात राजेन्द्र प्रसाद सिंह यादव को एसपी प्रतापगढ़ बनाया गया है। प्रतापगढ़ के एसपी बलिकरन सिंह यादव को इंटेलीजेंस मुख्यालय में तैनाती दी है। मैनपुरी के एसपी श्रीकांत सिंह को एसपी सीबी-सीआईडी लखनऊ बनाया गया हैं। उनकी जगह पर उदयशंकर जायसवाल को मैनपुरी की कमान सौंपी गई है। तकनीकी सेवाएं में तैनात नेहा पाण्डेय को एसपी बहराइच बनाया गया है। यहां तैनात रामलाल वर्मा को एसपी ईओडब्ल्यू बनाया गया है। एसपी फतेहपुर सालिक राम को गोरखपुर के पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय का एसपी बनाया गया है।

शाहजहांपुर के लिए स्थानांतरित एएसपी शफीक अहमद को एएसपी (वेस्ट) बाराबंकी बनाया गया है। यहां तैनात कुलदीप नारायण को एएसपी ग्रामीण फैजाबाद बनाया गया है। शाहजहांपुर के एएसपी सिटी राजेश कुमार का एएसपी प्रोटोकाल इलाहाबाद के लिए हुआ तबादला निरस्त कर दिया गया है। एएसपी प्रोटोकाल इलाहाबाद डॉ. एमपी सिंह को 37वीं वाहिनी पीएसी कानपुर का उपसेनानायक बनाया गया है। आगरा इंटेलीजेंस में तैनात विश्वजीत श्रीवास्तव को एएसपी क्राइम नोएडा बनाया गया है। जगदीश शर्मा को एएसपी ग्रामीण सहारनपुर बनाया गया है। बिजनौर के एएसपी ग्रामीण राधेश्याम को सीबी-सीआईडी मुख्यालय में तैनाती मिली है। 

पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड वाराणसी के एएसपी सु्खराम भारती को एएसपी विजिलेंस लखनऊ बनाया गया है। फैजाबाद के एएसपी इंटेलीजेंस दिगम्बर कुशवाहा को एएसपी (गंगापार) इलाहाबाद बनाया गया है। फैजाबाद के एएसपी ग्रामीण पीयूष रंजन श्रीवास्तव को उनकी जगह एएसपी इंटेलीजेंस बनाया गया है। सहारनपुर के एएसपी ट्रैफिक संजय सिंह यादव को एएसपी ग्रामीण नोएडा बनाया गया है। यहां तैनात बृजेश कुमार सिंह को उनकी जगह सहारनपुर भेजा गया है। नोएडा की एएसपी क्राइम सुनीता सिंह को एएसपी इंटेलीजेंस आगरा बनाया गया है। पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद में तैनात आशुतोष मिश्रा को एएसपी यमुनापार इलाहाबाद बनाया गया है। यहां तैनात नीरज कुमार पाण्डेय को एएसपी प्रोटोकॉल इलाहाबाद बनाया गया है। सहारनपुर के एएसपी ग्रामीण धर्मवीर सिंह को एएसपी ग्रामीण बिजनौर के पद पर तैनाती मिली है।

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थाने से उड़ गई रिपोर्टर की तहरीर, दुबारा गुहार, फिर भी पुलिस खामोश

वाराणसी : अभी पिछले माह की ही बात है, जब एक लोकल चैनल डेन काशी के लंका-भेलूपुर प्रतिनिधि को ठिकाने लगाने की धमकी मिली थी. सभी मामलो की तरह यह भी मामला पंहुचा थाने लेकिन इस मामले में हुआ कुछ अलग. 

अधिकांश मामलों में तहरीर लेने के लिए पुलिस पीड़ितों को थाने के इतने चक्कर लगवा देती है कि आम जनता न्याय के पहले अड्डे पर ही थक के हार मान जाती है या फिर पुलिस खुद पैसे लेकर आरोपी के पक्ष में पीड़ित को ही इतना धमका देती है कि पीड़ित शांत हो जाता है. लेकिन पत्रकार को जब जान से मारने की धमकी मिली और जैसे ही यह बात पहुंची अन्य पत्रकारों तक, वे थाने पहुंच गए।

उसके बाद लंका थाने ने तहरीर ली और थानाध्यक्ष रमेश यादव ने आरोपी को जल्द से जल्द पकड़ने का आश्वासन  भी दिया लेकिन जब सप्ताह भर बाद पीड़ित पत्रकार ओमकारनाथ ने थाने पहुंचकर एसओ से यह जानकारी हासिल करनी चाही कि क्या आरोपी पकड़ा गया तो एसओ को शर्म भी नहीं आई। कहा कि आप की तहरीर गायब हो  गयी है। आप दूसरी तहरीर दे दे. पत्रकार ने तुरंत दुबारा तहरीर भी दे दी लेकिन फिर भी पुलिस एक्शन में नहीं दिखी।

क्या पुलिस अब किसी अप्रिय घटना का इन्तजार कर रही है? हालाँकि तहरीर गायब होने का यह कोई पहला मामला नहीं। समय समय पर ऐसी सूचनाएं मिलती रहती हैं। अब यहाँ पुलिस कार्यप्रणाली पर उंगली उठना लाजिमी है कि जब छोटे से मामले में पुलिस के हाथ आरोपी तक नहीं पहुंच पाए तो इलाके में अपराधियों के हौसले तो बुलंद होंगे ही। 

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनो ओमकार नाथ को जान से मारने की धमकी दी गई थी। घटना से लंका पुलिस थाने के एस ओ को मौखिक रूप से अवगत कराने के साथ ही रिपोर्ट भी दर्ज कराने को तहरीर दी गई थी। बताया गया था कि मोबाइल नंबर 8931893649 से ओमकार के मोबाइल नंबर 8423182294 पर किसी ने फोन कर पहले तो उनके बारे में जानकारी ली। नाम-पता पूछा, उसके बाद गंदी-गंदी गालियाँ देने लगा। इस पर ओमकार ने ऐतराज जताया तो फ़ोन करने वाले ने धमकाते हुए कहा कि तुम बहुत तेज़-तर्रार रिपोर्टर बनते हो। सुधार जाओ वरना अभी तो सिर्फ समझा रहा हूं। नहीं माने तो तुम्हे जान से हाथ धोना पड़ेगा। उस समय ओमकार लंका पर एक घटनास्थल पर मौजूद थे। वहां एसओ लंका भी उस समय मौजूद थे। 

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मसूरी में बवाल काटते पंजाबी नवाबजादों को जमकर पीटा उत्तराखंड पुलिस ने

आज मसूरी में हूं. जिस होटल में ठहरा हूं, वंहा पंजाब के लड़कों का एक झुंड भी ठहरा हुआ था. हां, आप सही पढ़ रहे हैं, यह झुंड ही है. इनकी बीएमडब्लू, औडी जैसी गाडि़यों से होटल का आंगन भरा पड़ा है. इस झुंड ने रात को दस बजे के बाद डीजे बंद होने पर बवाल किया. बवाल क्या बल्कि बेहूदी की हदें पार कीं. होटल के लोगों को मारा, उन्हें मां-बहन की गालियां दीं. मैं जब दोस्तों के साथ होटल पहुंचा तो यह बवाल जारी था. 40-50 लड़के थे. उन्होंने डीजे का सामान समेट रहे लड़के को जमकर पीटा और उसका सामान फेंक दिया. इस बीच तीन पुलिसकर्मी भी होटल पहुंचे. लेकिन नशे में धुत इन नवाबजादों ने उनसे भी मारपीट की. चीख-चीख कर धौंस दी कि बुलाओ साले एसएसपी को. इनमें से कुछ होटल कर्मचारियों को पीट रहे थे. मैं यह सब देख रहा था. सच बताऊं तो इतना लाचार मैंने खुद को कभी पहले नहीं पाया था. जब वो मिलकर गरीब कर्मचारियों को पीट रहे थे तो कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं? 

पुलिस वाले भी लाचार नज़र आ रहे थे लेकिन थोड़ी ही देर बाद जो हुआ उसे देख कर दिल खुश हो गया. पुलिस के लगभग 10 जवान एक स्थानीय होटलकर्मी के साथ होटल में दाखिल हुए. और जहां यह झुंड बैठकर खाना खा रहा था, वहां लाठियां भांजनी शुरू की. जो नवाबजादा सबसे ज्यादा धौंस दे रहा था, उसे सबसे तबीयत से पीटा. होटल कर्मचारियों से उन्हें पीटने वालों की पहचान करवाई और डंडों से धो डाला. 

कसम खा कर कह सकता हूं कि किसी को पिटते हुए देखकर इतनी खुशी पहले कभी नहीं हुई थी. दिल को तसल्ली सी हो गई. यह देखकर कि औडी, बीएमडब्ल्यू खड़ी रह गई और नवाबजादों को उनकी करतूत का जवाब तुरंत ही मिल गया. हिंसा कभी इतनी प्यारी लगेगी, ये सोचा नहीं था. उत्तराखंड पुलिस, ‘I love you for what you have done today.’

राहुल कोटियाल के एफबी वॉल से

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इंदौर के दो पत्रकारों में ठनी

इंदौर : आज़तक के इंदौर रिपोर्टर राहुल करैया के खिलाफ झूठे प्रकरण में फंसाने में, धमकाने और षड्यंत्र रचने की शिकायत की गई है। यहां की धर्मराज कालोनी एअरोड्रम रोड, निवासी एवं सुदर्शन न्यूज, टाइम टीवी के स्टेट को-ऑर्डिनेटर हितेष शर्मा ने शासन-प्रशासन एवं पुलिस को अपने शिकायती पत्र में बताया है कि राहुल ने उन्हें धमकियां दी हैं। राहुल करैया का कहना है कि ऐसा व्यक्ति हमारे ऊपर अनर्गल आरोप लगा रहा है, जो पूरे परिक्षेत्र में फ्रॉड पत्रकारिता करने के लिए कुख्यात है। उसके खिलाफ कई गंभीर मामलों पर एक से अधिक जांच विचारधीन हैं। हितेश शर्मा जिस टाइम टीवी और सुदर्शन न्यूज का खुद को स्टेट कोऑर्डिनेटर बाताते हैं, उन दोनो चैनलों का प्रबंधन इन्हें अपना प्रतिनिध मानने से ही मना करता है। 

उन्होंने राहुल पर आरोप लगाया है कि अपने टीवी ग्रुप से जब से उन्हें मैंने हटा दिया है, वे बदले की भावना से पेश आ रहे हैं। वह वाट्सऐप पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। वह चैनल के नाम से अवैध उगाही तथा लोगों को ब्लेकमैल करते हैं। उनकी शिकायत राज्य सायबर क्राईम पुलिस थाना इन्दौर में भी की जा चुकी है। शर्मा इससे पहले अतिरिक्त पुलिस महानीरीक्षक से भी राहुल के खिलाफ कार्रवाई की गुहार लगा चुके हैं। आरोपो के संबंध में राहुल करैया से फोन संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन वह वार्ता के लिए उपलब्ध न हो सके।

राहुल करैया का कहना है कि हितेष शर्मा ने समाज विरोधी कार्य कर के पत्रकारिता के पेशे को कलंकित किया है। उनके खिलाफ पुलिस प्रशासन में विभिन्न स्तरों पर जांच चल रही हैं। वह क्या मेरी जांच कराएंगे, पुलिस उल्टे उन्हीं की जांच कर रही है। क्षेत्र के आला पुलिस अधिकारी उनके बहुचर्चित कारनामों से सुपरिचत हैं। बहुत जल्द ही उन्हें अपनी करतूतों का सिला जांच रिपोर्ट कंपलीट होते ही मिलने वाला है। वह पत्रकारिता के नाम पर आए दिन लोगों को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ये तो वही बात हुई कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।    

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कोतवाल की थाने में पिटाई, जांच के नाम पर लीपापोती, अब आईपीएस अमिताभ ठाकुर का भरोसा

देवरिया : पुलिस विभाग का एक अधिकारी अपने मातहतों द्वारा कोतवाली थाने में ही बुरी तरीके से पिटा जाता है, लेकिन उच्चाधिकारी जांच के नाम पर मामले को मैनेज कराने में जुटे हुए हैं। इस घटना को हुए एक सप्ताह से अधिक का समय हो रहा है। आला अफसर अब तक पिटाई करने वाले दोषियों को चिन्हित ही नहीं कर पाये हैं। कार्यवाही करने की बात तो काफी दूर की है। लोगों का कहना है कि इससे तो यही प्रतीत होता है कि पुलिस के आला अधिकारी कोतवाल को पिटवाना चाहते थे?

उल्लेखनीय है कि बीते सोमवार की रात्रि करीब दस बजे अधीनस्थ वर्दीधारियों द्वारा कोतवाल को जम कर पीटा गया था। उनके शरीर में जगह जगह चोटें आईं तथा वर्दी फट गई थी।

सूत्रों का कहना है कि कोतवाली थाने के प्रभारी कोतवाल गजेन्द्र राय की पिटाई किए जाने के मामले में पुलिस विभाग एक तीन स्टार वाले जाति विशेष के एक अफसर का हाथ है। राय की 7 अप्रैल की रात्रि में पिटाई अचानक नहीं हुई है, बल्कि इस कार्य में सत्ता पक्ष के एक नेता एवं कुछ सजातीय पुलिस कर्मचारियों का हाथ है। इस बात की जोरदार चर्चा है कि राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस विभाग के आला अधिकारी इस मामले को पूरी तरह से दबाना चाहते हैं। 

पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी अमिताभ ठाकुर, जो इस समय लखनऊ में आईजी हैं, का कहना है कि पुलिस विभाग के अधिकारी यदि अपनी समस्या और घटनाओं को दबाने का प्रयास करेंगे तो यह पुलिस विभाग के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। इस मामले में कोतवाल गजेन्द्र राय को मुझसे बात कर पूरे प्रकरण को बताना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह तो पुलिस विभाग के अधिकारी की कायरता है कि वह कोतवाली थाने में पिटा जा रहा है और इसके खिलाफ आवाज भी नहीं उठा रहा है। ठाकुर ने इस प्रकरण में कोतवाल का सहयोग करने का भरोसा दिया है। 

घटना हो जाने के एक सप्ताह बाद भी पुलिस के जिम्मेदार अधिकारी बचने का प्रयास कर रहे हैं। इस वजह से प्रकरण में पुलिस विभाग में दो गुट बन गया है। एक गुट कार्यवाही की मांग पर अड़ा है तथा कह रहा है कि जब सिपाही लोग कोतवाल को पीट सकते हैं, वह भी कोतवाली थाने में घुसकर, तब वे दो स्टार वाले दारोगा को क्या समझेंगे? इस गुट का कहना है कि आज इन्सपेक्टर पीटा गया तो कल डिप्टी एस पी और एस पी भी पिट सकते हैं। इसलिए दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। दूसरा गुट, जिसमें पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी शामिल हैं, नौकरी को सर्वोपरि मानते हुए सब कुछ बर्दाश्त करने की नसीहत दे रहे हैं। पुलिस अधीक्षक डा. मनोज कुमार ने कहा कि जांच कराई जा रही है। 

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पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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यूपी में जंगल राज : पुलिस वाले ने आठ साल के इस बच्चे के साथ क्या किया, देखें वीडियो

यूपी में पुलिस पहले से ही हैवान थी और आज भी है. कोई बदलाव सुधार नहीं आया है. फिरोजाबाद के थाना सिरसागंज में थाने के अन्दर पुलिस 8 वर्ष के मासूम बच्चे पर जुल्म ढा रही है. मासूम बच्चे को पट्टे से बर्बरता से मारती पुलिस इसे अपनी मर्दानगी का सबूत समझ रही है. पुलिस ने पॉकेट मारी के आरोप में 8 वर्ष के बच्चे पकड़ा था. थाने का हेड कांस्टेबल धनीराम इस बच्चे के लिए कैसे यमराज बन जाता है, देखिये यह कुछ सेकेंड्स का वीडियो…

https://www.youtube.com/watch?v=3A5Ytvbh4do

पुलिसिया हंटर की गूँज जब आला अधिकारियों के कानों में पहुंची तो जिले के कप्तान ने इस हेड कांस्टेबल को सस्पेंड कर दिया…. क्या इस दीवान और संबंधित थाने के थानेदार को नौकरी से बर्खास्त नहीं कर देना चाहिए?

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ये है अखिलेश यादव की नाक तले काम कर रही लखनऊ पुलिस की हकीकत

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज डीआईजी लखनऊ आर के चतुर्वेदी को पत्र लिख कर लखनऊ पुलिस की हकीकत बताई है. पत्र में उन्होंने कहा है कि उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने स्वयं से सम्बंधित एक शिकायती पत्र थाना गोमतीनगर में भेजा पर थानाध्यक्ष और एसएसआई सहित सभी ने पत्र रिसीव करने तक से मना कर दिया. श्री ठाकुर ने इस सम्बन्ध में एसएसआई से फोन पर बात करना चाहा तो उन्होंने इससे भी मना कर दिया.

इसके बाद श्री ठाकुर ने डीआईजी को फोन कर गहरी नाराजगी जाहिर की जिसके तुरंत बाद डीआईजी ने थानाध्यक्ष को फोन किया जिन्होंने झूठ कह दिया कि पत्र पहले ही रिसीव हो गया है जबकि सच्चाई यह थी कि डीआईजी की डांट के बाद पत्र रिसीव करना शुरू किया गया था. श्री ठाकुर ने डीआईजी को इस सभी बातों से अवगत कराते हुए इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए कठोर कार्यवाही के लिए कहा है ताकि लखनऊ पुलिस में वास्तविक सुधार हो और जनता का वास्तविक भला हो.

सेवा में,
श्री आर के चतुर्वेदी,
डीआईजी रेंज,
लखनऊ

विषय- थाना गोमतीनगर में पत्र रिसीव नहीं करने, बात तक करने से इनकार करने, पत्र ले गए व्यक्ति से अनुचित आचरण किये जाने विषयक

महोदय,

कृपया आज समय 01.48 बजे मेरे सीयूजी नंबर 094544-00196 से आपके सीयूजी नंबर 094544-00212 पर किये गए फोन कॉल और इसके उत्तर में आप द्वारा 02.00 बजे किये गए कॉल का सन्दर्भ ग्रहण करें. आपको स्मरण होगा कि मैंने आपको कॉल कर अवगत कराया था कि मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर की ओर से एक प्रार्थनापत्र (प्रतिलिपि संलग्न) ले कर एक व्यक्ति थाना गोमतीनगर में रिसीव कराने गए थे जहां उपस्थित सभी लोगों ने पत्र रिसीव करने से साफ़ इनकार कर दिया था. मैंने यह भी बताया था कि जब पत्र ले गए व्यक्ति ने फोन मिला कर थाने के लोगों से मुझसे फोन से बात करने को कहा तो उन्होंने इससे तक इनकार कर दिया था. मैंने आपको निवेदन किया था कि थाने पर थानाध्यक्ष तथा एसएसआई बैठे हैं पर कोई भी व्यक्ति पत्र रिसीव नहीं कर रहा है.

मैंने आपसे निवेदन किया था कि आप और सभी वरिष्ठ अधिकारी लगातार कहते हैं कि थानों पर सभी पत्र तत्काल रिसीव होंगे पर यह उसकी वास्तविक स्थिति है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि मैं मात्र अपना पत्र रिसीव करवाने हेतु यह फोन नहीं कर रहा, बल्कि इस मामले को एक नजीर के रूप में देखने के लिए कर रहा हूँ कि थाने पर इस प्रकार खुलेआम प्रार्थनापत्र रिसीव नहीं किये जा रहे हैं, क्या इस पर कोई कार्यवाही भी हुआ करती है और आप जैसा सक्षम अधिकारी क्या इस पर कोई कार्यवाही करेगा.

आपने मुझसे कहा था कि आप अभी मामले को देख रहे हैं और मुझे सूचित करेंगे. आपने कुछ देर बाद मुझे फोन कर बताया था कि वह पत्र तो पूर्व में रिसीव हो गया है जिस पर मैंने आपको बताया था कि मुझे अभी-अभी थाने पर मौजूद व्यक्ति ने बताया कि थानाध्यक्ष अभी-अभी किसी का फोन हाथ में लिए सर-सर करते निकले हैं और पत्र रिसीव करने के आदेश दिए हैं. मैंने यह भी बताया था कि अभी तक पत्र रिसीव नहीं हुआ है, बल्कि आपके फोन के बाद पत्र रिसीव करने की कार्यवाही शुरू हुई है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि इस मामले को यूँ ही बीच में छोड़ने की जगह इसमें कोई ठोस कार्यवाही करें ताकि सही सन्देश जाए.

बाद में मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने भी आपसे फोन कर इस मामले में ठोस कार्यवाही का निवेदन किया था पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ दिखता है. निवेदन है कि हमारे लिए यह एक अकेला मामला नहीं, एक उदहारण है कि किसी प्रकार स्वयं लखनऊ जनपद में पुलिस द्वारा थाने पर व्यवहार किया जा रहा है. जैसा मैंने आपको बताया था कि थाने के लोग जानते हैं कि मैं एक आईपीएस अफसर हूँ, तब उन्होंने उस समय तक पत्र रिसीव नहीं किया जबतक मैंने आपके समक्ष अपनी गहरी नाराजगी और भारी कष्ट व्यक्त नहीं किया था और जब तक आपने इसे पुनः थानाध्यक्ष गोमतीनगर को आगे संप्रेषित नहीं किया था.

निवेदन करूँगा कि यदि यह एक उस आदमी के साथ स्थिति हो जो मौजूदा समय में आईपीएस पद पर तैनात है तो आम आदमी की स्थिति का अनुभव स्वयं किया जा सकता है. अतः जैसा आपके विषय में आम शोहरत है और जैसा मैंने आपसे फोन पर भी कहा था कि आप एक सक्षम अधिकारी माने जाते हैं, मैं समझता हूँ यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि मात्र पत्र रिसीव होने को प्रकरण का अंत समझने की जगह इसे प्रकरण की शुरुआत मानते हुए इसे एक उदहारण के रूप में देखने की कृपा करें. तदनुसार यदि आपको मेरी बातों में कोई अर्थ दिख रहा हो तो न सिर्फ इस मामले में
आवश्यक जांच कर आवश्यक कार्यवाही कार्यवाही करने की कृपा करें बल्कि इस सम्बन्ध में भविष्य में किसी घटना की पुनरावृति को रोकने के लिए भी सभी आवश्यक निर्देश निर्गत करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-AT/Complaint/85/15                                  
दिनांक- 26/02/2015
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

प्रतिलिपि- डीजीपी, यूपी, लखनऊ को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

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यूपी पुलिस के सीओ आशुतोष मिश्रा की कारस्तानी : पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेंद्र तिवारी को छह साल जेल कटवा दिया

04 सितम्बर 2009 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में महेंद्र कुमार की हत्या हुई जिसमे अनिल कुमार त्रिपाठी नामजद हुए और पिच्चू मिश्रा आरोपों के घेरे में आये. विवेचना के दौरान विवेचक सीओ अजीतमल आशुतोष मिश्रा ने जबरदस्ती पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र चंद्रशेखर को पुच्ची मिश्रा बताते हुए 11 सितम्बर 2006 को गिरफ्तार कर इटावा जेल भेज दिया जबकि वे जानते थे कि यह पिच्चू मिश्रा नहीं है.

धर्मेन्द्र तिवारी के खिलाफ आरोप पत्र भी लग गया और वे छह साल से ऊपर जेल में रहे. वे 07 अक्टूबर 2012 को तब छूटे जब अपर सत्र न्यायाधीश, औरैया ने 06 अक्टूबर के अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि वह पुच्ची मिश्रा नहीं, धर्मेन्द्र तिवारी हैं. जज ने तमाम बैनामे, परिवार रजिस्टर, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे ताम साक्ष्य को देखने के बाद यह आदेश दिया था.

जेल जाने के पहले धर्मेन्द्र तिवारी के पास 10 पहिये के दो ट्रक थे और 30-40 हज़ार प्रति माह की अच्छी आमदनी थी पर इस दौरान उनका पूरा कारोबार ख़त्म हो गया और आज वे पैसे-पैसे के मोहताज हैं. उनका घर गिर गया है और 11 साल का बच्चा मात्र तीसरे क्लास में है.

अब आईपीएस अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उनकी लड़ाई को उठाते हुए इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा है और कोर्ट के आदेश के आधार पर श्री धर्मेन्द्र को पुलिस द्वारा फर्जी फंसाए जाने के सम्बन्ध में कम से कम पांच करोड़ मुआवजा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है.

Spent 6 years in jail on police action, 5 crore compensation sought  

One Mahendra Kumar was murdered on 04 September 2009in Anantram, police station Ajitmal, district Auraiya in which Anil Kumar Tripathi was named accused and Picchu Mishra’s name came in light. During investigation, then CO Ajitmal Ashutosh Mishra arrested Dharmendra Kumar Tiwari son of Chandrashekhar calling him Picchu Mishra on 10 September 2006, while definitely knowing that he is not Picchu, who was sent to Etawah jail.

Later Chargesheet was submitted against Picchu Mishra, with Dharmendra remaining in jail and facing trial for more than 6 years. He was released from jail on 07 October 2012 only after orders of ADJ Auraiya dated 06 October which clearly stated that this man was Dharmendra Tiwari and not Picchu Mishra. The Judge based his order on several sale deeds, family register, vehicle registration certificate, driving licence, voter identity card, ration card and such other fundamental documents.

Before going to jail Dharmendra Tiwari had two 10-tyre trucks and his monthly income was Rs. 30-40,000. During this period, his income evaporated, his house got dilapidated and today his 11 year son is studying only in class 3.

Now IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have taken up his cause, writing to National Human Rights Commission, to order a compensation of Rs. 5 crores for Sri Dharmendra and appropriate legal action and delinquent police officers.

Dear Amitabh Thakur,

The Commission has recieved your complaint and it has assigned diary number as 1519251

with the following details:-

Victim
Dharmendra Kumar Mishra
Address
s/o Late Chandrashekhar Tiwari, r/o Mandir Mahewa, ps Bakewar, district- Etawah
Incident dated
01/01/1900
Incident Type
ILLEGAL ARREST
Incident Place
Auria
AURIA , UTTAR PRADESH

NHRC, New Delhi, INDIA.

मूल पत्र….   

सेवा में,
मा० अध्यक्ष महोदय,
मा० राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
नयी दिल्ली

विषय- श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र स्व० चंद्रशेखर तिवारी निवासी मंदिर महेवा, थाना बकेवर, जनपद इटावा के साथ हुए घोर मानवाधिकार उल्लंघन में उन्हें समुचित मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित करने विषयक  

महोदय,
हम आपके समक्ष एक ऐसा प्रकरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमे हमें प्राप्त अभिलेखों और हमें बताये तथ्यों के अनुसार एक व्यक्ति को पुलिस अफसरों द्वारा जानबूझ कर दूसरा व्यक्ति दिखा कर हत्या जैसे गंभीर मामले में जेल भेज दिया गया और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी प्रेषित कर दिया गया जिसका नतीजा यह रहा कि वह पूर्णतया निर्दोष व्यक्ति पुलिस अफसरों के जानने-समझने के बाद भी छः वर्ष से अधिक अवधि के लिए जेल में निरुद्ध रहा जिस दौरान उसका पूरा कारोबार नष्ट हो गया, उसकी बीवी और बच्चे सड़क पर आ गए और उस समय लाखों का वह आदमी आज पैसे-पैसे को मोहताज है.

यह व्यक्ति तब जेल से छूट पाया जब सत्र न्यायलय के सामने यह पूरी तरह साबित और स्थापित हो गया कि वह मुकदमे में प्रकाश में आया व्यक्ति नहीं है बल्कि एक दूसरा पूरी तरह अनजान आदमी है जिससे उस मुकदमे का दूर-दूर तक कोई भी वास्ता नहीं था बल्कि जिसे मात्र कुछ पुलिस अफसरों की व्यक्तिगत लालच ने जेल तक पहुंचा दिया था.

उपरोक्त अभिलेख और तथ्यों के आधार पर हमारी दृष्टि में यदि मा० आयोग ने इस मामले में संज्ञान लेकर इस पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा दिलाने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित किये जाने का कार्य नहीं किया तो यह न्याय की दृष्टि से निश्चित रूप से घातक होगा.

प्रकरण यह है कि दिनांक 04/09/2005 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में श्री महेंद्र कुमार पुत्र श्री आशाराम निवासी रूपसाहब मुदैना, थाना अजीतमल, जनपद औरैया की हत्या हुई जिसके सम्बन्ध में मु०अ०स० 235/2005 धारा 302, 307, 504 आईपीसी तथा 3(2)(5) एससी एसटी एक्ट का मुक़दमा थाना अजीतमल पर श्री आशाराम द्वारा पंजीकृत कराया गया. इसमे श्री अनिल कुमार त्रिपाठी पुत्र श्री रामस्वरुप नामजद हुए. विवेचक सीओ अजीतमल श्री अजय प्रताप सिंह द्वारा प्रारंभ की गयी जिसमे लगातार कई विवेचक बदले और श्री वंशराज सिंह यादव, सीओ अजीतमल इसके विवेचक हुए.

श्री वंशराज ने वादी श्री आशाराम के बयान दिनांक 03/10/2005 (विवेचना का परचा संख्या VI) के आधार पर तीन अज्ञात व्यक्तियों के नाम प्रकाश में लाये- श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा,  थाना बकेवर, इटावा, श्री बृजेश मिश्रा पुत्र श्री बीर मिश्र निवासी निवासी बम्हौरा, थाना बकेवर, इटावा तथा श्री राजीव पुत्र श्री बदन निवासी बहेड़ा थाना बकेवर, इटावा.

इसके बाद श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल ने दिनांक 01/11/2005 को इसकी विवेचना ग्रहण की. दिनांक 20/12/2005 को उपरोक्त चारों (श्री अनिल कुमार त्रिपाठी, श्री बृजेश मिश्रा, श्री राजीव चौधरी और श्री पुच्ची मिश्रा) के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया.
इस समय तक श्री धर्मेन्द्र तिवारी कहीं प्रकाश में नहीं थे और उनसे इस मामले का कोई साबका नहीं पड़ा था. श्री धर्मेन्द्र तिवारी के अनुसार उनको पहली बार इस मामले की जानकारी दिनांक 10/09/2006 को रात करीब दस बजे उस समय हुई जब ये अपने घर मंदिर महेवा, थाना बकेवर के बाहर खड़े थे. उसी समय अचानक पुलिस की जीप आई और श्री धर्मेन्द्र को पकड़ कर थाने ले गयी. घर पर पकड़ने के पहले कोई बात नहीं बताई. जीप में कहा कि थाने चलिए, आपके खिलाफ वारंट है. अजीतमल थाने पर पुलिसवालों ने बताया कि श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा के नाम से वारंट है, उसकी जगह आपको हाज़िर होना पड़ेगा. श्री धर्मेन्द्र ने इसका प्रतिवाद किया. उस समय तक उनके भाई श्री जीतेन्द्र तिवारी भी थाने आ गए थे. उन्होंने भी इसका प्रतिवाद किया तो पुलिसवालों ने उनको भी थाने पर बैठा लिया. कहा कि इसे थाने पर हाज़िर होना पड़ेगा नहीं तो श्री जीतेन्द्र को भी झूठा केस लगा कर बंद कर देंगे.

श्री धर्मेन्द्र का कहना है कि कोई विकल्प नहीं होने पर दोनों भाई थाने पर चुपचाप बैठे रहे. सुबह श्री धर्मेन्द्र को थाने की जीप पर बैठा पर औरैया कोर्ट ले गए और श्री पुच्ची मिश्रा दर्शा कर मा० न्यायालय में हाज़िर करा दिया. श्री धर्मेन्द्र ने मा० सीजेएम, औरैया से कहा कि वे पुच्ची मिश्रा नहीं हैं धर्मेन्द्र कुमार तिवारी हैं लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गयी और श्री धर्मेन्द्र को जेल भेज दिया गया.

अभिलेखों के अनुसार पुलिस की यह कार्यवाही श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल के कार्यकाल में उनके निर्देशों और आदेशों पर हुई. इसके बाद श्री धर्मेन्द्र इटावा जेल भेज दिए गए. श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ ने एससीडी पर्चे (केस डायरी) में कहीं भी श्री धर्मेन्द्र को कहीं से भी गिरफ्तार करना नहीं दिखाया बल्कि केस डायरी में लिखा कि श्री पुच्ची मिश्र मा० न्यायालय में हाज़िर हुए और उनका बयान लिया जा रहा है जबकि श्री धर्मेन्द्र के अनुसार वास्तविकता यह थी कि उन्हें पिछली रात उनके घर से अजीतमल थाने की पुलिस उठा कर ले आई थी. श्री आशुतोष मिश्रा ने दिनांक 11/09/2006 के केस डायरी में लिखा कि पुच्ची मिश्र से अपराध के बारे में पूछा गया तो पुच्ची मिश्र ने कहा कि वे अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखेंगे.

इस प्रकार तथ्य बताते हैं कि श्री आशुतोष मिश्र ने श्री पुच्ची मिश्र का जो नाम दिनांक 03/10/2005 को श्री वंशराज यादव के विवेचना के समय श्री आशाराम के बयान में आया था, उसे दिनांक 10/09/2006 को मनमर्जी श्री पुच्ची की जगह श्री धर्मेन्द्र को स्वतः ही श्री पुच्ची बना दिया गया और उन्हें स्थानीय पुलिस किए द्वारा गिरफ्तार करा कर मा० न्यायालय में पेश कर जेल भिजवा दिया गया. श्री धर्मेन्द्र को आज तक यह नहीं पता कि विवेचक श्री आशुतोष ने ऐसा क्यों किया और ऐसा करने के पीछे उनका क्या मकसद था या क्या मजबूरी थी पर श्री धर्मेन्द्र को इतना अवश्य ज्ञात है कि उन्हें श्री पुच्ची के स्थान पर पकड़ कर मा० न्यायालय लाया गया और उसके बाद वे जेल भी भेज दिए गए.

श्री आशुतोष ने दिनांक 16/09/2006 को इस मामले में श्री पुच्ची के नाम पर जेल में निरुद्ध श्री धर्मेन्द्र सहित सभी अभियुक्तगण के खिलाफ आरोपपत्र मा० न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया और इसके बाद नतीजा यह रहा कि श्री धर्मेन्द्र छः साल तक बिना किसी कारण, बिना किसी दोष के जेल में सड़ते रहे और इस बीच उनका परिवार, उनका कारोबार और वे स्वयं पूरी तरह बर्बाद होते गए. इसके बाद ट्रायल के समय श्री धर्मेन्द्र बार-बार मा० न्यायालय आते रहे और उनकी पुकार भी धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में होती रही और मा० न्यायालय के आर्डर शीट पर भी वे श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी के नाम से ही हस्ताक्षर करते थे. इस प्रकार मा० न्यायाधीश सहित सभी अधिवक्तागण और पुलिस वाले यह जानते थे कि यह व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र हैं पर इसके बाद भी उन्हें श्री पुच्ची के रूप में जेल में रहना पड़ा और दर्जनों बार मा० न्यायालय में सबों की जानकारी के बाद भी श्री पुच्ची के रूप में आना पड़ा.

इस मामले में सपूर्ण सत्यता तब सामने आई जब मा० न्यायालय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अ0एक्स कैडर, ।। औरैया श्री के पी सिंह, एचजेएस द्वारा सत्र परीक्षण सं0-155/2006 में दिनांक 06/10/2012 को आदेश पारित किया गया. मा० न्यायालय के आदेश ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया. मा० न्यायालय के आदेश ने यह पूरी तरह स्थापित और सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति पिछले छः साल से जेल में निरुद्ध था वह श्री पिच्चु मिश्रा नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी है. उदहारण के लिए मा० न्यायलय ने अपने आदेश के पृष्ठ 24 के तीसरे प्रस्तर में कहा- “यहीं पर अब प्रश्न यह उठता है कि जो अभियुक्त पुच्ची मिश्रा के नाम से प्रकरण में परीक्षित हो रहा है क्या वह धर्मेन्द्र तिवारी है या पुच्ची मिश्रा है। बचाव पक्ष की ओर से जो भी साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं उन साक्ष्यों के आधार पर यह साबित है कि अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी है न कि पुच्ची मिश्रा है। अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के तमाम दस्तावेजीय साक्ष्य उसके द्वारा प्रस्तुत भी किया गया है.”

आदेश के पृष्ठ 25 से लगायत पृष्ठ 27 तक कई ऐसे अभिलेखों और गवाहों का उल्लेख किया गया है जो निर्विवादित रूप से स्थापित कर देते हैं कि निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं श्री धर्मेन्द्र थे. उदहारण के लिए मा० न्यायालय ने कहा-“बचाव पक्ष (अभियुक्त पुच्ची मिश्रा) द्वारा अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के निम्नलिखित दस्तावेजीय साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं जिससे उसका नाम पुच्ची मिश्रा नहीं है बल्कि धर्मेन्द्र तिवारी लिखा है। परिवार रजिस्टर प्रदर्श ख-1 को डी0डब्लू0-2 केशव सिंह ने साबित किया है जिसमें परिवार की मुखिया बैकुण्ठी देवी दर्ज है। परिवार रजिस्टर के पेज संख्या-120 से लेकर 121 पर क्रम संख्या-416 पर बैकुण्ठी देवी व उनके बाद प्रेमादेवी, जितेन्द्र कुमार, सुषमा देवी, धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर, सागर पुत्र धर्मेन्द्र कुमार आदि दर्ज है। चन्द्रशेखर के दो लड़के धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार लिखा है। धर्मेन्द्र का उर्फियत में कोई नाम नहीं लिखा है। पुच्ची मिश्रा भी उर्फियत में दर्ज नहीं है। धर्मेन्द्र की पत्नी का उर्फियत में नाम रश्मि दर्ज है। डी0डब्लू0-2 ने यह भी कहा है कि उर्फियत में नाम यदि पुच्ची मिश्रा होता तो अवश्य दर्ज होता। गवाह ने आगे यह भी कहा है कि दौरान पड़ताल मैंने बैकुण्ठी देवी के परिवार के पुरूष सदस्यों के बारे में धर्मेन्द्र व जितेन्द्र के बारे में जानकारी की तो पता चला कि ये ब्राहम्ण जाति के त्रिपाठी लिखते हैं। मिश्रा लिखने की कोई जानकारी नहीं मिली। प्रदर्श ख-1 को अपने हस्तलेख, हस्ताक्षर में बैकुण्ठी देवी के परिवार रजिस्टर को जारी करना साबित किया है। इस परिवार रजिस्टर से भी धर्मेन्द्र का पुच्ची मिश्रा साबित होना नहीं पाया जाता। इसी प्रकार डी0डब्लू0-1 दिवाकर पाण्डेय ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत महेवा थाना बकेबर जिला इटावा ने भी अपनी शहादत में कहा है कि बैकुण्ठी देवी के चन्द्रशेखर लड़के थे जिनके दो लड़के जितेन्द्र व धर्मेन्द्र हैं। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र को पहचानता है। 10-15 दिन वर्ष पूर्व बृजेश मिश्रा का परिवार रहता था, उनके दो लड़के पुच्ची मिश्रा व गुड्डू मिश्रा थे। पुच्ची 12-13 साल का तथा गुड्डू 2-3 वर्ष का रहा होगा। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी का नाम पुच्ची मिश्रा नहीं रहा न उन्हें पुच्ची मिश्रा कह कहर पुकारा जाता है। धर्मेन्द्र तिवारी व जितेन्द्र तिवारी का कोई उपनाम भी नहीं है। धर्मेन्द्र के पास ट्रक का व्यापार करते हैं। ग्राम प्रधान होने के नाते उनके व उनके परिवार के बारे में जानता हूं। डी0 डब्लू0-3 अतिबल सिंह रजिस्ट्रार कानूनगो ने भी भारत निर्वाचन आयेाग द्वारा जारी पहचाना पत्र (निर्वाचन कार्ड) नं0-यू0पी0/66/303/402113 प्रदर्श ख-4 एवं एस0डी0ए0म भर्थना द्वारा धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर के नाम दिनांक 01.05.1995 को जारी होना साबित किया है। इसी प्रकार डी0डब्लू-4 लाखन सिंह, वरिष्ठ लिपिक, ए0आर0टी0ओ0 कार्यालय इटावा ने भी एल0एम0वी0 लाइसेंस नंबर-44445 प्रदर्श ख-3 व धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर के नाम दिनांक 14.07.2000 को जारी होना साबित किया व उस पर धर्मेन्द्र कुमार की फोटो लगी होना भी साबित किया है। लाइसेन्स का नवीनीकरण दिनांक 09.05.06 से दिनांक 08.05.09 तक किया जाना व पुनः फोटो धर्मेन्द्र की लगवाना साबित किया है। नवीनीकरण पर तत्कालीन ए0आ0टी0ओ0 श्रीमती रचना यद्वंशी के हस्ताक्षर भी साबित किया। यह भी कहा कि धर्मेन्द्र कुमार की नई फोटो मिलाकर नवीनीकरण किये थे। इसी गवाह द्वारा लाइसेन्स बुक में लगी फोटो को हाजिर अदालत अभियुक्त की फोटो होना तथा गाड़ी पंजीयन रजि0 में गाड़ी नम्बर-यू0पी0 75एफ/8641 का पंजीकरण धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर तहसील भर्थना जिला इटावा के नाम होना आर0सी0 फार्म नंबर-23 में पंजीकृत स्वामी धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर व आर0सी0 प्रदर्श ख-5 उक्त ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर का होना पंजीयन रजिस्टर प्रदर्श ख-6 पर ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेख का नाम होना साबित यिा है। इसी प्रकार डी डब्लू0-5 मनोज कुमार अस्थाना निबन्धक लिपिक ने भूमिंख्या-354/2 में से 17 डिस0 का विक्रयनामा /24 भाग क अखिलेश कुमार के पक्ष में दिनांक 01.11.199 तहरीर किया जाना व बैनामे के दस्तावेज पर धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार पुत्रगण चन्द्रशेखर मूल निवासी टकरूपुरा की फोटो लगा होना साबित किया है। फोटो पर जिेन्द्र कुमार व धर्मेन्द्र कुमार के नाम अंकित होना कहा है। का0 सं0-100 ख/10 दस्तावेज की सतय प्रतिलिपि प्रदर्श ख-7 को साबित किया है। दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति आज न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है कहा है। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है, का कथन किया। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो को देख कर अदालत में मौजूद अभियुक्त जो कस्टडी में जेल में लाया गया है, की धर्मेन्द्र कुमार के नाम पर पहचान की ओैर कहा कि मेरे दस्तावेज में धर्मेन्द्र कुमार की फोटो मुल्जिम धर्मेन्द्र से मेल खाती है। इसी प्रकार डी0डब्लू0-6 बाल भ्यासी जिसे अभियोजन के अनुसार घटना स्थल पर वरवक्त घटना मौजूद होना कहा जाता है, ने बयान में पुच्ची मिश्रा निवासी मोहल्ला नरायनपुर जिला औरैया द्वारा गोली चलाना कहा है। धर्मेन्द्र को भी जानता है, कहा है। हाजिर अदालत अभियुक्त की पहचान धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में किया और प्रकरण में गोली चलाने वाले व्यक्ति को पुच्ची मिश्रा बताया जिसकी कद काठी धर्मेन्द तिवारी से भिन्न बताया।“

मा० न्यायालय ने स्पष्ट कहा- “जो कार्य अभियोजन द्वारा कार्यवाही शिनाख्त कराना चाहिये था उस कार्य का निर्वहन बचाव पक्ष की ओर से किया गया है, उसकी ओर से तमाम सबूत पेश किये गये हैं जो यह साबित करते ही नहीं बल्कि उससे स्पष्ट रूप से निर्विवाद रूप से यही साबित होता है कि प्रकरण में विचारित तथा कथित पुच्ची मिश्रा, धर्मेन्द्र तिवारी है। यही अभियोजन के चक्षुदर्शी साक्षी बाल भ्यासी जो डी0डब्लू-6 के रूपमें बचाव पक्ष ने परीक्षित कराया है, उसके साक्ष्य से भी साबित होता है।“

मा० न्यायलय ने कहा- “जब इस तथ्य का साक्ष्य अभियोजन ने प्रस्तुत किया है कि पुच्ची मिश्रा ने गोली चलायी थी तब अभियुक्त धर्मेन्द तिवारी नहीं पुच्ची मिश्रा ही है यह साबित करने का भार अभियोजन पर था जबकि अभियोजन के इस दायित्व को बचाव पक्ष द्वारा निर्वहन करते हुए साबित किया गया है कि अदालत में जिसका विचारण हो रहा है व व्यक्ति पुच्ची मिश्रा नहीं धर्मेन्द तिवारी है। धर्मेन्द तिवारी होने का तमाम दस्तावेजी साक्ष्य भी उसकी ओर से दाखिल करके साबित भी किया गया है।“

मा० न्यायलय के उपरोक्त समस्त टिप्पणी इस बात को निर्विवादित रूप से स्थापित करते हैं कि जेल में निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि उनके नाम पर श्री धर्मेन्द्र थे. मा० आयोग के समक्ष प्रस्तुत इस वाद/शिकायत का मूल आधार भी मा० अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, आर एक्स कैडर-II, औरैया का आदेश दिनांक 06/10/2012 है. उपरोक्त आदेश के आधार पर मा० न्यायलय द्वारा निकले गए निष्कर्ष की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति पुलिस की गलती (जानबूझ कर अथवा अनजाने) के कारण ही छः वर्ष तक प्रताड़ित हुआ, लगातार जेल में रहा, उसकी पत्नी और बेटा सड़क पर आ गए और उसका पूरा व्यवसाय चौपट हो गया.

श्री धर्मेन्द्र के अनुसार जिस समय वे गिरफ्तार किये गए थे उस समय उनकी उम्र 28-29 वर्ष की थी. वे एकदम युवा थे और उनके अनंत संभावनाएं थीं. उनके मन में काफी कुछ करने की तमन्ना और जज्बा था.उन्होंने हाल में दो नयी गाड़ियां दस पहिया ट्रक ख़रीदा था. उन्होंने महेवा कसबे का जिला पंचायत से तहबाजारी का ठेका भी 3.66 लाख रुपये में लिया था जिससे उन्हें लगभग 6-7 लाख रुपये साल की आमदनी की उम्मीद थी. वे हर माह लगभग 35-40 हज़ार रुपये कमा ले रहे थे. उस समय उनके एक ट्रक की कीमत 14 लाख रुपये थी जिसकी आज के समय कीमत पच्चीस लाख रुपये के आसपास होगी. इस तरह एक युवा आदमी, जिसकी युवा पत्नी और ढाई साल का बच्चा था,  उसे पुलिस ने दूसरा आदमी, जिससे उनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही कोई लेना-देना था, बना कर उसके घर से फर्जी पकड़ कर हत्या का मुलजिम बना दिया और इसके साथ ही उसका सब कुछ बर्बाद हो गया. श्री धर्मेन्द्र, उसकी पत्नी और बच्चे का तीन लाख का बीमा जस का तस पड़ा रह गया क्योंकि घर में खाने के लाले पड़ गए थे, बीमा कौन जमा करता. आज श्री धर्मेन्द्र का बेटा ग्यारह साल का हो गया है पर पिता के गाइडेंस के बिना वह कक्षा तीन में पढने को मजबूर है. पत्नी भी इस हादसे से पूरी तरह से टूट चुकी है. इस बीच श्री धर्मेन्द्र का महेवा स्थित घर भी गिर गया, पूरा खंडहर हो गया, उसे बनाने वाला कोई नहीं था. आज श्री धर्मेन्द्र के बच्चे उसके कानपुर स्थित भाई श्री जितेन्द्र के घर में रहने को मजबूर हैं जबकि स्वयं श्री धर्मेन्द्र भाई श्री जितेन्द्र के महेवा स्थित घर में रहते हैं और वे स्वयं भी अर्ध-विक्षिप्त अवस्था में न्याय के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं. इसी दौरान उन्हें कुछ लोगों ने हमारे बारे में भी बताया तो वे यहाँ चल कर आये हैं.

ऊपर लिखी सभी बातों के बाद हमारी दृष्टि में यह मा० आयोग का कर्तव्य हो जाता है कि श्री धर्मेन्द्र और उनके परिवार के साथ पूर्ण न्याय किया जाए. हमारी दृष्टि में इसके कम से कम दो अनिवार्य अंग होने चाहिए-

1. श्री धर्मेन्द्र को पुलिस के गलत कार्यों के कारण होने वाले समस्त कठिनाईयों, परेशानियों, अन्याय, कारावास आदि और उनके परिवार के साथ घटित समस्त दुर्व्यवस्थाओं और दुर्दशा के लिए उन्हें राज्य की ओर समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए. जहां तक हम समझ पा रहे हैं और जहां तक उपरोक्त तथ्य इंगित कर रहे हैं, यह मुआवजा कम से कम पांच करोड़ रुपये होना चाहिए

2. श्री धर्मेन्द्र की इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार समस्त पुलिसकर्मियों के विरुद्ध समस्त आवश्यक विधिक और प्रशासनिक कार्यवाही की जाए

हमें विश्वास है कि मा० न्यायालय के उपरोक्त आदेश के आलोक में मा० आयोग इस प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए इसमें तत्परता के साथ सम्पूर्ण न्याय करेगा क्योंकि यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का एक अत्यंत ज्वलंत प्रकरण दिख पड़ता है.

पत्र संख्या-AT/Complaint/86/15                                  
दिनांक- 27/02/2015

डॉ नूतन ठाकुर
अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

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लाला लाजपत राय को भाजपाई पटका पहनाने के मामले में कोर्ट ने किरण बेदी के खिलाफ कार्रवाई का ब्योरा मांगा

किरण बेदी अपनी मूर्खताओं, झूठ, बड़बोलापन और अवसरवाद के कारण बुरी तरह घिरती फंसती जा रही है. पिछले दिनों नामांकन से पहले किरण बेदी ने स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भगवा-भाजपाई पटका पहना दिया. इस घटनाक्रम की तस्वीरों के साथ एक कारोबारी सुरेश खंडेलवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के जाने-माने वकील हिमाल अख्तर के माध्यम से किरण बेदी को कानूनी नोटिस भिजवाया फिर कोर्ट में मुकदमा कर दिया. इनका कहना है कि लाला लाजपत राय किसी पार्टी के प्रापर्टी नहीं बल्कि पूरे देश के नेता रहे हैं. ऐसे में किसी एक पार्टी का बैनर उनके गले में टांग देना उनका अपमान है.

इस मामले में दायर मुकदमें को संज्ञान लेने हुए आज कोर्ट ने पुलिस को किरण बेदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के संबंधि में पूछा है कि पुलिस ने क्या क्या किया है अब तक, इस बारे में रिपोर्ट पेश करे. सुनवाई की अगली तारीख 18 फरवरी है. उपर कोर्ट का आदेश है. नीचे पूरे मामले से संबंधित तस्वीर, अखबारी कटिंग, कंप्लेन और लीगल नोटिस का प्रकाशन किया जा रहा है. इस मामले में किसी अन्य जानकारी के लिए वरिष्ठ वकील हिमाल अख्तर से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 09810456889 के जरिए किया जा सकता है.

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