दंगों के दाग और अपराधों की आग से कैसे बचेंगे अखिलेश यादव

अलीगढ़ में हुई महिलाओं से मारपीट और लूटपाट की दो घटनाओं ने बुलंदशहर कांड की याद फिर ताजा कर दी है। उत्त्तर प्रदेश में दंगों के सवाल पर सपा सरकार को विपक्षी दल पहले से ही घेरते आ रहे हैं। तो ऐसे में सवाल उठ रहा है कि चुनाव के समय अब अखिलेश यादव दंगों के दाग और अपराधों की आग से खुद और पार्टी को कैसे बचाएंगे ?

धीरज सिंह

घटनाएं होती हैं और कुछ समय बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं मगर चुनाव आते ही राजनैतिक दल एक- दूसरे का लेखा-जोखा कुरेद कर फिर बाहर निकाल देते है। लोग जिन बातों को भूल चुके थे, चुनाव के ऐन पहले फिर से सुर्खियां बनने लगती हैं। प्रदेश में हुए दंगे और आपराधिक वारदात, कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं जो समाजवादी पार्टी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ेंगे। मार्च 2012 में उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आने के बाद जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने युवा पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया तो जनता प्रदेश के विकास का सपना देख रही थी। लैपटॉप मिलने की आशा में प्रदेश के युवाओं में भारी उत्साह था।

मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद अखिलेश भी अपने चुनावी वादे करने में जुट गये। प्रदेश भर में हजारों छात्र-छात्राओं को लैपटॉप बांटे गए। अखिलेश की महत्वाकांक्षी योजना प्रदेश में मेट्रो दौड़ाने की थी, उस पर भी अमल शुरू हो गया। यह सब कुछ ऐसे होता रहा, मानों अगला चुनाव मेट्रो और लैपटॉप के दम पर ही जीतना हो। चुनाव की अधिसूचना आने से पहले मुख्यमंत्री ने जैसे-तैसे मेट्रो का रन ट्रायल भी करवा ही दिया। हालांकि अभी लखनऊ में मेट्रो का काफी काम अभी बाकी है और मेट्रो को चलने में काफी समय लगने वाला है।

यूपी मिशन-2017 का लक्ष्य सामने आया तो सपा के दिग्गज फिर माथापच्ची में जुट गए। लैपटॉप तो बांट चुके, अब इस बार क्या? काफी सोच-विचार के बाद घोषणा हुई कि इस बार स्मार्ट मोबाइल फोन बांटे जाएंगे। आखिर युवाओं में मोबाइल फोन का क्रेज जो है। तो क्या मोबाइल और मेट्रो अखिलेश भइया की चुनावी नैया पार लगा देंगे। विपक्षी दल इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करते हैं कि सपा की सरकार बनते ही उत्तर प्रदेश में अपराध बढ़ने लगते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा मुखिया बहन मायावती जब भी प्रेस कान्फ्रेंस में पहले से ही लिखा-लिखाया भाषण पढ़ती हैं तो यह जिक्र करना कभी नहीं भूलती हैं कि प्रदेश में अपराधों की बाढ़ आ गई और जंगल राज कायम हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस के नेता भी सपा सरकार पर ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। भाजपा नेता कह चुके हैं कि अखिलेश की सरकार आने के बाद से प्रदेश में 500 से ज्यादा छोटे-बड़े दंगे हो चुके हैं। अखिलेश के राज में सबसे बड़ा दाग मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों से हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा भी राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन चुका है।

बुलंदशहर हाईवे पर जुलाई 1016 को हुई शर्मनाक घटना अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खी बनी थी, मां-बेटी से दुष्कर्म की घटना की गूंज विदेशों तक हुई थी। इस कलंक को धोने के लिए राज्य सरकार ने यूपी-100 डायल योजना लांच की। इस योजना का जोर शोर से प्रचार किया गया और वाहवाही लूटने की कोशिश की गई। पुलिस के आला अधिकारी प्रदेश में कानून व्यवस्था चुस्त- दुरुस्त होने का दावा करने लगे। वूमेन्स हेल्पलाइन और यूपी- 100 डायल चालू होने के बाद तो क्या वाकई प्रदेश में अपराध थम गये हैं। चुनावी बेला में बुलंदशहर जैसा कांड होने से अखिलेश सरकार को फिर भारी धक्का लगा है। 22 जनवरी 2017 को अलीगढ़ के टप्पल क्षेत्र के गांव जिकरपुर में एक रिटायर डीआईजी के फार्म हाउस पर मां-बेटी के साथ मार-पीट और लूटपाट की वारदात और एक्सप्रेस वे पर बस यात्रियों से लूटपाट की वारदात ने प्रदेश में कानून व्यवस्था के दावों की सच्चाई उधेड़ कर रख दी है। बताया जा रहा है कि ये दोनों ताजा वारदात बुलंदशहर कांड की तर्ज पर ही अंजाम दी गई हैं और अपराधियों के बढ़े हौसले को उजागर कर रही हैं। क्या राज्य की जनता मेट्रो, मोबाइल और लैपटॉप को राज्य की खुशहाली मान लेगी। विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश और उनकी पार्टी को दंगों और अपराधों पर भी जवाब देना होगा।

धीरज सिंह
dhirajsinghdv@gmail.com

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उ.प्र. सपा के किले में दरार : टीपू से टीपू सुल्तान बनने के अखिलेश के मंसूबों पर फिर गया पानी

अलग-अलग चाहर दिवारियों से समय-समय पर झर-झर के बाहर आये बयान जिन्हें पाठकों की सुविधा के लिए, सिलसिलेवार नीचे परोसा गया हैं, तो यही संकेत दे रहे हैं कि “टीपू“ से “टीपू सुलतान“ बनने के अखिलेश (घर परिवार में टीपू) के मंसूबों पर पूरी तरह पानी फिर गया है।

-सारा झगड़ा मुख्यमंत्री की उस कुर्सी का है, जिस पर मै बैठा हूँ। –अखिलेश यादव

-मुझे मुख्यमंत्री पद की कोई ख्वाहिश नहीं है, अखिलेश मेरे बेटे की तरह हैं। उन्हें अक्ल से काम लेना चाहिए। उन्हें अनुभव की जरूरत है। –शिवपाल सिंह

-अखिलेश अगर शिवपाल को राज्य में सपा का मुखिया बनाने से नाखुश हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि राजनीति में उनका कभी कोई अपना कद नही था।  –मुलायम सिंह

-अमर सिंह नेताजी की सरलता का लाभ उठा कर पार्टी को नुक्सान पहुँचाचा रहे हैं । उनका सपा से कुछ लेनादेना नही है। — रामगोपाल यादव

-अमर के बारे में क्या जानते हो? वे उस वक्त साथ थे जब पार्टी के नेता साथ छोड़ रहे थे। कॉंग्रेस ने जब मेरे खिलाफ सीबीआई जांच कराई तब किसने मदद की बताओ? केवल अमर सिंह ने। — मुलायम सिंह

सूबे की सत्ता सम्भाले बैठी संयुक्तपरिवारवादी पार्टिं के घर के भीतर में सब कुछ ठीक ठाक नही है। मामला 2012 से ही भीतर ही भीतर खौल रहा है। पार्टी में नम्बर दो की हैँसियत और राजनीति के दांव-पेंच, उठापटक, पैंतरेबाजी में अपने बड़े भाई मुलायम सिंह (नेता जी) की तरह माहिर खिलाड़ी शिवपाल अच्छी तरह जानते हैं कि नेताजी अपनी बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ के कारण अब किस सीमा तक राजनैतिक चुनौती झेल पाएंगे। ये चुनौती शिवपाल सिंह ने पार्टी और सरकार के सभी पदों से इस्तीफे दे कर दे भी दी। इसके बाद लखनऊ में घटनाक्रम ने जिस तरह करवट बदली, उससे लोगो के बीच यही सन्देश गया कि- अखिलेश को कुर्सी पर मुख्यमंत्री का अभिनय करने के लिए ही बिठाया गया था और 2017 के चुनाव तक भी उनसे यही अपेक्षा रहेगी। 

राजनीति का लिवास ओढ़े भृष्टाचारी, भू-माफिया, अराजक और गुंडा तत्वों के हौसले बुलंद हैं- ये किस्से अखबारों की सुर्खियां तो बनते ही रहे है साथ ही सड़कों, गली मोहल्लों में आम चर्चा का विषय भी बन चुके हैं। पार्टी में अंदरूनी उठा पटक की नब्ज पर पकड़ रखने वालों की माने तो प्रो0 यादव के सर भू-माफियाओं को संरक्षण देने का ठीकरा फोड़े जाने के प्रयास उच्च स्तर पर चल रहे हैं। मथुरा का जय गुरुदेव आश्रम ट्रस्ट पर उनके ड्राइवर पंकज यादव की ताजपोशी का मामला हो या मथुरा में ही जवाहर बाग़ पर रामबृक्ष यादव के कब्जे का मामला दोनों ही मामले पूरे प्रदेश में एक पखवाड़े से ज्यादा राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियों में रहे हैं। उस समय भी इन मामलों की आंच ने प्रदेश के प्रथम परिवार को लपेटे में लिया था। इन बातों से चौकन्ना होकर अखिलेश पिछले डेढ़ साल से पार्टी की छवि को मांजने, धोने-पोंछने और चमकाने में लगे रहे। साथ ही वो इस बात का भी भरसक प्रयास करते रहे कि सूबे में विकास और सामाजिक सशक्तिकरण की जो योजनाएं उनकी सरकार ले के आई है, उनका लाभ और स्वाद आमजन को चुनाव से पहले मिल जाये। इसके लिए जरूरी था कि वो बतौर मुख्यमंत्री अपनी “कठपुतली छवि“ को बदलें। निर्णय लेने में स्वतंत्र और उन्हें लागू कराने में मजबूत मुख्यमंत्री के रूप में अपने को स्थापित करें। पिछले डेढ़ वर्ष से वह यही तो कर रहे थे। अलबत्ता लोगों को इसका एहसास पिछले छः माह से होने लगा था।


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मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का मामला हो, मुख्य सचिव आलोक रंजन की सेवा निबृति के बाद इस कुर्सी पर अपने पसंदीदा प्रवीर कुमार को बिठाने का मामला हो,  चार साल में तीन बार मंत्री पद की शपथ और हर बार एक सीढ़ी ऊपर उठाये जा रहे गायत्री प्रजापति को राज्य मंत्री फिर राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और फिर केबिनेट मंत्री बनाये जाने का मामला हो,  गायत्री प्रजापति व राजकिशोर की बर्खास्तगी का हो, या शिवपाल सिंह के सभी विभागों की वापसी (पीडब्ल्यूडी छोड़ कर) का रहा हो या फिर “बाहरी“ (अमर सिंह) का विरोध करने का, हर मामले में अखिलेश को “थूके को चाटने“ जैसी स्थिति का ही  सामना करना पड़ा है।

इतिहास भी किस तरह अपने को दोहराता है इसका अंदाजा मुलायम सिंह को शायद उस समय न रहा होगा जब उन्होंने अपने बेटे को प्यार में टीपू कहना शुरू किया होगा। इतिहासिक टीपू सुल्तान की उम्र , जब पहली बार उन्होंने अंग्रेज फौजों से अपने राज्य को बचाने के लिए युद्ध लड़ा (सन 1792) और उन्हें शिकस्त दी, मात्र 42 वर्ष थी। आज जब उ0प्र0 में “टीपू“ –  “टीपू सुलतान“ बन कर उभरने के लिए राजनैतिक समर में संघर्ष कर रहा है, तब उसकी उम्र भी 42 वर्ष की ही है। ये बात दूसरी है कि इस टीपू का बाप जिन्दा है और उसने इस राजनैतिक समर में खुद उसे पीछे धकेल दिया है। इतिहासिक टीपू के पिता जब वे मात्र 32 वर्ष (सन 1782) के थे चल बसे थे।

प्रदेश के वो लाखों युवा जिन्होंने 2012 में सपा को नही अखिलेश को वोट दिया था। उनके दिल-ओ-दिमाग पर अखिलेश छाये हुए हैं। ये वो युवा हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे युवा अखिलेश में अपना अक्स दीखता है । उन्हें अपनी राजनैतिक महत्वाकांछा के पूरा होने के सुख की अनुभूति होती है। आज सब घोर निराश हैं। इन युवकों में लाखों ऐसे युवा भी जुड़ गए हैं जो उ0प्र0 में 2017 के चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। सब को पार्टी के मंचों से नीचे उतार दिया गया है। इस स्थिति में ये सब,  खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। ऐसे लाखों नौजवानों का मानना है की अखिलेश अपने ही परिजनों की “राजनैतिक गुंडई“ का शिकार बन गए हैं।

यह भी हकीकत है, कि पार्टी पर अखिलेश की सीधी पकड़ नही रही है। 2012 के चुनावों से पहले उनकी राजनैतिक पहचान मात्र इतनी ही थी कि, वह पार्टी के सर्वे सर्व मुलायम सिंह के बेटे है। पढ़े लिखे खुले दिमाग के हैं। लोगों को उम्मीद बधीं थी कि वह सपा के लठैती चरित्र को बदलेंगे। राजनैतिक दाँव-पेंच, उठा-पटक और लठैती  उखाड़-पछाड़ से दूर रहने वाले अखिलेश के पर कतरे जाने से क्षुब्ध उनके समर्थक लाखों युवा मुलायम सिंह से जानना चाहते हैं कि अगर उ0प्र0 के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम परिवार से बाहर का अन्य कोई युवा बैठा होता तो क्या वह —
 
सरकार का मुखिया होने के नाते जनता के प्रति जो उत्तरदायित्व हैं उनका निर्वहन वह किसी बाहरी या भीतरी दबाव से मुक्त रह कर नही करता? किसको मंत्रिमंडल या मंत्रीपरिषद में रखना किसको हटाना, मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस विशेषाधिकार का उपयोग किसी बाहरी या भीतरी दबाव से मुक्त रह कर वह नही करता? शासन में किस नौकरशाह को किस कुर्सी पर बिठाना, किसको हटाना किसको किसकी जगह लाना ये मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस अधिकार का उपयोग बिना किसी बाहरी या भीतरी दबाव के वह नही करता?

मुलायम सिंह जी, बिना इस अपेक्षा के कि लाखों युवाओं को उनके उपरोक्त सवालों का जबाब आपसे मिलेगा, वो पूछना चाहता हैं कि —

जब आप शुरू से जानते थे कि राजनीति में आपके भाई शिवपाल सिंह यादव के मुकाबले अखिलेश का कोई कद नहीं है, तो 2012 में आपने अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर, क्या सोच के बिठाया था? क्या यह सोच के, कि वह पूरे कार्यकाल आपकी या आपके भाइयों की कठपुतली बनकर काम करेंगे? अगर आपकी मंशा यही थी तो, जब अखिलेश अपने कठपुतली होने के लबादे को फाड़ के फेंकने में लगे हुए थे, आप धृतराष्ट्र बन कर चुप क्यों बैठे रहे? शायद इस लिए कि आपको अपने जीवन काल में अपने भाई शिवपाल सिंह से ये उम्मीद नही रही होगी कि वह पार्टी तोड़ आपके सामने प्रतिद्वंदी बन खड़े होने की हद तक चले जाएंगे।

जो भी हो, फिलहाल आपने कुनबे को बिखरने से तो बचा लिया है, पर यह सब लाखों युवाओं और अपने चहेते अखिलेश (टीपू) को सार्वजनिक रूप से बौना साबित करके। इसकी भारी कीमत आपको 2017 के चुनावों में चुकानी ही होगी। इन परिस्थितियों में फंसे अखिलेश अपना ध्यान पीडब्ल्यूडी विभाग पर केंद्रित कर रहे हैं। वो अच्छी तरह जानते हैं कि प्रदेश में सड़कों पर यदि वाहन फर्राटे से दौड़ेंगे तो उनके विजय रथ की राह कोई रोक नही पायेगा। हो सकता है यही सोच के उन्होंने चाचा को सारे विभाग लौटा दिए पर पीडब्ल्यूडी अपने पास ही रख लिया। अभी हाल ही में मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और विशेष सचिव स्तर के अपने विश्वस्त 14 आईएएस अधिकारियों को प्रमुख विभागों का मुखिया बना के बिठाया है।

लेखक विनय ओसवाल हाथरस के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क vinayoswal1949@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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अखिलेश यादव की कहानी से याद आये राजीव गांधी!

अनेहस शाश्वत
23 जून, 1980 की सुबह रेडियो पर एक समाचार आया और सन्नाटा छा गया। समाचार यह था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र और उनके सम्भावित उत्तराधिकारी कांग्रेस नेता संजय गांधी का दुर्घटना में निधन हो गया। इस दारुण दुख के आघात से उबरी इन्दिरा गांधी ने सिर्फ इतना कहा कि-‘‘मेरे साथ इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।’’ लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में न डिगने वाली भारतीय मानसिकता की इन्दिरा गांधी ने तत्काल अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर प्रषिक्षण देना शुरू किया। अभी यह प्रशिक्षण चल ही रहा था कि दूसरी दुर्घटना घटी और 31 अक्टूबर, 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। चूंकि सारी गोटें इन्दिरा गांधी बिछा चुकी थीं और उनके सिपहसालार भी जांनते थे कि उनका भविष्य वंशवादी शासन में ही सुरक्षित है। इसलिए तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी।

कुछ ही दिन बाद हुए अगले आम चुनाव में सहानुभूति की लहर के फलस्वरूप प्रचन्ड बहुत की सरकार के मुखिया राजीव गांधी हुए। हंसमुख, ऊर्जावान और नये विचारों से भरे हुए राजीव गांधी ने कई नयी शुरुआत की। जिनका फल हम आज भी खा रहे हैं। राजनीति में नई संस्कृति लाने के विचार से प्रेरित राजीव गांधी ने स्वीकारोक्ति की कि दिल्ली से जो रुपया चलता है वह गांव तक पहुंचते-पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है और भी तमाम कदम उन्होंने उठाये। राजीव की ऐसी बेबाक बयानी और नई राजनीतिक संस्कृति लाने की आहट से पुराने जमे-जमाये घाघ कांग्रेसी सक्रिय हो गये। बहुत डिटेल में जाने की जरूरत नहीं क्योंकि यह सब हाल ही का इतिहास है। ज्यादातर लोग जानते हैं। इन घाघ नेताओं के सक्रिय होने का नतीजा यह हुआ कि राजीव गांधी खासी बदनामी झेलकर सत्ता से बेदखल हुए बाद में किस्मत ने भी दगा किया और वे एक दर्दनाक मौत का शिकार हुए। इस तरह सम्भावनाओं से भरे एक राजनैतिक जीवन का अंत हो गया। जो शायद पूरा समय पाता तो हो सकता है कुछ बहुत अच्छा देखने को मिलता।

इन्दिरा गांधी की कार्यशैली से नाराज और विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल अभियान से शीर्ष पर पहुंचे कई नेताओं में से मुलायम सिंह भी एक हैं। शीर्ष पर पहुंचने के बाद मुलायम सिंह में वे सारे गुण विकसित हो गये जिनके लिए मुलायम और उन सरीखे दूसरे नेता इन्दिरा गांधी की बुराई करते थे। वंशवाद भी ऐसा ही एक गुण है। सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के लिए मुलायम सिंह ने भी वे सारे करम-धतकरम किये जो आम राजनीतिज्ञ करता है। और इन्दिरा गांधी की तरह सत्ता अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी। यहां तक तो सब ठीक रहा। लेकिन अखिलेश ने भी वही गलती कर दी। जो कभी राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने राजनीति में नये विचार और संस्कार का समावेश करने की कोशिश की और एक हद तक सफल भी रहे।

लेकिन आज के इस दौर में जब अलग चाल, चरित्र और चेहरे का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा तक सारे करम-धतकरम करने पर उतारू है, अखिलेश की यह सदाशयता कितने दिन चलती? पुराने राजनैतिक ढंग में रचे-बसे सपाई जो इत्तफाक से उनके परिजन भी हैं, सक्रिय हो गये। तर्क दिया गया कि केवल आदर्शों और काम के सहारे चुनाव नहीं जीता जाता। उसमें वे सब शतरंजी गोटें भी बिछानी पड़ती हैं, जिससे अखिलेश यादव अनभिज्ञ हैं या जानबूझकर परहेज करते हैं। जाहिर सी बात है रार छिड़नी ही थी और जमकर छिड़ी। दोनो ओर से आरोप-प्रत्यारोप और घात-प्रतिघात का दौर षुरू हुआ। अन्ततः पुराने सपाई सफल हुए और मुलायम सिंह के आशीर्वाद से सक्रिय भी हो गये।

इस लड़ाई में विपक्षियों ने भी छौंक लगाना शुरू किया और तमाम अरोप जड़ दिये। विपक्षियों के वे सारे आरोप निराधार भी नहीं हैं सत्ता के शीर्ष पर बैठे अखिलेश यादव दूध के धुले हों, यह सम्भव भी नहीं है। लेकिन कम से कम एक नई शुरुआत तो अखिलेश ने की ही और एक नई राजनैतिक संस्कृति लाने का प्रयास भी किया। अब रहा सवाल चुनाव जीतने की तिकड़मों का तो पिछला चुनाव जो समाजवादी पार्टी हार गयी थी तब भी तो प्रबन्धन इन्हीं सिपहसालारों की हाथ में था, जो अब मुलायम के आषीर्वाद से फिर सक्रिय हो गये हैं।

ऐसे में अगर अखिलेश को पूरी छूट दी जाती तो शायद कुछ अच्छा देखने को मिलता। आखिर बिहार जैसे जंगल राज्य में नीतीश ने ऐसा कारनामा करके दिखाया ही जैसा अखिलेश अब उत्तर प्रदेष में करना चाहते हैं। हालांकि नई पारी में लालू यादव नीतीश के प्रयास को फिर से मटियामेट करने पर उतारू हैं, ऐसा दिख रहा है। इन परिस्थितियों में एक बात कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कांग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट मुलायम, लालू सरीखा जो नेतृत्व विभिन्न राज्यों में उभरा उसके अगर ऐसे ही कारनामे रहे तो भाजपा को उनका सफाया करते देर नहीं लगेगी। सच यह भी है कि कांग्रेस फिर भी खासी उदार है भाजपा से उदारता की यह उम्मीद ये क्षेत्रीय-क्षत्रप नहीं करें, वही उनके हित में होगा।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी में जंगलराज : जेल के चिकित्साधिकारी को क्यों है मौत का अंदेशा, पढ़िए पूरा पत्र

सेवा में
महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
महानिदेशालय स्वास्थ्य भवन लखनऊ उ.प्र.
विषय – हत्या से पूर्व का बयान
महोदय

सविनय निवेदन है कि मैं जिला कारागार फिरोजाबाद में चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात हूँ। मैं डायबिटीज का मरीज़ हूँ और सुबह-शाम इन्सुलिन लेता हूँ। जनवरी 2016 में जब मैं नवीन प्रा. स्वास्थ्य केंद्र इटौली पर तैनात था, तब मुझे पैनिक एंग्जायटी की समस्या हो गई थी। ढाई महीने तक नियमित दवा लेने और 21 फरवरी से 22 मार्च तक स्वास्थ्य लाभ हेतु अर्जित अवकाश लेने के बाद में पूरी तरह ठीक हो गया।

मैं छुट्टी से वापस लौटा तो मुझे पता चला कि मुख्य चिकित्साधिकारी ने बदले की भावना से मेरा ट्रांसफर जिला कारागार में कर दिया है। जिला कारागार में लेवल तीन की पोस्ट खाली थी जबकि मैं लेवल एक में हूँ। लेवल एक की जिले में 45 पोस्ट खाली हैं और 35 चिकित्साधिकारी कार्यरत हैं और लेवल-2 की ग्यारह पोस्ट हैं और लेकिन सभी भरी हैं। मैंने मुख्य चिकित्साधिकारी को 15.02.16 को आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था जो ACR भेजने के पैसे लेता था और उसके द्वारा ACR न भेजने के कारण 2014 में सात चिकित्साधिकारियों का प्रमोशन लेवल-1 से लेवल -2 में नहीं हो सका। मुख्य चिकित्साधिकारी ने बजाय जांच करने के उसकी पेंशन सुनिश्चित कर दी।

19 मई को मैंने एक पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखा  जिसमें अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आधार पर अपनी मूल तैनाती नवीन प्रा. स्वा केंद इटौली पर करने का निवेदन किया। मैंने RTI के माध्यम से आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता पर हुई कार्रवाई के बारे में पूछा। मुख्य चिकित्साधिकारी महोदय ने RTI का जवाब तो आज तक नहीं दिया, तीन दिन बाद जेल से डॉ धर्मेंद्र हरजानी का ट्रांसफर पर दिया। इससे मेरा ड्यूटी सिड्यूल और मुश्किल हो गया और नियमित दवा लेने के बावजूद मेरी स्वास्थ्य समस्या सुधरने के बजाय बढ़ गई। 22 जून को मैंने पुनः चिकित्साधिकारी को पत्र लिखकर अपनी स्वास्थ्य समस्या बताई और चिकित्सा अवकाश के लिए कहा। महोदय ने स्पष्ट शब्दों में कहा – हम तुम्हें चिकित्सा अवकाश नहीं दे सकते।

10 जुलाई को डॉ अमित जिंदल का जेल से ट्रांसफर कर दिया और डॉ संजीव कुमार को उनकी जगह जेल में ट्रांसफर कर दिया। १२ जून को मैंने पुनः जिला अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट डॉ अजय अग्रवाल से परामर्श लिया। उन्होंने मुझे दो हफ्ते का रेस्ट लिखा है। दांत में अक्सर दर्द होता रहता है , इसके लिए जिला अस्पताल के डेंटिस्ट ने RCTकराने के लिए लिखा है। मैंने स्वास्थ्य संबंधी नए-पुराने प्रपत्रों के साथ 15 जुलाई को चिकित्सा अवकाश के लिए लिखित फॉर्म भरकर चिकित्साधिकारी को दिया है। मगर महोदय ने अवकाश देने से मना कर दिया है।

बिना किसी वजह के मेरा मार्च के बाद से वेतन भी मुख्य चिकित्साधिकारी ने रोक रखा है। मौखिक रूप से कई बार और 09.06.16 को मैंने लिखित पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को दिया पर मार्च के बाद से मेरा वेतन अभी तक नहीं निकल सका है।

मैं 23.06.16 को अपर निदेशक आगरा व महानिदेशक महोदय को अपने स्वास्थ्य,चिकित्सा अवकाश व वेतन के बारे में लिख चुका हूँ पर कहीं से कोई राहत नहीं मिली। महोदय, इनसोम्निया व एंग्जायटी के लिए सरटालिन, क्लोनेज़ीपाम व ज़ोल्पिडेम मुझे नियमित लेनी पड़ती हैं। रात में नींद बहुत देर से आती है और दिन में दोपहर तक नींद आती रहती है। मैं अकेला  रहता हूँ। जेल शहर से पांच किलोमीटर दूर है। माचिस, आटा, सब्जी तक लेने शहर से पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। एंग्जायटी के समय शुगर लेवल तेज़ी से नीचे गिरता है। 15.05.16 को मेरा शुगर लेवल 48 व 23.05.16 को 52 व 10.06.16 को 56 था। ऐसे मैं भी मुख्य चिकित्साधिकारी शाम पांच से सुबह नौ बजे तक कारागार की ड्यूटी। दिन में नौ से पांच तक पोस्टमॉर्टम ड्यूटी और पांच से सुबह नौ बजे तक फिर कारागार ड्यूटी की उम्मीद करते हैं।

29 मई को मैंने सात पोस्टमॉर्टम किए। सड़ी हुई लाशें जहां खड़ा होना दुश्वार था। मोरचरी ऐसी जगह पर है जहां का तापमान 45 डिग्री से ऊपर रहा होगा। बैठ कर खाना खाने तक की जगह नहीं है। पंखा चलवाने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी व चिकित्सा अधीक्षक को कई फोन किए। डेढ़ घंटा पंखा चला कर बंद कर दिया। अगर पानी की बोतल और मीठा मेरे साथ न होता और जब तक आधा किलोमीटर से पानी लेकर व्यक्ति आएगा तब तक किसी भी इन्सुलिन लेने वाले व्यक्ति की हाइपोग्लाइसीमिया से मौत हो सकती है।

मेरी स्वास्थ्य समस्या ऐसी है जिसके साथ मैं काम तो कर सकता हूँ परंतु उससे तात्कालिक रूप से वह मेरे लिए जानलेवा हो सकता है और  लंबे समय में मेरे स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डाल सकता है। मेरे साथ भी कहीं पर किसी भी तरह से ऐसी दुर्घटना घटती है तो इसके लिए सीधे तौर पर मुख्य चिकित्साधिकारी को ज़िम्मेदार ठहराया जाए। मेरा वेतन निकलवा दिया जाए। मेरा NPS का और ACP का पैसा मेरे माँ-बाप को दे दिया जाए (रामजीलाल गुप्ता द्वारा ACR न भेजने के कारण मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और ACP की पहली लिस्ट में मेरा नाम नहीं है ) । 2014 में मेरे जवान भाई की मृत्य के बाद उसकी आठ साल व चार साल की बच्चियां मुझ पर आश्रित हैं सरकार उनके पालन-पोषण व अध्ययन की व्यवस्था करे। जिन – जिन अधिकारियों को मैंने पत्र लिखे हैं वे सब मेरी फाइल में उपलब्ध हैं।

सधन्यवाद

प्रार्थी
डॉ राम प्रकाश
चिकित्साधिकारी
जिला कारागार फिरोजाबाद उ. प्र.
वरिष्ठता क्रमांक – 13517 
मोबाइल – 8273492240

प्रतियां
1. महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य लखनऊ        
2. अपर निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण आगरा
3. मुख्य चिकित्साधिकारी फिरोजाबाद

संलग्नक-
1. 15.02.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
2. 19.05.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
3. 22.06.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
4. पुराने व नए चिकित्सा संबंधी दस्तावेज पृष्ठ

दिनांक-  25.07.2016

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जंगलराज और घरेलू झगड़े के आरोपी अखिलेश यादव मीडिया पर निकाल रहे भड़ास

यूपी में अजब गजब राज चल रहा है. सीएम किसी बच्चे की तरह अपनी हर हार का ठीकरा मीडिया पर फोड़ रहा है. प्रदेश में जंगलराज चरम पर है. सरकारी आफिसों में घूसखोरी और भ्रष्टाचार, सपा नेताओं व मंत्रियों की नंगई, सत्ताधारियों के परिजनों की गुंडई, समाजवादी पार्टी के कुनबे में आंतरिक विवाद, महिलाओं का उत्पीड़न और बलात्कार, बाढ़ से परेशान लाखों किसान, पुलिस प्रशासन द्वारा आम जनता की सुनवाई से इनकार… यूपी के बारे में जितना लिखा जाए कम है. लेकिन नौजवान सीएम अखिलेश यादव लंबे चौड़े कई कई पन्ने और कई कई मिनट के विज्ञापन अखबारों-चैनलों में देकर खुद की बढ़िया इमेज गढ़ने-काढ़ने में लगे हैं लेकिन कोई मामला जब उनके सिर के उपर सवार हो जाता है तो वह सारा ठीकरा मीडिया के सिर मढ़ देते हैं…

कुछ दिन पहले चाचा शिवपाल के साथ एक कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद कहा कि हे मीडिया वालों, हम लोगों में झगड़े मत लगाओ. सोचिए जरा, क्या मीडिया वालों की इतनी हैसियत है कि वे अखिलेश, शिवपाल, रामगोपाल, मुलायम के बीच झगड़े लगा दें? अरे जब आपके घर में कई किस्म के महत्वाकांक्षाओं के चलते झगड़े रगड़े चल रहे हैं तो मीडिया तो उसे रिपोर्ट करेगी ही, मीडिया तो नेताओं से अलग अलग मिलकर उनके मन की बात, मूड, मिजाज जानकर उसे खबर बनाएगी ही, लेकिन ये कहना कि मीडिया वाले झगड़ा लगा रहे हैं, अखिलेश की अपरिपक्वता दर्शाता है. अखिलेश अपने गिरेबान में झांके तो खुद पता चलेगा कि असल में झगड़े के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. कौमी एकता दल का विलय होने के बाद उसे रद्द कराना शिवपाल को बुरी तरह नाराज करने के लिए काफी है. अमर सिंह ने जो ताजा बयान दिया है कि उससे पता चलता है कि अखिलेश तो इतने बड़े हो गए हैं कि वे अब अमर सिंह जैसे नेताओं के अनुरोध करने पर भी उनसे बात तक करने का वक्त नहीं निकाल पाते. ऐसे में अशांति, तूतूमैंमैं को भला कौन रोक सकता है.

अखिलेश का मन नहीं भरा तो एक बार फिर मीडिया को गरिया दिए हैं… मीडिया पर फिर भड़के अखिलेश बोले, ‘मालूम है कहां से आता है मुनाफा’. अखिलेश यादव का ये मौसम मीडिया से नाराजगी का है. उन्होंने मीडिया पर पक्षपात करने का आरोप लगाया. अखिलेश ने कहा कि टीवी और अखबारों से जो यूपी को देखता है, उसे लगता है यूपी में बुरी हालत है. यूपी में कुछ हो जाता है तो टीवी चैनल में खूब दिखाया जाता है. अखिलेश यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि टीवी वालों हमें पता नहीं कि तुम्हारा मुनाफा कहां से आता है. अखिलेश ने कहा कि एक टीवी चैनल ने सर्वे दिखाया है जिसमें पहले हमें तीन नंबर पर बताया था और अब एक नंबर पर बता रहे हैं. लगता है चुनाव आने के साथ ही इनका हिसाब-किताब ठीक हो गया है.

अखिलेश जी, आप खुद बताइए कि मीडिया को आपके अफसर किस तरह मैनेज करते हैं. कोई बड़ी घटना हो जाने पर मीडिया को मैनेज करने के वास्ते नोटों भरी अटैची के साथ अफसरों को दिल्ली कौन भेजता है. मीडिया वाले भ्रष्ट तो हैं ही. लेकिन उन्हें भ्रष्ट किसने किया? आप जैसों ने ही तो. नेताजी मुलायम सिंह यादव ने तो अपने जमाने में मीडिया को मैनेज करने के लिए विवेकाधीन कोष से करोड़ों रुपये बांट डाले. अपात्रों को मान्यता प्राप्त पत्रकार बनाने और उन्हें सरकारी मकान देकर उपकृत करने का खेल कौन खेलता है. सीएम साहब, मीडिया पर भड़ास निकालने से नहीं, अपने गिरेबां में झांकने से समस्या का हल निकलेगा वरना चुनाव आने वाला है, जनता बोलती नहीं तो भूलती भी नहीं. सारे सर्वे धरे रह जाएंगी और आपके नीचे से कुर्सी सरक जाएगी.

अखिलेश खुद को ट्रेनी सीएम बता रहे हैं. साथ ही यह भी कह रहे हैं कि उन्हें फिर मौका मिला तो वह खूब काम करेंगे, खूब विकास करेंगे. यह सुनकर सिहरन पैदा होती है. उनके ट्रेनी राज में यूपी में क्या क्या कांड हुआ और उन कांडों पर किस तरह सरकार ने राख डाला, सबको पता है… इस ट्रेनी सीएम के राज में एक रीढ़ वाला पत्रकार जिंदा जलाकर फूंक डाला गया.. आरोपी मंत्री और पुलिस वाले सब आज भी मौज काट रहे हैं… अगर आप लोगों की स्मृति कमजोर न हो तो शाहजहांपुर का पत्रकार जोगेंद्र सिंह हत्याकांड याद होगा… ऐसे दर्जनों कांड इनके राज में हुए और सब पर राख डालते गए… जाने किस विकास में लीन हैं कि जनता हर ओर करप्शन घूसखोरी उत्पीड़न बलात्कार दबंगई से त्रस्त है और ये महाशय हैं कि विकास गान गाते हुए अघा नहीं रहे हैं… कहो भाई रे, ये टीपू कैसा विकास कर रहा है… और, जब इस टीपू पर लोग सवाल उठाने लगते हैं तो परेशान होकर गुस्से में सारा ठीकरा मीडिया पर फोड़ देता है… न न, बहुत हो गया टीपू… अब किसी और को मौका दो और पांच साल थोड़ा सीखो देखो सोचो मंथन करो… बहुत पाप किए हैं… पश्चाताप के लिए भी दिन मिलने चाहिए…

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

पिछले चौबीस घंटे में यूपी में जंगलराज से संबंधित तीन समाचार भड़ास के पास मीडिया वालों ने भेजे हैं, जो इस प्रकार हैं…

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UP mei Jangal Raj ki Sachhi Kahaniyan

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लखनऊ में सपाई साइकिलों की खटर पटर और ताज होटल में टिप टिप बरसा पानी…

Yashwant Singh : अखिलेश यादव अदूरदर्शी और बकलोल नेता हैं. उन्हें जमीनी हालत की समझ ही नहीं है. पूर्वांचल में कौमी एकता दल के पास ठीकठाक जनाधार है. मुसहर, जुलाहा टाइप हिंदू मुस्लिम्स की बेहद पिछड़ी या यूं कहिए अति दलित जातियों का माई बाप कौमी एकता दल ही है. सपा में इस पार्टी के विलय से सपा को जबरदस्त फायदा होता. लेकिन मीडिया और दूसरी पार्टियों के नेताओं के ‘अपराधीकरण अपराधीकरण’ के हो हल्ले के जाल झांसे में फंसकर अखिलेश न सिर्फ इस विलय को रद करा बैठे बल्कि जमीनी स्तर पर सपा संगठन को मजबूती देने वाले शिवपाल को भी नाराज कर दिया.

फिलहाल तो शिवपाल और अखिलेश में जबरदस्त वाली खींचतान चल रही है और सपा में दोनों का दो गुट बन चुका है. हर गुट नजर रखता है कि दूसरे गुट से कौन लोग जुड़े हैं और चल क्या रहा है. पिछले दिनों लखनऊ एक प्रोग्राम में जाना हुआ तो मंच से मैंने सपा में कौएद के विलय की जमीनी हकीकत ग्रासरूट असर की बात बता दी. इसका जिक्र आप इस रिपोर्ट में भी देख सकते हैं. https://www.bhadas4media.com/sabha-sangat/10460-sadhna-plus-samman-samaroh

मैं तो दिल से मना रहूं कि सपा हार जाए अगले चुनाव में ताकि ये दोनों गुट अपनी अपनी साइकिल लेकर अलग-अलग दिशा में दौड़ लगाएं, इस तरह दो अलग पार्टियां बना लें, एक तो मूल समाजवादी पार्टी रहेगी ही, अखिलेश के नेतृत्व में, दूसरी पार्टी बनेगी- समाजवादी पार्टी (मुलायम). प्रोफेसर रामगोपाल सनक गए किसी दिन तो तीसरी पार्टी बन जाएगी- समाजवादी पार्टी (लोहिया). पहली के नेता अखिलेश. दूसरी के शिवपाल. तीसरी के प्रोफेसर रामगोपाल. इस तरह यूपी में कुछ नए नेता पैदा होंगे. कुछ नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे और मुर्दाहाल उत्तर प्रदेश में थोड़ी जान आ सकेगी. फिलहाल तो सब एकजुट होकर लूट रहे हैं, आपस में कम लड़ रहे हैं.

कार्यक्रम का सबसे मजेदार पार्ट रहा अल्का याज्ञनिक का गाना. ताज होटल के बाहर झूमकर बारिश हो रही थी और अंदर अल्का याज्ञनिक टिप टिप बरसा पानी गाकर माहौल मादक कर रहीं थीं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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सपा नेताओं के स्त्री विरोधी चेहरे को दिखाने वाला यह पोस्टर सोशल मीडिया पर हो रहा वायरल

सोशल मीडिया पर इन दिनों समाजवादी पार्टी की थू थू हो रही है. सपा के स्त्री विरोधी चेहरे के बखूबी उजागर हो जाने के बाद हर पढ़ा लिखा नागरिक इस पार्टी की भरपूर निंदा कर रहा है. बुलंदशहर गैंगरेप प्रकरण पर आजम खान के बेवकूफी भरे बयान के बाद हर आम ओ खास यह कहने पर मजबूर है कि आखिर सपा के नेताओं को हो क्या गया है, क्या उनके घर में बेटी मां नहीं हैं? सपा की सोच को उजागर करता एक पोस्टर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है.

इस पोस्टर में मुलायम सिंह यादव के ”लड़के हैं, गलती हो जाती है…” वाले बयान और आजम खान के ‘गैंगरेप प्रकरण राजनीतिक साजिश…’ को नेताओं की तस्वीरों के साथ उद्धृत किया गया है. माना जा रहा है कि आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में सपा को महिलाएं कतई वोट नहीं देने वाली क्योंकि इस सरकार के राज में महिला अस्मिता कतई सुरक्षित नहीं है. लगातार छेड़खानी, गैंगरेप और हत्याओं के प्रकरण से महिलाएं सकते में और गुस्से में हैं. सपा नेताओं का बयान इसमें आग में घी जैसा काम कर रहा है.

कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह पिटी सपा सरकार न तो महिलाओं को सुरक्षा प्रदान कर पा रही है और न ही आम जन को. हर तरफ भ्रष्टाचार और अराजकता का माहौल है. पूरा यूपी लंबे समय से जंगलराज की चपेट में है लेकिन हालिया गैंगरेप की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है. इस पर सपा नेताओं के बेतुके और स्त्री विरोधी बयान से हर कोई स्तब्ध है कि आखिर ये लोग किस मानसिकता के प्राणी हैं और कैसे इन्हें शासन सत्ता का सुख भोगने दिया जा रहा है.

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यूपी में जंगलराज : बुलन्दशहर से जुड़े सवालों के जवाब चाहिए

उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में नेशनल हाइवे पर गैंगरेप का बेहद ही शर्मनाक मामला सामने आया है। कार में सवार परिवार को बंधक बनाकर वहशी दरिंदो ने मां और बेटी को हवश का शिकार बनाया है। सामूहिक दुष्कर्म की यह खौफनाक घटना कानून के शासन को कलंकित करने और सभ्य समाज को लज्जित करने वाली हैं। रूह को कंपा देने वाली इस घटना ने एक बार फिर नारी अस्मिता को कुचला है। एक बार फिर नारी की इज्जत को तार-तार किया गया। उस डरावनी एवं खौफनाक रात्रि की कल्पना ही सिहरन पैदा करती है कि परिवार के सदस्यों के सामने किस तरह एक मां-बेटी को अगवा किया और फिर बंधक बनाकर गैंगरेप किया गया।

रोंगटे खड़े करने वाली यह घटना जंगलराज नहीं, बल्कि बर्बर-क्रूर जंगलराज जैसे अमानवीय हालात को बयान करती है। ऐसी घटनाओं से कानून और व्यवस्था पर भरोसा डिगने के साथ ही शासन-प्रशासन की नाकामी भी सामने आयी है। उत्तरप्रदेश सरकार जहां अपने प्रचार में महिला सुरक्षा की बात करती है, नारी को सम्मानित जीवन देने के बड़े-बड़े विज्ञापन करती है, वहीं यह घटना उनकी पोल खोल रही है। इस सरकार में न तो अपराधी डरते हैं, न ही पुलिस उन पर कोई कार्रवाई कर पाती है।

सामूहिक दुष्कर्म की वह काली रात एक ऐसा वीभत्स एवं डरावना पृष्ठ है जिसमें मां-बेटी कितनी चीखी-चिल्लाई होगी, कितनी बार उसने दरिन्दों से रहम की भीख मांगी होगी, कितना उसने दरिन्दों से मुकाबला किया होगा, सोच कर ही कंपकंपी होती है और इस पूरे घटनाक्रम पर पूरा देश सदमें में है। गैंग रेप की इस घटना के बाद का हर पल देश के सवा अरब जनमानस को व्यथा और शर्मिंदगी के सागर में डुबो रहा।

हमने निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड को देखा और समूचे राष्ट्र ने उस समय जो जागरूकता दिखाई, जो संवेदनाएं व्यक्त की, जिस तरह घरों से बाहर आकर ऐसे जुल्म के खिलाफ सामूहिकता का जो प्रदर्शन किया, उसी का परिणाम था कि दिल्ली की फास्ट टैªक अदालत ने चारों आरोपियों को फांसी की सजा सुनायी। अदालत का वह फैसला केवल फैसला नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी परिभाषा समेटे हुए था अपने भीतर। जिससे एक रोशनी आती है कि अब नारी की इस तरह सरेआम अस्मत से खिलवाड़ करने वालों को हजार बार सोचना होगा। सचमुच इस अदालती फैसले ने एक नया सूरज उदित किया था। पुरुष की पशुता पर नियंत्रण की दृष्टि से एक सफल उपक्रम हुआ था। लेकिन बुलन्दशहर की इस घटना एक बार फिर पूरी मानवता को झकझोर दिया है।

चाहे भंवरीदेवी हो, या प्रिदर्शिनी मट्टू या फिर नैना साहनी- या निर्भया -आज का मनुष्य अपनी सुविधानुसार नारी को भोग्या बनाये हुए है। यह मनुष्यता का घोर अपमान है। पुरुष की वासना कीमती, नारी सस्ती- कैसी विडम्बना! मनुष्य सस्ता, मनुष्यता सस्ती- कैसी त्रासदी!! और मनुष्य अपमानित नहीं महसूस कर रहा है। जीवन मूल्यहीन और दिशाहीन हो रहा है । हमारी सोच जड़ हो रही है।  वासना और कामुकता के चक्रव्यूह में जीवन मानो कैद हो गया है। चारों ओर घोर अंधेरा- सुबह का निकला शाम को घर पहुंचेगा या नहीं-आश्वस्त नहीं है मनुष्य। अगर पत्नी पीहर गई है, तो अपनी जवान लड़की को पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर आप दफ्तर नहीं जा सकते। जवान लड़कियों का दिन हो या रात्रि में बाहर निकलना असुरक्षित होता जा रहा है। क्या यह काफी नहीं है हमें झकझोरने के लिए? पर कौन छुएगा इन जीवन मूल्यों को? कौन मंथन करेगा इस विष और विषमता को निकालने के लिए।

निर्भया ने इस वहशीपन पर जागरूकता का वातावरण निर्मित किया। उस समय जिन-जिन ने संघर्ष किया, उन को नमन। क्योंकि वह लाखों-लाखों युवाओं के बलिदान और संघर्ष का ही परिणाम था कि सरकार भी झूकी, कानून भी सक्रिय हुआ और मीडिया भी एक नये तेवर में दिखाई दिया। लेकिन क्या बुलन्दशहर में मां-बेटी को नौंचे जाने की घटना भी ऐसी ही किसी क्रांति का सबब बनेगी?

निर्भया के बाद कानून बना, लेकिन ताजा घटना ने यह जाहिर किया है कि असल में सख्त कानून अपराध के खात्मे का परिचायक नहीं होते हैं। फिर हम क्यों इन कानूनों के बन जाने का आदर्श स्थिति मानकर चल रहे हैं कि अब अपराध और अपराधियों की खैर नहीं। हत्या जैसे अपराध ऐसे हैं जिनके लिए सुपरिभाषित और सुस्पष्ट सख्त कानून हमारे विधान में मौजूद हैं, लेकिन क्या हत्या जैसे वे तमाम अपराध खत्म हो गए हैं। अगर नहीं तो क्या इस बात की पड़ताल जरूरी नहीं है? सख्त कानून किसी भी अपराध को कम तो कर सकते हैं लेकिन खत्म नहीं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में कानून केवल एक पहलू है। इसे अमल में लाने वाले अभियोजन-पुलिस तंत्र और सामाजिक ताने-बाने की स्थिति भी अपराधों के समूल खात्में में प्रभावी भूमिका निभाते हैं।

बुलन्दशहर की घटना ने अनेक सवाल खड़े किये हैं। उत्तर प्रदेश सरकार को सवाल का जवाब देना ही होगा कि ऐसा बर्बर आपराधिक गिरोह राष्ट्रीय राजमार्ग पर क्यों सक्रिय था? पुलिस के मुताबिक यह किसी घुमंतू गिरोह द्वारा अंजाम दी गई वारदात है। यदि ऐसा है घुमंतू गिरोह पुलिस और कानून व्यवस्था के होते हुए क्यों पनपा? आज के युग में ऐसे घुमंतू गिरोहों का तो कोई अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए जो भेड़ियों के झुंड में तब्दील हो गए हों। सवाल यह है कि ऐसे किसी गिरोह पर पहले ही लगाम क्यों नहीं कसी जा सकी? वे इतने दुस्साहसी कैसे हो गए कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर इस तरह की वहशी वारदात को अंजाम दे सकें? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस घटना पर गंभीरता प्रदर्शित करते हुए त्वरित कार्रवाई की। यदि मीडिया इस घटना को प्रकाश में नहीं लाती तो शायद यह उसी काली अंधेरी रात में ही लुप्त हो गयी होती।

बुलंदशहर की घटना को लेकर विरोधी राजनीतिक दलों के तीखे तेवर स्वाभाविक है, लेकिन ऐसी घटनाएं भविष्य में कहीं पर भी न हों, इसके लिए सभी दलों को कानून एवं व्यवस्था दुरुस्त करने के मामले में दलगत हितों से ऊपर उठकर विचार करने की जरूरत है। विचार ही नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई होनी चाहिए जो एक खौफ पैदा करे और लोगों को यौन क्रूरता करने से पहले उनकी मानसिकता बदलने के लिए एक सिहरन जरूर पैदा करे। ऐसी कठोर कार्रवाई की अपेक्षा है जो समाज की मानसिकता बदलने में सहायक सिद्ध हो।

उत्तर प्रदेश के बारे में अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि यहां कानून व्यवस्था डांवाडोल है। अपराधों को पनपाने में सत्ता और राजनीति का खुला प्रोत्साहन मिलता है। यही कारण है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, गैंगरेप के मामले में उत्तर प्रदेश देश में अव्वल है। यहां 2014 में सबसे ज्यादा 762 गैंगरेप हुए थे। इतना सब होने पर भी इस प्रदेश में नारी सुरक्षा एवं आम-जनजीवन के मसले कभी गंभीर शक्ल नहीं ले पाये हैं। जरूरत है समस्याओं से लड़ने के लिए सोची-समझी रणनीति, सधा हुआ होमवर्क और खूब सारा धैर्य, तभी हम कोई बड़ा परिवर्तन कर पाएंगे।

बुलन्दशहर की घटना के मामले में हमने भावुकता नहीं, संवेदनशीलता दिखानी होगी, तभी आजीवन शोषण, दमन और अपमान की शिकार रही भारतीय नारी को एक उजली जगह मिलेगी। नारी अनादि काल से अत्यंत विवशता और निरीहता से देख रही है वह यह अपमान, यह अनादर। उसके उपेक्षित एक पक्ष से हमारी इस चुप्पी का टूटना जरूरी है और ऐसा होना निश्चित ही एक सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बनेगा। जरूरत इस बात की भी है कि देश और समाज में उसका जो स्थान है, वह पूरी गरिमा के साथ सुरक्षित रहे और वह खण्ड-खण्ड होकर बार-बार न बिखरे।

ललित गर्ग की रिपोर्ट. संपर्क : 9811051133

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यूपी में जंगलराज : अखिलेश यादव के राज में अपराधियों का मनोबल चरम पर

यूपी के बुलंदशहर में दिल्ली-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बंधक बनाकर मां-बेटी से गैंगरेप और लूटपाट कोई पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी एक-दो नहीं हजार से भी अधिक ऐसे मामले है, जिसमें गैंगरेप, लूट, हत्या, डकैती, बच्चियों संग बलातकार जैसी वारदाते हुई है। इन घटनाओं में संलिप्त अपराधियों को धर दबोचने के बजाय सपाई गुंडों संग मिलकर पैसा बनाने में जुटे पुलिसकर्मी कार्रवाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ खानापूर्ति ही की है। चार-छह घटनाओं को छोड़ दें तो हरेक घटनाओं में निर्दोषों की गिरफ्तारी दिखाकर पुलिस न सिर्फ वाहवाही लूटी बल्कि अवैध वसूली का कुछ हिस्सा सत्ताई कुनबे को पहुंचाकर न मलाईदार थानों में तैनाती के साथ तरक्की का तगमा भी हासिल कर ली या करने वाले है।

खास यह है कि अखिलेश के निर्देश पर अवैध वसूली में दिन-रात जुटे पुलिसकर्मी दिखावा के तौर पर ऐसे लोगों पर अपना कहर ढहा रहे है जिन्हें कुछ साल पहले यही भ्रष्ट पुलिसकर्मी उनका नाम अपराधियों की सूची में शामिल कर रखे है। कई ऐसे संभ्रांतों पर भी कार्रवाई की गयी है जिनका अपराध से कोई वास्ता ही नहीं है। जबकि सरकार के मंत्री, विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने अपने-अपने इलाके में पुलिस संग निर्दोषों पर तांडव कर रहे है और असल अपराधी अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। क्योंकि अखिलेश यादव पुलिस को तो अल्टीमेटम दे रहे है लेकिन सपाई गुंडों एवं माफिया विधायकों के संरक्षण  में पल-बढ़ रहे अपराधियों को कब अल्टीमेटम देंगे? शायद दे भी नहीं पायेंगे, क्योंकि अब तक यूपी में जितने भी महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति हुई है वह जाति-धर्म तथा वोट के सियासत पर हुई है। और जब विसात ही गलत हाथों में है तो भ्रष्टाचार से लेकर गुंडागर्दी तो होगी ही।

सच तो यह है कि इन सपाई गुंडों पर दंगा कराने से लेकर लूट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे संगीन मामले तो है ही बलात्कार की भी दर्जनों वारदातें दर्ज हैं। मतलब साफ है इस सरकार में न तो आदमी सुरक्षित है ना ही किसी की जान। कभी इनके काले कारनामों को उजागर करने वाले पत्रकारों पर कहीं फर्जी मुकदमें दर्जकर घर-गृहस्थी लूटवा रहे है तो कहीं जिंदा जलाकर मार डाल रहे है तो कभी रंगदारी न देने पर व्यापारी की गोली मारकर हत्या व लूट कर ली जाती है। भ्रष्ट मंत्रियों के काले कारनामे बढ़ते जा रहे हैं और टैकस के रूप में जुटाई गयी जनता की गाढ़ी कमाई को झूठ रुपी विकास के दावे को करोड़ों-अरबों कुछ समाचार पत्रों में इस्तहार के नाम पर लूटा रही है। कानू-व्यवस्था का यह हाल है कि अब हाइवे भी सुरक्षित नहीं है। सपाई गुंडे, माफियाओं एवं जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में पल-बढ़ रहे हौसलाबुलंद बदमाश चलती कार को रोककर पहले पूरे परिवार को बंधक बनाते है और डेढ़ घंटे तक मां-बेटी संग बलातकार करते है। लेकिन चंद फर्लांग की दूरी पर मौजूद पुलिस चौकी के सिपाहियों को चीख तक नहीं सुनाई दी।

लापरवाही की हद तो तब हो गयी जब हो हल्ला मचने के 24 घंटे बाद चिर निद्रा से जागे अखिलेश यादव ने गृह सचिव को झकझोरा तो डीजीपी मौके पर पहुंचे। आनन-फानन में डीजीपी ने संबंधित क्षेत्रिय अधिकारियों को अल्टीमेटम दे दिया कि दो घंटे में कार्रवाई नहीं हुई तो बर्खास्तगी भी तय यानी फिर किसी निर्दोष की बलि चढ़ना पक्का। क्योंकि पुलिस कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि तत्काल अपराधियों को ढूढ़ ही लेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि बुलंदशहर में जहां वारदात हुई है वहां मौके से पुलिस सोने की चेन तक नहीं उठा सकी। ऐसे में सवाल यही है क्या बगैर सबूतों के अपराधियों को पकड़ेगी अखिलेश की पुलिस? फिरहाल लचर कानून व्यवस्था व फर्जी कार्रवाईयों का ही नतीजा है कि शातिर अपराधियों में पुलिस का खौफ नहीं रह गया है। परिणाम यह है कि रोजाना बलात्कार की 10-15, लूट की 15-20, हत्या की 16-20 घटनाएं सामने आ रही है।

ताज्जुब है कि कानून के रखवाले पुलिस वाले ही आम आदमियों के भक्षक बन गए है। कानून का स्थान सपा के माफिया जनप्रतिनिधियों के आगे पूरी तरह से दम तोड़ रही है। अपराधियों व अवांछनीय तत्वों का जैसे राज छा गया है। गोली चलाना मामूली बात हो गयी है। रंजिश में हत्या राजनीति के चलते हत्या हो रही है। ताबड़तोड़ छिनैती, हत्या व लूट की वारदाताओं से व्यापारी दहशत में है और शाम ढलते ही दुकान की शटर गिरा देते है। खासकर महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध। अवैध खनन, जमीनों पर अवैध कब्जे, फर्जी मुकदमों की तो मानों बाढ़ आ सी गयी है। हालात यहां तक बिगड़ चुके है कि लोग अब तो यूपी का नाम ही बदल डाले है कोई इसे दबंगों का प्रदेश बता रहा तो कोई गुंडाराज। यूपी के ये नाम अब हर सख्श की जुबा पर तो है ही पुलिस-अपराधी गठजोड़ का आरोप भी चर्चा-ए-खास है।

बहरहाल, बड़ा सवाल तो यही है कि कल तक मां-बेटी के सम्मान की रक्षा के लिए सड़क पर उतरने की दुहाई देने वाले स़ड़कों से नदारद है। खासकर जिस सरकार में विकास व महिलाओं की सुरक्षा के बूते फिर से सत्ता में आने का दावा कर रहे है उनसे भी यही सवाल है कि क्या अपराध के ‘उत्तम प्रदेश‘ के लिए वोट मांगेंगे अखिलेश? क्या मान लिया जाएं कि यूपी में रहने वाले परिवार की सुरक्षा भगवान भरोसे है? क्योंकि हैवानियत की ऐसी तस्वीर शायद ही कहीं मिले जहां हाइवे पर भी सुरक्षित नहीं है परिवार? यूपी की सियासत व लचर सिस्टम का ही तकाजा है कि हर वारदात के बाद पुलिस लकीर पर लाठी पिटती ही नजर आती है।

जहां तक बुलंदशहर की घटना का सवाल है तो वह बेहद शर्मनाक है। गुंडई की हद यह है कि शनिवार को दिल्ली-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर नोएडा से शाहजहांपुर जा रहे कार सवारों को गुंडों ने रोककर सरेराह ज्वैलरी और कैश लूट लिया। कार सवार मां-बेटी के साथ सड़क किनारे खेत में ले जाकर दंरिदों ने मां के सामने बेटी का बलात्कार और बेटी के सामने मां को हवस का शिकार बनाया। ताज्जुब इस बात का है कि डेढ़ घंटे तक बुलंदशहर की कोतवाली देहात के पास दरिंदे वारदात को अंजाम देते रहे और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। दो घंटे तक परिवारवालों को बंधक बनाकर रखा गया। किसी तरह परिवार ने नोएडा पुलिस को फोन किया तब जाकर बुलंदशहर पुलिस ने पीड़ितों से संपर्क किया।

परिवार का दावा है गहने और कैश मिलाकर डेढ़ लाख रुपये की लूट हुई है। यह सब करने के बाद डकैतों ने परिवार के सभी लोगों के हाथ पैर बांध दिए थे जिससे किसी तरह निकल कर पुलिस को सूचना दी गयी। पहली बार 100 नंबर पर फोन किया लेकिन जवाब नही मिला। बाद में मामला बढ़ता देख कोतवाली इंचार्ज को थाने से हटा दिया गया। हैरानी की बात ये है कि घटनास्थल से पुलिस चौकी कुछ ही दूरी पर थी। इस हृदयविदारक घटना के दो दिन बीतने के बाद भी आरोपी नहीं पकड़ा जाए तो ये गुंडाराज नही तो क्या है। कहा जा सकता है अखिलेश यादव के राज में कानून व्यवस्था चरमरा गई है। अपराधियों का मनोबल अपने चरम पर है। पुलिस के मुताबिक पीड़‍ित परिवार दो बड़े भाई शनिवार रात को मां की तेहरवीं करने घर जा रहे थे। एसेंट कार में दोनों भाई, दोनों पत्नी और बड़े भाई का बेटा और और छोटे भाई की 11 साल की बेटी थी। दर्जनभर बदमाशों ने हथियार के बल पर गाड़ी पर लोहे की भारी वस्तु फेंककर भ्रम फैलाया कि गाड़ी में कोई खराबी आ गई है। जब गाडी रुकी तो गुंडों ने इस वीभत्स वारदात को अंजाम दिया। 

यूपी पुलिस की दरिंदगी की सारी सीमाएं पर हो चुकी है। आइएएस अमृत त्रिपाठी, आईपीएस अशोक शुक्ला, कोतवाल संजयनाथ तिवारी जैसे भ्रष्ट लूटेरा, हत्यारे पुलिसकर्मी सपाई गुंडों के साथ मिलकर जनता को लूट रहे है। कानपुर में पुलिसिया दरिंदगी का आलम यह है कि वहां जब एक रिक्शाचालक ने पुलिस की अवैध वसूली का विरोध किया तो उसके गरीब रिक्शाचालक संग वो अमानवीय व्यवहार किया कि सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। जानकारी के मुताबिक शहर के मूलगंज थाना इलाके में पुलिसकर्मी ई-रिक्शा चालकों से अवैध वसूली कर रहे थे। पुलिसकर्मियों ने गुंडों की तरह हफ्ता बांध रखा है। जिसे इन गरीबों को अपनी मेहनत की कमाई से देना पड़ता है। लेकिन इस पीड़ित रिक्शाचालक ने खुलेआम चल रही पुलिस की गुंडागर्दी का विरोध कर दिया। बस फिर क्या था ‘साहब लोगों‘ का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसके साथ वहीं मार-पिटाई शुरू कर दी। उसको किसी जानवर की तरह बांध कर थाने ले आए और हवालात में बंद कर दिया। लेकिन पूरी घटना का वीडियो किसी ने अपने मोबाइल में कैद कर सोशल मीडिया में वायरल कर दिया। अब इस घटना को लेकर डीजीपी मुख्यालय तक हड़कंप मचा हुआ है। फिलहाल रिक्शा चालक को छोड़ दिया गया है। लेकिन इसके बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं कि आम जनता आखिर क्या करे।

यूपी के पत्रकार सुरेश गांधी का विश्लेषण.

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यूपी में मंत्री ने अफसर को दी मां-बहन की गालियां (सुनें टेप)

यूपी में समाजवार्दी पार्टी की सरकार के मंत्री बेलगाम हैं और पूरा जंगलराज कायम कर रखा है. अखिलेश यादव अपनी इमेज के सहारे इलेक्शन जीतने की तैयारी में लगे हैं लेकिन उनके मंत्री उनकी लुटिया डुबाने के लिए कमर कसे हैं. तभी तो आए दिन मंत्रियों के कारनामों की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती है. ताजा मामला सपा सरकार के एक राज्यमंत्री की दबंगई का है.

खबर है कि एक राज्यमंत्री ने कुशीनगर में जिला पंचायत के ठेके के बंटवारे को लेकर अपर मुख्य अधिकारी (जिला पंचायत) को माँ-बहन की खूब गालियां दी. इस गालीबाजी से संबंधित आडियो सामने आया है. यह आडियो जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी के मोबाइल में रिकार्ड हुआ. इसमें चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री राधेश्याम सिंह जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी उमेश पटेल को भद्दी-भद्दी गाली दे रहे हैं. डर के चलते अपर मुख्य अधिकारी पूरे मामले में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं. आडियो सुनने के लिए नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/z5bCZ0J3gjU

कुशीनगर से शकील अहमद की रिपोर्ट.

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यूपी में जंगलराज : पत्रकार को कालर पकड़ बाहर निकाला और बोला- ‘जहां चाहे शिकायत कर लो, कुछ न होगा’

यूपी में वास्तव में जंगल राज है। इलाहाबाद में एक पत्रकार को गरियाते धकियाते कालर पकड़कर गैस एजेंसी से बाहर कर दिया गया। साथ ही चेतावनी भी दी गई कि जहां चाहो शिकायत कर दो कुछ नहीं होने वाला। भुक्तभोगी पत्रकार ने थाने जाकर घटना की तहरीर दी पर पांच दिन बाद भी मुकदमा दर्ज करने को कौन कहे, पुलिस प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कर सकी है। मामला इलाहाबाद के नवाबगंज थाना क्षेत्र का है। ‘पत्रकारों का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं’ का जोर जोर से गाना गाने वाले ‘क्रांतिकारी पत्रकार’ हों या इलाहाबाद के पत्रकारीय संगठन इस मामले में बगल झांकने और आश्चर्यजनक हद तक चुप्पी साधे हुए हैं।

उज्जवला : ना रोक ना टोक, केवल लूटखसोट

केंद्र सरकार की उज्जवला रसोईगैस कनेक्शन योजना जो गरीब परिवारों के लिए चल रही है। हकीकत में बड़ा गड़बड़ घोटाला है। योजना तो शुरू कर दी गई पर ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि उसका लाभ किसको मिल रहा है। पीएम मोदी से लेकर भाजपा के बड़े नेताओं का जोर, केंद्र सरकार की योजनाओं को आमजन तक पहुंचाने और योजनाओं में होने वाली गड़बड़ियों की तरफ सतर्क निगाह रखने के लिए आएदिन कार्यकर्ताओं को दिया जाता है पर जमीनी स्तर पर ठन-ठन गोपाल है। बड़े नेताओं को चेहरा दिखाने और सेल्फी की गहराती परंपरा वाले कार्यकर्ता, पदाधिकारी को छोड़िए, विधानसभा चुनाव के उन टिकटार्थियों को भी तो इधर देखने की फुर्सत नहीं जो जनसेवा का ठप्पा लगाए, कुर्ता टाइट किए समाजसेवा करने की ‘जंग’ में जुटे हुए हैं।

हकीकत यह है कि उज्जवला गैस योजना में किसी गरीब परिवार के नाम का कनेक्शन किसी और को फर्जी तरीके से देने का ‘खेल’ खुलेआम चल रहा है। इलाहाबाद के सोरांव तहसील के नवाबगंज इलाके में डेढ़ से दो हजार रूपए वसूलने के बाद ही कनेक्शन दिए जा रहे हैं। तकरीबन दो हजार से ज्यादा भुक्तभोगी ग्रामीण इस लूट के गवाह हैं पर कोई सुनने वाला नहीं। ना अच्छे दिन का सपना दिखाने वाली केंद्र सरकार और ना ‘बन रहा है आज संवर रहा है कल’ का राग अलापने वाली प्रदेश सरकार।

कई भुक्तभोगियों की शिकायत पर दारासिंह सरोज नामक पत्रकार ने न्यूज आइटम कलेक्ट के दौरान सच्चाई जानने नवाबगंज स्थित गैस एजेंसी पहुंचा तो वहां दलित जाति के पत्रकार दारासिंह को जातिसूचक गालियां दी गईं। पत्रकार को कालर पकड़ कर धकियाते हुए बाहर कर दिया गया। प्रतापगढ़ के एक पूर्व मंत्री का खुद को भतीजा बताने वाले एजेंसी संचालक के गुर्गों ने चैलेंज किया-जहां शिकायत करनी हो, करके देख लो, पहुंच-जुगाड़ दोनों है, कुछ नहीं होगा। भुक्तभोगी पत्रकार नोएडा में दो तीन चैनलों में कार्य करने वाला इलाहाबाद से प्रकाशित एक मासिक पत्रिका का ब्यूरोचीफ है। भुक्तभोगी पत्रकार ने मदद की गुहार लगाई है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. संपर्क: shivas_pandey@rediffmail.com

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सोशल मीडिया पर वायरल हो गई यूपी के मुख्य सचिव आलोक रंजन की क्रूर कथा

मुख्‍य सचिव आलोक रंजन को हार चाहिए, न मिले तो नकद तीस लाख रुपया दो… चोरी के आरोप में दो महीनों तक अवैध हिरासत में रखा अपने दो घरेलू नौकरों को… इसी सारे मामले से जुड़ी है लखनऊ के एसएसपी के तबादले की इंटरनल स्टोरी….

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : यूपी के मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने अपने घरेलू नौकरों पर जो कहर तोड़ा है, उसने मानवता ही सहम गयी। अपनी बहू के बेशकीमती हार की चोरी पर मुख्‍य सचिव इतना गुस्‍साये कि सारे कानून-कायदों को ही धता बता दिया। वे किसी भी कीमत पर यह चाहते थे कि हार बरामद हो जाए और अगर ऐसा न हो सके तो उस हार की कीमत वसूली पुलिस अफसरों के जिम्‍मे डाली जाए। अब चूंकि लखनऊ के एसएसपी राजेश पाण्‍डेय ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जता दी, तो आखिरकार राजेश पाण्‍डेय को दण्डित कर लखनऊ की बड़े दारोगीगिरी से ही अपमानित कर दिया गया। यह मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासा चर्चित हो चुका है और पूरा प्रकरण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आपको बता दें कि तीन महीने के लिए एक्‍सटेंशन पर मुख्‍य सचिव पद पर जमे आलोक रंजन के घर से विगत 28 फरवरी को एक बेशकीमती हार चोरी हो गया था। यह हार यूपी के एक बड़े उद्योगपति ने आलोक रंजन के बेटे के बहू-उत्‍सव अवसर पर भेंट किया था. लेकिन लाखों की कीमत का ये हार रिसेप्शन की रात चोरी हो गया। हीरों के इस हार के अलावा लाखों रूपए के जेवर और कैश पर भी किसी ने हाथ साफ़ कर दिया था। इस हार को बरामद करने के लिए चीफ सेक्रेटरी आलोक रंजन के दो सरकारी नौकर पुलिस ने हिरासत में लिए। ये नौकर अलोक रंजन के घर पर कई साल से काम रहे थे. सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इन दोनों नौकरों को दो महीने तक थाने में अवैध हिरासत में रखा और यातनाएं दीं. इस के बाद भी जब हार और कैश नहीं मिला तो सोमवार को चीफ सेक्रेटरी के कहने पर लखनऊ के बडे़ दारोगा राजेश पांडेय को ही हटा दिया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि आलोक रंजन चाहते थे कि अगर यह हार नहीं बरामद हो सकता हो तो फिर राजेश पांडेय ही उस हार के बदले पूरी नकदी का जिम्‍मा सभालें।

इंडिया संवाद न्यूज पोर्टल पर अंशुल जैन की एक रिपोर्ट छपी है जिसमें आलोक रंजन के घरेलू नौकर राजेश ने खुलासा किया कि 28-29 फरवरी को हुए रिसेप्शन के 4-5 दिन बाद उसे हार चुराये जाने के शक में पुलिस पकड़कर थाने ले आई। थाने पर उसे और एक अन्य नौकर सुशील रावत को काफी मारा-पीटा गया. यहाँ तक की दोनों को पुलिस ने सीएफएसएल लैब में लाई डिटेक्टर मशीन पर बैठा दिया. क्यूंकि दोनों ने हार चोरी नहीं किया था इसलिए वो चोरी गए हार के बारे में कुछ बता नहीं सके. पत्रकारों को पता न लग सके इसलिए दोनों नौकरों को पुलिस हज़रतगंज थाने से 20 किलोमीटर दूर बक्शी का तालाब थाने ले गई. दोनों नौकरों के खिलाफ पुलिस ने कोई रिपोर्ट तो नहीं लिखी लेकिन दो महीने तक अवैध हिरासत में ज़रूर रखा।

पुलिस सूत्रों का कहना था कि दोनों नौकर बेक़सूर थे लेकिन फिर भी चीफ सेक्रेटरी का हार बरामद करने का दबाव बढ़ता जा रहा था. इस बीच अखिलेश के पुराने मित्र रहे लखनऊ के डिप्टी एसपी अशोक वर्मा ने अखिलेश से मुलाकात की. वर्मा ने बताया कि नौकरों को बहुत ज्यादा यातनाएं देना उचित नहीं होगा क्यूंकि एक नौकर ने आत्महत्या करने तक की कोशिश की है. अखिलेश ने तब चीफ सेक्रेटरी को किनारे कर आदेश दे दिए कि नौकरों को तुरंत छोड़ दिया जाय।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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यूपी में जंगलराज : लाख रुपये न देने पर पुलिस वालों ने पीटकर मार डाला और लाश हवालात में टांग दिया

यूपी की संभल पुलिस का बर्बर चेहरा… युवक की हवालात में मौत… परिजनों ने पुलिस पर लगाया हत्या का आरोप… हवालात के शौचालय में फाँसी पर झूलता मिला युवक का शव… पुलिस अधीक्षक ने थाना प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियो को किया निलंबित… मजिस्ट्रेटी जाँच के दिए आदेश… परिजनों ने काटा हंगामा…. भारी पुलिस बल मौके पर तैनात… कई थानों की पुलिस को बुलाया गया…  

संभल की थाना धनारी पुलिस पर एक युवक की हत्या का आरोप लगा है. 11 अप्रैल को धनारी थाने में एक किशोरी के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था. पीड़ित पक्ष ने चार लोगों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवाया था. चार लोगो में एक राम नरेश यादव भी शामिल था. राम नरेश जनपद अलीगढ़ का रहने वाला था. इसी कड़ी में देर रात धनारी पुलिस ने अलीगढ़ के थाना गंगोइ के ग्राम रतलोइ में दबिश दी. मौके से पुलिस को युवती तो बरामद हुई नहीं पर पुलिस राम नरेश को गिरफ्तार कर लाई.

युवक को थाने पर लाकर पूछताछ की. पुलिस का कहना है जब हमने हवालात में देखा तो युवक दिखाई नहीं दे रहा था. जब हमने अंदर जा कर देखा तो युवक हवालात के शौचालय में फाँसी के फंदे पर लटका हुआ था. दूसरी ओर मृतक राम नरेश के परिजनों का कहना है कि इन्होंने ही राम नरेश की हत्या की है. परिजनों का कहना है कि इन्होंने एक आरोपी को एक लाख रुपये लेकर छोड़ दिया था और हमसे भी एक लाख रुपये की मांग कर रहे थे. एक लाख रुपय नहीं देने पर इन्होंने हमारे भाई की हत्या कर उसको फाँसी का रूप दे दिया.

वहीं शाम होते होते मामले को शांत करने के लिए एसपी सम्भल अतुल सक्सेना ने कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी ब्रजेश यादव समेत सात पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया. साथ ही पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश भी दे दिए हैं. वहीं इस घटना को लेकर एक बार फिर उत्तर प्रदेश का जंगलराज सुर्खियों में है. शव का पंचनाम भर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. नीचे दिए गए वीडियोज में परिजनों और एसपी संभल के बाइट के साथ साथ पूरे मामले को समझने के लिए पर्याप्त विजुअल हैं.

https://youtu.be/cI_zfgIGpl8

https://youtu.be/dwqpqK-qpRc

https://youtu.be/qMg2FLkbv-4

https://youtu.be/JkP6HE-1gp0

https://youtu.be/vpxdjsrHrR0

संभल से मोहम्मद सद्दाम की रिपोर्ट. संपर्क : 9997331892 और 9528571125

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यूपी के जंगलराज से भयमुक्त होने के लिए वरिष्ठ पत्रकार ने अपनाया था यह नायाब तरीका

Shambhunath Shukla : तीव्र शहरीकरण किसी इलाके को हुआ है तो वह शायद एनसीआर का इलाका ही होगा। देखते ही देखते दिल्ली के करीब बसे नोएडा व गाजियाबाद में इस तेजी से बहुमंजिली इमारतें खड़ी हुई हैं कि यह पूरा इलाका कंक्रीट के जंगल में ही बदल गया है। इसमें भी गाजियाबाद जिले का इंद्रा पुरम इलाका तो अव्वल है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब यहां से गुजरने मेें दिन को भी डर लगता था। मैने यहां पर अपना 200 मीटर का एक भूखंड इसलिए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को वापस कर दिया था क्योंकि 1993 में उन्होंने इस भूखंड के लिए 264000 रुपये मांगे थे जो कि मेरे लिए बहुत ज्यादा रकम थी और मैने वह आवंटित भूखंड सरेंडर कर दिया।

साल 2008 में जब मैं नोएडा अमर उजाला के दिल्ली-एनसीआर-हरियाणा संस्करण का कार्यकारी संपादक था तब अक्सर नोएडा के अपने दफ्तर से लौटते हुए देर हो जाया करती और ड्राइवर अपने घर चला जाता तब मुझे अपनी एवियो कार स्वयं ड्राइव करते हुए वसुंधरा आना पड़ता। सीआईएसएफ वाली रोड से मैं कनावनी पुलिया आता और वहां से लेफ्ट टर्न लेकर जनसत्ता अपार्टमेंट। उस समय सीआईएसएफ रोड पर रोज राहजनी अथवा कार लूट हुआ करती थी। मुझे भी कभी-कभी सन्नाटे में डर लगता और एक दिन मैने अपने एक गूजर मित्र से अपनी व्यथा कही। उसने कहा कि सर जी आप चाहो तो रिवाल्वर का लायसेंस ले लो पर क्या फायदा आप चलाओगे हो नहीं उलटे उसकी सुरक्षा करने में जान जा सकती है। आपकी सुरक्षा का उपाय मैं ढूंढ़ता हूं।

एक दिन वह आया अपने साथ मास्टर ब्रह्मपाल नागर की रागिनी का कैसेट लेकर। और मेरी गाड़ी के स्टीरियो में उसे फुल आवाज में बजाया तथा कहा कि सर जी अब आप को कोई खतरा नहीं है। आप दो काम करो एक तो रात को लौटते वक्त कार का एसी मत ऑन करना और दरवाजों की खिड़कियों के सारे शीशे खोलकर रखना। तथा फुल आवाज में यह कैसेट बजाते हुए चले जाना। किसी की हिम्मत नहीं है कि आपकी कार को रोक ले या ओवरटेक कर ले। उसकी उक्ति कारगर रही और मैं बड़े मजे से कभी रात 11 बजे तो कभी 12 बजे आता रहा मगर किसी ने गाड़ी नहीं रोकी। एक रागिनी ने मेरे अंदर आत्मविश्वास भर दिया। जब मैने ब्रह्मपाल को यह बात बताई तो उन्होंने मुझे अपनी रागिनी के कई कैसेट भेंट कर दिए। अब तो उन्हें नहीं सुन पाता मगर मास्टर ब्रह्मपाल नागर की रागिनी एक जमाने में पूरे एनसीआर में धाक तो भरती ही थी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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यूपी के खराब सूचना आयुक्तों के नाम का खुलासा : मुलायम के समधी अरविन्द बिष्ट टॉप पर, जावेद उस्मानी नंबर दो

लखनऊ : येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव और सामाजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा, आरटीआई कार्यकर्ता तनवीर अहमद सिद्दीकी, आरटीआई विधिक सलाहकार और उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ के अधिवक्ता रुवैद कमाल किदवई और आरटीआई एक्सपर्ट आर.एस. यादव ने आज लखनऊ में एक प्रेस वार्ता को संयुक्त रूप से संबोधित करते हुए सबसे खराब सूचना आयुक्त पता लगाने के वास्ते किए जा रहे सर्वे के परिणाम सार्वजनिक किये. सर्वे के आधार पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के समधी सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह बिष्ट को सूबे का सबसे खराब सूचना आयुक्त बताया गया है तो वहीं जन सूचना अधिकारियों द्वारा आरटीआई आवेदनों के निस्तारण में की जा रही हीलाहवाली आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन की सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आयी है.

उर्वशी शर्मा ने बताया कि उत्तराखंड के हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के आगरा, बहराइच, बरेली, बस्ती, देवरिया, इटावा, फर्रुखाबाद, फतेहपुर, गोंडा, जालौन, कानपुर, लखनऊ, मऊ, रायबरेली, सीतापुर, श्रावस्ती, सुल्तानपुर और उन्नाव जिले के लोगों ने भाग लेकर यूपी के सबसे खराब सूचना आयुक्त का और यूपी में आरटीआई एक्ट को प्रभावी रूप से लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा का चुनाव करने के येश्वर्याज के इस अनूठे सर्वे में अपनी राय व्यक्त की. उर्वशी ने बताया कि खराब सूचना आयुक्तों की श्रेणी के सर्वे में व्यक्त कुल मतों में से 17% मत पाकर अरविन्द सिंह बिष्ट पहली पायदान पर रहे. 13.8% मत पाकर मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी दूसरी पायदान पर, 11.6% मत पाकर गजेन्द्र यादव तीसरी पायदान पर, 9.4% मत पाकर हाफिज उस्मान चौथी पायदान पर, 9.1% मत पाकर स्वदेश कुमार पांचवीं पायदान पर,8.4% मत पाकर पारस नाथ गुप्ता छठी पायदान पर,8.1% मत पाकर खदीजतुल कुबरा सातवीं पायदान पर, 7.9% मत पाकर राजकेश्वर सिंह आठवीं पायदान पर और बराबर-बराबर 7.2% मत पाकर दो सूचना आयुक्त सैयद हैदर अब्बास रिज़वी और विजय शंकर शर्मा आख़िरी पायदान पर रहे.

आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन की सबसे बड़ी बाधा का पता लगाने के लिए किये सर्वे में लोगों ने  कुल पड़े मतों में से 28% मत देकर जन सूचना अधिकारियों द्वारा आरटीआई आवेदनों के निस्तारण में की जा रही हीलाहवाली को आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन की सबसे बड़ी बाधा बताया. सर्वे के अनुसार 25.4% मत पाकर सूचना आयोग की खराब कार्यप्रणाली आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन की दूसरी बड़ी बाधा के रूप में सामने आयी. 24.3% मत पाकर आरटीआई रूल्स 2015 तीसरी और 22.2% मत पाकर प्रथम अपीलीय अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन की चौथी बाधा के रूप में सामने आया. उर्वशी ने बताया कि कुछ महीने पूर्व ही जारी हुए आरटीआई रूल्स के प्रति लोगों के भारी विरोध से स्पष्ट है कि निकट भविष्य में ये रूल्स आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन के लिए कितने बड़े बाधक बनने जा रहे हैंl

उर्वशी ने बताया कि सर्वे के इन परिणामों को सूबे के राज्यपाल को भेजकर सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह बिष्ट को आरटीआई एक्ट की धारा 17 में विहित व्यवस्थानुसार हटाने के लिए प्रकरण को उच्चतम न्यायालय को संदर्भित करने की मांग की जा रही है. सामाजिक संगठन येश्वर्याज ने सर्वे के इन परिणामों को सूबे के मुख्यमंत्री को भेजकर आरटीआई एक्ट को प्रभावी रूप से लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आये जन सूचना अधिकारियों के लचर रवैये पर सख्त कदम उठाकर उनको समुचित ट्रेनिंग दिलवाने और आरटीआई का पालन न करने बाले जनसूचना अधिकारियों को विभागीय दंड देने की व्यवस्था करने की मांग उठाने की बात बतायी गयी है.

उर्वशी ने बताया कि आरटीआई एक्ट के लिए सूबे में नोडल विभाग के रूप में कार्य रहे प्रशासनिक सुधार विभाग को यह रिपोर्ट इस आशय से प्रेषित की जा रही है कि वे वर्तमान सूचना आयुक्तों को चेतावनी जारी कर इनको आरटीआई एक्ट और मानवाधिकार संरक्षण की ट्रेनिंग दिलवाने और भविष्य में होनी बाली सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों में योग्य व्यक्तिओं की नियुक्तियां पारदर्शी रूप से की जाएँ तथा आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन के मार्ग की इन बाधाओं को दूर करने के लिए  विभाग एक रणनीति बनाकर तेजी से कार्य करे. बकौल उर्वशी वे स्वयं उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग  जाकर  इस सर्वे की रिपोर्ट को मुख्य सूचना आयुक्त को सौंपकर उनसे इस रिपोर्ट को सभी सूचना आयुक्तों को प्रसारित करने का अनुरोध भी करेंगी ताकि मुख्य सूचना आयुक्त समेत सभी सूचना आयुक्त आत्मावलोकन कर अपने कार्य व्यवहार में अपेक्षित सुधार कर अपने दायित्वों का निर्वहन आरटीआई एक्ट की मंशा के अनुसार कर सकें. उर्वशी ने घोषणा की है कि उनका संगठन 6 महीने बाद इसी प्रकार का सर्वे एक ही दिन यूपी के सभी जिलों में आयोजित करेगा.

क्या आम आरटीआई आवेदक और क्या ख़ास आरटीआई एक्टिविस्ट, सभी यूपी के सूचना आयुक्तों के कार्य और व्यवहार से इस हद तक निराश हैं कि जब राजधानी लखनऊ की सामजिक संस्था येश्वर्याज सेवा संस्थान ने सूबे के सबसे खराब सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए एक सर्वे किया तो यूपी से सटे प्रदेश उत्तराखंड और यूपी के सुदूर जिलों से आये आक्रोशित लोगों ने संस्था द्वारा न मांगे जाने पर भी अपनी पीड़ा और गुस्से को शब्दों का रूप देते हुए सर्वे के फॉर्म पर अपने दिल की भावनाएं बेबाक अंदाज में व्यक्त कर दीं. मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित समाजसेवी डा० संदीप पाण्डेय ने सभी सूचना आयुक्तों के कार्य व्यवहार को गलत बताते हुए सभी सूचना आयुक्तों द्वारा निराश किये जाने और सभी सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर न होकर राजनैतिक कारणों से होने की बात कही तो वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और विश्वविख्यात आरटीआई विशेषज्ञ डा0 नीरज कुमार सभी सूचना आयुक्तों के पास आरटीआई एक्ट का कोई भी ज्ञान न होने की बात कहने से अपने आप को रोक नहीं पाए.

एक राष्ट्रीय सामाजिक संगठन के संस्थापक कमरुल हुदा ने अखिलेश सरकार द्वारा जावेद उस्मानी को पूर्व में मुख्य सचिव के पद से हटाने की बजह कार्य के प्रति लापरवाही बताते हुए ऐसे व्यक्ति से मुख्य सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी बखूबी निभाने की आशा करने को बेमानी बताया और मतदाता जागरण संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा० शेख सिराज बाबा ने एक सूचना आयुक्त पर सवाल उठाते हुए लिखा “(हाफिज) और मोमिन होने के बावजूद कोई मुसलमान भ्रष्टाचार और झूठ का पुलंदा अपनी बातों में बांधे, उससे भ्रष्ट कोई भी आयुक्त हो ही नहीं सकता”. हरिद्वार, उत्तराखंड से आये मनोज कुमार ने मुख्य सूचना आयुक्त से सवाल किया कि अगर वे इमानदार हैं तो सुनवाई की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग क्यों नहीं करवाते. फर्रुखाबाद से आये शिवनारायण श्रीवास्तव ने सूचना आयुक्तों पर लम्बी अवधि की तारीखें देकर अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिवादीगण को बचाने की बात लिखी. लखनऊ के पंकज मिश्र ने सभी सूचना आयुक्तों की कार्यप्रणाली को नियम विरुद्ध और असंतोषजनक बताकर तो वहीं अजय कुमार ने एक सूचना आयुक्त को सबसे भ्रष्ट कहते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं.

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यूपी में जंगलराज : गरीबी, कर्ज और भूख से त्रस्त किसान झिनकू पेड़ से लटक मरा

(उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक कर संबंधित वीडियो देखें)


-रामजी मिश्र ‘मित्र’-

सीतापुर : कैसे कोई गरीब किसान झिनकू पेड़ पर लटक कर मर जाने में ही मुक्ति देख पाता है, इसे जानना हो तो आपको उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में आना पड़ेगा। यहां झिनकू की मौत अफसरों, नेताओं, सिस्टम से ढेर सारे सवालों का जवाब मांग रही है लेकिन सब भ्रष्टाचारी चुप्पी साधे मामले को दबाने में लगे हैं। किसान अन्नदाता होता है। झिनकू भी अन्नदाता था। लेकिन गरीबी, कर्ज और भूख ने उसे ऐसे बेबस किया कि पूरा सिस्टम उसे आत्महत्या की ओर ले जाने लगा।

यूं तो अन्नदाता सबका पेट भरता है लेकिन झिनकू के पेट की फिकर किसी ने नहीं की। जिले के महोली ब्लाक के मूड़ाहूसा का किसान आखिर फांसी पर झूल ही गया और इसके साथ ही उसने तमाम सरकारी वादों को खोखला साबित कर दिया। बुधवार बीस अप्रैल को हुई किसान की मौत पर भले शासन प्रशासन मौन हो लेकिन मीडिया में लगातार खबरें आने से मामला तूल पकड़ता जा रहा है। 

दरअसल झिनकू की मौत यूं ही नहीं हुई। उसकी कहानी बेहद दर्द भरी दास्तान है जिसमें संघर्ष की सारी सीमाएं टूट गईं। आपको बताते चलें कि हर दिन भूख सहना और फसल पकने पर अच्छे दिनों की राह अन्य किसानों की तरह झिनकू के सपने भी ऐसे ही थे। बारह साल पहले उसकी पत्नी आखिरकार कमजोर होकर बीमार हो गई। नतीजन झिनकू ने बहुत सारा कर्जा लेकर पत्नी को बचाने का पूरा प्रयास किया। झिनकू कर्जी भी हुआ और पत्नी भी हाथ से निकल गयी।

झिनकू की एक बिटिया अब शादी लायक हो चुकी थी। आखिर उसने सन 2009 में उसने अपनी बड़ी बेटी नीलम की शादी कर दी। वह पत्नी की बीमारी में लगे धन से हुए कर्जे को अब तक अदा नहीं कर पाया था। बेटी के ब्याह में उस पर तैंतीस हजार का सरकारी कर्ज भी हो गया। दिन रात भूख की फिकर छोड़कर झिनकू को कर्ज की फिकर सताने लगी। पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों पर मौसम का ऐसा कहर बरसा की उनकी पूरी फसल चौपट हो गयी। लोगों ने बताया झिनकू गरीबी के चलते पटवारी को पैसे न दे पाया जिस पर उसके फसल के नुकसान की जानकारी पटवारी ने नहीं बनाई और उसे सरकारी मुवावजा भी नहीं मिल सका। वह कई बार तहसील गया अधिकारियों से गिड़गिड़ाया लेकिन उसकी शिकायत न ही दर्ज की गई और न ही उसे किसी प्रकार की सहायता दी गयी।

झिनकू का एक बेटा महेंद्र शादी के बाद निशक्त हो गया। आखिर लोग उससे कर्जा लेने के लिए उसके बैल खेत में पहुँचकर रोक लेते। उसे गालियां मिलती, धमकियाँ मिलती। घर का खर्चा बहुत अधिक था। वह भूखा रहकर भी कर्ज के बोझ से दबा का दबा रह गया। अब अगर फसल का पैसा वह कर्ज अदायगी में दे भी देता तब भी भूख औरे घर के अन्य खर्चे से उसे मुक्ति मिलती नहीं दिख रही थी। आखिर झिनकू ने फांसी पर झूल कर धरतीपुत्र कहे जाने वाले मुलायम के पुत्र के राज्य में किसानों के साथ हो रहे अत्याचार की बड़ी कहानी को बयान कर डाला।

अधिकारियों ने इस मामले पर मौत के बाद भी झिनकू की कोई मदद नही की। इधर मौत के पाँच दिन बाद भी स्थानीय मीडिया इसे लगातार कवर कर रही है लेकिन अधिकारी मामले के थमने की राह देख रहे हैं। झिनकू के परिवार में एक बेटी बबली (16 वर्ष) और अनुज (12 वर्ष) निशक्त बेटा महेंद्र और उसकी पत्नी है। इन सबकी जिंदगी में हल किसके कंधे पर होगा, सवाल यह भी है। एक मौत ने कई ज़िंदगियों को अंधेरे में ढकेल दिया है। झिनकू के बैल मालिक के रहते सूखा पैरा चबाने को पा जाते थे लेकिन अब उन्हें वह भी नसीब होते नहीं दिख रहा। खूँटे से बंधे बैल पाँच दिन बाद भी मालिक की राह देखते जान पड़ते हैं। वहीं झिनकू के बच्चे और परिवार के लिए गाँव के लोग अब भी सरकारी सहायता के लिए आस लगाए बैठे हैं। 

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https://www.youtube.com/watch?v=rfk0PgMB8AQ

सीतापुर से रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट.

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समाजवादी राज का सच : मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट नवीन सचिवालय भवन में उडाई जा रही है श्रम कानूनों की धज्जियां

निर्माण मजदूरों की जिदंगी लगी है दांव पर निर्माण मजदूर मोर्चा की जांच टीम की रिपोर्ट

लखनऊ :  ‘अरे साहब आप डाक्टर की बात करते है यहां तो हालत यह है कि यदि कोई मजदूर मर जाए तो लाश का भी पता न चले ठेकेदार उसे अपना मजदूर मानने से ही इंकार कर दे‘ यह बातें शटरिंग का काम करने वाले बाराबंकी के एक निर्माण मजदूर ने आज उ0 प्र0 निर्माण मजदूर मोर्चा की जांच टीम से कहीं। जांच टीम उ0 प्र0 के मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट और विधानसभा के ठीक सामने बन रहे नवीन सचिवालय भवन में निर्माण मजदूरों की कार्यस्थितियों की जांच करने के लिए वहां गयी थी। इस टीम में यू0 पी0 वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर, निर्माण मजदूर मोर्चा के जिलाध्यक्ष बाबूराम कुशवाहा, जिला उपाध्यक्ष राम सुदंर निषाद और केश चंद मिश्रा शामिल थे। जांच टीम ने देखा कि उ0 प्र0 निर्माण निगम द्वारा बनवाए जा रहे नवीन सचिवालय में भवन व अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम 1996, उ0 प्र0 भवन एवं सन्निर्माण (नियोजन तथा सेवा शर्त विनियमन) नियम 2009 के प्रावधानों की खुलेआम धज्जियां उडाई जा रही है।

जांच टीम ने देखा इस निर्माणाधीन भवन में मिर्जापुर की अहरौरा धाटी से आए उन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिन पत्थरों को पूर्ववर्ती मायावती की सरकार ने पार्को और स्मारकों में लगवाया था। इन पत्थरों की कटिंग, उन पर नक्काशी करने और उन्हें लगाने का काम राजस्थान के मजदूर कर रहे थे। इन पत्थरों की कटिंग और नक्काशी के काम में भारी धूल उड़ रही थी पर किसी भी मजदूर के पास मास्क नहीं था। पूछने पर राजस्थान के धौलपुर के रहने वाले मजदूरों ने जांच टीम को बताया कि गुड़ और मास्क नहीं दिया जाता। इस धूल के कारण कई मजदूरों के फेफड़े छलनी हो जाते है और उन्हें टीबी जैसी बीमारियां हो जाती है। टाइल्स और पत्थर कटिंग का काम करने वाले मजदूरों के लिए तीरपाल का शेड़ तक नहीं लगवाने के कारण मजदूरों को इस भीषण गर्मी में धूप में काम करना पड़ रहा था। उ0 प्र0 भवन एवं सन्निर्माण नियम 2009 की धारा 148, 149, 150 के अनुसार नियोक्ता की यह जिम्मेदारी है कि वह मजदूरों को सेफ्टी बेल्ट उपलब्ध कराए। उसे इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय मानकों को पूरा करने वाले जाल सही ढंग से लगे हो। इतना ही नहीं सेफ्टी बेल्ट और जाल का सही उपयोग कराने के लिए लगातार निरीक्षण करने का भी नियम है। लेकिन जांच टीम ने पाया कि सबसे ऊपरी मंजिल पर काम कर रहे मजदूरों ने सेफ्टी बेल्ट नहीं लगाया हुआ था और बेहद अव्यवस्थित और फटे हुए जाल लगे हुए थे। जबकि दो माह पूर्व इसी बिल्डिंग में दो मजदूरों की गिरकर मौत हो चुकी है।

एसी की फीटिंग का काम कर रहे रायबरेली के मजदूरों ने जांच टीम को बताया कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती है। यह शिकायत तो शटरिंग से लेकर हर जगह काम करने वाले मजदूरों ने की। इस निर्माणाधीन भवन में मजदूरों से 12 घण्टे काम कराया जा रहा है जिसमें 8 घण्टे काम के 250 रूपए और शेष चार घण्टें काम का सिंगल ओवरटाइम के हिसाब से 125 रूपया ही मिलता है। जबकि उ0 प्र0 में अकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 273 रू0, अद्र्वकुशल मजदूर की 300 रू0 और कुशल मजदूर की 336 रू0 है और उ0 प्र0 भवन एवं सन्निर्माण नियम 2009 की धारा 39 के तहत यदि मजदूर आठ घण्टे से ज्यादा काम करता है तो उसे मिल रही मजदूरी के दुगने की दर से भुगतान करना होगा। बोनस, ईपीएफ, वेतन किताब, रोजगार कार्ड तो किसी भी मजदूर को नहीं मिलता है। यहां तक कि टीम ने पाया कि कई मजदूरों का अभी भी कर्मकार कल्याण बोर्ड में रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है।

उ0 प्र0 भवन एवं सन्निर्माण नियम 2009 की धारा 46 में मजदूरों की जानकारी के लिए इस नियम के तहत प्राप्त कल्याणकारी योजनाओं को हिन्दी में बोर्ड पर लिखकर निर्माणाधीन स्थल पर लगाने की व्यवस्था दी गयी है पर इस निर्माणाधीन भवन में कहीं भी बोर्ड नहीं लगा था। मजदूरों के लिए कानून और नियम के तहत बने कोई भी कल्याणकारी प्रावधान यहां लागू नहीं है। जांच टीम ने पाया कि मजदूरों के लिए साफ पेयजल तक की व्यवस्था नहीं है। मजदूरों ने बताया कि पानी के कुछ पाइप लगे है पर उनमें भी कभी-कभी तीन-तीन दिन तक पानी नहीं आता। वहां बने हुए शौचालय खराब पड़े हुए थे। प्राथमिक स्वास्थ सुविधा की कोई व्यवस्था नहीं थी। जबकि कानून के अनुसार ऐसे निर्माणस्थल पर बकायदा ऐम्बुलेंस और डाक्टरों की व्यवस्था रहनी चाहिए। मजदूरों के स्वास्थ्य के नियमित परीक्षण के बारें में पूछने पर मजदूरों ने बताया कि ऐसा कोई परीक्षण नहीं कराया जाता। कुछ मजदूरों के लिए जो अस्थायी आवास की व्यवस्था की गयी है उनकी हालत बेहद खराब है। श्रम विभाग ने घोषणा की थी कि यहां काम करने वाले मजदूरों को 10 रू0 में खाना उपलब्ध कराया जायेगा इसके बारें में मजदूरों ने बताया कि तीन दिन सस्ता खाना आया था पर अब नहीं आता।

एक तरफ अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर सरकार यह बताने में लगी है कि वह निर्माण मजदूरों के लिए बड़ी योजनाएं चला रही है वहीं उसके नाक के नीचे ठीक विधानसभा के सामने मजदूरों की जिदंगी दांव पर लगाकर काम कराया जा रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर उ0 प्र0 निर्माण मजदूर मोर्चा उ0 प्र0 शासन को पत्रक देकर इस निर्माणाधीन भवन में कार्यरत निर्माण मजदूरों के कानूनी अधिकार को सुनिश्चित करने को कहेगा।

दिनकर कपूर
dinkar kapoor
प्रदेश अध्यक्ष
यू पी वर्कर्स फ्रंट  
dinkarjsm786@rediffmail.com

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जानिए, मोदी का मूड बिगड़ा तो किस तरह चौटाला के बगल वाली बैरक में पहुंच जाएंगे मुलायम!

ये ‘सीबीआई प्रमाड़ित ईमानदार’ क्या होता है नेताजी?

सौदेबाज मुलायम का कुनबा 26 अक्टूबर 2007 से वाण्टेड है, क़ानूनी रूप में सीबीआई की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद 40 दिनों में एफआईआर हो जानी चाहिए थी. चूँकि सीबीआई सत्ता चलाने का टूल बन चुकी है, सो सीबीआई कोर्ट पहुँच गई एफआईआर की परमीशन मांगने। उस वक्त मुलायम के पास 39 सांसदों की ताकत थी। खुली लूट की आजादी में रोड़ा बन रहे वामपंथियों से मनमोहन का गिरोह छुटकारा चाहता था और अपने आकाओं के इशारे पर हरहाल में न्यूक्लियर डील कराने पर आमादा था।

इसी बीच नवम्बर 07 में वामदलों ने सरकार को चेतावनी देकर कहा कि यदि सरकार ने डील की तो समर्थन वापस ले लूंगा। मनमोहन गिरोह के मैनेजरों को मुलायम के डीए केस पर निगाह लग गयी।  यहीं से शुरू हुआ ब्लैकमेलिंग का सिलसिला जो कि 2014 तक जारी रहा। न्यूक्लियर डील हो जाने के बाद मेरे निजी उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ। पैसे के आफर दिए गए, सुरक्षा छीन ली गई, जान से मारने की धमकी दी गई। ये सारे दांव कोर्ट में सीबीआई का केस वापसी का हलफनामा दायर कराने के लिए आजमाए गए। सन 2009 के लोकसभा चुनावों में सपा से गठबन्धन कर चुनाव लड़ने का ख़्वाब देखने वाले मनमोहन गिरोह को उस वक्त हताशा हुई जब कोर्ट में केस वापसी का मैंने विरोध किया।

उसी दौरान सीबीआई की डीआईजी के फर्जी हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट मीडिया में हेडलाइन बनाकर चलाकर कोर्ट को दबाव में लेने का असफ़ल प्रयास किया गया लेकिन कोई दाव काम नहीं आया और 10 फरवरी 20009 को कोर्ट ने फ़ैसला रिजर्व कर लिया। 2009 के चुनावों से पहले सपा ने गठबंधन तोड़ने का एलान कर दिया। 2009 के लोकसभा चुनावो में उप्र में स्थानीय कारणों से कांग्रेस को 21 सीटों पर सफलता मिली। अब मेरे उत्पीड़न की धार तेज हो चुकी थी। संसद में कट मोशन, जेपीसी, राष्ट्रपति चुनाव सहित जब कोई बड़ा सवाल हुआ, फ़ौरन कोर्ट में केस लिस्ट हुआ और सरकार व मुलायम के वकील एक स्वर में मेरे ऊपर पिल पड़ते थे। एक बार तो एटार्नी जनरल वाहनवती से कोर्ट को पूछना पड़ा कि आप मुलायम के वकील हो या केंद्र सरकार के।

2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। मोदी जी प्रधानमंत्री बने। मुलायम की बांछे खिल गई क्योंकि असल में मुलायम की धोती के नीचे खाकी है। 1977 में जनता पार्टी में संघ के साथ काम कर चुके हैं। 1989 और 2003 में भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अब मोदी वंदना जेल जाने से बचने के लिए कर रहे हैं। यदि मुलायम में हिम्मत है तो मोदी के ख़िलाफ़ एक लफ्ज बोलकर दिखाएं। मुलायम को मालूम है कि कोर्ट ने एफआईआर किये जाने के लिए रोक नहीं लगाई है। यदि मोदी का मूड बिगड़ा तो चौटाला के बगल वाली बैरक में पहुंच जाएंगे मुलायम।

मुलायम को यह भी मालूम है कि जब कोर्ट के निर्देश पर जाँच हो रही है तो कोर्ट ही जेल भेजेगी या केस खत्म करेगी। समर्थन की कीमत वसूल चुके मुलायम मीडिया से भी वसूली कर रहे हैं। भारतीय मीडिया तीन बार केस क्लोज कर चुकी है। एकतरफा बयानों के आधार पर केस का क्लोजर रिपोर्ट चलाने वाली मीडिया को भी मालूम है कि इस प्रकरण में 3 पक्षकार हैं। मुलायम का कुनबा, कोर्ट और याचिका कर्ता, लेकिन दो पक्ष फायदे का सौदा नहीं है। मुलायम के पास सत्ता है, देने के लिए बहुत कुछ है, सो जब मन किया क्लोजर कर दिया। वैसे भी मीडिया के बारे में आम राय बन गई है कि यह सत्ता की चेरी है, भाट वंदना में माहिर है, फील्ड में खपने वाले पत्रकार लाचारी और बेचारगी की स्थिति में हैं।

The certified copy of supreme court on mulayam Singh’s DA case 15/09/2015 and this is the the last affidavit filed by cbi in supreme court on 30/03/2009.

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELETE JURISDICTION
WRIT PETITION ( C ) NO. 633 OF 2005
IN THE MATTER OF:
Vishwanath Chaturvedi Petitioner
Versus
Union of India & Ors. Respondents
Affidavit on behalf of Central Bureau of Investigation

I, S.R. Majumdar, aged about 57 years, son of Shri B.B. Majumdar, working as Supdt. Pf Police, Central Bureau of Investigation, Anti-Corruption Unit-IV, 8th Floor, Lok Nayak Bhawan, Khan Market, New Delhi, do hereby state on oath, affirm and declare as under:
1. That I am Supervisory Officer in the enquiry in the present case and I am conversant with and aware of the facts of the case as derived from the records, which I believe to be true, and am competent to depose this Affidavit.

2. It is respectfully submitted that this affidavit is being filed on behalf of Central Bureau of Investigation (CBI) to place on record before this

Hon’ble Court certain vital facts and in order to allay misgiving / erroneous impressions, in certain quarters, and to highlight that CBI has proceeded in this matter with utmost dedication and integrity as warranted and expected in terms of the judgement of this Hon’ble Court in the aforesaid matter.

3. It is respectfully submitted that this Hon’ble Court had issued certain directions to CBI in a Writ Petition (Civil) No. 633/2005 and in particular craves leave to highlight Paras 34, 37 and 42 of the Judgement of this Hon’ble Court reported in (2007) 4 SCC 380. These paras road as follows:
Para 34:
“…………We, therefore, direct the CBI to conduct a preliminary enquiry into the assets of all the respondents and after scrutinizing if a case is made out then to take further action in the matter”.
Para 37:
“The ultimate test, in our view, therefore, is whether the allegations have any substance. An enquiry should not be shut out at the threshold because a political opponent of a person with political difference raises an allegation of commission of offence. Therefore, we mould the prayer in the writ petition and direct the CBI to enquire into alleged acquisition of wealth by respondent Nos. 2-5 and find out as to whether the allegations made by the petitioner in regard to disproportionate assets to the known source of income of respondent Nos. 2-5 is correct or not and submit a report to the Union of India and on receipt of such report, the Union of India may take further steps depending upon the outcome of the preliminary enquiry into the assets of respondent Nos. 2-5”.
Para 42:
“The Registry is directed to send in sealed cover the documents market as ‘A’ to ‘H’ and all the copies of the sale deeds and other statements etc. filed by the parties to the CBI. The CBI may take the
preliminary enquiry, CBI had received documents sent by this Hon’ble Court referred to in Para 42 of the said Judgement.

5. It is respectfully submitted that after careful scrutiny of the documents received from this Hon’ble Court, CBI issued requisitions to Banks where accounts of the respondents no. 2 to 5 were maintained, to Sub Registrar office within whose jurisdiction the immovable properties which were subject matter of the enquiry were situated, the Income Tax Department and also to the Chartered

Accountant of respondents no. 2 to 5 and other concerned authorities.

6. It is respectfully submitted that the required documents as sought for from the Banks, Income Tax Department and the Sub Registrar office and other authorities were obtained. CBI faced non-cooperation in collecting documents from office of the Chartered Accountants of respondents no. 2 to 5.

7. It is respectfully submitted that the immovable properties which were subject matter of the enquiry were sought to be evaluated through the Valuation Cell of Income Tax Department and even through the CBI wanted respondents 2 and 3 to be present either in person or through their authorized representative and had given notice regarding the date and time if the evaluation, none from their side were present on two occasions. Therefore, the evaluation work could not be undertaken. The other issues which were required to be examined have been mentioned in the Status Report.

8. It is respectfully submitted that a Preliminary Enquiry Report was prepared with the available evidence pursuant to the direction of this Hon’ble Court and the enquiry in this regard was concluded on 26th October, 2007 as per the procedure laid down in the CBI Crime Manual, 2005. A Status Report was prepared which can
be placed before this Hon’ble Court for perusal.

9. It is respectfully submitted that thereafter on conclusion of enquiry, an Interlocutory Application being I.A. No. 12 of 2007 was filed in the present matter on 26.10.2007 with the following prayer:-
(a) Pass an order/ direction permitting the applicant (CBI) to proceed further reference in the matter in accordance without any further reference to the Union Government or State Government: and
(b) Pass such other further orders, as this Hon’ble Court may deem fit and proper in the facts and circumstances of the case and in the interests of justice.
10. It is respectfully submitted that the matter came up before this Hon’ble Court on 29.10.2007 and directions were given for issue of notice to all the parties for filling of replied within 4 weeks. No replies were filed. An interlocutory application being I.A. No. 13 of 2008 was filed on 12th March 2008, with the prayer for early hearing of I.A. No. 12 of 2007. The Hon’ble Registrar of Hon’ble Supreme Court granted another four weeks time to all the respondents for filing of counter affidavits. Since no reply was files, the matter came up for hearing on 7.5.2008 and the Hon’ble

Registrar directed that the matter be put up before the Hon’ble Bench.

11. It is respectfully submitted that after a lapse of nearly nine months from the date of conclusion of Preliminary Enquiry, representations were sent on behalf of respondents no. 2 to 5, starting from July 2008 (representation dated 14.7.2008, 18.9.2008 and 29.10.2008) by Smt. Dimple Yadav through Department of Personnel Training (DOP&T) for taking into account additional facts pertaining to clubbing of income of all the four respondents and to accept the determination of value of property, wealth and income as accepted by the competent authorities. The copies of the representations are on the file of CBI and the same can be produced before the Hon’ble Court, if so warranted.

12. It is respectfully submitted that there were divergent views within the CBI as to whether at this stage the representations so received could be looked into. Therefore, the matter was sought to be referred for legal opinion of a high ranking Law Officer of Government of India, through the nodal Ministry i.e., Department of Personal and Training (DOP&T). The matter was sent for the opinion of Law Officer on 7.11.2008. the legal opinion from the LD. Solicitor General of India dated 21.11.2008 was received through the Department of Personal and Training Government of India.

13. It is respectfully submitted that based on the legal opinion received through the Department of Personal and Training, Government of India, CBI files an interlocutory application being I.A. No. 14 of 2008 on 6.12.2008 for withdrawal of I.A. No. 12 of 2007.

14. It is respectfully submitted that CBI stands by its recommendations made in the Status Report of 26.10.2007 as informed to this Hon’ble Court vide IA no. 12/2007.

15. It is respectfully submitted that another representation from respondent Smt. Dimple Yadav was received through Department of Personal and Training on 27.1.2009 subsequent to the hearing which took place before the Hon’ble Court on 6.1.2009. This representation has also been kept on record.

16. It is respectfully submitted that some print media have published false/fabricated news related to this matter on 9.2.2009 just a day prior to the scheduled hearing in this matter before this Hon’ble Court on 10.2.2009. This false/fabricated news was also aired through some of the channels of the electronic media, which continued to be telecast till 13.2.2009. It was also mentioned before this Hon’ble Court that the respondents have copies of some documents of CBI, Specific reference being made to the news-item published in The Times of India dated 9.2.2009 related to this enquiry. It is respectfully submitted in this regards that the news report mentioned above is totally false and fabricated.

Complaints have already been lodged with the Press Council of India and the Secretary, Ministry if Information & Broadcasting, Government of India, New Delhi in this regard. Copies of complaints lodged by CBI with the Press Council of India, the Secretary, Ministry if Information & Broadcasting, Government of India and letter dated 18.2.2009 sent to Department of Personal & Training for permitting filing of a criminal case a Civil Suit against The Times of India, Star News, CNN-IBN for slanderous, incorrect and false news report/telecast are appended herewith as Annexure A, B & C respectively.

17. It is respectfully submitted further that as the matter called for an in-depth investigation to find out as to who are responsible for the publication of false and fabricated reports related to the aforementioned enquiry with a view to malign and tarnish the reputation of the CBI as well as defaming the CBI officials to whom these non-existent reports dates 30.7.2007 and 20.8.2007 and so called 17-page internal review note dated 2.2.2009 were attributed, a Regular Case has been registered by CBI against unknown person u/s 120B r/w 465, 469/500 & 471 of IPC and the substantive offences thereof which is under investigation vide FIR copy enclosed as Annexure – D.

18. It is respectfully submitted that as far as the CBI is concerned, it has acted in utmost good faith in the present matter and is placing these facts only to highlight that CBI has strictly complied with the directions of this Hon’ble Court and still stands by its Status Report dated 26.10.2007.

DEPONENT
VERIFICATION
I, S.R. Majumdar, Supdt. Of Police, ACU-V, 8th Floor, Lok Nayak Bhawan, Khan Market, New Delhi, son of Shri B.B. Majumdar, the above named deponent do hereby verify that the contents of the above affidavit are true and correct to the best of my knowledge based on the official records.

Verified and signed on this _______ day of March, 2009 at New Delhi.

जाने माने वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के एफबी वॉल से.

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यूपी में जंगलराज : तंजील की हत्या बिगड़ी कानून व्यवस्था एक और नमूना

…2007 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसलिये हार का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था, यही समस्या अखिलेश सरकार के साथ है…

अजय कुमार, लखनऊ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के डीएसपी मोहम्मद तंजील अहमद की जिस तरह से एक शादी समारोह से लौटते समय मौत के घाट उतारा गया वह शर्मनाक तो है ही इस तरह की वारदातें कई गंभीर सवाल खड़े करती है। खासकर तब तो और भी आश्चर्य होता है जब ऐसे हादसों के समय सियासतदार चुप्पी साध लेते हैं कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां की जुबान पर ताला लग जाता है। उम्मीद तो यही की जा रही थी शहीद डीएसपी तंजील की मौत के बाद फिजाओं में तुम कितने तंजील मारोगे, घर-धर से तंजील निकलेगा’ का नारा गूंजेगा। यह तंजील को सच्ची श्रद्धांजलि होती, लेकिन नारा लगाना तो दूर चंद लोगों के अलावा तंजील के घर जाकर उनके परिवार के आंसू तक पोछना किसी ने जरूरी नहीं समझा। तंजील की हत्या आतंकवादी साजिश थी या फिर कोई और वजह, इसका खुलासा देर-सबेर हो ही जायेगा। 

मगर वतन पर शहीद होने वालों के प्रति ऐसी बेरूखी न केवल दुखदायी है, बल्कि चिंताजनक भी है। जिस देश में अफजल गुरू और यहां तक की 26/11 के हमले में शामिल  पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब के समर्थन में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है वहां तंजील अहमद की शहादत को सलाम करने के लिये नेताओं और लोगों को समय नहीं मिलता है। शहीद डीएसपी तंजील का तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर शाहीन बाग स्थित उनके घर पहुंचा तो वहां रोना पीटना मच गया। हजारों की संख्या में लोग जमा हो गए। ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि तंजील एनआईए में कार्यरत हैं। उनको जामिया नगर स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। तंजील को दफनाने से पूर्व स्थानीय लोगों ने खूब हंगामा किया। लोगों का कहना था कि केंद्र, यूपी और दिल्ली सरकार से शहीद के घर उनके परिवार को सांत्वना देने कोई नहीं पहुंचा। 

बात तंजील के परिवार की कि जाये तो तंजील की पत्नी फरजाना बटला हाउस स्थित सरकारी स्कूल में टीचर हैं। वहीं, बेटी दसवीं में पढ़ती है, जबकि बेटा सातवीं कक्षा में पढ़ता है। तंजील के बड़े भाई रागिब अजमेरी गेट स्थित एंग्लो अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में टीचर हैं। हत्याकांड के समय रागिब दूसरी गाड़ी में तंजील से कुछ दूरी पर थे। तंजील को दिल्ली सरकार ने एक करोड़ की आर्थिक मदद दी है तो यूपी सरकार ने बीस लाख की।

बहरहाल, तंजील पर  जिस तरह ताबड़तोड़ दो दर्जन गोलियां दागी गईं उससे यह स्पष्ट है कि हत्यारों का मकसद उनकी जान लेना ही था। तंजील अहमद राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआइए से 2009 से जुड़े थे इसलिए इस तरह की आशंकाएं उभरना स्वाभाविक हैं कि कहीं उनकी हत्या के पीछे आतंकी तत्वों का तो हाथ नहीं है? ध्यान रहे कि जिस बिजनौर जिले में उन्हें निशाना बनाया गया वहां कुछ समय पहले हुए बम विस्फोट की जांच एनआइए ही कर रही थी। इस बम विस्फोट के पीछे आतंकियों का ही हाथ था। आतंकवादी भटकल की गिरफ्तारी में तंजील का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। एनआइए का सदस्य होने के नाते तंजील पठानकोट में हुई आतंकी वारदात के अलावा अन्य कई आतंकवादी घटनाओं की जांच से भी जुड़े हुए थे। तंजील अहमद थे तो एनआईए में जरूर लेकिन मूलरूप से वह सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अधिकारी थे। 1991 में तंजील की बीएसएफ में सब इंस्पेक्टर के रूप में भर्ती हुई थी। तेजतर्रार तंजील की कार्यक्षमता को देखकर उन्हें एनआइए में लाया गया था और वह इस एजेंसी के गठन के समय से ही उससे जुड़े हुए थे। तंजील की उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ थी। वह सर्विलांस में भी माहिर थे। आतंकवादियों के कोडवर्ड आसानी से टेªस कर लेते थे। आतंकवादियों के बीच होने वाली बातचीत को समझने में उन्हें महारथ हासिल थी।

तंजील की हत्या एक दुस्साहसिक घटना तो थी ही इससे अलावा इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है यह उत्तर प्रदेश में बिगड़ी कानून का एक और नमूना थी।  इस संदर्भ में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए जो कहा कि इस राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता है। राज्यपाल राम नाईक भी कई बार प्रदेश की कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिंह लगा चुके हैं। यहां तक की कानून व्यवस्था को लेकर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं है। 2007 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसी लिये हार का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था। यही समस्या अखिलेश सरकार के साथ है।

उत्तर प्रदेश सरकार चाहे जैसे दावे क्यों न करे, रह-रहकर ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं जो यही बताती हैं कि राज्य सरकार कानून एवं व्यवस्था के समक्ष उपजी चुनौतियों का सही तरह से सामना नहीं कर पा रही है। इस मामले में उसके पास अपने बचाव का यही तर्क होता है कि उत्तर प्रदेश एक बड़ा राज्य है और कानून एवं व्यवस्था संबंधी आंकड़े अन्य राज्यों से बेहतर हैं।  आंकड़ों की अपनी एक महत्ता होती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उत्तर प्रदेश सरकार रह-रहकर इस आरोप से दो चार होती है कि वह उन तत्वों पर लगाम नहीं लगा पा रही है जो कानून एवं व्यवस्था के लिए खतरा बने हुए हैं। उधर, उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा है कि पठानकोट आतंकी हमले की जांच में शामिल एनआईए अफसर तंजील अहमद की हत्या देश के खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली में खामी का नतीजा है। उन्होंने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। प्रकाश सिंह हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई उपद्रव और हिंसा की घटनाओं की जांच करने वाली कमेटी के अध्यक्ष हैं। पूर्व डीजीपी प्रकाश कहते हें अगर हत्या किसी निजी वजह से की गई है तो जांच में इसका खुलासा हो जाएगा,  लेकिन देश के बड़े-बड़े मामलों की जांच से जुड़े अधिकारी को अगर आईएसआई के इशारे पर मारा गया है, तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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यूपी में हेल्पलाइन नहीं, हेल्पलाइफ चाहिए, माफिया को असहमति के स्वर अब बर्दाश्त नहीं

सच बोलता पत्रकार असहिष्णुता का सबसे बड़ा शिकार

वाराणसी। देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता को लेकर खूब घमासान मचा। इस मुद्दे को लेकर फिल्मी हस्तियों सहित धर्माचार्यों ने भी खूब सुर्खियां बटोरी। स्थिति यह हुई कि संसद में भी जमकर हंगामा हुआ। अभिनेता आमिर खान ने तो यहां तक कह डाला कि उनकी पत्नी को देश में डर लगता है। उनके बयान के बाद मानो भूचाल आ गया। हर खास-ओ-आम खुद को असहिष्णुता का शिकार बताने लगा। कुछ समय के लिए लगा पूरा देश ही  असहिष्णुता की आग में झुलस गया हो। लेकिन समय के साथ यह शब्द धीरे-धीरे ठंडा होने लगा। सच कहे तो इस देश में असहिष्णुता का सबसे बड़ा शिकार वह पत्रकार है जो बेबाक बोलता है, सही-गलत को अपने विवेक की तराजू में तौलता है।

यह सिलसिला आज का नहीं है, जब भी पत्रकार ने सच बोला तो उसका परिणाम भुगतना पड़ा और कलम पर तरह-तरह के दबावों के रूप में असहिष्णुता को सहना पड़ा। असहमत लोगों की ओर से खड़े किए गए प्रतिरोध, सार्वजनिक अपमान से लेकर मौत के घाट उतार दिए जाने तक कुछ भी हो सकते है। अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर सुल्तानपुर के पत्रकार तरूण मिश्रा की शहादत इस असहनशीलता का उदाहरण है। भ्रष्टाचार के कोख से उपजे यह असहिष्णुता हर रोज ही पत्रकार को झेलनी पड़ती है। कभी धमकी के रूप में तो कभी प्रलोभन के रूप में। अब दोनों से बात नहीं बनती तो गोली के रूप में। बावजूद इसके सियासतदां भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार की हर घटना के बाद बड़ी बेशर्मी से इसे जब न तब ‘मीडिया का खेल’ करार देते है। कथित चौथे स्तम्भ के हत्या की संख्या में हो रहे इजाफे सरकार सहित नौकरशाहों को कठघरे में खड़ा करता है।

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सपा सरकार ने पत्रकारों को झुनझुना देना शुरू कर दिया है। ताकि पिछले चार सालों में पत्रकारों पर हुए जुल्म पर मरहम लगाकर उसे दबाया जा सके। हाल ही में अखिलेश सरकार ने पत्रकारों को एक लालीपाप दिया हेल्पलाइन का। अब यक्ष प्रश्न यह कि हेल्पलाइन पर शिकायत के बाद मामले की जांच कौन करेगा। सेल्फी लेने पर एक नाबालिग को सीखचों तक पहुंचाने के बाद सुर्खियों में आई बुलंदशहर की डीएम बी. चंद्रकला ने एक पत्रकार से मात्र इस बात पर बदतमीजी की कि वह डीएम महोदया का भी पक्ष जानना चाहता था। यह तो तय है कि पत्रकार का हर प्रश्न सामने वाले के मनमुताबिक नहीं हो सकता। जब जिले के जिम्मेदार जिलाधिकारी ही बदमिजाज हो तो पत्रकार आखिर अपनी शिकायत किससे करें।

पीएम का संसदीय क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। जहां की सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य होनी चाहिए वहां खुलेआम सत्ताधारी पक्ष के छुटभैय्या नेता और अस्पताल संचालक गुण्डागर्दी पर अमादा है। समाचार संकलन करने गये एक पत्रकार को सिगरा क्षेत्र में लाठी-डंडो से लैस सत्ताधारी पक्ष के मनबढ़ों ने पीटायी की, तो दुसरी ओर मंडुवाडीह चौराहे पर स्थित अंगार नर्सिंग होम में एक खबर की पुष्टि करने गये पत्रकार के साथ डा. डी.एस. सिंह ने बदसलुखी की और अस्पतालकर्मियों ने जान से मार डालने की धमकी तक दे डाली। दोनों मामले ऐसे थे जिसमें पत्रकार सिर्फ अपनी ड्यूटी बजा रहा था, फिर भी इस असहिषुण लोगों ने इसे अपने अहं पर चोट की तरह लिया और सियासी सामंतशाही से ग्रसित होकर जुबान की बजाए इसका उत्तर हमले के रूप में दिया। दोनों मामले में पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में रही। वैसे भी सियासत में इन दिनों जो संस्कृति प्रचलन में है उसमें खादी की दबंगई खाकी की हनक पर भारी पड़ रही है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छा संकेत नहीं है।

बनारस से अवनिन्द्र कुमार सिंह की कलम से.

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यूपी में जंगलराज : अमेठी में यौन उत्पीड़न की शिकार महिला के परिजनों को मिल रही धमकियां

लखनऊ : कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी स्थित मुंशीगंज थाने में 30 जनवरी को यौन हमले की कोशिश का एक मुकदमा धारा 354, 7, 8 के तहत दर्ज कराया गया है। पीड़ित पक्ष शाहगढ़ ब्लॉक स्थित एक गाँव का है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है, उनके नाम हैं नीरज व हरीश, मौजी का पुरवा और मुंशीगंज स्थित कटरा निवासी मनीश। बिल्कुल शरू में ही आरोपियों से संबंध रखने वाले दबंगों ने पूरी कोशिश की कि मामला थाने में ही दर्ज न होने पाये और इसके लिए थानेदार को बाकायदा विश्वास में लिया गया। इसी कड़ी में पीड़िता के घर जाकर दंबंगों ने शपथ-पत्र व दूसरे कागजात पर हस्ताक्षर करवाए और परिजनों को अपमानित किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पुरानी रंजिश के चलते बदले की भावना से यह शर्मनाक कृत्य करवाया गया। अंततः जब थाने में मुकदमा कायम हो गया तो बौखलाए हुए अभियुक्तों ने पीड़िता के पिता को धमकाया कि उल्टे तुम्हें ही किसी मुकदमे में फँसाकर जेल भिजवा देंगे, थाने में कुटाई होगी सो अलग। पीड़ित पक्ष ने अपनी भाषा और अपने तरीके से यह बात स्पष्ट कर दी है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन और स्थानीय मीडिया को मैनेज कर लिया गया है।

बहरहाल, पीड़िता का परिवार बेदह सदमे में है और एकदम से डरा हुआ है। दबंगों ने किसी जानकार वकील से शपथपत्र व दूसरे कागजात तैयार करवा कर पीड़िता और उसके घर वालों से हस्ताक्षर करवा लिये हैं, ताकि मामले को अदालत में पहली ही पेशी पर खारिज करवाया जा सके। पीड़िता के पिता ने यह भी आशंका जाहिर की है कि अब बयान बदलवा लेने के बाद अदालत में खुद उसके ही खिलाफ कार्यवाही करवाई जा सकती है कि झूठा मुकदमा क्यों कायम करवाया?

इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि कुछ छुटभैया नेताओं ने दबाव बनाने की योजना के तहत मुकदमे की नकल थाने से प्राप्त कर ली, ताकि यह ‘समझाया’ जा सके कि देखो भइया लड़की का मामला है, आगे चलकर काफी बदनामी होगी। इस बात का पता नहीं चल पाया है कि जिस शपथपत्र और दूसरे कागजात पर पीड़ित पक्ष से जबरिया हस्ताक्षर करवाये गये हैं, क्या वे पुलिस के भी पास हैं या नहीं। संवेदनशील-सरोकारी लोगों के समर्थन-सहयोग से क्या पीड़ित पक्ष को यकीन दिलाया जा सकता है कि चुप्पी तोड़ो और अपने खिलाफ अन्याय का डटकर प्रतिकार करो, हम तुम्हारे साथ हैं, इस सवाल का उत्तर मिलना अभी बाकी है।

कामता प्रसाद की रिपोर्ट.

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यूपी में पत्रकारों के लिए हेल्पलाइन अखिलेश सरकार का एक बड़ा छलावा

सुप्रभात यशवंत जी

आपसे टेलीफ़ोन पर हुई वार्ता के सन्दर्भ में पूरी बात लिखकर यहां बताना चाहूंगा आपको कि उत्तर प्रदेश द्वारा शुरू की गयी हेल्पलाइन यदि केवल राजपत्रित (accredit) पत्रकारों के लिए है तो इसका कोई मतलब नहीं है। जागरण, अमर उजाला जैसे बड़े संस्थानों में भी 5% से कम ही राजपत्रित पत्रकार है। बाकी 95% पत्रकार और गैर पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों का क्या मीडिया में कोई योगदान नहीं है? राजपत्रित पत्रकारों पर तो मीडिया मालिक और प्रशासन वैसे ही मेहरबान रहता है, उन्हें तो सामान्यता शिकायत की नौबत आती ही नहीं है।

आज मैंने अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिये फ़ोन किया, तो बताया गया कि केवल राजपत्रित पत्रकार ही अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। उसमें में भी उन्होंने कुछ सीमित विषय बताये जैसे पैसे का लेन-देन वगैरह। मैंने उन्हें बताया कि मेरा मामला पैसे, शोषण और मजीठिया victimization का है जो आपकी बताई category के अंतर्गत आता है। इस पर उन्होंने कहा ऐसी 350 शिकायतें पहले ही दर्ज हैं। जब उन पर कोई कार्यवाही होगी तो आपका समाधान भी अपने आप हो जाएगा। उन्हें मेरी शिकायत दर्ज नहीं करनी थी, अंतोगत्वा दर्ज नहीं ही की। इससे लगता है कि यूपी में पत्रकारों के लिए अखिलेश सरकार द्वारा शुरू की गई हेल्पलाइन मात्र छलावा है।

सुशील राणा
पत्रकार


यूपी सरकार द्वारा पत्रकारों के लिए शुरू की गई हेल्पलाइन को लेकर अगर आपके पास भी कोई पाजिटिव या निगेटिव फीडबैक है तो कृपया भड़ास से शेयर करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

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पत्रकार जगेंद्र केस में आरोपी पुलिसकर्मी बरेली क्राइम ब्रांच पर कोर्ट में बयान का बना रहे हैं दबाव

बरेली : शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह मर्डर केस में आरोपी पुलिसकर्मी बरेली क्राइम ब्रांच पर जबरन दो गवाहों के कोर्ट में बयान कराने का दबाव बना रहे हैं। इन गवाहों के बयान के जरिए वह खुद को केस से बचाना चाहते हैं, लेकिन बरेली के पुलिस अधिकारियों ने आईओ को बिना किसी दवाब के सही जांच करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।

1 जून 2015 को जगेंद्र सिंह पर पुलिस टीम ने दबिश के दौरान पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी थी। जगेंद्र की 8 जून को मौत हो गई थी। मौत से पहले जगेंद्र ने मंत्री व कोतवाली एसएचओ व उनकी टीम पर जलाकर मारने का आरोप लगाया था। इस मामले में जमकर राजनीति हुई थी। इस मामले में एक मुकदमा जगेंद्र के बेटे की तहरीर पर दर्ज किया गया था और दूसरा मुकदमा एसएचओ कोतवाली की ओर से जगेंद्र सिंह पर दर्ज किया गया था।

दोनों मामलों की जांच बरेली क्राइम ब्रांच को सौंपी गई थी। जगेंद्र के बेटे की ओर से दर्ज एफआईआर में पुलिस चार्जशीट लगा चुकी है लेकिन एसएचओ की ओर से दर्ज मामले की जांच चल रही है। एसएचओ की एफआईआर में कोई भी गवाह नहीं था लेकिन बाद में दो गवाहों को पेश कर दिया गया था। इन्हीं दो गवाहों के बयान कोर्ट में कराने का दबाव बनाया जा रहा है।

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वीमन हेल्पलाइन के बड़े दरोगा नवनीत सिकेरा को पत्रकार कुमार सौवीर ने दिखाया आइना

Kumar Sauvir : 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसो अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पा किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।

सिकेरा प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं:- “गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो तो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है।”

सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और, फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ कि उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा.  अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए। ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है। है कि नहीं बड़े दारोगा जी?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट>

यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

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यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

बधाई हो सरकार में बैठे समाजवादियों और तुम्हारे कारकूनों! तुम्हारे अटूट प्रयास आज फलीभूत हुए और नतीजा यह हुआ कि बीती रात एक मेडिकल छात्रा ने राजधानी के गुडम्बा कालोनी में अपने कमरे में पंखे से लटक  कर खुद को मौत हवाले कर दिया। बधाई हो। ताज़ा खबर है कि लखनऊ के एक डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली। पिछले कई महीने से मोहल्ले से लेकर कॉलेज आसपास शोहदों ने उसका जीना हराम कर रखा था। मानसिक तनाव इतना बढ़ने लगा कि उसे खुद की जिंदगी ही अभिशाप लगाने लगी। उसे लगा कि उसका स्त्री-देह ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। बस फिर क्या था। इस बच्ची ने उस कलंक-अभिशाप को ही हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।

यह बच्ची अवध क्षेत्र के बलरामपुर जिले की थी। उसके पिता वहां दवा की दूकान चलाते हैं। यह बच्ची होनहार थी, सो आगे की पढाई के लिए लखनऊ अपने चाचा के परिवार के साथ रहने लगी। जल्दी ही उसकी मेहनत रंग लायी और उसे डेंटल कालेज में प्रवेश मिल गया। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता है कि महिला-शक्ति को सशक्तिकृत करने के दावे तो यूपी सरकार ने तो खूब किये। शुरुआत हुई महिला अपराधों पर कडा अंकुश लगाने के संकल्प से। योजना की संकल्पना तैयार की थी 2 साल पहले सुल्तानपुर की एक महिला युवा आईपीएस अधिकारी अलंकृता ने, जो उस वक्त वहां पुलिस कप्तान थी।

लेकिन शासन और पुलिस के बड़े हाकिमों ने उस संकल्पना को उस महिला से छीन लिया और लखनऊ के एसएसपी पद से हटाये गए नवनीत सिकेरा को उसका मुखिया बना डाला। जबकि होना तो यह था कि जिस अफसर ने उस योजना की रूप-रेखा बुनी थी, उसे ही उसका जिम्‍मा दिया जाता। इसलिए खास तौर पर भी, कि महिला होने के चलते वह महिलाओं की इस हेल्‍पलाइन को बेहतर ढंग से समझ और क्रियान्वित कर सकती थी। लेकिन उस योजना को नयी रंगरोगन से लीपपोत कर उसे 1090 का नाम गया। सिकेरा को मुखिया इस लिए बनाया गया क्योंकि अखिलेश यादव परिवार से सिकेरा की बेहद करीबी है। कुछ भी हो, 1090 ने और कोई काम भले किया हो या नहीं, लेकिन इसको लेकर फर्जी डंके खूब बजवा दिया।

लेकिन अपने दो साल के प्रयोग के अंतराल यह 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया। महिलाओं में विश्वास उपजाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। हाल ही 1090 के एक प्रभारी अधिकारी तो एक वादी युवती से ही वही करतूत करने लगे, जिसके खिलाफ ही 1090 डंका बजाने का दावा था। पीडि़त महिला जब महिला अधिकार प्रकोष्‍ठ की महानिदेशक सुतापा सान्‍याल के पास पहुंची तो उन्‍होंने तत्‍काल इस मामले की खुद जांच करने का ऐलान किया। लेकिन अचानक ही आला अफसरों ने सुतापा सान्‍याल से यह मामला खींच कर सीधे नवनीत सिकेरा को थमा दिया। बाकी आप-सब को यह बताने की जरूरत तो है नहीं कि करीब एक महीना होने के बावजूद यह मामला ठण्‍डे बस्‍ते में ही पड़ा हुआ है। इसके पहले एक 84 वर्षीय महिला को एक शख्‍स ने कई-कई बार फोन करके भद्दी गालियां दीं और जान से मार डालने की धमकियां दीं। इसकी शिकायत जब 1090 और नवनीत सिकेरा तक की गयी, लेकिन कई कोशिशों के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ। बाद में पता चला कि इस शिकायत पर गाजीपुर के थानाध्‍यक्ष ने उक्‍त अभियुक्‍त से 15000 हजार रूपया वसूल कर मामला रफा-दफा कर दिया।

यह तब हुआ जब सूचना विभाग के एक बड़े बडबोले और महीन अफसर अशोक कुमार शर्मा पुलिस के प्रवक्‍ता बने घूम रहे थे और इस मामले पर उन्‍होंने खुद हस्‍तक्षेप करने का दावा किया था। तो बोलो:- नवनीत सिकेरा जिन्‍दाबाद।

ऐसे में 1090 के प्रति आम महिला का विश्‍वास कैसे पनपता ?

एक ओर मुलायम सिंह यादव जब यह ऐलान करते घूम रहे थे कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, ऐसे में यह मेडिकल छात्रा किससे अपनी फरियाद करती। उस बच्‍ची ने फैसला किया। तय किया कि अब न बांस रहेगा और न बजेगी बांसुरी। बीती रात उसने अपने दोपट्टे से पंखे से फांसी का फंदा बनाया और झूल गयी फांसी पर वह होनहार बच्‍ची। आओ, अब 1090 का डंका बजाया जाए कि 1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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यूपी सरकार ने मीडिया वालों के लिए जारी किया टोल फ्री नंबर, इस पर करें मजीठिया वेज बोर्ड न मिलने की शिकायत

यूपी में अखिलेश सरकार ने मीडिया वालों को टोल फ्री हेल्पालइन का लालीपाप फेंका है. यह हेल्पलाइन कितना कारगर है, इसका टेस्ट सिर्फ एक प्वाइंट पर मीडिया वाले कर सकते हैं. जिन जिन को मजीठिया वेज बोर्ड न मिला हो वे इस टोल फ्री नंबर पर कंप्लेन करें. देखें कि क्या अखिलेश यादव मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से नया पुराना सेलरी एरियर हिसाब दिला पाते हैं. पक्का मानिए, अखिलेश सरकार मीडिया को लेकर सिर्फ दिखावा कर रही है. अगर वह सीरियस है तो टोल फ्री नंबर देने से पहले प्रिंट मीडिया वालों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू कराने का तोहफा दे चुकी होती. पर अराजक और जंगल राज चलाने वाली यूपी की समाजवादी सरकार इन दिनों नौकरशाहों के दिखावे वाले तामझाम में इतना मशगूल है कि वह बुनियादी काम भूल-छोड़ चुकी है.

यूपी में मीडियाकर्मियों के लिए कथित हेल्पलाइन की व्यवस्था की गई है. सोमवार को सीएम अखिलेश यादव ने इसकी शुरुआत की. कहा जा रहा है कि इस हेल्पलाइन के जरिये मीडियाकर्मियों को सुरक्षा, उनके हितों के संरक्षण के लिए जरूरी सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है. इसके लिए टोल फ्री नंबर 1800-1800-303 होगा. दावा किया जा रहा है कि इस टेक्नोलॉजी से जनता को लाभ होगा. एक जगह मॉनिटरिंग होगी. बताया गया है कि यह मीडिया हेल्‍पलाइन नंबर सूचना विभाग में स्थापित की गई है. इसके माध्यम से मीडियाकर्मी घर बैठे अपनी शिकायतें ऑनलाइन दर्ज करा सकेंगे.

प्रेस मान्यता, चिकित्सा सुविधा, सचिवालय प्रवेश पास, रेलवे पास, राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क यात्रा आदि की जानकारी ले सकेंगे. पत्रकार उत्पीड़न और पत्रकारों की सुरक्षा संबंधी मामलों के समाधान के लिए ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराकर जानकारी प्राप्त कर सकेंगे. मीडिया हेल्पलाइन पर दर्ज मामलों में संबंधित जिलों के मजिस्ट्रेट, जिला सूचना अधिकारी, सहायक निदेशक, उप सूचना निदेशक एक्‍शन लेंगे. हेल्पलाइन पर दर्ज कराई गई सामान्य शिकायतों को एक सप्ताह में,अर्जेंट 72 घंटे और मोस्ट अर्जेंट मामलों को 24 घंटे में समाधान कराने की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी. सीएम अखिलेश यादव ने मीडियाकर्मियों को समाचार कलेक्ट करने में होने वाली असुविधाओं का समाधान कराने, शासन और प्रशासन के बीच मीडियाकर्मियों से बेहतर तालमेल बनाने में सूचना विभाग को दायित्व सौंपा है.

प्रमुख सचिव नवनीत सहगत ने कहा कि तकनीक के सहारे प्रशासन का कैसे बेहतर प्रयोग हो सके, लगातार प्रयास किया जा रहा है. जन सुनवाई पोर्टल देश में पहली बार किया जा रहा है. जिले से भी आई शिकायतों को लखनऊ से देखा जाएगा. दूसरा पोर्टल मीडिया के लिए है, जहां सिर्फ मीडिया के लोग अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे. विशेष सचिव सीएम अमित गुप्ता ने बताया कि अलग-अलग शिकायत का अलग-अलग ब्लॉक बनाया गया है.

इस टोल फ्री नंबर की हकीकत का टेस्ट मीडिया वालों को करना है. उत्तर प्रदेश के मीडिया वाले, खासकर प्रिंट मीडिया वाले अपने मीडिया मालिकों की कंप्लेन इस नंबर पर करें और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बढ़ी हुई सेलरी न देने की बात दर्ज कराएं. फिर देखिए इस टोल फ्री की असलियत क्या है. ये वही अखिलेश सरकार है जिसने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मीडिया मालिकों के दबाव के आगे झुकते हुए सुप्रीम कोर्ट में बेहद लचर किस्म की रिपोर्ट भेजी है और इस सरकार के अधीन कार्यरत लेबर अफसर मजीठिया संबंधी शिकायतों पर एक्शन लेने में दाएं बाएं करते हैं. अब ये सरकार मीडिया वालों को टोलफ्री नंबर का लालीपाप देकर अपने पुराने पाप धोने की कोशिश में हैं. मीडिया वाले भूले नहीं हैं कि किस तरह एक मंत्री के कहने पर एक कोतवाल ने जगेंद्र नामक पत्रकार को जिंदा फूंक दिया और वह भ्रष्ट हत्यारा मंत्री अब भी अखिलेश मंत्रिमंडल में शोभायमान है.

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ये यूपी है जनाब : 19 महीने बाद दर्ज हो सका पत्रकार उमेश शुक्ला के लापता होने का मुकदमा

(लापता पत्रकार उमेश शुक्ल)

वाराणसी । वाराणसी पुलिस विगत 19 महीनों से लापता एक पत्रकार को खोजना तो दूर, उनका सुराग तक नहीं लगा पाई। लापता पत्रकार की खोज के लिए लगातार बड़ा भाई दिनेश कार्यालयों और अधिकारियों के दरवाजे भटकता रहा लेकिन किसी ने कुछ नहीं सुना। दिनेश मुख्यमंत्री सहित गृह मंत्रालय को भी पत्र लिखते रहे लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। कुछ दिनों तक पत्रकार संगठनों ने दिलचस्पी दिखाई लेकिन अखबरों में संगठन का नाम छपने के बाद वह भी बैकफुट पर आ गए। लेकिन दिनेश ने हार नहीं माना और न्याय के लिए लड़ते रहे। दिनेश ने पुनः एसएसपी आकाश कुलहरि से गुहार लगाई। एसएसपी से आदेश मिलने के बाद सिगरा थाने ने आईपीसी की धारा 363 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। 

वाराणसी के हडहा, बेनियाबाग थाना चौक निवासी दिनेश शुक्ला ने बताया कि उनके छोटे भाई पत्रकार उमेश शुक्ला उत्तर प्रदेश के विभिन्न अखबारों में कार्य कर चुके हैं। लापता होने से पूर्व वह ‘आज’ अखबार, गाज़ियाबाद में कार्यरत थे। वहां साथ में अपने परिवार को भी रखते थे। अस्वस्थ होने के कारण वह वाराणसी चले आए और सिगरा थाना क्षेत्र के शास्त्री नगर कॉलोनी में किराए के मकान में रहने लगे थे। 24 मार्च 2014 को मकान मालिक ने फोन कर बताया कि पिछले 2 दिन से उमेश न तो कमरे पर हैं, न उनका फ़ोन लग रहा है।

सूचना के बाद दिनेश ने उमेश से उनके फोन नंबर 9598510392 और 9506532363 पर संपर्क साधने की कोशिश की। दोनो नंबर बंद मिले। इसके बाद वह उमेश की कार (UP-14-AY-2448) की खोज में जुट गए। जब वह भी पता नहीं चला तो उन्होंने किसी अनहोनी की आशंका में सिगरा पुलिस की मदद ली। प्रथम दृष्ट्या मामला पत्रकार का होने के कारण पुलिस हरकत में आ गई और उनके मोबाइल नंबर से उनका लोकेशन जानने की कोशिश की। उनका अंतिम लोकेशन वाराणसी का शिवपुर थाना क्षेत्र मिला। उसके बाद पुलिस ने गुमशुदगी भी दर्ज कर ली लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया। मामला पुलिस के ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। दिनेश ने जनता से भी गुजारिश की है कि जो भी उनके भाई के बारे में कोई सूचना देना चाहे, उनके मोबाइल नंबर – 9889296402 पर बता सकता है।

इस प्रकरण के बारे में भड़ास पर छपी कुछ पुरानी खबरों के लिंक ये रहे>

पत्रकार उमेश शुक्ला लापता, भाई दर-दर खोज रहा, पुलिस खामोश

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सालभर से लापता पत्रकार को नहीं खोज पाई ‘मोदी के बनारस’ की पुलिस

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यूपी में जंगलराज : सूचना दिलाने के बजाय आयुक्त बिष्ट ने वादी को बेइज्जत कर नज़रबंद कराया

: राज्य सूचना आयोग के अफसरों की मनमर्जी बेलगाम, कार्यकर्ताओं में क्षोभ : लखनऊ : सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी छवि चमकाने और पार्टी की जड़ों को जमाने की लाख कोशिश कर लें, उनके अनेक बड़े सूबेदार सारा मटियामेट करने में जुटे हैं। ताजा मामला है राज्य के चर्चित सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह विष्ट का, जिन्होंने आज दोपहर एक सूचना कार्यकर्ता के साथ भरे दफ्तर गालियां दीं और अपने सुरक्षाकर्मियों को बुला कर उन्हें एक कमरे में बंद करा दिया। ताज़ा खबर मिलने तक तनवीर बिष्ट के कमरे में गैरकानूनी ढंग से नज़रबंद हैं और उन्हें किसी से भी मिलने से पाबंदी लगा दी गई है।

आपको बता दें कि बिष्ट पत्रकार होते हुए सूचना आयोग में आये हैं। मुलायम सिंह यादव के सगे समधी होने के चलते बिष्ट को सूचना आयुक्त की कुर्सी मिली, लेकिन इसके बाद से बिष्ट का लहजा अभद्र होता जाता रहा। चूंकि बिष्ट आयुक्त पद पर हैं और लगातार यही प्रचार कर रहे हैं की सपा सरकार में वे जो भी चाहें, कर सकते हैं। इसलिए अफसरशाही में उनकी पकड़ होती जा रही है। यही से पकड़, दबाव और धंधे की दूकान चल रही है बिष्ट की।

इतना भी रहता तो भी ठीक था, लेकिन अब बिष्ट का दर्प-घमंड अब उनके सर पर चढ़ कर बोल रहा है। अपने कार्यालय में सूचना कार्यकर्ता-आवेदकों से बिष्ट आयेदिन अभद्रता और उन्हें बेइज्जत करने पर आमादा रहते हैं। अनेक कार्यकर्ताओ का आरोप है कि अफसरों से सूचना दिलाने के बजाय बिष्ट अफसरों को कृपा बरसाते हैं और अफसरों के सामने ही कार्यकर्ताओं-आवेदकों सरेआम गरियाते और सुरक्षाकर्मियों की धौंस पर आवेदकों को नजरबन्द तक कर देते हैं। कई बार तो सूचना आयोग में आवेदकों की पिटाई तक करायी जा चुकी है।

आज बिष्ट का कहर तनवीर सिद्दीकी पर टूटा। बेहद गंभीर और शालीन प्रवृत्ति वाले तनवीर ने दो दिन पहले ही हजरतगंज वाले गांधी प्रतिमा पर सैकड़ों सूचना कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन और धरना दिया था। इस आंदोलन का मकसद सूचना आयुक्तों की मनमर्जी और निर्णयों में हो रही उनकी धांधली का विरोध करना ही था। लेकिन बिष्ट इस पर भड़क गए। आज जैसे ही तनवीर को बिष्ट ने देखा, तनवीर को गालियां देना शुरू कर दिया। तनवीर ने जब उनकी अभद्रता का विरोध करना चाहा तो बिष्ट ने अपने सुरक्षाकर्मियों को बुला कर उन्हें एक कमरे में बंद करा दिया।

लखनऊ से बेबाक पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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बलिया में सिपाही ने की अवैध वसूली की शिकायत तो एसपी ने किया सस्पेंड, आहत सिपाही ने दिया इस्तीफा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नरही थाने के पिकेट पर हो रही अवैध वसूली की शिकायत करना एक सिपाही को महंगा पड़ गया. एसपी ने शिकायत करने वाले सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. इससे आहत निलम्बित सिपाही ने पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद को अपना त्याग पत्र भेज दिया है. उसने जान-माल की सुरक्षा की गुहार भी की है.

नरही थाने पर चंद दिनों पहले तैनात हुए सिपाही संतोष कुमार वर्मा का कहना है कि 03 जनवरी की रात 09 बजे से भरौली चेक पोस्ट पर उनकी ड्यूटी लगी थी. वे जब ड्यूटी पर पहुंचे तो वहां एक व्यक्ति द्वारा अवैध गाड़िया चेक पोस्ट से पार करायी जा रही थी. इसका विरोध करते हुए सिपाही संतोष कुमार ने उक्त व्यक्ति को पकड़कर थाने के एसएचओ को सूचित किया. एसएचओ मौके पर पहुंचे और उक्त व्यक्ति को आजाद करते हुए सिपाही संतोष को ही जबरिया थाने लेकर चले आये.

जब इसकी शिकायत सिपाही ने एसपी से की तो एसएचओ रामरतन सिंह भड़क गये. सिपाही का आरोप है कि एसएचओ ने उसे न सिर्फ गालियों से नवाजा, बल्कि उसके मुंह पर जबरदस्ती शराब गिराकर पीएचसी के चिकित्सक से मेडिकल भी करवाया. हद तो तब हो गयी जब एसपी अनीस अहमद अंसारी ने सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. सिपाही पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा है. विभाग से मिले इस प्रतिदान से आहत और निलम्बित सिपाही ने अपना त्याग पत्र पुलिस हेड क्वार्टर को भेज दिया. सिपाही ने कहा कि वह रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल लूँगा लेकिन पुलिस की नौकरी नही करूँगा क्योकि यहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं.

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बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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आज़म खान, रामपुर की पुलिस और दोगला चरित्र

Kanwal Bharti : कल रामपुर पुलिस ने फेसबुक पर आज़म खान के खिलाफ लिखने वाले किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। खबर है कि उसने आज़म और उसके परिवार पर कोई टिप्पणी की थी। किन्तु रामपुर पुलिस दोगली चरित्र की है।

इसी आज़म के बेटे और उसके साथियों ने फेसबुक पर ही मुझे अभद्र भाषा में गालियां दी थीं, मुझे घर से उठाने की धमकी दी थी।

मैंने पूरे प्रमाण के साथ इसकी शिकायत डीजी, आईजी, डीआईजी और एसपी को की थी। साल भर हो गया, पर आज तक रामपुर की पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया। क्यों? है न दोगला चरित्र। क्या मान और भावनाएं सिर्फ आज़म और उसके परिवार की ही आहत होती हैं?

जाने माने दलित चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

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