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(पार्ट दो) सत्ता-मीडिया गठजोड़ सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया : पुण्य प्रसून बाजपेयी

आजादी के तुरंत बाद देश को किसी पार्टी की सरकार नहीं बल्कि राष्ट्रीय सरकार मिली थी। इसीलिये नेहरु के मंत्रिमंडल में वह सभी चेहरे थे जिन चेहरों के आसरे आज राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिये टकराते हैं। यानी 68 बरस पहले 1947 में सवाल देश का था तो नेहरु की अगुवाई में देश के कानून मंत्री बीआर आंबेडकर थे। गृह मंत्री सरदार पटेल थे। तो शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और इंडस्ट्री-सप्लाई मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इसी तर्ज पर अठारह कैबिनेट मंत्री अलग अलग जाति-सप्रदाय-धर्म-भाषा-सूबे के थे। जो मिलकर देश को दिशा देने निकले। तो पत्रकारिता भी देश को ले कर ही सीधे सवाल नेहरु की सत्ता से करने की हिम्मत रखती थी।

आजादी के तुरंत बाद देश को किसी पार्टी की सरकार नहीं बल्कि राष्ट्रीय सरकार मिली थी। इसीलिये नेहरु के मंत्रिमंडल में वह सभी चेहरे थे जिन चेहरों के आसरे आज राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिये टकराते हैं। यानी 68 बरस पहले 1947 में सवाल देश का था तो नेहरु की अगुवाई में देश के कानून मंत्री बीआर आंबेडकर थे। गृह मंत्री सरदार पटेल थे। तो शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और इंडस्ट्री-सप्लाई मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इसी तर्ज पर अठारह कैबिनेट मंत्री अलग अलग जाति-सप्रदाय-धर्म-भाषा-सूबे के थे। जो मिलकर देश को दिशा देने निकले। तो पत्रकारिता भी देश को ले कर ही सीधे सवाल नेहरु की सत्ता से करने की हिम्मत रखती थी।

असर इसी का था कि संसद के भीतर की बहस हो या सड़क पर हिन्दू महासभा से लेकर समाजवादियो का विरोध। लोहिया के तीखे सवाल हो या गैर कांग्रेसवाद का नारा लगाते हुये कांग्रेस विरोधी संगठन और पार्टियों को लाने की कवायद। हर सोच के पीछे देश को समझने और भारत के हर सूबे-संप्रदाय-धर्म तक न्यूनतम जरूरतों को पहुंचाने की होड़ थी। यही हर राजनीतिक दल के घोषणापत्र का एलान था और यही समझ हर राजनेता के कद को बढाती कि उसे देश की कितनी समझ है। तब लड़ाई न्यूनतम जरूरतों को लेकर थी। यानी सिर्फ हिन्दू या मुस्लिम। या फिर आर्य-द्रविड़ कहने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि सूबे-दर-सूबे न्यूनतम जरूरतों को कैसे पहुंचाया जा सकता है, यह प्रमुख था। खेत-मजदूर के सवाल देश के सवाल थे। आदिवासियों के सवाल थे। अल्पसंख्यकों की मुश्किलात का जिक्र था। देश के तमाम संस्थान देश को बांधने में लगे थे। तो पत्रकारिता के सामने सत्ता को लेकर सारे सवाल अवाम से जुडे थे। क्योंकि राजनीतिक सत्ता के सारे राजनीतिक सरोकार पहले जनता से जुडे थे। इसीलिये मुद्दा सांप्रादियकता का हो या किसानों का। मुद्दा विकास का हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर का। हर हालात देश के भीतरी माहौल से ही टकराते और उसी में रास्ता निकालने की कोशिश होती। देश के सामाजिक-आर्थिक चेहेरे से इतर टाटा-बिड़ला सरीखे उद्योगपति भी नहीं देख पाते और अखबारी पत्रकारिता और उसके संपादक की कलम भी आम जनता के सरोकार से जुडकर सवाल भी उठाती और सत्ता को प्रभावित करने वाली रिपोर्ट को लेकर सौदेबाजी का दायरा भी राजनीतिक दलाली की जगह सत्ता से टकराने का हुकूक दिखाने को तैयार हो जाता।

इस दौर तक संपादक, पत्रकार और मीडिया संस्थान अक्सर रिपोर्ट या लेखनी के जरिये बंटते भी और अलग-अलग दिखायी भी देते। संजय गांधी की जनता कार यानी मारुति पर पहली रिपोर्ट टीएन निनान ने लिखी। लेकिन उसे बिजनेस स्टैन्डर्ड ने नहीं छापा। तो वह रिपोर्ट इंडिया टुडे में छपी। कमोवेश एक लंबा इतिहास रहा है जब किसी रिपोर्टर या किसी संपादक ने संस्थान इसलिये छोड़ा क्योंकि उसकी रिपोर्ट सत्ता के दबाव में नहीं छपी। या फिर सत्ता ने संपादक को ही बदलवा दिया। जैसे कुलदीप नैयर को सत्ता के इशारे पर हटाया गया। लेकिन वह पत्रकारिता के हिम्मत का दौर था। वह राजनीतिक सत्ता के रिपोर्ट से खौफजदा होने का भी दौर था। यानी मीडिया का प्रभाव जनता में और जनता को प्रभावित कर सत्ता पाने की राजनीति। शायद इसीलिये हर कद्दावर राजनेता का लेखन या पत्रकारिता से जुडाव भी उस दौर में देखा जा सकता है। और संपादकों में संसद जाने की लालसा को भी देखा जा सकता था।

एक लिहाज से समझे तो पत्रकारिता देश को जानने समझने के लिये ही नहीं बल्कि राजनेताओं को दिशा देने की स्थिति में भी रही। उस पर भी साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक पाया गया। इसलिये विभन्न भाषाओं के साहित्यकार भी संपादक बने और राजनीतिक तौर पर किस दिशा में देश को आगे बढना है या संसद के कानून बनाने को लेकर किसी भी मुद्दे पर पत्रकारिता ने बड़ी लंबी लंबी बहस की, जिसने देश को रास्ता दिखाने का काम किया क्योंकि तब राजनीति का आधार और पत्रकारिता की पूंजी जनता थी। बहुसंख्यक आम जनता। लेकिन 1991 के बाद बाजार देश पर हावी हुआ। देश की सीमा पूंजी के लिये पिघलने लगी। उपभोक्ता और नागरिक के बीच लकीर दिखायी देने लगीं। सरोकार सिमटने लगे। समाज के भीतर ही संवादहीनता की स्थिति बनने लगी।

नेहरु, शास्त्री या इंदिरा गांधी आदिवासी गौंडी भाषा भी समझ लेते थी या फिर संवाद के लिये आदिवासियों के बीच एक द्विभाषिए को साथ ले जाते थे। पत्रकार आदिवासियों से संपर्क साध कर उनकी भाषा के जरिये उनके संवाद को कागज पर उकेरता। या फिर दंगों की रिपोर्टिंग या संपादकीय में पत्रकार दंगों से प्रभावित सच तक पहुंचने की जद्दोजहद करता नजर आता। उन रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही पता चलता कि कौन संपादक कितना बड़ा है और किस राजनीतिक दल या राजनेता के सरोकार दंगाईयों से रहे। एक चैक-एंड बैलेंस लगातार काम करते रहता क्योंकि पत्रकारिता की पूंजी जनता की मान्यता थी और पत्रकार की वही साख सत्ता को भी परेशान करती। जब बाजार का मतलब पूंजी और पूंजी का मतलब मुनाफा हुआ तो देश का मतलब भी पूंजी पर टिका विकास हुआ।

…जारी…

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने माने पत्रकार हैं. इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.


इसके पहले और बाद का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें:

(पार्ट एक) क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है

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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं

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