पुण्य प्रसून सिर्फ एक लाइन बोले- ‘250 करोड़ की डील, जय हिंद’!

सूर्या समाचार से खुद को निकाले जाने के घंटों बाद ट्विटर पर पुण्य प्रसून बाजपेयी ने केवल एक लाइन लिखा है, ‘250 करोड़ की डील, जय हिंद!’ अब लोग इसके तरह तरह के आशय निकाल रहे हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि इतने रुपये की डील होने के बाद प्रबंधन ने पुण्य की टीम …

अजीत अंजुम ने पूछा- प्रसूनजी किसी आर्थिक मजबूरी के मारे भी न थे, फिर ‘सूर्या’ में गए क्यों?

Ajit Anjum : मुझे हैरत तो उस दिन हुई थी, जिस दिन प्रसून वाजपेयी ने सूर्या समाचार ज्वाइन किया था. आज बिल्कुल हैरान नहीं, जब जाना कि प्रसून पूरी टीम के साथ वहां से रुखसत हो रहे हैं. जिस आदमी से 20 मिनट की मुलाकात बाद ही मैं चाय तक छोड़कर उठ गया था कि …

पुण्य प्रसून के हटाए जाने को शहादत और चौकीदार के डर का रंग ना दीजिए!

Sanjay Singh : पत्रकार से फिर डरा चौकीदार.. हिटलर-शाही के इस दौर में सच बोलना कितना मुश्किल है यह @ppbajpai की हालत देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है, सूर्या TV भी उनको निकालने की तैयारी में है। हम सब बहुत नासमझ हैं। हमें कुछ नही पता किसके इशारे पर यह सब हो रहा है। (आम …

पुण्य प्रसून जी, डिजिटिल में आइए, यहां कोई नहीं निकालेगा!

Shyaam Tyagi : खबर है कि पुण्य प्रसून जी ने ‘सूर्य’ नमस्कार कर लिया है। इस पुष्ट/अपुष्ट खबर के साथ ही उनकी ‘शुभचिंतक ब्रिगेड’ बवाल काटने में लग गई है कि प्रसून जी को एकबार फिर केंद्र सरकार ने दबाने की कोशिश की है। लोग कह रहे हैं कि चैनल के मालिक पर मोदी सरकार …

पुण्य प्रसून ने मजबूरी में अपनी इमेज से कमतर चैनल में ज्वॉइन किया था!

Navneet Mishra : पुण्य प्रसून वाजपेयी यूँ तो 2015 में ही मेनस्ट्रीम मीडिया को अलविदा कहना चाहते थे, शायद स्क्रीन के मोह में नहीं कर पाए। तब एक वेबसाइट लॉन्च हो रही थी। माना जा रहा था कि इस टीम का प्रसून भी हिस्सा होंगे क्योंकि वह भी इच्छा जता चुके थे। अचानक प्रसून ने …

पुण्य प्रसून के मामले में सरकार ने दिखा दिया, आखिर क्यों नामुमकिन अब मुमकिन है!

आखिरकार एक और चैनल के मालिक ने सत्ता के समक्ष घुटने टेक दिए… इस चैनल के मालिक ने सुबूत भी दे दिया कि आज के समय में पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ मालिकों के लिए व्यापार से बढ़कर कुछ नहीं है. इन मालिकों को इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने सिर्फ पत्रकारिता का …

रवीश कुमार ने पूछा- आखिर कौन है जो पुण्य प्रसून के पीछे इस हद तक पड़ा है!

Ravish Kumar : पुण्य प्रसून वाजपेयी को फिर से निकाल दिया गया है। आख़िर कौन है जो पुण्य के पीछे इस हद तक पड़ा है। एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ कौन है जो इतनी ताकत से लगा हुआ है। आए दिन हम सुनते रहते हैं कि फलां संपादक को दरबार में बुलाकर धमका दिया गया। फलां …

पुण्य प्रसून को बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ जाना चाहिए!

Abhishek Srivastava : मान लिया कि पुण्‍य प्रसून को एबीपी न्‍यूज़ से नरेंद्र मोदी के कहने पर निकलने पर मजबूर किया गया। मान लिया कि प्रसून को सूर्या समाचार से सरकार ने ही निकलवाया और मालिक ने इसके बदले करोडों की डील कर ली। मान लिया कि भारतीय मीडिया में पुण्‍य प्रसून बाजपेयी इस वक्‍त …

पुण्य प्रसून बाजपेयी दंभ के पाखंड पर सवार, अहंकार के अहाते में कैद, एक पाखंडी पुरुष हैं!

Ajit Tripathi : तो पुण्य प्रसून वाजपेयी को फिर से निकाल दिया गया… इससे पहले उन्हें एबीपी से निकाल दिया गया था… उसके पहले उन्हें आजतक से निकाल दिया गया था… उससे भी पहले ज़ी न्यूज से निकाल दिया गया था, और उसके भी पहले सहारा से निकाल दिया गया था… Share on:कृपया हमें अनुसरण …

पुण्य प्रसून बाजपेयी एंड टीम की ‘सूर्या समाचार’ से छुट्टी!

तेवरदार पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की ताप सह न सका प्रिया गोल्ड बिस्किट कम्पनी चलाने वाला सूर्या समाचार का मालिक बीपी अग्रवाल : एक बड़ी खबर सूर्या समाचार न्यूज चैनल से आ रही है। सत्ता के दबावों के आगे सूर्या समाचार चैनल के मालिक नतमस्तक होते हुए हाल में ही ज्वाइन कराई गई पुण्य प्रसून …

सूर्या समाचार से सीईओ दिनेश्वर को भी जाना पड़ा, न्यूज रूम में नए और पुरानों में हो रहा ‘युद्ध’!

पुण्य प्रसून बाजपेयी के लिए सूर्या समाचार चैनल काफी भाग्यशाली सिद्ध हो रहा है. चैनल प्रबंधन ने उन्हें भरपूर छूट दे दी है. इस कारण पुण्य पहले से जमे लोगों को चैनल से बहरियाने में बिलकुल संकोच नहीं कर रहे हैं. एक के बाद एक पुराने लोगों को निकाला जा रहा है. ताजी सूचना है …

पुण्य प्रसून से पीड़ित पत्रकार ने FB Live के जरिए सुनाई दास्तान, देखें वीडियो

SP Singh Rajput : दिवाकर जी आपके संघर्ष में देश आपके साथ है। पत्रकारिता में बड़ा नाम होने से कोई बड़ा नहीं हो जाता, उसको अपने पत्रकारिता धर्म से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं मिल जाती। आपने बखूबी कहा कि नेताओं की निष्ठा और ईमानदारी पर हमेशा सवाल उठाने वाले पत्रकारों भी अपने गिरेबान में …

पुण्य प्रसून प्रायोजित खबरें चलाना चाहते थे, विरोध किया तो इस्तीफा देना पड़ा : दिवाकर विक्रम सिंह

सूर्या समाचार चैनल में एक नया विवाद खड़ा हो गया है. एडिटर इन चीफ पुण्य प्रसून बाजपेयी पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक्जीक्यूटिव एडिटर दिवाकर विक्रम सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. दिवाकर ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहा कि पुण्य प्रसून मोदी सरकार के खिलाफ कुछ प्रायोजित खबरें और सर्वे प्लांट कर रहे थे …

पुण्य प्रसून की ‘सूर्या समाचार’ संग आज शुरू हुई ये पारी कब तक चलेगी?

छह महीने बेरोजगार रहने के बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी एक बार फिर आज से सूर्या चैनल के साथ अपनी नई पारी का आगाज़ करेंगे. पत्रकारिता में पुण्य के करियर ग्राफ पर नजर डाला जाए तो आज उनकी नई शुरुआत से पता चलता है कि वे अर्श से फर्श पर आ गिरे हैं. तो क्या इसके …

फेसबुक पर लाइव हुए पुण्य प्रूसन बाजपेयी, देखें वीडियो

सूर्या समाचार न्यूज चैनल ज्वाइन करने के बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी अब सोशल मीडिया के प्लेटफार्म्स पर ज्यादा सक्रिय हो गए हैं. आज उन्होंने फेसबुक पर लाइव होकर अपनी बात कही और कल भी शाम चार बजे लाइव होने का ऐलान किया. Share on:कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पुण्य प्रसून बाजपेयी सूर्या समाचार के एडिटर इन चीफ बने!

एक बड़ी खबर सूर्या समाचार न्यूज चैनल से आ रही है. चर्चा है कि दो-दो न्यूज चैनलों से हटने को मजबूर हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी का नया ठिकाना सूर्या समाचार बन गया है. इस बात की पुष्टि चैनल के अंदर-बाहर के कई सोर्सेज ने की है. Share on:कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

खनन लूट की जांच हो जाये तो सभी सीएम जेल में होंगे : पुण्य प्रसून बाजपेयी

राजनीति साधने वाले मान रहे हैं और कह रहे हैं कि अखिलेश यादव पर सीबीआई शिकंजा सपा-बसपा गठबंधन की देन है। यानि गठंबधन मोदी सत्ता के खिलाफ है तो मोदी सत्ता ने सीबीआई का फंदा अखिलेश यादव के गले में डाल दिया। राजनीति साधने वाले ये भी कह रहे हैं कि आखिर खनन की लूट …

लोकमत समूह का हिंदी न्यूज चैनल लांच कराएंगे पुण्य प्रसून बाजपेयी!

चर्चा है कि वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने एंकर पुण्य प्रसून बाजपेयी लोकमत समूह का न्यूज चैनल लांच कराने की तैयारी कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चैनल लांच करो अभियान के तहत एक के बाद एक धड़ाधड़ हिंदी चैनल्स लांच हो रहे हैं. स्वराज एक्सप्रेसर, टीवी9 हिंदी, रिपब्लिक भारत के बाद अब …

हिन्दी के टॉप चैनलों को सरकार बताती है कि वे किस मुद्दे पर चर्चा करें : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Punya Prasun Bajpai 2014 के जनादेश ने कैसे बदल दिया मीडिया को… क्या वाकई भारतीय मीडिया को झुकने को कहा गया तो वह रेंगने लगा है। क्या वाकई भारतीय मीडिया की कीमत महज 30 से 35 हजार करोड की कमाई से जुड़ी है। क्या वाकई मीडिया पर नकेल कसने के लिये बिजनेस करो या धंधा …

पुण्य प्रसून जी, आप बाज़ार के एक मोहरा भर हैं, मालिक या नियंता नहीं!

Dayanand Pandey : दि वायर में पुण्य प्रसून वाजपेयी का विधवा विलाप पढ़ कर पता लगा कि वह मोदी-मोदी भले बोल रहे हैं, फर्जी शहादत पाने के लिए लेकिन उन नौकरी के असली दुश्मन रामदेव ही हैं। आज तक और ए बी पी दोनों जगह से रामदेव और पतंजलि का विज्ञापन ही उन की विदाई …

बाबा रामदेव से मुश्किल सवाल पूछने के कारण पुण्य प्रसून बाजपेयी की नौकरी गई

मीडिया मालिकों द्वारा मोदी भक्ति में लीन होते जाने के इस दौर में खरी बात कहना-पूछना भी गुनाह बन गया है. खबर है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी की आजतक न्यूज चैनल से इसलिए छुट्टी कर दी गई क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव से कुछ मुश्किल सवाल पूछ लिए थे. इस सवाल से रामदेव भड़क गए थे. सूत्रों का कहना है बाद में बाबा ने आजतक के मालिकों से संपर्क साधा और चैनल को दिए जाने वाले सारे विज्ञापन बंद करने की धमकी देते हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी को सबक सिखाने हेतु दबाव बनाया.

पुण्य प्रसून बाजपेयी ने उठाया सवाल- एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है। या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का सवाल- कोई भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाया?

नजदीक होकर भी दूर क्यों रहा इजरायल… दो बरस पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरुर लेकिन पहले फिलीस्तीन गए फिर इजरायल दौरे पर गये। पिछले बरस जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं उसके बाद इजरायल गईं। लेकिन पीएम मोदी तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजराइल को लेकर संबंधों की नयी इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस एतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरु तक की सोच अलग रही। महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा, “यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलीस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है”।

पुण्य प्रसून ने पूछा- किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को क्यों नहीं प्रकाशित या प्रसारित किया?

आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88,बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीएस 5,50, एस यादव 5.00, ए एम 30.00, एएन 35.00, डी लाल 50.00, वीसीएस 47.00, एनएस 8.00…. और इसी तरह कुछ और शब्द, जिन के आगे अलग अलग नंबर। यानी ना तो इनीशियल से पता चलता कि किसका नाम और ना ही नंबर से पता चलता कि ये रकम है या कुछ और। लेकिन पन्ने के उपर लिखा हुआ पीओई फ्राम अप्रैल 86 टू मार्च 90। सारे नामों के आगे लिखे नंबर को जोडकर लिखा गया 1602.06800। कागज के एक किनारे तीन हस्ताक्षर। तीनों के नीचे तारीख 3/5/91. तो इस तरह के दो पन्ने जिसमें सिर्फ नाम के पहले अक्षर का जिक्र। मसलन दूसरे पन्ने में एलकेए या फिर वीसीएस। देखते देखते देश की सियासत गर्म होती चली गई कि जैन हवाला की डायरी का ये पन्ना है जिसमें लिखे अक्षर नेताओं के नाम हैं जिन्हें हवाला से पेमेंट हुई।

जब रविशंकर प्रसाद चिल्लाने लगे पुण्य प्रसून वाजपेयी पर!

Sarvapriya Sangwan : अभी अभी ‘आज तक’ पर पुण्य प्रसून वाजपेयी को रविशंकर प्रसाद का इंटरव्यू लेते सुना। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने एक बढ़िया इंटरव्यू लिया और रविशंकर प्रसाद ने उतना ही घटिया इंटरव्यू दिया। पहले तो वाट्सएप्प जोक सुनाते रहे और बाद में जब सवाल मुश्किल होने लगे तो चिढ़ कर हर जवाब से पहले पुण्य प्रसून वाजपेयी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करते रहे।

मोदी सरकार के वर्तमान इकनॉमिक मॉडल में रोजगार रहित विकास : पुण्य प्रूसन बाजपेयी

गुजरात में पाटीदारों ने आरक्षण के लिए जो हंगामा मचाया, जो तबाही मचायी, राज्य में सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति स्वाहा कर दी उसका फल उन्हें मिल गया। सरकार ने सामान्य वर्ग में पाटीदारों समेत आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। तो विकास की मार में जमीन गंवाते पटेल समाज के लिये यह राहत की बात है कि जिनकी कमाई हर दिन पौने दो हजार की है उन्हें भी आरक्षण मिल गया। यानी सरकारी नौकरी का एक ऐसा आसरा जिसमें नौकरी कम सियासत ज्यादा है। यानी आरक्षण देकर जो सियासी राजनीतिक बिसात अब बीजेपी बिछायेगी उसमें उसे लगने लगा है कि अगले बरस गुजरात में अब उसकी हार नहीं होगी।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण : दो साल में देश को बर्बादी की ओर ले गए मोदी राज में देशद्रोह देशद्रोह खेला जा रहा है!

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इस पर संसद की ही नहीं बल्कि देश की नजर होगी। आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं। पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है। पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे हैं। साथ ही संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

पत्रकारिता जीने का तरीका है, यह पाठ एसएन विनोद ने मुझे पढ़ाया : पुण्य प्रसून बाजपेयी

मौजूदा दौर में पत्रकारिता करते हुये पच्चीस-छब्बीस बरस पहले की पत्रकारिता में झांकना और अपने ही शुरुआती करियर के दौर को समझना शायद एक बेहद कठिन कार्य से ज्यादा त्रासदियों से गुजरना भी है। क्योंकि 1988-89 के दौर में राजनीति पहली बार सामाजिक-आर्थिक दायरे को अपने अनुकूल करने के उस हालात से गुजर रही थी और पत्रकारिता ठिठक कर उन हालातों को देख-समझ रही थी , जिसे इससे पहले देश ने देखा नहीं था। भ्रष्टाचार के कटघरे में राजीव गांधी खड़े थे। भ्रष्टाचार के मुद्दे के आसरे सत्ता संभालने वाले वीपी सिंह मंडल कमीशन की थ्योरी लेकर निकल पड़े और सियासत में साथ खड़ी बीजेपी ने कमंडल थाम कर अयोध्या कांड की बिसात बिछानी शुरु कर दी। और इसी दौर में नागपुर से हिन्दी अखबार लोकमत समाचार के प्रकाशन लोकमत समूह ने शुरू किया जिसका वर्चस्व मराठी पाठकों में था।

पुण्य प्रूसन बाजपेयी का विश्लेषण : बीजेपी के भीतर नरेंद्र मोदी और अमित शाह को मुश्किल होने वाली है…

बीजेपी का यह भ्रम भी टूट गया कि कि बिना उसे नीतीश कुमार जीत नहीं सकते हैं। और नीतिश कुमार की यह विचारधारा भी जीत गई कि नरेन्द्र मोदी के साथ खड़े होने पर उनकी सियासत ही धीरे धीरे खत्म हो जाती। तो क्या बिहार के वोटरों ने पहली बार चुनावी राजनीति में उस मिथ को तोड़ दिया है, जहां विचारधारा पर टिकी राजनीति खत्म हो रही है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिक गई है!

: सत्ता से दो दो हाथ करते करते मीडिया कैसे सत्ता के साथ खडा हो गया : अमेरिका में रुपर्ट मर्डोक प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो मड्रोक ने मोदी को आजादी के बाद से भारत का सबसे शानदार पीएम करार दे दिया। मड्रोक अब अमेरिकी राजनीति को भी प्रभावित कर रहे है। ओबामा पर अश्वेत प्रेसीडेंट न मानने के मड्रोक के बयान पर बवाल मचा ही हुआ है। अमेरिका में अपने न्यूज़ चैनल को चलाने के लिये मड्रोक आस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ अमेरिकी नागरिक बन चुके है, तो क्या मीडिया टाइकून इस भूमिका में आ चुके हैं कि वह सीधे सरकार और सियासत को प्रभावित कर सके या कहे राजनीतिक तौर पर सक्रिय ना होते हुये भी राजनीतिक खिलाडियों के लिये काम कर सके।