अब सिर्फ वे ही न्यूज चैनल चलेंगे जो साहेब को खुश रख सकें या फिर हिन्दू मुस्लिम दंगा करा सकें!

Sheetal P Singh : साहेब को TV पर एब्सोल्यूट कब्जा मांगता. सिर्फ वे ही चैनल चलेंगे जो हिन्दू मुस्लिम दंगा करा सकें. ABP news में बड़े फेरबदल की खबर है. संपादक मिलिंद खांडेकर हटाये गए. चर्चित एंकर अभिसार शर्मा के ऑफ एयर होने की खबरें. कहा जा रहा है कि PMO असंतुष्ट है. स्वाति चतुर्वेदी ने भी ट्वीट किया है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी से भी ABP न्यूज़ प्रबंधन ने इस्तीफा ले लिया है. Continue reading

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एबीपी न्यूज से पुण्य प्रसून बाजपेयी और अभिसार शर्मा भी हटा दिए गए!

Qamar Waheed Naqvi

Qamar Waheed Naqvi

एबीपी न्यूज़ में पिछले 24 घंटों में जो कुछ हो गया, वह भयानक है. और उससे भी भयानक है वह चुप्पी जो फ़ेसबुक और ट्विटर पर छायी हुई है. भयानक है वह चुप्पी जो मीडिया संगठनों में छायी हुई है. मीडिया की नाक में नकेल डाले जाने का जो सिलसिला पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से चलता आ रहा है, यह उसका एक मदान्ध उद्-घोष है. मीडिया का एक बड़ा वर्ग तो दिल्ली में सत्ता-परिवर्तन होते ही अपने उस ‘हिडेन एजेंडा’ पर उतर आया था, जिसे वह बरसों से भीतर दबाये रखे थे. Continue reading

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बाबा रामदेव से मुश्किल सवाल पूछने के कारण पुण्य प्रसून बाजपेयी की नौकरी गई

मीडिया मालिकों द्वारा मोदी भक्ति में लीन होते जाने के इस दौर में खरी बात कहना-पूछना भी गुनाह बन गया है. खबर है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी की आजतक न्यूज चैनल से इसलिए छुट्टी कर दी गई क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव से कुछ मुश्किल सवाल पूछ लिए थे. इस सवाल से रामदेव भड़क गए थे. सूत्रों का कहना है बाद में बाबा ने आजतक के मालिकों से संपर्क साधा और चैनल को दिए जाने वाले सारे विज्ञापन बंद करने की धमकी देते हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी को सबक सिखाने हेतु दबाव बनाया.

चर्चा है कि प्रबंधन ने आनन-फानन में बैठक कर पुण्य प्रसून बाजपेयी को तलब कर लिया और उनसे जवाब मांगा गया. पुण्य प्रसून बाजपेयी के दस्तक नामक बुलेटिन को भी छोटा कर दिया गया. अंतत: ऐसा माहौल क्रिएट किया गया जिससे पुण्य प्रसून बाजपेयी के लिए काम करना मुश्किल हो गया. तब उन्होंने प्रबंधन को इस्तीफा थमा दिया.

पुण्य प्रसून इसके पहले भी आजतक छोड़ चुके हैं. वे तब सहारा और जी न्यूज की यात्रा करते हुए दुबारा आजतक लौटे थे. कहा जा रहा है कि पुण्य कई न्यूज चैनलों के मालिकों के संपर्क में हैं. उनकी बातचीत एबीपी न्यूज, इंडिया न्यूज समेत कई चैनलों के कर्ताधर्ताओं से चल रही है. फिलहाल आजतक न्यूज चैनल का कोई भी शख्स पुण्य प्रसून के इस्तीफे को लेकर कुछ भी आन द रिकार्ड बोलने के लिए तैयार नहीं है. भड़ास ने पुण्य प्रसून को फोन कर उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन उनने फोन नहीं उठाया.

पुण्य प्रसून बाजपेयी टीवी के ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें राइट विंग के नेता आंखों की किरकिरी के रूप में देखते हैं. पुण्य प्रसून बेबाक और तीखा बोलने के लिए जाने जाते हैं. नेता उनके सामने बोलते-इंटरव्यू देते खुद को असहज महसूस करने लगते हैं. आजकल की भक्ति पत्रकारिता के दौर में पुण्य प्रसून जैसे बेबाक पत्रकार थोड़े-से ही हैं जिन्हें सत्ता और प्रबंधन का गठजोड़ मिलकर किनारे लगा देना चाहता है.

बाबा रामदेव से वो कौन-सा तीखा सवाल पुण्य प्रसून बाजपेयी ने पूछ लिया जिसके कारण उनकी नौकरी चली गई… जानने के लिए नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें और वीडियो को बारह मिनट पैंतालीस सेकेंड से देखना शुरू करें….

https://www.youtube.com/watch?v=15WTQguDAxE&t=769s

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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने उठाया सवाल- एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है। या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है।

हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये। लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है। इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है। इनको ही भर लिया जाये। अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये। और, जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे। सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे। जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है। और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है। यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है। लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है। इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है। रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है। आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है। और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म ले लिया है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Punya Prasun Bajpai : शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग…. ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है। ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है। ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है। ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है। ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे।

यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था। संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी। तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी।

संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता। लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया।

ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उन पर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेंगे।

इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेंगे कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिंदू है तो फिर उसके पिछडे़पन का इलाज कैसे होगा। तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था। यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरिये उभारा जायेगा।

जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है। एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई।

यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में बदल दिया है उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा। तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी। लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा, इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी।

आजतक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार के वर्तमान इकनॉमिक मॉडल में रोजगार रहित विकास : पुण्य प्रूसन बाजपेयी

गुजरात में पाटीदारों ने आरक्षण के लिए जो हंगामा मचाया, जो तबाही मचायी, राज्य में सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति स्वाहा कर दी उसका फल उन्हें मिल गया। सरकार ने सामान्य वर्ग में पाटीदारों समेत आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। तो विकास की मार में जमीन गंवाते पटेल समाज के लिये यह राहत की बात है कि जिनकी कमाई हर दिन पौने दो हजार की है उन्हें भी आरक्षण मिल गया। यानी सरकारी नौकरी का एक ऐसा आसरा जिसमें नौकरी कम सियासत ज्यादा है। यानी आरक्षण देकर जो सियासी राजनीतिक बिसात अब बीजेपी बिछायेगी उसमें उसे लगने लगा है कि अगले बरस गुजरात में अब उसकी हार नहीं होगी।

इससे पहले कुछ ऐसा ही हाल हरियाणा के जाट आंदोलन का है। आरक्षण इन्हें भी चाहिए था और आरक्षण की मांग करते हुये करीब 33 हजार करोड़ की संपत्ति स्वाहा इस आंदोलन में हो गई। धमकी सरकार गिराने की दे दी गई तो आरक्षण भी मिल गया। लेकिन यह सवाल दोनों जगहों पर गायब है कि नौकरी है कितनी और जिस जमीन और खेती को गंवाकर आरक्षण की राजनीति के रास्ते देश निकल रहा है उसका सच आने वाले वक्त में ले किस दिशा में जायेगा क्योंकि गुजरात में पटेल समाज की 12 फीसदी खेती की जमीन विकास ने हड़प ली। हरियाणा में जाट समाज की 19 फीसदी जमीन विकास ने हड़प ली। देश में किसानों की कमाई में 27 फीसदी की गिरावट बीते 3 बरस में आई है। अगर आरक्षण के जरिये नौकरियों की चाहत है तो हालात हैं कितने बुरे इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि गुजरात में 11,0189 रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं। हरियाणा में 30 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं। देश की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में जा रही है उसमें रोजगार बिना विकास का नारा ज्यादा बुलंद है। आइये इसे भी समझ लें।

देश भर में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 2 करोड 71 लाख 90 हजार है। वैसे बेरोजगार जो रोजगार दफ्तर तक भी नहीं पहुंच पाये उनकी संख्या 5 करोड 40 लाख है। पूरे देश में सरकारी नौकरी करने वाले महज 1 करोड 70 लाख हैं। यानी जिस वक्त बिना रोजगार विकास के रास्ते मोदी सरकार चल पड़ी है और आरक्षण के मांग के लिये पटेल समाज से लेकर जाट समाज आरक्षण पा कर खुश है उस दौर का सच यह भी है कि बीते 9 बरस में देश में सरकारी नौकरी में 25 लाख नौकरियों की कमी आ गई। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि विकास की सोच प्राइवेट नौकरिया पैदा कर रही है। मोदी सरकार खुश है कि जीडीपी से लेकर निवेश में विकास हो रहा है लेकिन सच तो यही है कि भारत रोजगार रहित विकास की राह पर भारत चल पड़ा है। नौकरी का हाल क्या है, ये समझ लीजिए।

देश के प्रमुख आठ कोर सेक्टरों में बीते बरस सबसे कम रोजगार पैदा हुआ। 2015 में सिर्फ 1.35 लाख युवाओं को रोजगार मिला जबकि 2011 में 9 लाख और 2013 में 4.19 लाख युवाओ को नौकरी मिली थी। यानी जिस वक्त जीडीपी को लेकर सरकार अपना डंका दुनिया में यह कहकर बजा रही है कि दुनिया में छाई मंदी के बीच भी भारत की जीडीपी 7.7 फीसदी है। लेकिन इसका दूसरा सच यह है कि रोजगार दर फकत 1.8 फीसदी है। हर महीने दस लाख युवा जॉब मार्केट में कूद रहा है, लेकिन उसके लिए नौकरी है नहीं, क्योंकि एक तरफ सरकारी नौकरियां कम तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में नौकरियों में सौ फीसदी तक की कमी आ चुकी है। 1996 -97 में सरकारी नौकरी जहां 1 करोड़ 95 लाख थी, जो अब एक करोड़ 70 लाख रह गई हैं। केयर रेटिंग के सर्वे के मुताबिक मोदी सरकार के दौर के पहले बरस यानी 2014-15 में 1072 कंपनियों ने सिर्फ 12,760 जॉब पैदा किए। जबकि 2013-14 में 188,371 नौकरियां निकली थी। तो क्या डिजिटल इंडिया से लेकर मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया तक मोदी सरकार की तमाम योजनाएं आकर्षक भले हों लेकिन रोजगार पैदा हो नहीं रहे।

बड़ा सवाल यही है कि रोजगार रहित विकास का मतलब है क्या? रोजगार पैदा ही नहीं होंगे तो पढ़ा लिखा युवा जाएगा कहां? क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि अगले 35 साल में भारत उन देशों में होगा-जहां रोजगार का भयंकर संकट होना है। और इससे कौन इंकार करेगा कि पेट भरने के लिए रोजगार तो चाहिए ही। लेकिन रोजगार पैदा करने से क्या देश आगे बढता है । क्योंकि विजय माल्या की कंपनियो की फेरहसित को ही समझे तो यूनाइटेड स्प्रिट्स  लिमिटेड , यूनाइटेड ब्रेवरीज लिमिटेड , मंगलोर कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ,यूबी इंजीनियरिंग लिमिटेड ,यूबीआईसीएस ,बर्जर पेंट , क्रॉम्पटन मालाबार कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स ,द एशियन एज, सिने ब्लिट्स सरीखे दर्जनो कंपनियो की ये फेरहिस्त काफी छोटी है । इस फेहरिस्त में देश की छोटी बडी दो हजार से ज्यादा कंपनिया आपको जोडनी होगी जिसमें काम करने वाले लोगो की तादाद 20 लाख पार कर जायेगी । और देश की सत्ता खुश हो जायेगी की भारत विकास की राह पर है । खूब रोजगार पैदा हो रहे है । तो जरा कल्पना किजिये देश के बैको को चूना लगाकर जो विजय माल्या लंदन भाग चुके है और अब वह कह रहे हैं कि भारत नहीं लौटेंगे।

तो उसी विजय माल्या को बैंकों ने कर्ज दिया . उसी कर्ज से विजय माल्या ने कंपनियां खोली। उन्हीं कंपनियों में करीब एक लाख युवाओं को रोजगार मिले और उसी रोजगार को देश के विकास से जोड़ा गया और अब जब माल्या का सबकुछ लूट-लूटा चुका है तो सारी कंपनिया बंद हैं। सारे रोजगार खत्म हो चले हैं। मनमोहन सिंह के दौर के किंग ऑफ गुड टाइम्स मोदी सरकार के दौर में भगौडा बन चुके हैं। लेकिन सवाल वही उलझा है कि क्या देश के पास कोई इक्नामिक माडल नहीं है। मनमोहन सिंह के इक्नामिक माडल में विजयमाल्या हर बरस दो-चार कंपनियां.खोल रहे थे। मार्च 2012 में 6185 कर्मचारी काम करते थे। करीब 80 हजार से एक लाख लोगों को माल्या ने रोजगार दिया था। माल्या के यूबी ग्रुप में कर्मचारी का औसत वेतन 2,28,258 रुपए से 8,85,470 रुपए की रेंज में था। यानी माल्या ने पैसा बनाया तो पैसा बांटा भी। और सच कहा जाए तो पैसा डुबोकर भी पैसा बांटा।

किंगफिशर एयरलाइंस डूबने की स्थिति में माल्या ने सरकारी बैंकों से यह कहते हुए ही कर्ज लिया कि कंपनी चलेगी तो रोजगार बढ़ेगा। और बैंक भी कर्ज देते रहे। लेकिन-जब कंपनी डूबी तो कर्मचारी सड़क पर आ गए और माल्या राजनीति के रास्ते पैसा लेकर लंदन भागने में कामयाब रहे। तो सवा बड़ा हैं, फर्जी विकास की राह पर देस चल रहा था। अब फर्जी विकास रोका गया तो फर्जी माडल ढह रहा है । फर्जी माडल के ढहने ने देश में रोजगार खत्म कर दिया है। सवाल वही कि विजय माल्या देश लौट भी आये तो क्या होगा। क्या वह सहारा के सुब्रत राय की तर्ज पर जेल में रहेंगे। या फिर वसूली के उन रास्तो पर सरकार कोई नीतिगत फैसला लेगी जिससे विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वाकई देश लाया जा सके। पनामा पेपर के लीक होने के बाद उन चेहरो पर लगाम कसी जा सके और 6 हजार से ज्यादा कारोबारियो की पेरहिस्त जिन्होने हजारो कंपनियां खोल कर देश को चूना लगाया। खुद रईसी में रहे उन पर कोई लगाम लगायी जा सके। यानी आरक्षण से आगे देश जा नहीं पा रहा है और नौकरी बगैर विकास की राह परह देश है और हर कोई मान चुका है कि राजनीति में ही सबसे ज्यादा नौकरी भी है और पावर भी।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से लिया गया है.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण : दो साल में देश को बर्बादी की ओर ले गए मोदी राज में देशद्रोह देशद्रोह खेला जा रहा है!

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इस पर संसद की ही नहीं बल्कि देश की नजर होगी। आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं। पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है। पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे हैं। साथ ही संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

कारपोरेट सेक्टर के पास काम नहीं है।
औघोगिक सेक्टर में उत्पादन सबसे निचले स्तर पर है।
निर्यात सबसे नीचे है।
किसान को न्यूनतम समर्थन मल्य तो दूर बर्बाद फसल के नुकसान की भरपाई भी नहीं मिल पा रही है।
नये रोजगार तो दूर पुराने कामगारों के सामने भी संकट मंडराने लगा है।
कोयला खनन से जुड़े हजारों हजार मजदूरों को काम के लाले पड़ चुके हैं।

कोर सेक्टर ही बैठा जा रहा है तो संघ परिवार के भीतर भी यह सवाल बडा होने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने विकास मंत्र के आसरे संघ के जिस स्वदेशी तंत्र को ही हाशिये पर ढकेला और जब स्वयंसेवकों के पास आम जनता के बीच जाने पर सवाल ज्यादा उठ रहे हैं और जवाब नहीं है तो फिर उसकी राजनीतिक सक्रियता का मतलब ही क्या निकला। दरअसल मोदी ही नहीं बल्कि उससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यकाल से ही राजनीतिक सत्ता में सिमटते हर संस्थान के सारे अधिकार महसूस किये जा रहे थे। यानी संस्धानों का खत्म होना या राजनीतिक सत्ता के निर्देश पर काम करने वाले हालात के आरोप मनमोहन सिंह के दौर में सीबीआई से लेकर सीवीसी और चुनाव आयोग से लेकर यूजीसी तक पर लगे। लेकिन मोदी के दौर में संकेत की भाषा ही खत्म हुई और राजनीतिक सत्ता की सीधी दखलंदाजी ने इस सवाल को बड़ा कर दिया कि अगर चुनी हुई सत्ता का नजरिया ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र के चार खम्भों के बारे में सोचना भी बेमानी है। इसलिये तमाम उल्झे हालातों के बीच जब संसद सत्र भी शुरू हो रहा है तो यह खतरा तो है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के वक्त ही विपक्ष बायकाट ना कर दे और सड़क पर भगवा ब्रिगेड ही यह सवाल ना उठाने लगे कि नेहरु माडल पर चलते हुये अगर मोदी सरकार पूंजी के आसरे विकास की सोच रही है तो फिर इस काम के लिये किसी प्रचारक के पीएम बनने का लाभ क्या है। यह काम तो कारपोरेट सेक्टर भी आसानी से कर सकता है।

सही मायने में यही काम तो मनमोहन सिंह बतौर पीएम से ज्यादा बतौर सीईओ दस बरस तक करते रहे। यानी पेट का सवाल। भूख का सवाल। रोजगार का सवाल। किसान का सवाल। हिन्दुत्व का सवाल। हिन्दुत्व को राष्ट्र से आगे जिन्दगी जीने के नजरिये से जोड़ने का सवाल। मानव संसाधन को विकास से जोड़ कर आदर्श गांव बनाने की सोच क्यों गायब है यह सवाल संघ परिवार के तमाम संगठनो के बीच तो अब उठने ही लगे है। किसान संघ किसान के मुद्दे पर चुप है। मजदूर संघ कुछ कह नहीं सकता। तोगडिया तो विहिप के बैनर तले राजस्थान में किसानों के बीच काम कर रहे हैं। यानी मोदी सरकार के सामने अगर एक तरफ संसद के भीतर सरकार चलते हुए दिख रही है, यह दिखाने-बताने का संकट है तो संसद के बाहर संघ परिवार को जवाब देना है कि जिन मुद्दों को 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त उठाया वह सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं थे। असर मोदी सरकार के इस उलझन का ही है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी अब संघ के राजनीतिक संगठन के तौर पर सक्रिय ऐसे वक्त हुये जब संसद शुरू होने वाली है। यानी टकराव सीधा नजर आना चाहिये, इसे संघ परिवार समझ चुका है। इसलिये पीएम बनने के बाद मोदी के ट्रांसफरमेशन को वह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।

ध्यान दे तो संघ की राष्ट्रभक्ति की ट्रेनिंग का ही असर रहा कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव में राइट-सेन्टर की लाइन ली। पाकिस्तान को ना बख्शने का अंदाज था। किसान-जवान को साथ लेकर देश को आगे बढाने की सोच भी थी। कारपोरेट और औघोगिक घरानों की टैक्स चोरी या सरकारी रियायत को बंद कर आम जनता या कहे गरीब भारत को राहत देने की भी बात थी। यानी संघ परिवार के समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के साथ देशभक्ति का जुनून मोदी के हर भाषण में भरा हुआ था। लेकिन बीते दो बरसो में राइट-सेन्टर की जगह कैपिटल राइट की लाइन पकडी और पूंजी की चकाचौंध तले अनमोल भारत को बनाने की जो सोच प्रधानमंत्री मोदी ने अपनायी उसमे सीमा पर जवान ज्यादा मरे। घर में किसान ने ज्यादा खुदकुशी की। नवाज शरीफ से यारी ने कट्टर राष्ट्रवाद को दरकिनार कर संघ की हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी पर सीधा हमला भी कर दिया।

इसी प्रक्रिया में स्वयंसेवकों की एक नयी टीम ने हर संस्धान पर कब्जा शुरू भी किया और मोदी सरकार ने मान भी लिया कि संघ परिवार उसके हर फैसले पर साथ खड़ा हो जायेगी क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय से लेकर रक्षा मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कृषि मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय में संघ के करीबी या साथ खडे उन स्वयंसेवकों को नियुक्ति मिल गई जिनके जुबा पर हेडगेवार-गोलवरकर से लेकर मोहन भागवत का गुणगान तो था लेकिन संघ की समझ नहीं थी। संघ के सरोकार नहीं थे। विश्वविद्यालयों की कतार से लेकर कमोवेश हर संस्धान में संघ की चापलूसी करते हुये बडी खेप नियुक्त हो गई जो मोदी के विकास तंत्र में फिट बैठती नहीं थी और संघ के स्वयंसेवक होकर काम कर नहीं सकती थी। फिर हर नीति। हर फैसले। हर नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम चेहरा जुडा। तो मंत्रियों से लेकर नौकरशाह का चेहरा भी गायब हुआ और समझ भी।

पीएम मोदी सक्रिय है तो पीएमओ सक्रिय हुआ। पीएमो सक्रिय हुआ तो सचिव सक्रिय हुये। सचिव सक्रिय हुये तो मंत्री पर काम का दबाब बना। लेकिन सारे हालात घूम-फिरकर प्रदानमंत्री मोदी की सक्रियता पर ही जा टिके। जिन्हे 365 दिन में से सौ दिन देश में अलग अलग कार्यक्रमों में व्यस्त रखना नौकरशाही बखूबी जानती है। फिर विदेशी यात्रा से मिली वाहवाही 30 से 40 दिन व्यस्त रखती ही है। तो देश के सवाल जो असल तंत्र में ही जंग लगा रहे है और जिस तंत्र के जरीये अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिये सरकार की जरुरत है वह भी संकट में आ गये तो उन्हें पटरी पर लायेगा कौन। मसलन एक तरफ सरकारी बैक तो दूसरी तरफ बैक कर्ज ना लौटाने वाले औघोगिक संस्थानों का उपयोग। यानी जो गुस्सा देशभक्ति के भाव में या देशद्रोह कहकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू तक में निकल रहा है। उसको देखने का नजरिया चाह कर भी छात्रों के साथ नहीं जुड़ेगा। यानी यह सवाल नहीं उठेगा कि छात्रों के सामने संकट पढाई के बाद रोजगार का है, बेहतर पढाई ना मिल पाने का है। शिक्षा में ही 17 फीसदी बजट कम करने का है। शिक्षा मंत्री की सीमित समझ का है। रोजगार दफ्तरों में पड़े सवा करोड आवेदनों का है। साठ फीसदी कालेज प्रोफेसरों को अंतराष्ट्रीय मानक के हिसाब से वेतन ना मिलने का है।

सवाल राजनीतिक तौर पर भी उठेंगे। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आईने में दलित का सवाल सियासी वोट बैंक तलाशेगा। जेएनयू के जरिये लेफ्ट को देशद्रोही करार देते हुये बंगाल और केरल में राजनीतिक जमीन तलाशने के सवाल उठेंगे। या फिर यह मान कर चला जायेगा कि अगर धर्म के साथ राष्ट्रवाद का छौंक लग गया तो राजनीतिक तौर पर बडी सफलता बीजेपी को मिल सकती है। चूंकि राजनीतिक सत्ता में ही सारी ताकत या कहे सिस्टम का हर पूर्जा समाया हुआ बनाया जा रहा है तो विपक्षी राजनीतिक दल हो या सड़क पर नारे लगाते हजारों छात्र या तमाशे की तर्ज पर देश के हालात को देखती आम जनता, हर जहन में रास्ता राजनीतिक ही होगा। इससे इतर कोई वैकल्पिक सोच उभर सकती है या सोच पैदा कैसे की जाये, यह सवाल 2014 के एतिहासिक जनादेश के आगे सोचेगा नहीं। दिमाग 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले के दिनों की गिनती करने लगेगा। यानी सवाल यह नहीं है कि संघ परिवार अब सक्रिय हो रहा है कि मोदी फेल होते है तो वह फेल ना दिखायी दे। या फिर कांग्रेस हो या अन्य क्षेत्रिय राजनीतिक दल इनकी पहल भी हर मुद्दे का साथ राजनीतिक लाभ को देखते हुये ही नजर आयेगी। हालात इसलिये गंभीर हैं क्योंकि संसद का बजट सत्र ही नहीं बल्कि बीतते वक्त के साथ संसद भी राजनीतिक बिसात पर प्यादा बनेगी और लोकतंत्र के चारो पाये भी राजनीतिक मोहरा बनकर ही काम करेंगे। इस त्रासदी के राजनीतिक विकल्प खोजने की जरुरत है इससे अब मुंह चुराया भी नहीं जा सकती। क्योंकि इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा और राजद्रोह भी सियासत के लिये राजनीतिक हथियार बनकर ही उभरेगा। क्योंकि इसी दौर में अंरुधति से लेकर विनायक सेन और असीम त्रिवेदी से लेकर उदय कुमार तक पर देशद्रोह के आरोप लगे।

पिछले दिनो हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप लगे। और अब कन्हैया कुमार पर। लेकिन उंची अदालत में कोई मामला पहले भी टिक नहीं पाया लेकिन राजनीति खूब हुई। जबिक आजादी के बाद महात्मा गांधी से लेकर नेहरु तक ने राजद्रोह यानी आईपीसी के सेक्शन 124 ए को खत्म करने की खुली वकालत यह कहकर की अंग्रेजों की जरुरत राजद्रोह हो सकती है। लेकिन आजाद भारत में देश के नागरिको पर कैसे राजद्रोह लगाया जा सकता है। बावजूद इसके संसद की सहमति कभी बनी नहीं। यानी देश की संसदीय राजनीति 360 डिग्री में घुम कर उन्ही सवालों के दायरे में जा फंसा है जो सवाल देश के सामने देश को संभालने के लिये आजादी के बाद थे। और इसी कडी 2014 के जनादेश को एक एतिहासिक मोड माना गया। इसलिये मौजूदा दौर के हालात में अगर मोदी फेल होते है तो सिर्फ एक पीएम का फेल होना भर इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं होगा बल्कि देश फेल हुआ। दर्ज यह होगा। यह रास्ता 2019 के चुनाव का इंतजार नहीं करेगा।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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पुण्य प्रूसन बाजपेयी का विश्लेषण : बीजेपी के भीतर नरेंद्र मोदी और अमित शाह को मुश्किल होने वाली है…

बीजेपी का यह भ्रम भी टूट गया कि कि बिना उसे नीतीश कुमार जीत नहीं सकते हैं। और नीतिश कुमार की यह विचारधारा भी जीत गई कि नरेन्द्र मोदी के साथ खड़े होने पर उनकी सियासत ही धीरे धीरे खत्म हो जाती। तो क्या बिहार के वोटरों ने पहली बार चुनावी राजनीति में उस मिथ को तोड़ दिया है, जहां विचारधारा पर टिकी राजनीति खत्म हो रही है।

यह सवाल इसलिये क्योंकि जो सवाल नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होते वक्त उठाये और जो सवाल बीजेपी शुरु से उठाती रही कि पहली बार नीतीश को बिहार का सीएम भी बीजेपी ने ही बनाया। तो झटके में जनादेश ने कई सवालो का जवाब भी दिया और इस दिशा में सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि देश से बड़ा ना कोई राजनीतिक दल होता है। ना ही कोई राजनेता और ना ही वह मुद्दे जो भावनाओं को छूते हैं लेकिन ना पेट भर पाते है और ना ही समाज में सरोकार पैदा कर पाते हैं। यानी गाय की पूंछ पकड कर चुनावी नैया किनारे लग नहीं सकती। समाज की हकीकत पिछड़ापन और उसपर टिके आरक्षण को संघ के सामाजिक शुद्दिकरण से घोया नहीं जा सकता। जंगल राज को खारिज करने के लिये देश में हिन्दुत्व की बेखौफ सोच को देश पर लादा नहीं जा सकता।

यानी पहली बार 2015 का बिहार जनादेश 2014 के उस जनादेश को चुनौती देते हुये लगने लगा जिसने अपने आप में डेढ़ बरस पहले इतिहास रचा। और मोदी पूर्ण बहुमत के साथ पीएम बने। तो सवाल अब चार हैं। पहला क्या प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को चुनावी जीत की मशीन मान लिया था। दूसरा क्या नीतीश कुमार ने दोबारा विचारधारा की राजनीति की शुरुआत की है और तीसरा क्या लालू यादव आईसीयू से निकल कर दिल्ली के राजनीतिक शून्यता को भरने के केन्द्र में आ खड़ा हुये हैं। और चौथा क्या कांग्रेस बिहार की जमीन से दोबारा खुद को दिल्ली में खड़ा कर लेगी। जाहिर है यह चारों हालात उम्मीद और आशंका के बीच हैं। क्योंकि बिहार के जनादेश ने 2014 में खारिज हो चुके नेताओं को दुबारा केन्द्रीय राजनीति के बीच ना सिर्फ ला खड़ा किया बल्कि मोदी सरकार के सामने यह चुनौती भी रख दी कि अगर अगले एक बरस में उसने विकास का कोई वैकल्पिक ब्लू प्रिंट देश के सामने नहीं रखा तो फिर 2019 तक देश में एक तीसरी धारा निकल सकती है। क्योंकि डेढ बरस के भीतर ही बिहार के आसरे वही पारंपरिक नेता ना सिर्फ एकजुट हो रहे है बल्कि उन नेताओं को भी आक्सीजन मिल गया, जिनका जिन टप्पर 2014 के लोकसभा चुनाव में उड़ गया था।

हालात कैसे बदले, यह भी सियसत का नायाब ककहरा है। जो राहुल गांधी लालू के मंडल गेम से बचना चाह रहे थे। जो केजरीवाल लालू के भ्रष्टाचार के दाग से बचना चाह रहे थे। सभी को झटके में लालू में अगर कई खासियत नजर आ रही है तो संकेत जनादेश के ही हैं। क्योंकि मोदी सरकार के खिलाफ लड़ा कैसे जाये इसके उपाय हर कोई खोज रहा है। आज जिस तरह राहुल, केजरीवाल ही नहीं ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से लेकर देवेगौड़ा को भी बिहार के जनादेश में अपनी सियासत नजर आने लगी तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र में जो शिवसेना बिहारियो को ही मुंबई से भगाने पर आमादा रही उसने भी बिहार जनादेश के जरीये अपनी सियासत साधने में कोई कोताही नही बरती। और बीजेपी को सीधी सीख दी तो मोदी और अमित शाह की जोड़ी को भी सियासी ककहरा यह कहकर पढ़ा दिया कि अगर महाराष्ट्र में आज ही चुनाव हो जाये तो बिहार सरीखा हाल बीजेपी का होगा। यानी बिहार के जनादेश ने देश के भीतर उन सवालों को सतह पर ला दिया जिसके केन्द्र में और कोई नहीं प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह है। तो सवाल यही है कि क्या अब बीजेपी के भीतर अमित शाह को मुश्किल होने वाली है और प्रदानमंत्री मोदी को सरकार चलाने में मुश्किल आने वाली है। क्योंकि राज्यसभा में 2017 तक बीजेपी बहुमत में आ सकती है यह अब संभव नहीं है। असहिष्णुता और सम्मान लौटाने का मुद्दा बिहार के बिगडे सामाजिक आर्थिक हालात को पीछे ढकेल चुका है। और देश के सवालों को जनादेश रास्ता दिखायेगा यह बहस तेज हो चुकी है।

यानी सिर्फ बीजेपी या मोदी सरकार की हार नहीं बल्कि संघ परिवार की विचारदारा की भी हार है यह सवाल चाहे अनचाहे निकल पड़े हैं। क्योंकि संघ परिवार की छांव तले हिन्दुत्व की अपनी अपनी परिभाषा गढ कर सांसद से लेकर स्वयंसेवक तक के बेखौफ बोल डराने से नहीं चूक रहे हैं। खुद पीएम को स्वयंसेवक होने पर गर्व है। तो बिहार जनादेश का नया सवाल यही है कि बिहार के बाद असम, बंगाल, केरल, उडीसा, पंजाब और यूपी के चुनाव तक या तो संघ की राजनीतिक सक्रियता थमेगी या सरकार से अलग दिखेगी। या फिर जिस तरह बिहार चुनाव में आरक्षण और गोवध के सवाल ने संघ की किरकिरी की। वैसे ही मोदी के विकास मंत्र से भी सेंध के स्वदेशी सोच के स्वाहा होने पर सवाल उठने लगेंगे। तो तीन फैसले संघ परिवार को लेने है। पहला, मोदी पीएम दिखे स्वयंसेवक नहीं। दूसरा नया अधय्क्ष [दिसबंर में अमित शाह का टर्म पूरा हो रहा है] उत्तर-पूर्वी राज्यों के सामाजिक सरोकारो को समझने वाला है। और तीसरा संघ के एजेंडे सरकारी नीतियां ना बन जायें। नहीं तो जिस जनादेश ने लालू यादव को राजनीतिक आईसीयू से निकालकर राजनीति के केन्द्र में ला दिया वहीं लालू बनारस से दिल्ली तक की यात्रा में मोदी सरकार के लिये गड्डा तो खोदना शुरू कर ही देंगे।

आजतक न्यूज चैनल से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रूसन बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिक गई है!

: सत्ता से दो दो हाथ करते करते मीडिया कैसे सत्ता के साथ खडा हो गया : अमेरिका में रुपर्ट मर्डोक प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो मड्रोक ने मोदी को आजादी के बाद से भारत का सबसे शानदार पीएम करार दे दिया। मड्रोक अब अमेरिकी राजनीति को भी प्रभावित कर रहे है। ओबामा पर अश्वेत प्रेसीडेंट न मानने के मड्रोक के बयान पर बवाल मचा ही हुआ है। अमेरिका में अपने न्यूज़ चैनल को चलाने के लिये मड्रोक आस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ अमेरिकी नागरिक बन चुके है, तो क्या मीडिया टाइकून इस भूमिका में आ चुके हैं कि वह सीधे सरकार और सियासत को प्रभावित कर सके या कहे राजनीतिक तौर पर सक्रिय ना होते हुये भी राजनीतिक खिलाडियों के लिये काम कर सके।

अगर ऐसा हो चला है तो यकीन मानिये अब भारत में भी सत्ता-मीडिया का नैक्सेस पेड न्यूज़ से कही आगे निकल चुका है। जहाँ अब सत्ता के लिये खबरों को नये सिरे से बुनने का है या कहे सत्तानुकुल हालात बने रहे इसके लिये दर्शको के सामने ऐसे हालात बनाने का है जिस देखते वक्त दर्शक महसूस करें कि अगर सत्ता के विरोध की खबर है तो खबर दिखाने वाला देश के साथ गद्दारी कर रहा है। यानी पहली बार मीडिया या पत्रकारिता की इस धारणा को ही मीडिया हाउस जड़-मूल से खत्म करने की राह पर निकल पडे हैं कि पत्रकारिता का मतलब यह कतई नहीं है कि चुनी हुई सरकार के कामकाज पर निगरानी रखी जाये। यानी सत्ता को जनता ने पांच साल के लिये चुना है तो पाँच बरस के दौर में सत्ता जो करे जैसा करे वह देश हित में ही होगा। जाहिर है यह बेहद महीन लकीर है है जहाँ मीडिया का सत्ता के साथ गठजोड़ मीडिया को भी राजनीतिक तौर खड़ा कर दें और सत्ता भी मीडिया को अपना कैडर मान कर बर्ताव करें। यह घालमेल व्यवसायिक तौर पर भी लाभदायक साबित हो जाता है।

यानी सत्ता के साथ खड़े होने की पत्रकारिता इसका एहसास होने ही नहीं देती है कि सत्ता कोई लाभ मीडिया हाउस को दे रही है या मीडिया सत्ता की राजनीति का प्यादा बनकर पत्रकारिता कर रही है। इसके कई उदाहरणों को पहले समझें। बिहार चुनाव में किसी भी अखबार या न्यूज चैनल की हेडलाइन नीतिश कुमार को पहले अहमियत देती है। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का नंबर आयेगा और फिर लालू प्रसाद यादव का। यानी कोई भी खबर जिसमें नीतिश कह रहे होगें या नीतिश को निशाने पर लिया जा रहा होगा वह खबर नंबर एक हो जायेगी। इसी तर्ज पर मोदी जो कह रहे होगें या मोदी निशाने पर होगें उसका नंबर दो होगा।

कोई भी कह सकता है कि जब टक्कर इन्हीं दो नेताओं के बीच है, तो खबर भी इन्ही दो नेताओं को लेकर होगी। तो सवाल है कि जब सुशील मोदी कहते है कि सत्ता में आये तो गो-वध पर पांबदी होगी। तो उस खबर को ना तो कोई पत्रकार परखेगा और ना ही अखबार में उसे प्रमुखता के साथ जगह मिलेगी। लेकिन जब नीतिश इसके जबाब में कहगें कि बिहार में तो साठ बरस से गो-वध पर पाबंदी है तो पत्रकार के लिये वह बड़ी खबर होगी। इसी तर्ज पर केन्द्र का कोई भी मंत्री बिहार चुनाव के वक्त आकर कोई भी बडे से बडा नीतिगत फैसले की जानकारी चुनावी रैली या प्रेस कान्फ्रेस में दे दें। उसको अखबार में जगह नहीं मिलेगी। ना ही प्रधानमंत्री मोदी के किसी बडे फैसले की जानकारी देने को अखबार या न्यूज चैनल दिखायेगें। यानी पीएम मोदी के बयान में जब तक नीतिश –लालू को निशाने पर लेने का मुलम्मा ना चढा हो, वह खबर बन ही नहीं सकती। यानी खबरों का आधार नेता या कहे सियासी चेहरो को उस दौर में बना दिया गया जब सबसे ज्यादा जरुरत ग्राउंड रिपोर्टिंग की है और उसके बाद चेहरों की प्राथमिकता सत्ता के साथ गढजोड़ के जरीये कुछ इस तरह से पाठकों में या कहें दर्शकों में बनाते हुये उभर कर आयी, जिससे ग्राउंड रिपोर्टिंग या आम जनता से जुड़े सरकारी फैसलों को परखने की जरुरत ही ना पड़े। उसकी एवज में सरकार के किसी भी फैसले को सकारात्मक तौर पर तमाम आयामों के साथ इस तरह रखा जाये जिससे पत्रकारिता सूचना संसार में खो जाये।

मसलन झारखंड विश्व बैंक की फेरहिस्त में नंबर 29 से खिसक कर नंबर तीन पर आ गया। इसकी जानकारी प्रधानमंत्री मोदी बांका की अपनी चुनावी रैली में यह कहते हुये देते है कि नीतिश बिहार को 27 वें नंबर से आगे ना बढा पाये, तो खबरों के लिहाज से नीतिश पर हमले या उनकी नाकामी या झारखंड में बीजेपी की सत्ता आने के बाद उसके उपलब्धि से आगे कोई पत्रकारिता जायेगी ही नहीं। यानी झारखंड में कैसे सिर्फ खनन का लाइसेंस नये तरीके से सत्ता के करीबियो को बांटा गया और खनन प्रक्रिया का लाभ झरखंड की जनता को कम उघोगपतियों को ज्यादा हो रहा है। इसपर कोई रिपोर्टिंग नहीं और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट झारखंड के लोगो की बदहाली या इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिशा में सबकुछ कैसे ठप पडा है या फिर रोजगार के साधन और ज्यादा सिमट गये हैं, इस पर केन्द्रित होता ही नहीं है। तो नयी मुशकिल यह नहीं है कि कोई पत्रकार इन आधारों को टटोलने क्यों नहीं निकलता। मुश्किल यह है कि जो प्रधानमंत्री कह दें या बिहार में जो नीतिश कह दें उसके आगे कोई लकीर इस दौर में पत्रकारिता खिंचती नहीं है या पत्रकारिता के नये तौर तरीके ऐसे बना दिये गये है जिससे सत्ता के दिये बयान या दावो को ही आखरी सच करार दे दिया जाये।

अब यह सवाल उठ सकता है कि आखिर ऐसे हालात पेड मीडिया के आगे कैसे है और इस नये हालात के मायने है क्या? असल में मीडिया के सरोकार जनता से हटते हुये कैसे सत्ता से ज्यादा बनते चले गये और सत्ता किस तरह मीडिया पर निर्भर होते हुये मीडिया के तौर तरीकों को ही बदलने में सफल हो गया। समझना यह भी जरुरी है। मौजूदा वक्त में मीडिया हाउस में कारपोरेट की रुची क्या सिर्फ इसलिये है कि मीडिया से मुनाफा बनाया कमाया जा सकता है? या फिर मीडिया को दूसरे धंधो के लिये ढाल बनाया जा सकता है, तो पहला सच तो यही है कि मीडिया कभी अपने आप में बहुत लाभ कमाने का धंधा रहा ही नहीं है। यानी मीडिया के जरीये सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दूसरे धंधो से लाभ कमाने के हालात देखे जा सकते है। लेकिन मौजूदा हालात जिस तेजी से बदले है या कहे बदल रहे है उसमें मीडिया की मौजूदगी अपनी आप में सत्ता होना हो चला है और उसकी सबसे बडी वजह है, बाजार का विस्तार। उपभोक्ताओं की बढती तादाद और देश को देखने समझने का नजरिया।

तमाम टेक्नॉलाजी या कहें सूचना क्रांति के बाद कहीं ज्यादा तेजी से शहर और गांव में संवाद खत्म हुआ है। भारत जैसे देश में आदिवासियों का एक बडा क्षेत्र और जनसंख्या से कोई संवाद देश की मुख्यधारा का है ही नहीं है। इतना ही नहीं दुनिया में आवाजाही का विस्तार जरुर हुआ लेकिन संवाद बनाना कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ा है, क्योंकि सुविधाओ को जुगाडना, या जीने की वस्तुओं को पाने के तरीके या फिर जिन्दगी जीने के लिये जो मागदौल बाजारनुकुल है उसमें सबसे बडी भूमिका टेक्नोलॉजी या मीडिया की ही हो चली है। यानी कल तो हर वस्तु के साथ जो संबंध मनुष्य का बना हुआ था वह घटते-घटते मानव संसाधन को हाशिये पर ले आया है। यानी कोई संवाद किसी से बनाये बगैर सिर्फ टेक्नालॉजी के जरीये आपके घर तक पहुँच सकती है। चाहे सब्जी फल हो या टीवी-फ्रिज या फिर किताब खरीदना हो या कम्यूटर। रेलवे और हवाई जहाज के टिकट के लिये भी अब उफभोक्ताओं को किसी व्यक्ति के संपर्क में आने की कोई जरुरत है ही नहीं। सारे काम, सारी सुविधा की वस्तु, या जीने की जरुरत के सामान मोबाइल–कम्यूटर के जरीये अगर आपके घर तक पहुंच सकते है तो उपभोक्ता समाज के लिये मीडिया की जरुरत सामाजिक संकट, मानवीय मूल्यो से रुबरु होना या देश के हालात है क्या या किसी भी धटना विशेष को लेकर जानकारी तलब करना क्यों जरुरी होगा?

खासकर भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में जहाँ उपभोक्ताओं की तादाद किसी भी यूरोप के देश से ज्यादा हो और दो जून के लिये संघर्ष करते लोगो की तादाद भी इतनी ज़्यादा हो कि यूरोप के कई देश उसमें समा जाये, तो पहला सवाल यही है कि समाज के भी की असमानता और ज्यादा बढे सके। इसके लिए मीडिया काम करेगा या दूरिया पाटने की दिशा में रिपोर्ट दिखायेगा। जाहिर है मीडिया भी पूंजी से विकसित होता माध्यम ही जब बना दिया गया है और असमानता की सबसे बडी वजह पूंजी कमाने के असमान तरीके ही सत्ता की नीतियों के जरीये विस्तार पा रहे हो तो रास्ता जायेगा किधर। लेकिन यह तर्क सतही है। असल सच यह है कि धीरे-धीरे मीडिया को भी उत्पाद में तब्दील किया गया। फिर मीडिया को भी एहसास कराया गया कि उत्पाद के लिये उपभोक्ता चाहिये। फिर उपभोक्ता को मीडिया के जरीये ही यह सियासी समझ दी गई कि विकास की जो रेखा राज्य सत्ता खिंचे वही आखरी सच है। ध्यान दें तो 1991 के बाद आर्थिक सुधार के तीन स्तर देश ने देखे। नरसिंह राव के दौर में सरकारी मीडिया के सामानांतर सरकारी मंच पर निजी मीडिया हाउस को जगह मिली। उसके बाद वाजपेयी के दौर में निजीकरण का विस्तार हुआ। यानी सरकारी कोटा या सब्सीडी भी खत्म हुई।

सरकारी उपक्रम तक की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगे। मनमोहन सिंह के दौर में बाजार को पूंजी के लिये पूरी तरह खोल दिया गया। यानी पूंजी ही बाजार का मानक बन गई और मोदी के दौर में पहली बार उस भारत को मुख्यधारा में लाने के लिये पूंजी और बाजार की खोज शुरु हुई जिस भारत को सरकारी पैकेज तले बीते ढाई दशक से हाशिये पर रखा गया था। पहली बार खुले तौर पर यह मान लिया गया कि 80 करोड भारतीयों को तभी कुछ दिया जा सकता है जब बाकी तीस करोड़ उपभोक्ताओं के लिये एक सुंदर और विकसित भारत बनाया जा सके। लेकिन इस सोच में यह कोई समझ नहीं पाया कि जब पूंजी ही विकास का रास्ता तय करेगी तो सत्ता कोई भी हो वह पूंजी पर ही निर्भर होगी और वह पूंजी कही से भी आये और सत्ता के पूंजी पर निर्भर होने का मतलब है वह तमाम आधार भी उसी पूंजी के मातहत खुद को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत पायेगें जो चुनी हुई सत्ता के हाथ में नहीं बल्कि पूंजी के जरीये बाजार से मुनाफा बनाने के लिये देश की सीमा नहीं बल्कि सीमाहीन बाजार का खुलापन तलाशेगें।

ध्यान दें तो मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिकी है। सेल्स या मार्केटिंग टीम न्यूज रुम पर भारी पडने लगी, तो संपादक भी मैनेजर से होते हुये पूंजी बनाने और जुगाड कराने से आगे निकलते हुये सत्ता से वसूली करते हुये खुद में ही सत्ता बनने के दरवाजे पर टिका। प्रोपराइटर का संपादक हो जाना। समाचार पत्र या न्यूज चैनल के लिये पूंजी का जुगाड करने वाले का संपादक हो जाना। यह सब 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले चलता रहा। लेकिन जिस तर्ज पर 2014 के लोकसभा चुनाव ने सत्ता के बहुआयामी व्यापार को खुल कर सामने रख दिया उसमें खबरो की दुनिया से जुडे पत्रकारो और मालिको को सामने पहली बार यह विकल्प उभरा कि वह सरकार की नीतियो को उसके जरीये बनाये जाने वाली व्यवस्था के साथ कैसे हो सकते है और राज्य के हालात खुद ब खुद उसे मदद दे देगा या फिर उसे खत्म कर देगा। यानी साथ खड़े हैं तो ठीक नहीं तो दुश्मन। यह हालात इसलिये पेड न्यूज से आगे आकर खडे हो गये क्योंकि चाहे अनचाहे अब राज्य को अपने मीडिया बजट का बंदर बाँट अपने साथ खड़े मीडिया हाउस में बाँटने के नहीं थे। बल्कि सत्ता की अकूत ताकत ने खबरों को परोसने के सलीके में भी सत्ता की खुशबू बिखरनी शुरु कर दी। सामाजिक तौर पर सत्ता मीडिया के साथ कैसे खड़ी होगी यह मीडिया के सत्ता के लिये काम करने के मिजाज पर आ टिका।

दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी उन्हीं पत्रकारो के साथ डिनर करेगें जो उनकी चापलूसी में माहिर होगा और पटना में नीतिश कुमार उन्ही पत्रकारो को आगे बढाने में सहयोग देगें जो उनके गुणगाण करने से हिचकेगा नहीं। इसलिये कोई पत्रकार दिल्ली में मोदी हो गया तो कोई पत्रकार पटना में नीतिश कुमार और जो-जो पत्रकार सत्ता से खुले तौर पर जुडा नजर आया उसे लगा कि वह खुद में सत्ता है। यानी सबसे ताकतवर है। असर में बिहार चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो चला है कि पहली बार नायको की खोज से चुनाव जा जुडा है। यानी 1989 में लालू यादव मंडल के नायक बने तो 2010 में नीतिश सुशासन के नायक बने और 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी देश के विकास नायक बन कर उभरे। ध्यान दें तो इसके अलावे सिर्फ दिल्ली के चुनाव ने केजरीवाल के तौर पर नायक की छवि गढी। लेकिन केजरीवाल का नायककत्व पारंपरिक राजनीतिक को बदलने के लिये था ना कि नायक बन कर उसमें ढलने के लिये। लेकिन 2015 के आखिर में बिहार चुनाव की जीत हार में तय यही होना है कि विदेशी पूंजी और खुले बाजार व्यवस्था के जरीये भारत को बदलने वाला नायक चाहिये या फिर जातिय गठबंधन के आसरे सामाजिक न्याय की सोच को आगे बढाने वाला नायक चाहिये।

जाहिर है बिहार जिस रास्ते पर जायेगा उसका असर देश की राजनीति पर पडेगा, क्योंकि चुनाव के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की नायक छवि है और दूसरी तरफ चकाचौंध नायकत्व को चुनौती देने वाले नीतिश – लालू है। यानी यही हालात यूपी में भी टकरायेगें। अगर बिहार लालू नीतिश का रास्ता चुनता है तो यकीन मानिये मुलायम-मायावती भी दुश्मनी छोड गद्दी के लिये साथ आ खडे होगें ही। यानी 2 जून 1995 का गेस्ट हाउस कांड एक याद भर रह जायेगा और इससे पहले जो थ्योरी गठबंधन के फार्मूले में फेल होती रही वह फार्मूला चल पडेगा। यानी दो बराबर की पार्टियों में गठबंधन। जाहिर है राजनीतिक बदलाव का असर मीडिया पर भी पडेगा। क्योंकि सत्ता के साथ वैचारिक तौर पर खड़े होकर पूंजी या मुनाफा बनाने से आगे खुद को सत्ता मानने की सोच को मान्यता मिले या सत्ता के सामाजिक सरोकार का ताना-बाना बुनते हुये कारपोरेट या पूंजी की सत्ता को ही चुनौती देनी वाली पत्रकारिता रहे। फैसला इसका भी होना है, लेकिन दोनो हालात छोटे घेरे में मीडिया को वैसे ही बड़ा कर रहे है जैसे अमेरिका में मड्रोक सत्ता को प्रभावित करने की स्थिति में है वैसे ही भारत में सत्ता के लिये मीडिया सबसे असरकारक हथियार बन चुका है। फर्क इतना ही है कि वहा पूंजी तय कर रही है और भारत में सत्ता की ताकत।

आजतक न्यूज चैनल से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- आखिर मुनव्वर राणा को लेकर संघ परेशान क्यों है?

: मुनव्वर राणा का दर्द और संघ परिवार की मुश्किल : ”आप सम्मान वापस लौटाने के अपने एलान को वापस तो लीजिये। एक संवाद तो बनाइये। सरकार की तरफ से मैं आपसे कह रहा हूं कि आप सम्मान लौटाने को वापस लीजिये, देश में एक अच्छे माहौल की दिशा में यह बड़ा कदम होगा। आप पहले सम्मान लौटाने को वापस तो लीजिये। यहीं न्यूज चैनल की बहस के बीच में आप कह दीजिये। देश में बहुत सारे लोग देख रहे हैं। आप कहिए इससे देश में अच्छा माहौल बनेगा।” 19 अक्टूबर को आजतक पर हो रही बहस के बीच में जब संघ विचारक राकेश सिन्हा ने उर्दू के मशहू शायर मुनव्वर राणा से अकादमी सम्मान वापस लौटाने के एलान को वापस लेने की गुहार बार बार लगायी तब हो सकता है जो भी देख रहा हो उसके जहन में मेरी तरह ही यह सवाल जरूर उठा होगा कि चौबीस घंटे पहले ही तो मुनव्वर राणा ने एक दूसरे न्यूज चैनल एबीपी न्यूज पर बीच बहस में अकादमी सम्मान लौटाने का एलान किया था तो यही संघ विचारक बाकायदा पिल पड़े थे। ना जाने कैसे कैसे आरोप किस किस तरह जड़ दिये।

लेकिन महज चौबीस घंटे बाद ही संघ विचारक के मिजाज बदल गये तो क्यों बदल गये। क्योंकि आकादमी सम्मान लौटाने वालों को लेकर संघ परिवार ने इससे पहले हर किसी पर सीधे वार किये। कभी कहा- लोकप्रिय होने के लिये। तो कभी कहा- न्यूज चैनलों में छाये रहने के लिये। तो कभी कहा- ”यह सभी नेहरु की सोच से पैदा हुये साहित्यकार हैं, जिन्हें कांग्रेसियों और वामपंथियों ने पाला पोसा। अब देश में सत्ता पलट गई तो यही साहित्यकार बर्दाश्त कर नहीं पा रहे हैं।”

सिर्फ हिंसा नहीं हुई बाकी वाक युद्ध तो हर किसी ने न्यूज चैनलों में देखा ही, सुना ही। और यही हाल 18 अक्टूबर को उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राणा के साथ भी हुआ। लेकिन अंदरुनी सच यह है कि जैसे ही मुनव्वर राणा ने अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया, सरकार की घिग्गी बंध गई। संघ परिवार के गले में मुनव्वर का सम्मान लौटाना हड्डी फंसने सरीखा हो गया। क्योंकि अकादमी सम्मान लौटाने वालों की फेरहिस्त में मुनव्वर राणा पहला नाम थे जिन्हें साहित्य अकादमी सम्मान देश में सत्ता परिवर्तन के बाद मिला। सीधे कहें तो मोदी सरकार के वक्त मिला। 19 दिसबंर 2014 को जिन 59 साहित्यकार, लेखक, कवियों को अकादमी सम्मान दिया गये उनमें मुनव्वर राणा अकेले शख्स निकले जिन्होंने उसी सरकार को सम्मान लौटा दिया जिस सरकार ने दस महीने पहले सम्मान दिया था। यानी नेहरु की सोच या कांग्रेस-वाम के पाले पोसे आरोपों में भी मुनव्वर राणा फिट नहीं बैठते।

तो यह मुश्किल मोदी सरकार के सामने तो आ ही गई। लेकिन सवाल सिर्फ मोदी सरकार के दिये सम्मान को मोदी सरकार को ही लौटाने भर का नहीं है। क्योंकि संघ विचारक के बार बार सम्मान लौटाने को वापस लेने की गुहार के बाद भी अपनी शायरी से ही जब शायर मुन्नर राणा यह कहकर स्टूडियो में जबाब देने लगे कि, ”हम तो शायर है सियासत नहीं आती हमको/ हम से मुंह देखकर लहजा नहीं बदला जाता” तो मेरी रुचि भी जागी कि आखिर मुनव्वर राणा को लेकर संघ परेशान क्यों है, तो मुनव्वर राणा के स्टूडियो से निकलते ही जब उनसे बातचीत शुरू हुई और संघ की मान-मनौव्वल पर पूछा तो उन्होंने तुरंत शायरी दाग दी, ”जब रुलाया है तो हंसने पर ना मजबूर करो / रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता।”

यह तो ठीक है मुनव्वर साहेब लेकिन कल तक जो आपको लेकर चिल्लम-पों कर रहे थे, आज गुहार क्यों लगा रहे हैं?

अरे हुजूर यह दौर प्रवक्ताओं का है। और जिन्हें देश का ही इतिहास भूगोल नहीं पता वह मेरा इतिहास कहां से जानेंगे। कोई इन्हें बताये तो फिर बोल बदल जायेंगे। यह जानते नहीं कि शायर किसी के कंधे के सहारे नहीं चलता। और मैं तो हर दिल अजीज रहा हूं क्योंकि मैं खिलंदड़ हूं। मेरा जीवन बिना नक्शे के मकान की तरह है। पिताजी जब थे तो पैसे होने पर कभी पायजामा बनाकर काम पर लौट जाते तो कभी कुर्ता बनवाते। और इसी तर्ज पर मेरे पास कुछ पैसे जब होते तो घर की एक दीवार बनवा लेते। कुछ पैसे और आते तो दीवार में खिड़की निकलवा लेता। अब यह मेरे उपर सोनिया गांधी के उपर लिखी कविता का जिक्र कर मुझे कठघरे में खडा कर रहे हैं। तो यह नहीं जानते कि मेरा तो काफी वक्त केशव कुंज [दिल्ली में संघ हेडक्वार्टर] में भी गुजरा। मैंने तो नमाज तक केशव कुंज में अदा की है। तरुण विजय मेरे अच्छे मित्र हैं। क्योंकि एक वक्त उनसे कुम्भ के दौरान उनकी मां के साथ मुलाकात हो गई। तो तभी से। एक वक्त तो आडवाणी जी से भी मुलाकात हुई। आडवाणी जी के कहने पर मैंने सिन्धु नदीं पर भी कविता लिखी। सिन्धु नदी को मैंने मां कहकर संबोधित किया। यह नौसिखियों का दौर है इसलिये इन्हें हर शायरी के मायने समझाने पड़ते हैं। और यह हर शायरी को किसी व्यक्ति या वक्त से जोड़कर अपनी सियासत को हवा देते रहते हैं। मैंने तो सोनिया पर लिखा, ”मैं तो भारत में मोहब्बत के लिये आई थी /कौन कहता है हुकूमत के लिये आई थी / नफरतों ने मेरे चेहरे का उजाला छीना/ जो मेरे पास था वो चाहने वाला छीना”। शायर तो हर किसी पर लिखता है। जिस दिन दिल कहेगा उन दिन मोदी जी पर भी शायरी चलेगी। अब नयी पीढ़ी के प्रवक्ता क्या जाने कि संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने मेरे उपर लिखा और कांग्रेस की पत्रिका में भी मेरी शायरी का जिक्र हो चुका है। तो फिर एसे वैसो के सम्मान वापस लौटाने के बाद कदम पीछे खींचने की गुहार का मतलब कुछ नहीं, ”सबों के कहने से इरादा नहीं बदला जाता / हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता।”

तो यह माना जाये मौजूदा वक्त से आप खौफजदा ज्यादा हैं?

सवाल खौफ का नहीं है। सवाल है कुछ लिख दो तो मां की गालियां पड़ती है। यह मैंने ही लिखा, ”मामूली एक कलम से कहां तक घसीट लाए / हम इस गजल को कोठे से मां तक घसीट लाए।” लेकिन हालात ऐसे है जो रुठे हुये है तो मुझे अपनी ही नज्म याद आती है- ”लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती / बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती।”

लेकिन सवाल सिर्फ गालियों का नहीं है सवाल तो देश का भी है?

ठीक कह रहे हैं आप। कहां ले जाकर डुबोयेगें उन्हें जिन्हें आप गालियां देते है। कहते हैं कि औरंगजेब और नाथूराम गोडसे एक था। क्योंकि दाराशिकोह को मारने वाला भी हत्यारा और महात्मा गांधी को मारने वाला भी हत्यारा। तब तो कल आप दाराशिकोह को महात्मा गांधी कह देंगे। इतिहास बदला नहीं जाता । रचा जाता है। यह समझ जब आ जायेगी। तब आ जायेगी। अभी तो इतना ही कि, ”ऐ अंधेरे! देख लें मुंह तेरा काला हो गया / मां ने आंखे खोल दी घर में उजाला हो गया।”

आजतक न्यूज चैनल से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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आप तो ऐसे न थे मुनव्वर राणा

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मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है। और, पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुले तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये। सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं। क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान। यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानों के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है। बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है। केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया। यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है, इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और, इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरू हुआ। असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है।

इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह ‘निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को’ लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहों ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है। इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है। और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उस पर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं। इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है, कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में।

इसी के समानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये। जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी। इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का। अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही। तो मीडिया इस पर भी बंट गई। जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है। जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है, वह बिका हुआ है। किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी। तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया। किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता। और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है। जैन बिल्डर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती। और, इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता नजदीक जाता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं।

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है। मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुश्मन है। यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज। देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग। या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो, उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये।

पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नेक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये। और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

1991 के बाद राजनीतिक सत्ता ने जिस तेजी से अर्थव्यवस्था को लेकर पटरी बदली उसने झटके में उस सामाजिक बंदिशों को ही तोड़ दिया, जहां दो जून की रोटी के लिये तड़पते लोगों के बीच मर्सिर्डिज गाड़ी से घूमने पर अपराध बोध होता। बंदिशें टूटी तो सत्ता का नजरिया भी बदला और पत्रकारिता के तौर तरीके भी बदले। बंदिशें टूटी तो उस सांस्कृतिक मूल्यों पर असर पड़ा जो आम जन को मुख्यधारा से जोड़ने के लिये बेचैन दिखती। लेखन पर असर पड़ा। संवैधानिक संस्थाएं सत्ता के आगे नतमस्तक हुईं और झटके में सत्ता को यह एहसास होने लगा कि वही देश है। यानी चुनावी जीत ने पांच साल के लिये देश की चाबी कुछ इस तरह राजनीतिक सत्ता के हवाले कर दी कि संविधान के तहत कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका जहां एक दूसरे को संभालते वहीं आधुनिक सत्ता के छाये तले सभी एक सरीखे और एक सुर में करार दे दिये गये। इसी कड़ी में शामिल होने में मीडिया ने भी देर नहीं लगायी क्योंकि सारी जरुरते पूंजी पर टिकी। मुनाफा मूल मंत्र बन गया।

 

हर संवैधानिक संस्था को संभाले चौकीदार सत्ता के लिये बदलते दिखे। सीबीआई हो या कैग या सीवीसी। झटके में सभी दागदार या कहे सत्ता से प्रभावित दिखे। लेकिन उनकी संवैधानिक छवि ने उनकी आवाज को ही हेडलाइन बनाया। यानी सत्ता अगरखुद दागदार हुई तो उसने सिस्टम के उन्हीं आधारों को अपना ढाल बनाना शुरू किया जिन्हें सत्ता पर निगरानी रखनी थी। यानी सत्ता का कहना ही हेडलाइन बन गई। और सत्ता की हर क्षेत्र को लेकर परिभाषाये ही मीडिया की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट मान ली गई। इस सत्ता का मतलब सिर्फ दिल्ली यानी केन्द्र सरकार भर ही नहीं रहा। बल्कि चौखम्भा राज सत्ता ने राष्ट्रीय अखबारों और न्यूज चैनलों से लेकर क्षेत्रीय और जिले स्तर के अखबार और टीवी चैनलों को भी प्रभावित किया। और इसकी सबसे बड़ी वजह यही रही कि जिस भी राजनीतिक दल को सत्ता मिलती है उसके इशारे पर समूची व्यवस्था खुद ब खुद चल पड़ती है। यानी एक वक्त कल्याणकारी राज्य की बात थी जो राज्यसत्ता की जिम्मेदारी थी। लेकिन अब बाजारवाद है तो खुद का खर्चा हर संस्थानों को खुद ही निकालना चलाना है। और खर्चा निकालने-चलाने में राज्यसत्ता की जहां जहा हरी झंडी चाहिये उसके लिये सत्ता के मातहत संस्थानों के नौकरशाह, पुलिस, अधिकारी निजी संस्थानो के लिये वजीर बने बैठे हैं। लेकिन सत्ता के लिये वही प्यादे हैं जो पूंजी बनाने कमाने के लिये शह-मात का खेल बाखूबी खेलते हैं। यानी मीडिया के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह या तो सत्ता की परिभाषा बदल दे या फिर सत्ता के ही रंग में रंगा नजर आये।

समूचा तंत्र ही जब सत्ता के इशारे पर काम करने लगता है तो होता क्या है, यह भी किसी से छुपा नहीं है। गुजरात में पुलिस नरेन्द्र मोदी की हो गई था तो 2002 के दंगों ने दुनिया के सामने राजधर्म का पालन ना करने का सबसे वीभत्स चेहरा रखा। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या को बड़े वृक्ष के गिरने से हिलती जमीन को देखने की सत्ता की चाहत में खुलेआम नरसंहार हुआ। शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में शिंकजा कसा तो लाखों छात्रों की प्रतियोगी परीक्षा धंधे में बदल गई। रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में शिंकजा कसा तो आदिवासियों के हिस्से का चावल भी सत्ताधारी डकारने से नहीं चूके। उत्तर प्रदेश में तो सत्ता चलाने और चलवाने का ऐसा समाजवाद दिखा की हर संस्था का रंग सत्ता के रंग में रंग दिया गया या फिर खौफ ने रंगने को मजबूर कर दिया। कलम चली तो हत्या भी हुई। और हत्या किसने की यह सवाल सियासी बिसात पर कुछ इस तरह गायब किया गया जिससे लगे कि सवाल करने या जवाब पूछने पर आपकी भी हत्या हो सकती है। सिर्फ यूपी ही क्यों बंगाल में भी मां, माटी, मानुष का रंग लाल हो गया। पत्रकार को गायब करना या निशाने पर लेने के नये हालात पैदा हुये। मध्यप्रदेश तो रहस्यमयी तरीके से पत्रकारिता को अपने चंगुल में फांसने में लगा। इसलिये व्यापम पर रिपोर्ट तैयार करने गये दिल्ली के पत्रकार की मौत को भी रहस्य में ही उलझा दिया गया।

मुश्किल सिर्फ इतनी भर नहीं है कि पत्रकारिता और मीडिया हाउस सत्ता के लिये एक बेहतरीन हथियार बन चुके है मुश्किल यह भी है कि सत्ता कभी हथियार तो कभी ढाल के तौर पर मीडिया का इस्तेमाल करने से नहीं चूकती और मीडिया के सामने मजबूरी यह हो चली है कि उसने जिस बिजनेस माडल को चुना है वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं है। वजह भी यही है कि झटके में कारपोरेट का कब्जा मीडिया पर बढ रहा है और मीडिया पर कब्जाकर कारपोरेट अपनी सौदेबाजी का दायरा सत्ता से सीधे करने वाले हालात में है। अब यहा सवाल यह उठ सकता है कि जब पत्रकार या मीडिया की साख उसकी विश्वसनीयता का आधार खबरों को लेकर इमानदारी ही है तो फिर सौदेबाजी पर टिके मीडिया हाउस को जनता देखेगी क्यों। तो इसका तो जवाब आसान है कि सभी को एक सरीखा कर दो अंतर दिखायी देंगे ही कहां। लेकिन जो सवाल मीडिया को विकसित करने के बिजनेस मॉडल के तहत दब जाता है उसमें समझना यह भी होगा कि एक वक्त के बाद संपादक भी कारपोरेट के रास्ते क्यों चल पडता है। मसलन टीवी18 जिस तरह पत्रकार मालिकों के हाथ से निकल कर कारपोरेट के पास चला गया उसमें टीवी18 की साख बिकी। न कि कोई बिल्डिंग। और पत्रकारों ने जिस मेहनत से एक मीडिया हाउस को खड़ा किया उसे कहीं ज्यादा रकम देकर अगर कोई कारपोरेट खरीद लेता है तो जिम्मेदारी होगी किसकी। यानी हमारे यहां इसकी कोई व्यवस्था ही नहीं है कि किसी मीडिया हाउस में काम कर रहे पत्रकारों की मेहनत उन्हें कंपनी के शेयर में हिस्सादारी देकर ऐसा चेक-बैलेंस खडा कर दें जिससे कोई कारपोरेट हिस्सेदारी के लिये किसी संस्थान को खरीदने निकले तो उसे सिर्फ एक या दो पत्रकार मालिकों से नहीं बल्कि पत्रकारों के ही बोर्ड से दो दो हाथ करने पड़ें। या फिर मीडिया हाउस पत्रकारों के हाथ में ठीक उसी तरह रहे जैसे खबरों को लेकर पत्रकार मेहनत कर अपने संस्थान को साख दिलाता है।

…समाप्त…

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने माने पत्रकार हैं. इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.


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(पार्ट एक) क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है

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(पार्ट दो) सत्ता-मीडिया गठजोड़ सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया

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(पार्ट दो) सत्ता-मीडिया गठजोड़ सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया : पुण्य प्रसून बाजपेयी

आजादी के तुरंत बाद देश को किसी पार्टी की सरकार नहीं बल्कि राष्ट्रीय सरकार मिली थी। इसीलिये नेहरु के मंत्रिमंडल में वह सभी चेहरे थे जिन चेहरों के आसरे आज राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिये टकराते हैं। यानी 68 बरस पहले 1947 में सवाल देश का था तो नेहरु की अगुवाई में देश के कानून मंत्री बीआर आंबेडकर थे। गृह मंत्री सरदार पटेल थे। तो शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और इंडस्ट्री-सप्लाई मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इसी तर्ज पर अठारह कैबिनेट मंत्री अलग अलग जाति-सप्रदाय-धर्म-भाषा-सूबे के थे। जो मिलकर देश को दिशा देने निकले। तो पत्रकारिता भी देश को ले कर ही सीधे सवाल नेहरु की सत्ता से करने की हिम्मत रखती थी।

असर इसी का था कि संसद के भीतर की बहस हो या सड़क पर हिन्दू महासभा से लेकर समाजवादियो का विरोध। लोहिया के तीखे सवाल हो या गैर कांग्रेसवाद का नारा लगाते हुये कांग्रेस विरोधी संगठन और पार्टियों को लाने की कवायद। हर सोच के पीछे देश को समझने और भारत के हर सूबे-संप्रदाय-धर्म तक न्यूनतम जरूरतों को पहुंचाने की होड़ थी। यही हर राजनीतिक दल के घोषणापत्र का एलान था और यही समझ हर राजनेता के कद को बढाती कि उसे देश की कितनी समझ है। तब लड़ाई न्यूनतम जरूरतों को लेकर थी। यानी सिर्फ हिन्दू या मुस्लिम। या फिर आर्य-द्रविड़ कहने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि सूबे-दर-सूबे न्यूनतम जरूरतों को कैसे पहुंचाया जा सकता है, यह प्रमुख था। खेत-मजदूर के सवाल देश के सवाल थे। आदिवासियों के सवाल थे। अल्पसंख्यकों की मुश्किलात का जिक्र था। देश के तमाम संस्थान देश को बांधने में लगे थे। तो पत्रकारिता के सामने सत्ता को लेकर सारे सवाल अवाम से जुडे थे। क्योंकि राजनीतिक सत्ता के सारे राजनीतिक सरोकार पहले जनता से जुडे थे। इसीलिये मुद्दा सांप्रादियकता का हो या किसानों का। मुद्दा विकास का हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर का। हर हालात देश के भीतरी माहौल से ही टकराते और उसी में रास्ता निकालने की कोशिश होती। देश के सामाजिक-आर्थिक चेहेरे से इतर टाटा-बिड़ला सरीखे उद्योगपति भी नहीं देख पाते और अखबारी पत्रकारिता और उसके संपादक की कलम भी आम जनता के सरोकार से जुडकर सवाल भी उठाती और सत्ता को प्रभावित करने वाली रिपोर्ट को लेकर सौदेबाजी का दायरा भी राजनीतिक दलाली की जगह सत्ता से टकराने का हुकूक दिखाने को तैयार हो जाता।

इस दौर तक संपादक, पत्रकार और मीडिया संस्थान अक्सर रिपोर्ट या लेखनी के जरिये बंटते भी और अलग-अलग दिखायी भी देते। संजय गांधी की जनता कार यानी मारुति पर पहली रिपोर्ट टीएन निनान ने लिखी। लेकिन उसे बिजनेस स्टैन्डर्ड ने नहीं छापा। तो वह रिपोर्ट इंडिया टुडे में छपी। कमोवेश एक लंबा इतिहास रहा है जब किसी रिपोर्टर या किसी संपादक ने संस्थान इसलिये छोड़ा क्योंकि उसकी रिपोर्ट सत्ता के दबाव में नहीं छपी। या फिर सत्ता ने संपादक को ही बदलवा दिया। जैसे कुलदीप नैयर को सत्ता के इशारे पर हटाया गया। लेकिन वह पत्रकारिता के हिम्मत का दौर था। वह राजनीतिक सत्ता के रिपोर्ट से खौफजदा होने का भी दौर था। यानी मीडिया का प्रभाव जनता में और जनता को प्रभावित कर सत्ता पाने की राजनीति। शायद इसीलिये हर कद्दावर राजनेता का लेखन या पत्रकारिता से जुडाव भी उस दौर में देखा जा सकता है। और संपादकों में संसद जाने की लालसा को भी देखा जा सकता था।

एक लिहाज से समझे तो पत्रकारिता देश को जानने समझने के लिये ही नहीं बल्कि राजनेताओं को दिशा देने की स्थिति में भी रही। उस पर भी साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक पाया गया। इसलिये विभन्न भाषाओं के साहित्यकार भी संपादक बने और राजनीतिक तौर पर किस दिशा में देश को आगे बढना है या संसद के कानून बनाने को लेकर किसी भी मुद्दे पर पत्रकारिता ने बड़ी लंबी लंबी बहस की, जिसने देश को रास्ता दिखाने का काम किया क्योंकि तब राजनीति का आधार और पत्रकारिता की पूंजी जनता थी। बहुसंख्यक आम जनता। लेकिन 1991 के बाद बाजार देश पर हावी हुआ। देश की सीमा पूंजी के लिये पिघलने लगी। उपभोक्ता और नागरिक के बीच लकीर दिखायी देने लगीं। सरोकार सिमटने लगे। समाज के भीतर ही संवादहीनता की स्थिति बनने लगी।

नेहरु, शास्त्री या इंदिरा गांधी आदिवासी गौंडी भाषा भी समझ लेते थी या फिर संवाद के लिये आदिवासियों के बीच एक द्विभाषिए को साथ ले जाते थे। पत्रकार आदिवासियों से संपर्क साध कर उनकी भाषा के जरिये उनके संवाद को कागज पर उकेरता। या फिर दंगों की रिपोर्टिंग या संपादकीय में पत्रकार दंगों से प्रभावित सच तक पहुंचने की जद्दोजहद करता नजर आता। उन रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही पता चलता कि कौन संपादक कितना बड़ा है और किस राजनीतिक दल या राजनेता के सरोकार दंगाईयों से रहे। एक चैक-एंड बैलेंस लगातार काम करते रहता क्योंकि पत्रकारिता की पूंजी जनता की मान्यता थी और पत्रकार की वही साख सत्ता को भी परेशान करती। जब बाजार का मतलब पूंजी और पूंजी का मतलब मुनाफा हुआ तो देश का मतलब भी पूंजी पर टिका विकास हुआ।

…जारी…

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने माने पत्रकार हैं. इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.


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(पार्ट एक) क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है

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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं

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(पार्ट एक) क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

आजादी के 68 बरस बाद यह सोचना कि मीडिया कितना स्वतंत्र है, अपने आप में कम त्रासद नहीं है। खासकर तब जबकि सत्ता और मीडिया की साठगांठ खुले तौर पर या तो खुशहाल जिन्दगी जीने और परोसने का नाटक कर रही हो या फिर कभी विकास के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर मीडिया को धंधे में बदलने की बिसात को ही चौथा स्तंम्भ करार देने नहीं चूक रही हो। तो क्या सियासी बिसात पर मीडिया भी अब एक प्यादा है। और प्यादा बनकर खुद को वजीर बनाने का हुनर ही पत्रकारिता हो चली है। जाहिर है यह ऐसे सवाल है जिनका जवाब कौन देगा, यह कहना मुश्किल है लेकिन सवालों की परतों पर परत उघाडें तो मीडिया का सच डरा भी सकता है और आजादी का जश्न सत्ता से मोहभंग कर भी सकता है। क्योंकि माना यही जाता है कि मीडिया के सामने सबसे बडी चुनौती आपातकाल में आई। तब दिखायी दे रहा था कि आपातकाल का मतलब ही बोलने-लिखने की आजादी पर प्रतिबंध है। लेकिन यह एहसास 1991 के आर्थिक सुधार के बाद धीरे धीरे काफूर होता चला गया कि आपातकाल सरीखा कुछ अब देश में लग सकता है जहां सेंसरशिप या प्रतिबंध का खुल्लम खुल्ला एलान हो।

दरअसल देश का नजरिया ही इस दौर में ऐसा बदला जहां मीडिया की परिभाषा बदलने लगी तो फिर सेंसरशिप सरीखे सोच का मिजाज भी बदलेगा। शायद इसीलिये पहला सवाल मीडिया को लेकर यह भी उभरा कि क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है। विकास के नाम पर बाजार व्यवस्था को विस्तार दिया गया। मीडिया पूंजी पर आश्रित होती चली जा रही है। तो बोलना-लिखना भी मीडिया संस्थानों के मुनाफे घाटे से जुड़ने लगा। यानी जो पत्रकारिता जनमानस के सवाल उठाकर सत्ता को बेचैन करती वही मीडिया सत्ता की उपलब्धि बताकर जनमानस को सत्ता के लिये अभ्यस्त करने में लग गई। असर इसी का हुआ कि व्यवस्था चलाते संवैधानिक संस्थानों की धार भी राजनीतिक सत्ता के सामने भोथरी होने लगी। ऐसे में अपनी नयी जमीन बनाते-तलाशते चौथे स्तम्भ को 2015 तक पहुंचते पहुंचते रास यही आने लगा कि रात के अंधेरे में सत्ता के साथ गलबहियां डाली जायें और सुबह-सुबह अखबारों में या ढलती शाम के साथ चैनलों के प्राइम टाइम में राजनीतिक जमीन सत्ता के लिये मजबूत किया जाये। इससे विकास की परिभाषा भूखे-नंगों के देश के बदले करोड़पतियों की बढ़ती तादाद पर टिके। विदेशी पूंजी या चुनिंदे मित्र कारपोरेट के साथ गलबहियां करते हुये इन्फ्रास्ट्रक्चर का राग अलाप कर क्रोनी कैपटलिज्म के अपराध को सांगठनिक व्यवस्था में बदल दिया जाये।

तो मीडिया का असल संकट पत्रकारिता के उस बदलाव से शुरु होता है जो सत्ता के विरोध और निगरानी के बदले खुद की सत्ता बनाने की जद्दोजहद को ही पत्रकारिता मान बैठी। यानी एक दौर में सत्ता से दो दो हाथ करते हुये सत्ता बदलने की ताकत को ही “जर्नलिज्म आफ करेज” माना गया तो एक वक्त पत्रकारिता की ताकत मीडिया हाउस शब्द पर जा टिकी। पत्रकारिता को किस महीन तरीके से मीडिया संस्थानों ने हड़पा और कैसे संपादक संपादकीय पेज से निकल कर संस्थानों के टर्न ओवर [बैंलेस शीट] में सिमटने लगा, और किस हुनर से मीडिया संस्थानों के टर्न-ओवर को अपनी मुट्ठी में सत्ता ने कर लिया, यह उपभोक्ताओं के हिन्दुस्तान में कोई समझ ही नहीं पाया।

और, असल भारत जब तक इस हकीकत को समझने की हालात में आता तब तक उपभोक्ता समाज को ही असल भारत करार देने में वही मीडिया जुट गया जिसके भीतर बदलते मीडिया के चेहरों से ही दो दो हाथ करने की बेचैनी थी। जिसे सत्ता पर निगरानी करनी थी। जिसे अपनी रिपोर्टों से किसान-मजदूर के भारत की अनदेखी पर सवाल खड़े करने थे। क्योंकि जैसे ही जनमानस को लेकर किसी पत्रकार ने सवाल उठाये, जैसे ही किसी मीडिया हाउस के तेवर सत्ता को चिकोटी काटने लगे, वैसे ही सिस्टम सक्रिय होने लगा। जो मीडिया को बिके होने या विरोधी राजनीतिक दल या धारा का बताकर हमला करने लगा। सत्ता वहां सफल नहीं हुई तो हमला उस पूंजी पर ताले लगाने से शुरू हुआ जिस पर कभी अखबारी कागज के जरिये होता था। लेकिन अब लाइसेंस रद्द करने या विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को लेकर होता है। अगर हाथ वहां भी फिसले तो फिर सत्ता को हिंसक होने में भी देर नहीं लगती। और यहीं से पत्रकार और मीडिया हाउस के बीच एक लकीर भी नजर आती है।

पत्रकारिता का रास्ता बंद गली के आखिरी छोर पर दीवार से टकराते हुये भी नजर आता है क्योंकि पत्रकारों के हाथ में पूंजी पर टिके वह औजार होते नहीं है जिसके जरिये वह मीडिया में तब्दील हो सके या पत्रकारिता को ही मीडिया में बदल सके। मीडिया के लिये बनायी व्यवस्था मीडिया हाउस को ही पत्रकारिता का खिताब देती है। लेकिन मीडिया कैसे किस रूप में भटका, इसे समझने से पहले बदलती राजनीतिक सत्ता और उसकी प्राथमिकता को भी समझना जरूरी है।

…जारी…

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने माने पत्रकार हैं. इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.


इसके आगे का पार्ट दो और पार्ट तीन पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें :

(पार्ट दो) सत्ता-मीडिया गठजोड़ सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया

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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं

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सत्ता की ताकत तले ढहते संस्थान : हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्ती होने लगी….

याद कीजिये तो एक वक्त सीबीआई, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख को लेकर आवाज उठी थी। वह दौर मनमोहन सिंह का था और आवाज उठाने वाले बीजेपी के वही नेता थे जो आज सत्ता में हैं। और अब प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता के आगे नतमस्तक होते तमाम संस्थानों की साख को लेकर कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष ही सवाल उठा रहा है। तो क्या आपातकाल के चालीस बरस बाद संस्थानों के ढहने और राजनीतिक सत्ता की आकूत ताकत के आगे लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल रही है। यानी आपातकाल के चालीस बरस बाद यह सवाल बड़ा होने लगा है कि देश में राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे क्यों कोई संस्था काम कर नहीं सकती या फिर राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र के हर पाये को मान लिया जा रहा है। क्योंकि इसी दौर में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर संसद की स्टैंन्डिग कमेटी बेमानी साबित की जानी लगी। राज्य सभा की जरुरत को लेकर सवाल उठने लगे। और ऊपरी सदन को सरकार के कामकाज में बाधा माना जाने लगा।

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सत्ता ने सवाल उठाये। कोलेजियम के जरीये न्यायपालिका की पारदर्शिता देखी जाने लगी। कारपोरेट पूंजी के आसरे हर संस्थान को विकास से जोड़कर एक नई परिभाषा तय की जाने लगी। कामगार यूनियनें बेमानी करार दे दी गई या माहौल ही ऐसा बना दिया गया है जहां विकास के रास्ते में यूनियन का कामकाज रोड़ा लगने लगे। किसानो से जुड़े सवाल विकास की योजनाओं के सामने कैसे खारिज हो सकते है यह आर्थिक सुधार के नाम पर खुल कर उभरा। सत्ताधारी के सामने नौकरशाही चूहे में बदलती दिखी। और यह सब झटके में हो गया ऐसा भी नहीं है । बल्कि आर्थिक सुधार के बाद देश को जिस रास्ते पर लाने का प्रयास किया गया उसमें ‘ पंजाब, सिंध , गुजरात,मराठा / द्रविड, उत्कल बंग …” सरीखी सोच खारिज होने लगी । क्योकि भारत की विवधता , भारत के अनेक रंगो को पूंजी के धागे में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश शुरु हुई कि देश के विकास या उसके बौद्दिक होने तक को मुनाफा से जोडा जाने लगा । असर इसी का है कि विदेशी पूंजी के बगैर भारत में कोई उत्पाद बन नहीं सकता है यह संदेश जोर-शोर से दी जाने लगी । लेकिन संकट तो इसके भी आगे का है ।

भारत को लेकर जो समझ संविधान या राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान तक में झलकती है उसे सत्ता ने अपने अनुकूल विचारधारा के जरीये हडपने की समझ भी विकसित कर ली। असर इसी का हुआ कि बाजारवाद की विचारधारा ने विकास के नाम पर संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये। तो एक वक्त सूचना के अधिकार के नाम पर हर संस्थान के दरवाजे थोड़े बहुत खोल कर लोकतंत्र की हवा सत्ता के जरीये बहाने की कोशिश हुई। तो मौजूदा वक्त में जनादेश के आसे सत्ता पाने वालो ने खुद को ही लोकतंत्र मान लिया और हर दरवाजे अपने लिये खोल कर साफ संकेत देने की कोशिश शुरु की पांच बरस तक सत्ता की हर पहल देश के लिये है। तो इस घड़ी में सूचना का अधिकार सत्ता की पंसद नापंसद पर आ टिका। और सत्ता जिस विचारधारा से निकली उसे राष्ट्रीय धारा मान कर राष्ट्रवाद की परिकल्पना भी सियासी विचारधारा के मातहत ही परिभाषित करने की कोशिश शुरू हुई। इसी का असर नये तरीके से शुरु हुआ कि हर क्षेत्र में सत्ता की मातृ विचारधारा को ही राष्ट्र की विचारधारा मानकर संविधान की उस डोर को ही खत्म करने की पहल होने लगी जिसमें नागरिक के अधिकार राजनीतिक सत्ता से जुड़े बगैर मिल नहीं सकते।

हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्ती होने लगी। गुड गवर्नेंस झटके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आईने में कैसे उतारा गया यह किसी को पता भी नहीं चला या कहे सबको पता चला लेकिन इसे सत्ता का अधिकार मान लिया गया । बच्चों के मन से लेकर देश के धन तक पर एक ही विचारधारा के लोग कैसे काबिज हो सारे यत्न इसी के लिये किये जाने लगे। नवोदय विघालय हो या सीबाएसई बोर्ड। देश के 45 केन्द्रीय विश्विघालय हो या उच्च शिक्षा के संस्थान आईआईटी या आईआईएम हर जगह को भगवा रंग में रंगने की कोशिश शुरु हुई। उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता को सत्ता अपने अधिन लाने के लिये मशक्कत करने लगी। और विचारधारा के स्तर पर शिमला का इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च रेसंटर हो या इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च या पिर एनसीईआरटी हो या यूजीसी। बोर्ड में ज्ञान की परिभाषा विचारधारा से जोड़कर देखी जाने लगी। यानी पश्चमी सोच को शिक्षा में क्यो मान्यता दें जब भारत की सांस्कृतिक विरासत ने दुनिया को रोशनी दी। और राष्ट्रवाद की इस सोच से ओत प्रोत होकर तमाम संस्थानो में वैसे ही लोग निर्णय लेने वाली जगह पर नियुक्त होने लगे जो सांस्कृतिक राष्ट्वाद की बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक रहे। यानी यहा भी यह जरुरी नहीं हा कि वाकई जो संघ की समझ हेडगेवार से लेकर गोलवरकर होते हुये देवरस तक बनी उसकी कोई समझ नियुक्त किये गये लोगो में होगी या फिर श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय की राजनीतिक सोच को समझने-जानने वाले लोगो को पदों पर बैठाया गया ।

दरअसल सत्ता के चापलूस या दरबारियो को ही संस्थानों में नियुक्त कर अधिकार दे दिये गये जो सत्ता या संघ का नाम जपते हुये दिखे । यानी पदों पर बैठे महानुभाव अगर सत्ता या संघ पाठ अविरल करते रहेंगे तो संघ का विस्तार होगा और सत्ता ताकतवर होगी यह सोच नये तरीके से विचारधारा के नाम पर विकसित हुई। जिसने उन संस्थानों की नींव को ही खोखला करना शुरु कर दिया जिन संस्थानों की पहचान दुनिया में रही। आईसीसीआर हो या पुणे का फिल्म इस्टीटयूट यानी एफटीआईई या पिर सेंसर बोर्ड हो या सीवीसी सरीखे संस्थान, हर जगह दिन हाथो में बागडोर दी गई उनके काम के अनुभव या बौद्दिक विस्तार का दायरा उन्हें संस्थान से ही अभी ज्ञान अर्जित करने को कहता है लेकिन आने वाली पीढ़ियों को जब वह ज्ञान बांटेंगे तो तो निश्चित ही वही समझ सामने होगी जिस समझ की वजह से उन्हे पद मिल गया। तो फिर आने वाला वक्त होगा कैसा या आने वाले वक्त में जिस युवा पिढी के कंघों पर देश का भविष्य है अगर उसे ही लंबे वक्त तक सत्ता अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठ बताने वाले शिक्षकों की नियुक्ति हर जगह कर देती है तो फिर बचेगा क्या। यह सवाल अब इसलिये कही ज्यादा बड़ा हो चला है कि राजनीतिक सत्ता यह मान कर चल रही है कि उसकी दुनिया के अनुरुप ही देश को ढलना होगा। तो कालेजों में उन छात्रों को लेक्चरर से लेकर प्रोफेसर बनाया जा रहा है,जो छात्र जीवन में सत्ताधारी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े रहे हैं। यानी मौजूदा वक्त बार बार एक ऐसी लकीर खींच रहा है जिसमें सत्ताधारी राजनीतिक दल या उसके संगठनों के साथ अगर कोई जुड़ाव आपका नहीं रहा तो आप सबसे नाकाबिल हैं। या आप किसी काबिल नहीं है।

मुश्किल तो यह है कि समझ का यह आधार अब आईएएस और आईपीएस तक को प्रभावित करने लगा है। बीजेपी शासित राज्यों में कलेक्टर, डीएम एसपी तक संघ के पदाधिकारियो के निर्देश पर चलने लगे है। ना चले तो नौकरी मुश्किल और चले तो सारे काम संघ के विस्तार और सत्ता के करीबियों को बचाने के लिये । तो क्या चुनी हुई सत्ता ही लोकतंत्र की सही पहचान है। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में भी मोदी सरकार को सिर्फ 31 फीसदी वोट ही मिले। वहीं जिन संवैधानिक संस्थानों को लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सवाल उठे थे तब काग्रेस को भी 70 करोड़ वोटरों में से महज साढे ग्यारह करोड ही वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस की सत्ता से जब अन्ना और बाबा रामदेव टकराये तो कांग्रेस ने खुले तौर पर हर किसी को चेतावनी भरे लहजे में वैसे ही तब कहा था कि चुनाव लड़कर जीत लें तभी झुकेंगे। लेकिन मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिये इसलिये नायाब है क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बडा करने की कवायद से शुरु की जो जनादेश दिलाने में साथ रहा । और जो सवाल कांग्रेस के दौर में बीजेपी ने उठाये उन्ही सवालो को मौजूदा सत्ता ने दबाने की शुरुआत की। दरअसल पहली बार सवाल यह नहीं है कि कौन गलत है या कौन सही।

सवाल यह चला है कि गलत सही को परिभाषित करने की काबिलियत राजनीतिक सत्ता के पास ही होती है । और हर क्षेत्र के हर संस्थान का कोई मतलब नहीं है क्योंकि विकास की अवधारणा उस पूंजी पर जा टिकी है जो देश में है नहीं और विदेश से लाने के लिये किसान मजदूर से लेकर उहोगपतियो से लेकर देसी कारपोरेट तक को दरकिनार किया जा सकता है। तो मौजूदा वक्त में सत्ता के बदलने से उठते सवाल बदलते नजरिये भर का नहीं है बल्कि सत्ता के अधिक संस्थानों को भी सत्ता की ताकत बनाये रखने के लिये कही ढाल तो कही हथियार बनाया जा सकता है। और इसे खामाशी से हर किसी को जनादेश की ताकत माननी होगी क्योंकि यह आपातकाल नहीं है।

जाने माने पत्रकार पुण्य प्रसून बाजयेपी के ब्लाग से साभार.

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केजरीवाल : चेहरा या मुखौटा?

किसी को इंदिरा गांधी का सिडिंकेट से लड़कर मजबूत नेता के तौर पर उभरना याद आ रहा है तो किसी को प्रफुल्ल महंत का असम में सिमटना और फूकन को बाहर का रास्ता दिखा कर एक क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर सिमट कर रह जाना याद आ रहा है। किसी को दिल्ली का चुनावी बदशाह दिल्ली में जीत का ठग लग रहा है तो कोई दिल्ली सल्तनत को अपनी बौद्दिकता से ठगकर गिराने की साजिश देख रहा है। कोई लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है तो कोई जनतंत्र पर हावी सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने वाली राजनीति का पटाक्षेप देख रहा है। एकतरफा निर्णय सुनाने की ताकत किसी में नहीं है। कोई इतिहास के पन्नों को पलटकर निर्णय सुनाने से बचना चाह रहा है तो कोई अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिये राजनीति के बदलते मिजाज को देखना चाह रहा है। लेकिन सीधे सीधे यह कोई नहीं कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है। जहां राजनेता तो हैं ही नहीं। जहा समाजवादी-वामपंथी या राइट-लेफ्ट की सोच है ही नहीं। जहां राजनीतिक धाराओं को दिशा देने की सोच है ही नहीं। जहां सामाजिक-आर्थिक अंतर्रविरोध को लेकर पूंजीवाद से लड़ने या आवारा पूंजी को संभालने की कोई थ्योरी है ही नहीं। यहा तो शुद्द रुप से अपना घर ठीक करने की सोच है।

 

और संयोग से घर का मतलब दिल्ली है। जहां सवा करोड़ लोग नौकरी और मजदूरी के लिये अपनी जड़ों से पलायन कर निकले पहुंचे हैं। जिन्हें काम मिल गया वह अब जिन्दगी आसान करना चाहते हैं और जिन्हें काम नहीं मिला वह उस सियासत से दो दो हाथ करना चाहते हैं, जिस राजनीति ने उन्हे हाशिये पर ढकेल दिया। इसलिये संघर्ष के लिये उठे हाथो को दिल्ली ने नहीं थामा बल्कि दिल्ली ही उठे हुये हाथ में बदल गई और उसने उस सत्ता को हरा दिया जो शुद्द राजनीतिक पार्टियां हैं। लेकिन सत्ता को हराने के बाद भी सत्ता का चरित्र बदलता नहीं है या जीत का सेहरा पहनते ही सत्ता चरित्र में उतरना पड़ता है। तो सवाल तीन हैं। पहला अगर केजरीवाल ने खुद को सत्ता माना है तो दिल्ली के सवालों को सुलझाते वक्त सत्ता चरित्र बदलेगा कैसे। दूसरा अगर दिल्ली के वोटरों की सत्ता को हराने की समझ ने केजरीवाल को सत्ता थमा दी तो केजरीवाल राजनीति के कीचड़ से सने हुये दिखायी क्यों नहीं देंगे। और तीसरा सवाल जिस तरीके से केजरीवाल की सत्ता उभरी क्या वह पारंपरिक राजनीतिक सत्ता चरित्र से आगे का एक नया चेहरा है। समझना इस तीसरे सवाल को ही  । क्योंकि बाकी दो सवालों के जबाब पांच बरस बाद ही मिलेंगे। यानी बिजली,पानी, झोपडपट्टी, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य को लेकर उठे चुनावी सवाल किस हद तक पूरे होते हैं और राजनीतिक लेकर केजरीवाल की समझ कैसे पूर्व की पारंपरिक सत्ता से अलग होती है, इसका इंतजार और फैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है। लेकिन तीसरा सवाल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि सत्ता का नया चेहरा केजरीवाल गढ़ेंगे कैसे? योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर लोकपाल एडमिरल रामदास के खिलाफ खुली और हंगामेदार कार्रवाई ने यह संकेत तो दे दिये कि केजरीवाल “निंदक नीयरे राखिये” को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है । लेकिन यह हालात तो वाकई इंदिरा से लेकर सोनिया और मायावती-मुलायम से लेकर नीतिश-लालू और जयललिता तक फिट हैं। तो फिर केजरीवाल का नया चेहरा होगा क्या।

केजरीवाल राजनेता नहीं है इसलिये वह 2013 में दिल्ली का सीएम बनकर भी सीएम की तरह नजर नहीं आते हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हारकर सामाजिक तानों को सह नहीं पाते और फिर दिल्ली की गद्दी तिकड़मों से पाने की जुगाड़ करते हैं। और 2015 में दिल्ली में एतिहासिक जीत हासिल करने के महीने भर के भीतर ही तानाशाह बनकर अपनी सत्ता को बिना अवरोध बनाने से हिचकते भी नहीं हैं। यानी राजनीतिक खेल का ऐसा खुलापन कभी कोई राजनेता करेगा, यह संभव नहीं है। और जो काम खामोशी से हो सकता हो उसे हंगामे के साथ गली मोहल्ले की तर्ज पर पूरा करने के रास्ते पर अगर केजरीवाल चल निकले हैं तो संकेत साफ हैं कि केजरीवाल राजनीतिक वर्ग से खुद को अलग करना-दिखना चाह रहे हैं। क्योंकि राजनेता कभी किसी को दुश्मन बनाता नहीं। और दुश्मन मानता है तो दिखाना नहीं चाहता। लेकिन केजरीवाल हर सियासी चाल को खुले तौर पर हंगामे के साथ दिखाना चाहते हैं। यानी केजरीवाल राजनीतिक सत्ता के उस चरित्र को अपने साथ खड़ा करना चाहते हैं, जहां वह गलत करार दिये जायें। क्योंकि सत्ता को लेकर जो गुस्सा और आक्रोश हाशिये पर ढकेल दिये गये लोगों में है, उस गुस्से और आक्रोश के साथ केजरीवाल तभी खड़े हो सकते हैं, जब सत्ता चरित्र ही उन्हें खारिज कर दे। ध्यान दें तो मौजूदा राजनीति में पीएम ही नहीं बल्कि बल्कि हर राज्य की सीएम और कमोवेश हर राजनीतिक दल के नेता किसानों से लेकर कारपोरेट और स्वदेशी से लेकर विदेशी निवेश तक किसी भी मुद्दे पर लंबा-चौडा बखान करने में वक्त नहीं लेंगे। लेकिन किसान को सब्सिडी कैसे मिलेगी, समर्थन मूल्य उत्पादन खर्च से ज्यादा कैसे मिलेगा और कारपोरेट की लूट कौन बंद करेगा । विकास का ढांचा ज्यादा उत्पादन या उत्पादन से ज्यादा लोगो के जुड़ाव से तय कैसे होगा इसपर भी हर सत्ता खामोश हो जायेगी। केजरीवाल का रास्ता किस दिशा में जायेगा यह कहना अभी जल्दबादी होगी लेकिन सीधे तौर पर कारपोरेट इक्नामी पर अंगुली उठाना ही नहीं बल्कि एफआईआर दर्ज कराना और सत्ता से हारे हुये तबकों के लिये सुविधाओं की पोटली खोलना एक नई राजनीति का आगाज है। या फिर जिस वैचारिक राजनीति की पीठ पर सवार होकर बोद्दिक तबका अक्सर हाशिये पर पड़े तबकों के लिये राजनीतिक लकीर खिंचना चाहता है, उसे सरेआम पीट कर केजरीवाल ने पहली बार यह संकेत दे दिये कि उनकी राजनीति उस मध्यम वर्ग की नहीं है जहां घर के भीतर झगड़े को पत्नी पति से पिटाई के बाद भी मेहमान के आते ही छुपा लेती है। बल्कि केजरीवाल की राजनीति उस झोपडपट्टी की है, जहां पति पत्नी का झगड़ा बस्ती में खुले तौर पर चलता है। और पत्नी भी पति को दो दो हाथ लगाती है । और छुपाया किसा ने नहीं जाता। बराबरी का हक । बराबरी का व्यवहार। क्योंकि कमाई में उसकी भी हिस्सेदारी होती है। जिन्दगी के संघर्ष में वह बराबर की हिस्सेदार होती है। दिल्ली की बस्तियों में रहने वाले लोगों को केजरीवाल ने ताकत नहीं दी बल्कि केजरीवाल को दिल्ली की बस्तियों में रहने वाले लाखों वोटरों ने ताकत दी। यह राजनीतिक प्रयोग दूसरे राज्य में हुआ नहीं है। सबसे बेहतर मिसाल तो महाराष्ट्र चुनाव में बारामती की है। जहां से अजित पवार चुनाव सबसे ज्यादा अंतर से उस हालत में जीत गये जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती जाकर उन्हें भ्रष्ट कहा । साठ हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले में अजित पवार का नाम बीजेपी ने पूरे चुनाव प्रचार में लिया। लेकिन महीने भर पहले अजित पवार के साथ महाराष्ट्र के सीएम और पीएम तक उसी बारामती के एक प्रोजेक्ट में अजित पवार के साथ मंच पर बैठे। सत्ता इसे प्रोटोकोल कह सकती है। और आने वाले वक्त में सियासत की जरुरत उन्हें एक साथ भी कर सकती है।

लेकिन केजरीवाल क्या इनसे अलग चेहरा बना पायेंगे। या फिर केजरीवाल सत्ता के जिस नये चेहरे को गढ़ना चाह रहे हैं असल में वह मुखौटे से इतर कुछ भी नहीं। ध्यान दे तो जिस दिन योगेन्द्र प्रशांत को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा था उसी दिन केजरीवाल बिहार के सीएम नीतीश कुमार से मिल रहे थे। और नीतीश कुमार केजरीवाल से मिलने से पहले जेल जाकर चौटाला और केजरीवाल के मिलने के बाद लालूप्रसाद यादव से मिलने गये। तो नीतिश राजनीति साधने निकले थे और केजरीवाल आप के भीतर मची धमाचौकड़ी से ध्यान बंटाने के लिये नीतिश से मिलते बेहिचक दिखायी दिए। तो केजरीवाल को लेकर असल सवाल यहीं से शुरु होता है कि जब मनमोहन कैबिनेट के दागी मंत्रियों से लेकर तब के बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी को कटघरे में खड़ा करने निकले तब उन्हे प्रशांत-योगेन्द्र की जरुर थी । जब रिलायंस-वाड्रा को घेरा तब भी प्रशांत भूषण की जरुरत थी। और उसी वक्त आम आदमी पार्टी की छवि देश में गढ़ी जाने लगी थी। जिसे प्रचार प्रसार में वैचारिक तौर पर वहीं चेहरे मजबूती दे रहे थे, जो अब निकाले गये हैं। जब बनारस में मोदी को हराने के लिये केजरीवाल निकले तब वैचारिक आवाज योगेन्द्र और प्रशांत भूषण से लेकर प्रो आंनद कुमार और अजित सरीखे लोगों ने ही समाजवादी-वामपंथी चिंतन तले आवाज दी। केजरीवाल बनारस में हारेजरुर लेकिन केजरीवाल की छवि मौलाना मुलायम और लालू यादव ही नही बल्कि कांग्रेस से भी ज्यादा मजबूत बनी। केजरीवाल की छाती पर लोकपाल से आगे के कई वैसे तमगे खुद ब खुद लगते चले गये जिसे वामपंथी अपने संघर्ष में गंवा बैठे थे और समाजवादी अपनों से ही लड़-भिड़ कर कभी ले नही पाये। यानी 5 साल केजरीवाल के नारे तले बिजली पानी। शिक्षा-स्वास्थ्य। रोजगार-सुरक्षा । के दौर को अगर अलग कर दें और 2012 से 2014 तक के दौर को परखे तो आम आदमी पार्टी या केजरीवाल की पहचान देश की रगों में इसलिये दौड़ने लगी क्योंकि वैचारिक और राजनीतिक तौर पर मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से आम आदमी पार्टी के चेहरे सीधे टकरा रहे थे। देश में विकास के नाम पर ठगे जा रहे नागरिकों से लेकर ज्यादा कमाई के लिये रास्ते बनाने वाली उपभोक्ता नीति से कंज्यूमर क्लास भी भष्ट्रचार से परेशान था। उन्हें आवाज मिल रही थी। किसी को न्यूनतम सुविधाओं के लिये सरकारो से टकराना है तो किसी को खर्च करने के बाद भी सुविधा न मिलने का गुस्सा है। आप का हर चेहरा टोपी लगाते ही संघर्ष का परिचायक बन रहा था। क्योंकि उसके निशाने पर सत्ता थी और वह सत्ता के निशाने पर था। सिर्फ केजरीवाल ही नही बल्कि योगेन्द्र और प्रशांत भी जो कामयाबी अपने वैचारिकी के आसरे इससे पहले नही पा सके, उसे आप के संघर्ष ने सामूहिक तौर पर हर किसी को मान्यता दे दी। इसलिये जीत कभी आम आदमी पार्टी की नही हुई बल्कि आम जनता की हुई। जो हाशिये पर है । और हाशिये पर ढकेली जा चुकी जनता ने ही दिल्ली में मोदी के अहंकार को हरा कर केजरीवाल को ताकत दी। अब इसे कोई सत्ता मानकर चले तो फिर सत्ता चरित्र हर चेहरे को मुखौटा करार देने में कितना वक्त लगायेगा। इंतजार कीजिये क्योंकि अग्निपरिक्षा तो चेहरे और मुखौटे की है।

पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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दिल्ली की हार, दस लाख का कोट और संघ की हैरानी

गुजरात के सीएम मोदी बदले तो लोकसभा की जीत ने इतिहास रच दिया और प्रधानमंत्री मोदी बदले तो दिल्ली ने बीजेपी को अर्स से फर्श पर ला दिया। दिल्ली की हार से कही ज्यादा हार की वजहों ने संघ परिवार को अंदर से हिला दिया है। संघ उग्र हिन्दुत्व पर नकेल ना कस पाने से भी परेशान है और प्रधानमंत्री के दस लाख के कोट के पहनने से भी हैरान है। संघ के भीतर चुनाव के दौर में बीजेपी कार्यकर्ता और कैडर को अनदेखा कर लीडरशीप के अहंकार को भी सवाल उठ रहे हैं और नकारात्मक प्रचार के जरीये केजरीवाल को निशाना बनाने के तौर तरीके भी संघ बीजेपी के अनुकुल नहीं मान रहा है।

वैसे असल क्लास तो मार्च में नागपुर में होने वाली संघ की प्रतिनिधिसभा में लगेगी जब डेढ हजार स्वयंसेवक खुले सत्र में बीजेपी को निशाने पर लेंगे । लेकिन उससे पहले ही बीजेपी को पटरी पर लाने की संघ की कवायद का असर यह हो चला है कि पहली बार संघ अपनी राजनीतिक सक्रियता को भी बीजेपी और सरकार के नकारात्मक रवैये से कमजोर मान रहा है। आलम यह हो चला है कि संघ के भीतर गुरुगोलवरकर के दौर का “एकचालक अनुवर्तित्व ” को याद किया जा रहा है और मौजूदा बीजेपी लीडरशीप को कटघरे में यह कहकर खड़ा किया जा रहा है कि वह भी 1973 के दौर तक के “एकचालक अनुवर्तित्व ” के रास्ते आ खडी हुई । जबकि देवरस के दौर से ही सामूहिक नेतृत्व का रास्ता संघ परिवार ने अपना लिया। यानी एक व्यक्ती ही सबकुछ की धारणा जब संघ ने तोड़ दी तो फिर मौजूदा लीडरशीप को कौन सा गुमान हो चला है कि वह खुद को ही सबकुछ मान कर निर्णय ले लें। संघ के भीतर बीजेपी को लेकर जो सवाल अब तेजी से घुमड रही है उसमें सबसे बड़ा सवाल बीजेपी के उस कैनवास को सिमटते हुये देखना है जो 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी को विस्तार दे रहा था। संघ के भीतर यह सवाल बड़ा हो चुका है कि बीजेपी नेताओं की पहचान सादगी से हटी है। मिस्टर क्लीन के तौर पर अन्ना और केजरीवाल की पहचान अभी भी है तो इनसे दूरी का मतलब इन पर नकारात्मक चोट करने का मतलब क्या है।

संघ का मानना है कि दिल्ली में ही अन्ना और केजरीवाल का आंदोलन और आंदोलन के वक्त संघ के स्वयसेवक भी साथ खडे हुये थे लेकिन आज संघ इनसे दूर है लेकिन मौजूदा राजनीति में किसे किस तरह घेरना है क्या इसे भी बीजेपी समझ नहीं पा रही है । संघ विचारक दिलिप देवधर की मानें तो संघ के भीतर यह सवाल जरुर है कि उग्र हिन्दुत्व के नाम पर जो उंट-पटाग बोला जा रहा है उसपर लगाम कैसे लगे । और कैसे उन्हें बांधा जा सके। प्रधानमंत्री मोदी की मुश्किल यह है कि वह सीधे हिन्दुत्व के उग्र बोल बोलने वालो को खिलाफ सीधे कुछ बोल नहीं सकते क्योंकि संघ की ट्रेनिंग या कहे अनुशासन इसकी इजाजत नहीं देता है। अगर प्रधानमंत्री मोदी कुछ बोलेंगे तो विहिप के तोगडिया भी कल कुछ बोल सकते है । यानी नकेल सरसंघचालक को लगानी है और संघ उनपर नकेल कसने में इस दौर में असफल रहा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता ।

लेकिन दिल्ली को लेकर संघ का यह आंकलन दिल्चस्प है कि दिल्ली चुनाव में संघ की सक्रियता ना होती तो बीजेपी के वोट और कम हो जाते। यानी 2013 के दिल्ली चुनाव हो या 2014 के लोकसबा चुनाव या फिर 2015 के दिल्ली चुनाव। संघ यह मानता है कि तीनो चुनाव के वक्त संघ के स्वयंसेवक राजनीतिक तौर पर सक्रिय थे । और दिल्ली में 32-33 फिसदी वोट जो बीजेपी को मिले है वह स्वयंसेवकों की सक्रियता की वजह से ही मिले हैं। और उसके उलट केजरीवाल के हक में वोट इसलिये ज्यादा पड़ते चले गये क्योकि हिन्दुत्व को लेकर बिखराव नजर आया। साथ ही बीजेपी लीडरशीप हर निर्णय थोपती नजर आयी । यानी सामूहिक निर्णय लेना तो दूर सामूहिकता का अहसास चुनाव प्रचार के वक्त भी नहीं था । जाहिर है संघ की निगाहो में अर्से बाद वाजपेयी, आडवाणी,कुशाभाउ ठाकरे, गोविन्दाचार्य की सामूहिकता का बोध है तो दूसरी तरफ बीजेपी अध्यक्ष की मौजूदा कार्यकर्तातओ पर थोपे जाने वाले निर्णय है। खास बात यह है कि

केजरीवाल की जीत से संघ परिवार दुखी भी नहीं है । उल्टे वह खुश है कि कांग्रेस का सूपडा साफ हो गया और दिल्ली के जनादेश ने मौजूदा राजनीति में ममता,मुलायम , लालू सरीखे नेताओ से आगे की राजनीतिक लकीर खिंच दी । और चूंकि नरेन्द्र मोदी भी केजरीवाल की तर्ज पर सूचना क्रांति के युग से राजनीतिक तौर पर जोडे हुये है और केजरीवाल की पहुंच या पकड राष्ट्रीय तौर पर नही है तो बीजेपी के पास मौका है कि वह अपनी गलती सुधार ले । संघ की नजर दिल्ली चुनाव के बाद केजरीवाल को लेकर इतनी पैनी हो चली है कि वह बीजेपी को यह भी सीख देने को तैयार है कि मनीष सिसोदिया को उप-मुख्यमंत्री बनाकर अगर केजरीवाल आम आदमी पार्टी के विस्तार में लगते हो तो फिर दिल्ली को लेकर केजरीवाल को घेरा भी जा सकता है।

यानी केजरीवाल को दिल्ली में बांध कर बीजेपी को राष्ट्रीय विस्तार में कैसे आना है और दिल्ली वाली गलती नहीं करनी है, यह पाठ भी संघ पढाने को तैयार है। यानी बीजेपी को राजनीतिक पाठ पढाने का सिलसिला गुरुवार से जो झंडेवालान में शुरू हुआ है वह रविवार और सोमवार को सरसंघचालक मोहन भागवत और दूसरे नंबर के स्वयसेवक भैयाजी जोशी समेत उस पूरी टीम के साथ पढ़ाया जायेगा जो मार्च के बाद कमान हाथ में लेगा। यानी अभी तक यह माना जा रहा था कि मोदी सरकार के बाद संघ हिन्दु राष्ट्र को सामाजिक तौर पर विस्तार देने में लगेगी लेकिन दिल्ली की हार ने बीजेपी और सरकार को संभालने में ही अब संघ को अपनी उर्जा लगाने को मजबूर कर दिया है। और बीजेपी लीडरशीप को साफ बोलने को तैयार है कि सुधर जाओ नहीं तो मुश्किल होगी। 

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से.

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एक दूसरे के लिए “सरकार” हैं मोदी और भागवत!

संघ परिवार से जो गलती वाजपेयी सरकार के दौर में हुई, वह गलती मोदी सरकार के दौर में नहीं होगी। जिन आर्थिक नीतियो को लेकर वाजपेयी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया, उनसे कई कदम आगे मोदी सरकार बढ़ रही है लेकिन उसे कठघरे में खड़ा नहीं किया जायेगा। लेकिन मोदी सरकार का विरोध होगा। नीतियां राष्ट्रीय स्तर पर नहीं राज्य दर राज्य के तौर पर लागू होंगी। यानी सरकार और संघ परिवार के विरोधाभास को नियंत्रण करना ही आरएसएस का काम होगा। तो क्या मोदी सरकार के लिये संघ परिवार खुद को बदल रहा है। यह सवाल संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के भीतर के उन कार्यकर्ताओ का भी है, जिन्हें अभी तक लगता रहा कि आगे बढने का नियम सभी के लिये एक सरीखा होता है। एक तरफ संघ की विचारधारा दूसरी तरफ बीजेपी की राजनीतिक जीत और दोनों के बीच खड़े प्रधानमंत्री मोदी। और सवाल सिर्फ इतना कि राजनीतिक जीत जहां थमी वहां बीजेपी के भीतर के उबाल को थामेगा कौन। और जहां आर्थिक नीतियों ने संघ के संगठनों का जनाधार खत्म करना शुरु किया, वहां संघ की फिलासफी यानी “रबर को इतना मत खींचो की वह टूट जाये”, यह समझेगा कौन।

मोदी सरकार को लेकर यह हालात कैसे चैक एंड बैंलेंस कर रहे हैं, इसके लिये दिल्ली चुनाव के फैसले का इंतजार कर रहे बीजेपी के ही कद्दावर और धुरंधर नेताओं को टटोल कर भी समझा जा सकता है और भारतीय मजदूर संघ से लेकर किसान संघ और बीजेपी को सांगठनिक तौर पर संभालने वाले खांटी स्वयंसेवकों से बातचीत कर भी समझा जा सकता है, जिनकी एक सांस में संघ तो दूसरी सांस में बीजेपी समायी हुई है। असल में हर किसी का अंतर्विरोध ही हालात संभाले हुये है या कहें मोदी सरकार के लिये तुरुप का पत्ता बना हुआ है। लेकिन जादुई छड़ी प्रधानमंत्री मोदी के पास रहेगी या सरसंघचालक मोहन भागवत के पास यह समझना कम दिलचस्प नहीं। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को भागवत भी चाहिये और भगवती भी। दिल्ली के लिये संघ परिवार भी चाहिये और संघ परिवार पर निशाना साधने वाले शांति भूषण भी चाहिये। वहीं भागवत को संघ की विचारधारा पर चलते हुये सत्ता के लिये मोदी भी चाहिये और विरोध करने वाले संगठनों का साथ भी। जिसमें संघ की विचारधारा के अनुसार ही भारत हिन्दू राष्ट्र की तरफ कदम बढाये उसके बाद चाहे सत्ता संघर्ष के लिये संघ को राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने की जरुरत नहीं पड़ेगी। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में मोदी सरकार के किसी भी मंत्री से ज्यादा तवोज्जो उसी के मंत्रालय पर पीएम मोदी के बोलने को दिया जाता है। जिसका असर यह भी हो चला है कि पीएम कुछ भी कही भी बोले उसका एक महत्व माना जाता है और मंत्री अपने ही मंत्रालय के बारे में कितने बड़े फैसले ही क्यों ना ले ले वह पीएम के एक बयान के सामने महत्वहीन हो जाता है। गुरु गोलवरकर के बाद कुछ यही परिस्थितियां संघ परिवार के भीतर भी बन चुकी हैं। संघ के मुखिया ही हर दिन देश के किसी ना किसी हिस्से में कुछ कहते है, जिन पर सभी की नजर होती है । लेकिन संघ के संगठनों के मुखिया कही भी कुछ कहते है तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता।

असर इसी का है कि जगदीश भगवती मोदी की पीठ ठोंकते है और भागवत से डराते हैं। शांति भूषण किरण बेदी के जरीये मोदी के मास्टरस्ट्रोक की पीठ ठोंकते है लेकिन मुस्लिम मुद्दे पर संघ से मोदी को डराते हैं। ऐसे में तलवार की धार पर सरकार चल रही है या संघ परिवार यह सत्ता के खेल में वाकई दिलचस्प है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों को लागू कराने के तरीके संघ के स्वयंसेवकों की तर्ज पर है और सरसंघचालक की टिप्पणियां नीतिगत फैसले के तर्ज पर हैं। इसीलिये बीते आठ महिनों को लेकर जो भी बहस सरकार के मद्देनजर हो रही है, उसमें प्रधानमंत्री का हर एलान तो शानदार है लेकिन उसे लागू नौकरशाही को करना है और नौकरशाही स्वयंसेवकों की टीम नहीं होती इसे कोई समझ नहीं पा रहा है। नौकरशाही में सुधार सिर्फ वक्त पर आने और जाने से हो जायेगा यह भी संभव नहीं है। सिर्फ बैंक के हालात को ही परख लें तो तो मौजूदा वक्त में औसतन हर बैंक कर्मचारी को हर दिन दो सौ ग्राहक का सामना करना पड़ता है। हर ग्राहक को तीन मिनट देने का मतलब है दस घंटे । वहीं स्वयंसेवक की तादाद सामूहिक तौर पर काम करती है। यानी जिनके बीच स्वयंसेवक काम करने जाता है उन्हें ही, स्वयंसेवक बना लेता है। ऐसे में जनधन योजना हो या फिर सरकार की कोई भी योजना जो समूचे देश के लिये हो उसे परखे तो समझ में येगा कि नौकरशाही के जरीये सरकार काम कराना चाहती है या नौकरशाही स्वयंसेवक होकर काम करने लगे। जनधन योजना से बैंकिंग कर्मचारी परेशान है कि बैंक संभाले या खाते खोलें। यह हालात आने वाले वक्त में सरकार के लिये घातक साबित हो सकते है। वहीं दूसरी तरफ संघ के मुखिया सरकार की तर्ज पर चल पड़े हैं। मसलन भारतीय मजदूर संघ को इजाजत है कि वह मोदी सरकार की मजदूर विरोधी नीतियो का विरोध करे। क्योंकि सरसंघचालक इस सच को समझते हैं कि देश भर में अगर 60 हजार शाखायें लगती हैं तो उनकी सफलता की बड़ी वजह भारतीय मजदूर संघ से जुड़े एक करोड़ कामगार भी हैं। जो ना सिर्फ शाखाओं में शरीक होते है बल्कि बरसात में संघ की शाखा के आयोजन से लेकर संघ के किसी भी कार्यक्रम के लिये में बिना पैसा लिये बीएमएस का दफ्तर या हाल उपलब्ध करा देते हैं। जो बीएमएस कॉपरेटिव से जुडा होता है। वही किसान संघ हो या आदिवासी कल्याण संघ, दोनों की मौजूदगी ग्रामीण भारत में संग परिवार को विस्तार देती है। और इस तरह चालीस से ज्यादा संगठनों का रास्ता केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों पर कई गुना ज्यादा भारी है। लेकिन मुश्किल यह है कि स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को विस्तार देने में लगे हैं। और मोदी सरकार की नीतियों का ऐलान संघ के सपनों के भारत की तर्ज पर हो रहा है जिसमें नौकरशाही फिट बैठती ही नहीं है। गंगा सफाई के लिये टेक्नालाजी और इंजीनियरिंग की टीम चाहिये या श्रद्दा के फूल। जो गंगा माता कहकर गांगा को गंदा ना कहने पर जोर दें। बिजली खपत कम करने के लिये एलईडी बल्ब सस्ते में उपलब्ध कराने से काम होगा या सोशल इंडेक्स लागू करने से। दुनिया के किसी भी देश में एलईडी बल्ब के जरीये बिजली खपत कम ना हुई है और ना ही एलईडी बल्ब का फार्मूला किसी भी विकसित देश तक के रिहाइशी इलाकों में सफल है।

भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देश में तो असंभव है मुश्किल यह है कि प्रधानमंत्री की नीयत खराब नहीं है बल्कि नरेन्द्र मोदी देश को स्वयंसेवकों की टोली के जरीये ही देश के बिगड़े हालात पर नियंत्रण करना चाह रहे हैं। और स्वयंसेवकों को पीएम का फार्मूला इसलिये रास नहीं आ सकता क्योंकि समूचा विकास ही उस पूंजी पर टिकाया जा रहा है जिस पूंजी के आसरे विकास हो भी सकता है इसकी कोई ट्रेनिंग किसी स्वयंसेवक को नहीं है। ट्रेनिंग ही नहीं बल्कि जिस वातावरण में संघ परिवार की मौजूदगी है या संघ परिवार जिन क्षेत्रो में काम कर रहा है, वहां विकास का सवाल तो अब भी सपने की तरह है। वहां तो न्यूनतम की लड़ाई है। पीने का साफ पानी तो दूर दो जून की रोटी का जुगाड़ तक मुशिकल है। स्कूल, स्वास्थ्य सेवा या पक्का मकान का तो सपना भी नहीं देका जा सकता। वैसे भी लुटियन्स की दिल्ली छोड़ दीजिये या फिर देश के उन सौ शहरों को जिन्हे स्मार्ट शहर बनाने का सपना प्रधानमंत्री ने पाला है। इसके इतर देश में हर तीसरा व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे है। सिर्फ पांच फिसदी लोगों के पास 78 फिसदी संसाधन है। बाकी 95 फिसदी 22 फिसदी संसाधन पर जी रहा है। उसमें भी 80 फीसदी के पास देश का महज 5 फिसदी संसाधन है। यानी संघ परिवार जिन हालातों में काम कर रहा है और मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां जिस तबके के लिये एलान की जा रही है, वह ना सिर्फ संघ की विचारधारा से दूर है बल्कि देश के हालातो से भी दूर है। यहां मुश्किल राजनीति शून्यता की भी है और संघ के

राजनीतिक सक्रियता के बावजूद देश में सामाजिक असमानता बढाने वाली नीतियों पर खामोश रहने की भी है। तो फिर रास्ता अंधेरी गली तरफ जा रहा है या फिर देश को एक खतरनाक हालात की तरफ ले जाया जा रहा है। यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण हो चला है संघ अब वाजपेयी सरकार की तर्ज पर मोदी सरकार को परख नहीं रहा और वाजपेयी सरकार के बाद भी कोई राजनीतिक पार्टी या नेता देश में है इसे मोदी सरकार के वक्त देश में दिखायी भी दे नहीं रहा है। याद कीजिये वाजपेयी सरकार के दौर में रज्जू भैया ने संघ के तमाम संगठनों पर नकेल कसी थी। लेकिन जब आर्थिक नीतियों को लेकर विरोध शुरु हुआ तो 2004 के चुनाव में संघ परिवार राजनीतिक तौर पर निष्क्रिय हो गया। अरबों खर्च करने के बाद भी शाइनिंग इंडिया अंधेरे में समा गया क्योंकि देश अंधेरे में था। लेकिन 2015 में अगर हालात को परखें तो मोहन भागवत ने संघ के तमाम संगठनों को छूट दे रखी है कि वह अपनी बात कहते रहे।

मोदी सरकार की नीतियों पर विरोध जताते रहे। क्योंकि संघ को राजनीतिक तौर सक्रिय रखना दिल्ली की जरुरत है और दिल्ली के जरीये संघ को विस्तार मिले यह संघ की रणनीतिक जरुरत है। मोदी आस बनकर चमक रहे है क्योंकि कारपोरेट की पूंजी पर संघ की विचारधारा का लेप था। और राजनीतिक अंधेरगर्दी के खिलाफ देश में अनुगूंज है। नया संकट यह भी है कि 2004 में जिन राजनीतिक दलों या नेताओं को लेकर आस थी 2015 में उसी आस की कोई साख बच नहीं रही। कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर क्षत्रप नये युवा भारत से इनका कोई सरोकार है नहीं और पुराने भारत से संपर्क कट चुका है। शायद इसीलिये मौजूदा वक्त में सबसे बडा सवाल यही है कि अगर बीजेपी के चुनावी जीत का सिलसिला थमता है या फिर मोदी सरकार के आईने में संघ परिवार की विचारधारा कुंद पडती है तो मोदी सरकार और संघ परिवार के बीच सेफ पैसेज देने का सिलसिला क्या गुल खिलायेगा। क्योंकि अंदरुनी सच यही है कि सेफ पैसेज की बिसात पर प्यादे बने नेता हों या स्वयंसेवक वक्त का इंतजार वह भी कर रहे हैं और अंधेरे से उजाले में आने का इंतजार देश का बहुसंख्यक तबका भी कर रहा है।

जाने-माने पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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बजट के महीने में देश का वित्त मंत्री दिल्ली चुनाव के लिये बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठने को क्यों है मजबूर

: दिल्ली फतह की इतनी बेताबी क्यों है? : बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिये दिल्ली बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठना पड़े… केन्द्र के दर्जन भर कैबिनेट मंत्रियों को दिल्ली की सड़कों पर चुनावी प्रचार की खाक छाननी पड़े… सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगे… और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी सड़क बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ हैं, उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा है और न्यूनतम की जरूरत का संघर्ष सत्ता को चुनाव में बहका रहा है।

दोनों खेल एक साथ कैसे चल सकते हैं या दो भारत को एक साथ जीने की कला जिस महारथी में होगी, वही मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर राजनेता होगा। सरकार उसी की होगी। क्योंकि यह वाकई कल्पना से परे है कि दिल्ली चुनाव के हर मुद्दे बिजली, पानी, सड़क, घर, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर कैबिनेट मंत्री हर प्रेस कान्फ्रेंस करने के लिये उपलब्ध है और महीने भर बाद जिस बजट का इंतजार देश कर रहा है, उस बजट से उस भारत को कुछ भी लेना देना नहीं होता है जो चुनाव में जीत हार तय करता है। और जो मंत्री दिल्ली के रायसीना हिल्स पर नार्थ या साउथ ब्लाक में बैठकर दुनिया को जिस भारत से रुबरु कराता है वही मंत्री जब चुनाव के लिये सड़क पर प्रचार के लिये उतरता है तो उसकी भाषा उस दुनिया से बिलकुल अलग होती है, जिस दुनिया के बीच भारत चहक रहा है। तो संकेत साफ है कि चुनावी जीत सरकार का पहला धर्म है. चुनाव की जीत हार देश के लिये मर मिटने की सियासत है। यानी सत्ता की ताकत सत्ता में बने रहने के उपाय खोजने से आगे जायेगी नहीं। यानी भारत में राजनीतिक सत्ता के आगे सारा ज्ञान बेमानी है और चुनाव जीतना ही ज्ञान के सागर में डुबकी लगाना है।

इस हाल दुनिया भारत की मुरीद हो और सत्ता हर जगह चुनावी जीत हासिल कर रही हो तो फिर एक भी हार कितनी खतरनाक साबित हो सकती है, यह डेढ़ बरस पहले दिल्ली में शीला दीक्षित सरीखे सीएम की हार के बाद काग्रेस का समूचे देश में लड़खड़ाने से भी समझा जा सकता है और मौजूदा वक्त में दिल्ली जीतने के लिये सरकार ही सड़क पर है इससे भी जाना जा सकता है। इन सारे अंतर्विरोध के बावजूद अगर दुनिया भारत की सत्ता पर लट्टू है तो दो संकेत साफ हैं। पहला, भारत की मौजूदा सत्ता जनादेश के आसरे कोई भी निर्णय लेकर उसे लागू कराने में सक्षम है जो 1991 के बाद से कभी संभव नहीं हुआ था। और दूसरा भारत का बाजार अमेरिका सरीखे देश की आर्थिक मुश्किलों को भी दूर कर सकता है।

भारत के भीतर बसने वाले इस दो भारत का ही कमाल है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां आने वाले वक्त में रेलवे में 5 से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है। बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडों एयरपोर्ट बनाने में भी 3 से 4 लाख करोड़ का निवेश किया जाना है। वहीं भारतीय सेना की जरुरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी पहली बार भारत सरकार की आस विदेशी निवेश को लेकर लगी है तो दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुले संकेत दिये है कि भारत विकास के रास्ते को पकड़ने के लिये आर्थिक सीमायें तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहे तो भारत में पूंजी लगा सकते हैं। असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरुरत है और यह जरुरत विकसित देशो को भारत में लाने को मजबूर करेगा। क्योंकि विकसित देशों की मजबूरी है कि वह अपने देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम पूरा कर चुके हैं और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है।

यहां तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका की आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहा उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में “मेक इन इंडिया” का रास्ता विदेशी निवेश के लिये खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते है। अब जरा कल्पना कीजिये दुनिया के तमाम ताकतवर या कहें जो विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं, उनके आसरे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का कोई रास्ता निकलेगा नहीं। बिजली, पानी, सडक की लड़ाई थमेगी नहीं। बल्कि इसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने अस्तित्व का संकट जरूर मंडराने लगेगा। क्योंकि मौजूदा सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरुरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी, यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। क्योंकि फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस कर देता है। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आयेगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है। यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा। और असल परीक्षा तभी होगी। लेकिन यह परीक्षा तो हर प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के लिये दी ही है। और उसे कटघरे में खड़ा भी किया गया है।

नेहरु ने लालकिले से पहले भाषण में नागरिक का फर्ज सूबा, प्रांत, प्रदेश, भाषा, संप्रदाय, जाति से ऊपर मुल्क रखने की सलाह दी। और जनता को चेताया कि डर से बडा ऐब/ गुनाह कुछ भी नहीं है। वहीं 15 अगस्त 1947 को कोलकाता के बेलीघाट में अंधेरे घर में बैठे महात्मा गांधी ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को यह कहकर लौटा दिया कि अंधेरे को रोशनी की जगमग से दूर कर आजादी के जश्न का वक्त अभी नहीं आया है। सत्तर के दशक में जिन खनिज संसाधनों को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय संपत्ति माना उसे सोनिया गांधी के दौर में मनमोहन सिंह ने मुनाफे के धंधे के लिये सबसे उपयोगी माना। बाजार सिर्फ जमीन के नीचे ही नहीं बना बल्कि उपर रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों, खेतिहर किसानों और मजदूरों को भी लील गया। लेकिन ताकतवर राजनीतिक सत्ता ने इसे दुनिया के बाजार के सामने भारत को मजबूत और विकसित करने का ऐसा राग छेड़ा कि देश के तीस फीसद उपभोक्ताओं को खुले तौर पर लगने लगा कि बाकि ७० फिसदी आबादी के जिन्दा रहने का मतलब क्या है। सरोकार तो दूर, संवाद तक खत्म हुआ। मोदी सरकार कुछ कदम और आगे बढी। लेकिन पहली बार उसने इस हकीकत को समझा कि चुनावी जीत से बड़ा कोई आक्सीजन होता नहीं है और चुनावी जीत ही हर कमजोरी को छुपाते हुये सत्ता का विकल्प कभी खड़ा होने नहीं देती है।

यानी बीते ६७ बरस की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का ना सिर्फ बढ़ाना है बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मानना भी है। असर यही है कि 1947 में भारत की जितनी जनसंख्या थी उसका तीन गुना हिन्दुस्तान 2015 में दो जून की रोटी के लिये राजनीतिक सत्ता की तरफ टकटकी लगाकर देखता है। असर इसी का है कि दिल्ली में जो भी सरकार बने या जिस भी राजनीतिक दल को जनता वोट दे । हर किसी को केन्द्र की सत्ता के पलटने के हर अंदाज तो याद है। फिर २०१४ के चुनाव में जिस जनादेश का गुणगान दुनिया भर में हो रहा है उसी जनादेश से बनी सरकार की सांस चुनाव के न्यूनतम नारों को पूरा करने में क्यों फूल रही है। और दिल्ली में न्यूनतम जरुरते पूरी हो जायेगी यह कहने के लिये और कोई नहीं उसी मोदी के कैबिनेट मंत्री और खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनावी मैदान में क्यों उतर रहे हैं। जिन्हें सत्ता सौपी ही इसलिये गई कि वह विकास की नयी धारा देश में बहा कर अच्छे दिन ला दें।

जाने-माने पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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दीपक सरीखे पत्रकारों को सोशल मीडिया की गलियों में खोना नहीं है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

: “पंडित जी, बीपीएल या बीएमडब्ल्यू… चुनना तो एक को ही पड़ेगा” : धारदार पत्रकारिता से मात तो मीडिया को ही देनी है दीपक शर्मा! : बीपीएल या बीएमडब्ल्यू। रास्ता तो एक ही है। फिर यह सवाल पहले नहीं था। था लेकिन पहले मीडिया की धार न तो इतनी पैनी थी और न ही इतनी भोथरी। पैनी और भोथरी। दोनों एक साथ कैसे। पहले सोशल मीडिया नहीं था। पहले प्रतिक्रिया का विस्तार इतना नहीं था। पहले बेलगाम विचार नहीं थे। पहले सिर्फ मीडिया था। जो अपने कंचुल में ही खुद को सर्वव्यापी माने बैठा था। वही मुख्यधारा थी और वही नैतिकता के पैमाने तय करने वाला माध्यम। पहले सूचना का माध्यम भी वही था और सूचना से समाज को प्रभावित करने वाला माध्यम भी वही था। तो ईमानदारी के पैमाने में चौथा खम्भा पक़ड़े लोग ही खुद को ईमानदार कह सकते थे और किसी को भी बेईमानी का तमगा देकर खुद को बचाने के लिये अपने माध्यम का उपयोग खुले तौर पर करते ही रहते थे।

बंधु, लेकिन अंतर तो पहले भी नजर आता था। कौन पत्रकार बीपीएल होकर पत्रकारिता करने से नहीं हिचकता और किसकी प्राथमिकता बीमडब्ल्यू है। लेकिन पहले कोई विस्तार वाला सार्वजनिक माध्यम भी नहीं था जिसके आसरे बीएमडब्ल्यू वाली पत्रकारिता का कच्चा चिट्टा सामने लेकर आते।

यह ठीक है लेकिन हमारे समाज का भी तो कोई सोशल इंडेक्स नहीं है। जिसे जितना कमाना है वह कमाये। जिसे जितना बनाना है वह बनाये। कोई रोक-टोक नहीं है। दिल्ली में तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, जो पेशे से वकील हैं या रहे हैं, एक पेशी के 20 से 40 लाख रुपये तक लेते हैं। संपादक की पहुंच पकड़ अगर सत्ताधारियों के बीच है तो उसका पैकेज करोड़ों में होता है। किसी भी धंधे में कोई कमाते-खाते हुये यह कहने से नहीं कतराता है कि अगर उसके पास करोड़ों है तो वह उसकी सफेद कमाई के हैं। अब आप करोगे क्या।

बंधु, एक चैनल पत्रकारों का हो इसके लिये तो आपको करोड़पति होना होगा, उसके बाद आप पत्रकार हैं या चिट-फंड वाले या बिल्डर या दलाल। सरकार की नीतियों तक तो इसका असर पड़ता नहीं है। तो फिर इस बीपीएल और बीएमडब्ल्यू के रास्ते की बात करने का मतलब है क्या। हां अब हालात इस मायने में जरुर बदले है कि दलाल पत्रकारों को सत्ता अपने साथ सटने नहीं दे रही है। लेकिन इसका दूसरा सच यह भी है कि दलालों के तरीके और उसकी परिभाषा बदल रही हैं। काबिलियत की पूछ तो अब भी नहीं है। या यह कहें कि देश में सत्ता बदली है तो नये सिरे से नये पत्रकारों को सत्ता अपने कटघरे में ढाल रही है। तब तो यह बीच का दौर है और ऐसे मौके का लाभ पत्रकारिता की धार के साथ उठाना चाहिये। बिलकुल उठाना चाहिये।

लेकिन इसके लिये सिर्फ सोशल मीडिया को तो माध्यम बनाया नहीं जा सकता। सोशल मीडिया एक कपडे उघाडने का मंच है। कपडे पहनकर उसके अंदर बाहर के सच को बताने का माध्यम तो है नहीं। नहीं आप देख लो। मनमोहन सिंह के दौर के तुर्रम संपादक मोदी के आने के बाद सिवाय सोशल मीडिया के अलावा और कहां सक्रिय नजर आ रहे हैं। लेकिन वहां भी तो भक्तों की मंडली पत्रकारो की पेंट उतारने से नहीं चुकती। सही कह रहे हैं, लेकिन इस सच को भी तो समझें कि रईसी में डूबे सत्ता की चाशनी में खुद को सम्मानित किये इन पत्रकारो ने किया ही क्या है। तब तो सवाल सिर्फ मनमोहन सिंह के दौर के पत्रकारो भर का नहीं होना चाहिये। हमने देखा है कैसे वाजपेयी की सरकार के बाद बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार ही कद पाने लगे । और लगा कि इनसे बेहतर पत्रकार कोई है ही नहीं। पत्रकारिता खबर ब्रेक करने पर टिकी। सत्ता ने खबर ब्रेक अपने पत्रकारों से करायी। और खबर का मतलब ही धीरे धीरे सत्ता की खबर ब्रेक करने वालों से होने लगी। सोनिया गांधी पीएम बनना नहीं चाहती हैं। या अंबानी बंधुओं में बंटवारा हो रहा है । वाजपेयी मुखौटा है। आडवानी संघ के चहते हैं। इन खबरो को ब्रेक करने वाला ज्यादा बड़ा पत्रकार है या साईंनाथ सरीखा पत्रकार, जो किसानो की बदहाली के बीच सत्ता की देशद्रोही नीतियों को बताना चाहता है। यह सवाल तो अब भी मौजूं है। खाता कोल कर सीधे गरीब के एकाउंट में पैसा पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये या यूरिया बाजार में उचित दाम पर मिल जाये । पीएमओ की ताकत के सामने कैबिनेट भी नतमस्तक कैसे हो चली है, यह छुपाया जाये और सत्ता की नीतियों के एलान को ही मीडिया के भोपूं के जरीये दुनिया तो ज्यादा जोर सुनाया जाये। और इसे ही पत्रकारिता मान लिया जाये। यही सवाल तो महत्वपूर्ण है। तो फिर धार का पैमाना हो कैसा।

यार आप बात देश की कर रहे हो और हर दिन जिस वातावरण में नौकरी करनी पड़ती है, उसमे चापलूसी , अपने प्यारे को ही आगे बढ़ाने की सोच, अपनी कुर्सी को ही सबसे विद्दतापूर्ण बताने जताने का खुला खेल। खुद को बचाते हुये हर दिन अपने ही इर्द-दिर्द ऐसी खबरो को तरजीह देना जो आपकी समझ में आती हों। जो आपके अपनों की हो। और स्क्रीन पर वही चेहरा-चेहरे, जिससे आपको प्यार है उस वातावरण में आपका पूरा दिन तो सिवाय जहर का घूंट पीने के अलावे और किसमें गुजरेगा। इतना ही नहीं, आपकी लायी बेहतरीन खबर की भी हत्या करने में कितना वक्त लगेगा। डाक्यूमेंट पूरे नहीं हैं। प्रतिक्रिया हर किसी की चाहिये। फायदा क्या है दिखाने का। कौन देखना चाहता है यह सब। टीआरपी मुश्किल है। हुजुर हजारों हथियार है नाकाबिल एडिटर के पास।

फिर भी यार भीतर रह कर लड़ा जा सकता है। बाहर निकलकर हम आप तो कहीं भी काम कर लेंगे । लेकिन जिन संस्थानों में जो नयी पीढी आ रही है, उनका भी सोचिये। या नाकाबिलों के विरोध करने की हिम्मत कहां बच रही है। नाकाबिल होकर मीडिया में काम आसानी से मिल सकता है। बंधु सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं है। सत्तादारी भी तो नहीं चाहते है कि कोई उनसे सवाल करे। तो वह भी भ्रष्ट्र या चार लाइन ना लिख पाने या ना बोल पाने वाले पत्रकारों को ज्यादा तरजीह देते हैं। जिससे उनकी ताकत, उनकी नीतियां या उनकी समझ पर कोई उंगुली उठाता ना दिखे। यह ऐसे सवाल हैं, जिन पर बीते दस बरस से कई कई बार कई तरीको से बात हुई।

जी, यह उस बातचीत का हिस्सा है जो 2004 में पहली बार मुलाकात के वक्त मीडिया को लेकर सवाल हों या पत्रकारिता करने के तरीकों को जिन्दा रखने की कुलबुलाहट होती थी और जब सांप-छछुंदर की खबरों ने पत्रकारीय पेशे को ही दिन भर चाय की चुस्की या हवाखोरी में तब्दील करते हुए दिल्ली से दूर निकल जाने के लिये खूब वक्त मुहैया कराया था। या फिर जैसे ही देश में मनमोहन सरकार की बत्ती गुल होने की खुशी के वक्त चर्चा में मोदी सरकार को लेकर कुछ आस जगाने की सोच हो। या फिर अंबानी-अडानी की छाया में दिल्ली की सत्ता तले सियासी बहस के दौर में मीडिया की भूमिका को लेकर उठते सवालों के बीच धारदार पत्रकारिता कैसे हो, इसका सवाल हो। आपसी चर्चा तो राडिया टेप पर पत्रकारों की भूमिका को लेकर भी खूब की और पत्रकार से मालिक बनते संपादकों की भी की और मालिको का पत्रकार बनने के तौर तरीको पर खूब की।लेकिन हर चर्चा के मर्म में हमेशा पत्रकारिता और जीने के जज्बे की बात हुई। इसलिये राबर्ट वाड्रा पर पहले कौन राजनेता अंगुली उठायेगा और जब नरेन्द्र मोदी ने पहली बार खुले तौर पर वाड्रा को कठघरे में खड़ा किया तो भी विश्लेषण किया कि कैसे बीजेपी का भी दिल्ली में कांग्रेसीकरण हो गया था और मोदी क्यो अलग है।

चर्चा मनमोहन सिंह के दौर के क्रोनी कैपटिलिज्म के दायरे में पत्रकारों के खड़े होने पर भी बात हुई। फिर मुज्जफरनगर दंगों में सैफई के नाच गानों के बीच यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करने का जज्बा हो। या मोदी सरकार के महज एलानिया सरकार बनने की दिशा में बढते कदम। हर बार ईमानदार-धारदार पत्रकारिता को ही लेकर बैचेनी दिखायी दी। लेकिन जैसे ही यह जानकारी मिली की बारह बरस बाद दीपक शर्मा आजतक छोड़ रहे हैं और यह कहकर छोड़ रहे हैं कि कुछ नया,कुछ धारदार करने की इच्छा है तो पहली बार लगा कि मीडिया संस्थान हार रहे हैं। जी दीपक शर्मा की अपनी पत्रकारिता है या पत्रकारिता को जीने के हर सपने को बीते बारह बरस में बेहद करीब से या कहें साझीदार होकर जीने के बीच में यह सवाल बार बार परेशान कर रहा है कि जिसके लिये पत्रकारिता जीने का अंदाज है। जिसके लिये ईमानदार पत्रकारिता जीने का नजरिया हो। जिसके लिये तलवार की नोंक पर चलते हुये पत्रकारिता करना जिन्दगी का सुकुन हो, वही ऐसे वक्त पर यह क्यों कह रहा है कि दिल्ली आया था तो अकबर रोड भी नहीं जानता था। आजतक में काम करते हुये आजतक ने अकबर बना दिया। अब दुबारा रोड पर जा रहा हूं। यह बेचैनी दीपक से पत्रकारिता के लिये कोई वैकल्पिक रास्ता निकलवा ले तो ही अच्छा है । क्योंकि दिल्ली में अब सवाल अकबर रोड का नहीं रायसीना हिल्स पर खड़े होकर बहादुरशाह जफर मार्ग को देखने समझने का भी है। और शायद भटकते देश को पटरी पर लाने का जिम्मा उठाने का वक्त भी है। इसलिये दीपक सरीखे पत्रकारों को सोशल मीडिया की गलियों में खोना नहीं है और हारे हुये मीडिया से शह पाकर मात भी उसी मीडिया को देनी है जो धंधे में बदल चुका है।

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.


मूल पोस्ट….

आजतक को अलविदा कह दिया दीपक शर्मा ने

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पूंजीपतियों की पक्षधरता के मामले में कांग्रेसी ममो के बाप निकले भाजपाई नमो!

: इसीलिए संघ और सरकार ने मिलजुल कर खेला है आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार का खेल : जनविरोधी और पूंजीपतियों की पक्षधर आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू कराने के लिए धर्म पर बहस को केंद्रित कराने की रणनीति ताकि जनता इसी में उलझ कर रह जाए : सुधार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कही ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे है । तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक दूसरे को इसका एहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाये फिर एक दूसरे को देख लेंगे।

यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका एहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरी कोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आईएमएफ की सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके।

सरकार और संघ ने उस रास्ते को धुआंधार तरीके से पकड़ लिया है जो दोनों को विस्तार दे और टकराव के हालात आने तक दोनों ही मान कर चलें कि सत्ता हाथ में रहेगी तो रोक लेगें या सत्ता की डोर खींच लेंगे। आने वाले वक्त में होगा क्या, इसे ताड़ना तो दूर की गोटी होगी लेकिन इस दौर के दो संकेत साफ हैं। पहला, आरएसएस धर्म को धारण करने की सोच से कही आगे ले जाना चाहती है। दूसरा सरकार खेती और खनिज संपदा को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की धरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है, इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता।

पहली बार कोयला खादान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिये की है क्योकि उन्हे निजी हाथो में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हडताल इसलिये करना चाह रहे हैं क्योंकि वेतन में इजाफा किये बगैर सरकार के सारे घतकर्म को बैंक के जरीये ही पूरा करने की नीति अपनायी जा रही है। बड़े बड़े हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो कोई नहीं जानता। जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे कोई संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुये चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरीये ही अपने होने का एहसास तेजी से जाग रहा है।

राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है। देश में विपन्न तबके की ताकत सत्ता से इसलिये टकराने से कतराती रही है क्योंकि सत्ता की नीतियो से इतर खेती एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के तहत पेट भरती रही है और धर्म की आस्था का पाठ संयम से जुडा रहा है। लेकिन यह दोनों हालात सत्ता की निगाहों में चढ़ जाये या सत्ता ही दोनो को प्रबावित करने लगे तो रास्ता क्या निकलेगा। इसकी संवेदनशीलता कौन कितना समढ रही है यह अपने आप में सवाल है। मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ रहा है, जो आक्रमक हो चला है। दूसरी तरफ विकास की थ्योरी भी आक्रामक है। राष्ट्र विकास की थ्योरी तले पूंजी को ज्यादा महत्व दे रहा है। जिस खेती पर टिका देश का साठ फिसदी दुनिया की मंदी से प्रभावित हुये बगैर भी बाकी चालीस फिसदी को भी संकट से उबार लेता है और मनमोहन सिंह सरीखे सुधारवादी अर्थशास्त्री भी यह कहने से नहीं चुकते कि भारत की इकनॉमी दुनिया की मंदी से प्रभावित नहीं हुई। उसी खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियारे का जमीन सुधार शुरू होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है।

ना तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और ना ही छत्तीसगढ या बंगाल सरीखे राज्यो की खेती अर्थव्यवस्था। औघोगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिये हथियारो के उद्योग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामिण क्षेत्रो में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जायेगा। लेकिन इसकी एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढे या विपन्न लोगों को रोजगार मिले। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भूसंपदा कारपोरेट घरानो को सौपी गयी। जो रियल इस्टेट में खपा। अकूत मुनाफाखोरी हुई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालाधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा।
योजना आयोग की घिसी पिटी लकीरों को मिटाकर नयी लकीर खिंचने के लिये बने नीति आयोग की नयी भर्ती से भी समझा जा सकता है। याद कीजिये तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविन्द पानागढिया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनों के लिये खुला बाजार खासा मायने रखता है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में काम करते हुये दोनों ने ही आर्थिक सुधार को ना सिर्फ खासा महत्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिये दोनो के लिये विकास की रेखा कंजूमर की बढती तादाद से तय होती है। दोनों ही डब्ल्यूटीओ की उन नीतियों का विरोध कभी ना कर सके जो भारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रही। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहे मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे। फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत में जितनी असमानता है और बिहार, यूपी, झारखंड सरीखे बीमारु राज्य की तुलना में महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे विकसित राज्य के बीच कभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी विकास को हर तबके तक पहुंचाने के लिये री-डिस्ट्रीब्यूशन आफ डेवलपमेंट की थ्योरी रखी। जिस वक्त नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिये लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविन्द पनगारिया ने भी बकायदा भारत में विकास की असमानता को लकेर कई लेखों में कई सवाल उठाये।

फिर विश्व बैंक और आईएमएफ का नजरिया भारत को लेकर इन दोनो अर्थशास्त्रियों के काम करने के दौरान ही कितना जन विरोधी रहा है, यह मनमोहन सिंह के दौर में बीजेपी ने ही कई मौको पर उठाये। और तो और, संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच दोनो ने ही हमेशा विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है । अब यहा नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिये सरकार की नीतियां। एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देशी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिये बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं और उन्हें बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार की राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे है। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतर्विरोध। या फिर सहमति और अंतर्विरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। क्योंकि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधरराव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक। जो वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में उसी विदेसी निवेश और पूंजी पर टिके उसी विकास के खिलाफ थे जो रोजगार दे नहीं पा रही थी और पूंजीवालों को हर सुविधाओं से लैस कर रही थी।

मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने 40 फिसदी मजदूरों के रोजगार छीने और 70 फीसदी स्वरोजगार में सेंध लगायी। २००५-२०१० के दौर में देश में कुल २७० लाख रोजगार हुये। लेकिन इसी दौर में करीब ढाई लाख स्वरोजगार बेरोजगार हो गये। इसी दौर में उद्योगों को टैक्स सब्सिडी हर बरस पांच लाख करोड़ तक दी गयी। और इस सब की हिमायत विश्व बैक और आईएसएफ से लेकर डब्लूटीओ तक ने की, जहां से निकले अर्थशास्त्री अब नीति आयोग को संभाल रहे हैं बल्कि मनमोहन सरकार के दौर में आर्थिक सलाह देने वाले डा विवेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविन्द पानागढ़िया का ही नहीं बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री डॉक्टर बिबेक देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में सुझाव देते आये है और इन अहम सुझावों को कभी बीजेपी ने सही नहीं माना। या कहें कई मौकों पर खुलेआम विरोध किया। डा देवराय इससे पहले की सरकार में विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियों का चलन यहां भी जारी रहेगा। तो सवाल है बदलेगा क्या। वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरों के लिये केन्द्र सरकार की नीतियों से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है। जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्व दिया जा रहा है और मजदूरों को मालिकों के हवाले कर हक के सवाल को हाशिये पर ढकेला जा रहा है उससे संघ का ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है।

सवाल यह भी है कि खुद नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद संसद के सेंट्रल हाल में अपने पहले भाषण में ही जिन सवालों को उठाया और उसके बाद जिस तरह हाशिये पर पड़े तबको का जिक्र बार बार यह कहकर किया कि वह तो छोटे छोटे लोगों के लिये बड़े बड़े काम करेंगे तो क्या नयी आर्थिक नीतियां वाकई बड़े बड़े काम छोटे छोटे लोगों के लिये कर रही है या फिर बड़े बड़े लोगों के लिये। क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे, इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और कारोबारियों के हाथ में सिमट रहा है और पहले ना मनमोहन सिंह कुछ बोले और ना ही अब कोई बोल रहा है। गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतियां कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही है। ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-ये किसके लिये कितना बड़ा, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है और देश को इसमें उलझाया जा रहा है मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में धर्म के नाम पर कही औवेसी तो कही आरएसएस का नाम लेकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का खुला खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियो की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुणा तेज है और यह लगने लगा है कि निजी सेक्टर चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चले हैं।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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संघ की उड़ान को थामना सोनिया-राहुल के बस में नहीं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

जिस सियासी राजनीतिक का राग नरेन्द्र मोदी ने छेड़ा है और जिस हिन्दुत्व की ढपली आरएसएस बजा रही है, कांग्रेस ना तो उसे समझ पायेगी और ना ही कांग्रेस के पास मौजूदा वक्त में मोदी के राग और संघ की ढपली का कोई काट  है। दरअसल, पहली बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी की राजनीतिक समझ नरेन्द्र मोदी की सियासत के जादू को समझ पाने में नाकाम साबित हो रही है  तो इसकी बडी वजह मोदी नहीं आरएसएस है। और इसे ना तो सोनिया-राहुल समझ पा रहे है और ना ही कांग्रेस का कोई धुरंधर। अहमद पटेल से लेकर जनार्दन  द्विवेदी और एंटनी से लेकर चिदबरंम तक सत्ता में रहते हुये हिन्दु इथोस  को समझ नहीं पाये। और ना ही संघ की उस ताकत को समझ पाये जिसे इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी ने बाखूबी समझा।

इसलिये सोनिया गांधी और  राहुल गांधी की सियासत सिवाय मोदी सरकार के फेल होने के इंतजार से आगे बढ़  भी नहीं पायेगी। इसलिये कांग्रेस ना तो मोदी सरकार के लिये कोई चुनौती है ना ही संघ परिवार के लिये कोई मुश्किल। और यह चिंतन कांग्रेस में नहीं  बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हो रहा है। संघ के चितंन-मनन का दायरा  कितना बड़ा है या कांग्रेस संघ की उस थाह को क्यों नहीं ले पा रही है, जिसे  इंदिरा ने ७० के दशक में ही समझ लिया और राजीव गांधी ने अयोध्या आंदोलन  के वक्त समझा। असल में संघ परिवार के भीतर भविष्य के भारत के जो सपने पल  रहे है वह पहली बार नेहरु-गांधी परिवार के साथ अतित में रहे संघ परिवार  के संबंधों से आगे देखने वाले हैं। हिन्दु राष्ट्रवाद को अध्यात्मिक तौर  पर आत्मसात कराने वाले हैं।यानी हिन्दु धर्म का नाम लिये बगैर एकनाथ  राणाडे की उस सोच का अमलीकरण कराना हो जो विवेकानंद को लेकर राणाडे ने  १९७० में करा लिया था। लेकिन उस वक्त इंदिरा गांधी ने इस सोच की थाह को  पकड़ लिया था।

असल में एकनाथ राणाडे की सौवी जंयती के मौजूदा बरस में वह  सारे सवाल संघ के भीतर हिलोरे मार रहे है जिनपर अयोध्या आंदोलन के वक्त  से ही चुप्पी मार ली गई और संघ की समूची समझ ही राम मंदिर के दायरे में सिमटा दी गयी। मुश्किल यह है कि काग्रेस की राजनीति बिना इतिहास को समझे भविष्य की लकीर खिंचने वाली है और संघ अपने ही अतित के पन्नो को खंगाल  कर भविष्य का सपना संजो रहा है। जो कांग्रेस और तमाम राजनीतिक दल आज संघ परिवार के हिन्दु शब्द सुनते ही बैचेन हो जाते है उस हिन्दु शब्द का महत्व आरएसएस के लिये क्या है और इंदिरा गांधी ने इस शब्द को कैसे पकड़ा इसके लिये इतिहास के पन्नो को खंगालना जरुरी है। पन्नों को उलटे तो १९७०  में स्वयंसेवक एकनाथ राणाडे ने जब विवेकानंद शिला स्मारक का कार्य पूरा  किया तो इंदिरा गांधी ने राणाडे को समझाया कि स्वामी विवेकानंद के विचार  को दुनियाभर में फैलाने और भारत को दुनिया का केन्द्र बनाने में उनकी  सरकार राणाडे की मदद करने को तैयार है। बशर्ते स्वामी विवेकानंद को  हिन्दू संत की जगह भारतीय संत कहा जाये। राणाडे इसपर सहमत हो गये ।  लेकिन तब के सरसंघचाल गुरुगोलवरकर इसपर सहमत नहीं हुये कि इंदिरा सरकार के साथ मिलकर हिन्दू संत विवेकानेद की जगह भारतीय संत विवेकानंद के लिये  एकनाथ राणाडे काम करें। असर इसी का हुआ कि १९७१ की आरएसएस की प्रतिनिधि  सभा में विवेकानंद शिला स्मारक की रिपोर्ट एकनाथ राणाडे ने नहीं रखी।

संघ के जानकार दिलिप देवघर के मुताबिक संघ की प्रतिनिधी सभा में विवेकानंद स्मारक शिला पर रिपोर्ट ना रखने पर स्वयसंवकों ने जब वजह जानना चाहा तो गुरु गोलवरकर की टिप्पणी थी, इनका संघ के साथ क्या संबंध। तो पहली बार इंदिरा गांधी ने संघ की उस ताकत में सेंध लगायी जिसे मौजूदा वक्त में कांग्रेस के धुरंधर समझ पाने में नाकाम हैं। इंदिरा गांधी की सफलता इतनी भर ही नहीं थी बल्कि इसके बाद विवेकानंद केन्द्र को लेकर जो  काम एकनाथ राणाडे ने शुरु किया वह इस मजबूती से उभरा कि रामकृष्ण मिशन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामानांतर एक बडी ताकत का केन्द्र विवेकानंद केन्द्र बनकर उभरा। यानी १९२६ में महज १२ बरस की उम्र में जो एकनाथ  राणाडे आरएसएस के साथ जुड गये और जिन्होंने १९४८ में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौर में गुरु गोलवरकर के जेल में रहने पर सरदार पटेल के साथ मिलकर तमाम समझौते किये। बालासाहेब देवरस और पी बी दाणी के साथ मिलकर आरएसएस  का संविधान लिखा। जिसके बाद संघ पर से प्रतिबंध उठा। उस एकनाथ राणाडे को अपनी राजनीति से इंदिरा गांधी ने साधा। हालांकि गुर गोलवरकर की मृत्यु के बाद बालासाहेब देवरस ने बैगलोर में संघ की सभा में एकनाथ राणाडे को हाथ पकड़कर साथ बैठाया और उसके बाद से विवेकानंद केन्द्र पर रिपोर्ट देने का सिलसिला शुरु हुआ। लेकिन यहा समझना यह जरुरी है कि राणाडे के शताब्दी वर्ष में ९ नवंबर २०१४ को अगर प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली के विज्ञान भवन के कार्यक्रम में शिरकत करते है और तीन दिन पहले नागपुर के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में सरसंघचालक मोहन भागवत भी एकनाथ राणाडे को याद कर स्वामी विवेकानंद के विचारों को ही देश में फैलाने के जिक्र कर हिन्दुत्व का सवाल उठाते हैं तो फिर इसके दो मतलब साफ है। पहला, संघ परिवार अब हिन्दू इथोस की उस सोच को देश मे पैदा करना चाहता है जिक्र जिक्र विवेकानंद ने किया और जिस सोच को राणाडे विवेकानंद के जरीये देश में फैलाना चाह रहे थे। और  दूसरा कांग्रेस आज इस हिन्दू इथोस को समझ नहीं पा रही है कि आखिर नेहरु गांधी परिवार हमेशा हिन्दुत्व को लेकर नरम रुख क्यों अपनाये रहा।

दरअसल इंदिरा गांधी ने इमरजेन्सी के दौर में जेपी के साथ आरएसएस के जुड़ने को भी खतरे की घंटी माना । यह वजह है कि १९८० में सत्ता वापसी के बाद इंदिरा गांधी ने खुले तौर पर हिन्दुत्व को लेकर साफ्ट रुख अपनाया । सत्ता संबालने के बाद विदर्भ जाकर इंदिरा गांधी ने विनोबा भावे के पांव छुये। उस दौर में उन्होने संघ की ताकत को लेकर विनोभा भावे से जिक्र किया । संघ के सामाजिक संगठनों को ही आरएसएस के भीतर संघर्ष कराने के हालात भी पैदा किये। असल में संघ परिवार के भीतर अब इस सवाल को लेकर मंथन चल रहा है कि विश्व हिन्दु परिषद को तो अध्यात्मिक रुख अदा करना था लेकिन अयोध्या आंदोलन को लेकर विहिप का रुख राजनीतिक कैसे हो गया। सच यह भी है कि विहिप के राजनीतिकरण में भी इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका रही। जिन्होंने धीरे धीरे विहिप के आंदोलन को राजनीति के केन्द्र में ला खड़ा किया। जिसे राजीव गांधी ने अयोध्या आंदोलन के दौर में शिला पूजन पर विहिप के साथ समझौता कर आगे भी बढाया और रज्जू भैया के साथ समझौते की दिशा में कदम भी बढाये। ध्यान दें तो राजीव गांधी ने एक साथ दो-तरफा सियासी बिसात बिछायी । एक तरफ सैम पित्रोदा के जरीये तकनीकी आधुनिकीकरण तो दूसरी तरफ बहुकेन्र्दीय सांप्रदायिकता । शाहबानो मामला, अयोध्या में शिला पूजन और नार्थइस्ट में मिशनरी। ध्यान दें तो मौजूदा कांग्रेस में ना तो सोनिया गांधी हिन्दु इथोस को समझ पायी है और ना ही राहुल गांधी काग्रेस के नरम हिन्दुत्व रुख के कारणो को समझ पाये। इसलिये जिस स्वामी विवेकानंद की धारा को इंदिरा गांधी ने संघ के ही स्वयसेवक एकनाथ राणाडे के जरीये की संघ के हिन्दुत्व पर चोट कर सामानांतर तौर पर खड़ा किया आज वही विवेकानंद केन्द्र मोदी सरकार की थिंक टैक हैं। और कांग्रेस की समझ से यह सियासत कोसो दूर है। असल में कांग्रेस की दूसरी मुश्किल तकनीक के विकास के जरीये विचारधारा और समाज में परिवर्तन की समझ भी है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के संबंध एल्विन टोफलर से भी रहे। दोनों ही भविष्य की राजनीति में तकनीक और टेकनाक्रेट दोनो की जरुरत को समझते थे। और आरएसएस के भीतर भी यह समझ खासी पुरानी रही है। १९९८ में संघ के चिंतन बैठक में बकायदा एचवी शेषार्दी ने बाल आप्टे और केरल के वरिष्ठ स्वयंसेवक परमेशवरन के जरीये एल्विन टॉफलर की किताब वार एंड एंटी वार और हेलिग्टन की क्लैशस आफ सिविललाइजेशन पर एक पूरा सत्र किया। यानी सोलह बरस पहले ही भविष्य के बारत को लेकर जो सपना भी संघ के भीतर चिंतन के तौर पर उपज रहा था वह नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कैसे लागू होगी या कैसे लागू की जा सकती है इस दिशा में काम लगातार चल रहा है। न्यूयार्क, सिडनी के बाद अब लंदन में भी प्रदानमंत्री मोदी की सार्वजनिक सभा के आयोजन में संघ का कोर ग्रूप लगा हुआ है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आज की तारीख में बकायदा हर एनआरआई स्वयंसेवक की पूरी जानकारी संघ-बीजेपी के कम्प्यूटर में मौजूद है, जिनसे संपर्क कर मोदी सरकार का साथ और संघ के हिन्दू राष्ट्र के सपने को जगाने में एक मेल यानी कंप्यूटर की चिट्टी ही काफी है । जो विदेशी स्वयंसेवकों में राष्ट्रप्रेम जगा देती है। इसी तर्ज पर अब दुनिया के हर हिस्से में में मौजूद भारतीयो की सूची भी अब संघ-बीजेपी तैयार कर रही है।

जाहिर है अगर तकनीक के आसरे संवाद बन सकता है और विदेश में रह रहे भारतीयो पर एक मेल से राष्ट्रप्रेम जाग सकता है तो संकेत साफ है कि डिजिटल क्रांति,संचार क्रांति और तकनीकी संबंध के आसरे भविष्य के भारत को  बनाने की दिशा में संघ की पहल मोदी सरकार के आसरे जिस रफ्तार पर चल पड़ी है उसमें कांग्रेस कहां टिकेगी और बाकि राजनीतिक दलो की सोच कैसे असर डालेगी। क्योंकि कांग्रेस के भीतर भारतीय संस्कृति के उन सवालो को समझने वाला और सोनिया-राहुल गांधी को समझाने वाले कितने कांग्रेसी हैं, जो बता पाये कि नेहरु ने पारसी दामाद होने के बावजूद इंदिरा को हिन्दु रखकर भारत के सियासत के मर्म को समझा। इंदिरा गांधी ने ईसाई बहू होने के बावजूद राजीव गांधी को हिन्दू रखकर भारत के हिन्दू इथोस को समझा। और  सोनिया-राहुल के दौर में संघ परिवार को आंतक के कटघरे में खडा कर हिन्दू शब्द पर ही सवालिया निशान लगाया गया। तो संकेत साफ है हिन्दू शब्द पर ही राजनीति बंटेगी तो कांग्रेस की हथेली खाली रहेगी।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल से जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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16 मई के बाद कितना और कैसे बदला मीडिया (पार्ट-3)

: जन-आंकाक्षाओं तले मीडिया की बंधी पोटली के मायने : बीते सात महीनों में एक सवाल तो हर जहन में है कि देश में मोदी का राजनीतिक विकल्प है ही नहीं। यानी जनादेश के सात महीने बाद ही अगर मोदी सरकार की आलोचना करने की ताकत कांग्रेस में आयी है या क्षत्रपों को अपने अपने किले बचाने के लिये जनता परिवार का राग गाना पड़ रहा है तो भी प्रधानमंत्री मोदी के विकल्प यह हो नहीं सकते। राहुल गांधी हो या क्षत्रपों के नायक मुलायम, नीतिश या लालू ।

कोई मोदी का विकल्प हो नही सकता है। क्योंकि सभी हारे हुये नायक तो हैं ही बल्कि जनादेश ने जो नयी आकांक्षायें देश में नये सीरे से जगायी है उसके सिरे को पकड़ने में यह तमाम चेहरे नाकामयाब हो रहे हैं। तो फिर विकल्प का सवाल भी सियासी राजनीति से गायब है। इसलिये पहली बार प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्रा हो या चुनावी प्रचार की रैली  के लिये राज्यों का दौरा दोनो में कोई अंतर नजर आता नहीं। भाषण हो या फिर सियासत दोनों जगहों पर अंदाज एकसा भी नजर आता है और कभी न्यूयार्क तो कभी सिडनी की एऩआरआई रैली भी देश के चुनावी रैलियों का हिस्सा भाषण की किसासगोई में बन जाती है तो कभी देश की चुनावी रैली अंतराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री की एनआरआई रैलियो में किस्सागोई की तर्ज पर उभर कर प्रधानमंत्री के कद को नये तरीके से गढ़ती हुई लगती है।

लेकिन सवाल है कि लोकप्रिय होने के मोदी के इस अंदाज को देश के सामाजिक-आर्थिक हालात के कटघरे में खड़े करने का साहस करते हुये भी कोई राजनीतिक दल या किसी राजनीतिक दल का कोई नेता उभर नहीं पाता है। ना उभरने या मोदी विरोध करते हुये ताकतवर दिखने से दूर तमाम नेता कमजोर दिखायी देते हैं। क्योंकि सभी ने अपनी साख सत्ता में रहते गंवायी है। तो फिर सत्ता के हर लडाई सिवाय निजी स्वार्थ से आगे किसी नेता की बढ़ भी नहीं पाती है। ऐसे में मीडिया इस राजनीति के सिरे को पकड़े या पूंछ को हाथ में मोदी की लोकप्रियता ही आयेगी और मीडिया की साख का सवाल यही से शुरु होता है।

दरअसल पहली बार जनादेश पाने वाले हो या गंवाने वाले दोनों ने ही मीडिया को चाहे-अनचाहे एक ऐसे हथियार के तौर पर उभार दिया जहां राजनीतिक-टूल से आगे मीडिया की कोई बानगी किसी को समझ आ ही नहीं रही है । मीडिया के प्रचार से जनादेश नहीं बनता लेकिन जनादेश से मीडिया की साख से खुला खिलवाड़ तो किया ही जा सकता है। मीडिया ने मोदी को ना जिताया ना मीडिया ने राहुल गांधी को हराया। तो भी मीडिया उसी राजनीति का सबसे बेहतरीन हथियार बना दिया गया जहां संपादकों और मालिकों के सामने खुद को ताकतवर बनाने के लिये राजनीतिक सत्ता के सामने नतमस्तक होना पड़े । कोई जरुरी नहीं है कि कोई संपादक राजनीतिक सत्ता के विरोध में खडा हो जाये तो उसे मुश्किल होगी। या फिर कोई मीडिया समूह सत्ता पर निगरानी करने के अंदाज में पत्रकारिता करने लगे तो उसके सामने मुश्किल हालात पैदा हो जायेंगे । मुश्किल हालात उसी के सामने पैदा होगें जिसका धंधा मीडिया हाउस चलाते हुये कई दूसरे घंघो को चलाने वाला हो । यानी मुनाफा व्यवस्था का उघोग अगर कोई मीडिया समूह या कोई संपादक-मालिक चला रहा होगा तो उसके सामने तो मुश्किल सामान्य अवस्था में भी होनी चाहिये। लेकिन मीडिया के लिये राजनीतिक ताकत का मतलब यही होता है कि उसके नाजायज धंधों पर सरकार खामोश रहे। या फिर जो सत्ता में आये वह उस मीडिया समूह के मुनाफे पर आंच ना आने दे। हालांकि गलत धंघे या फिर भारत के सामाजिक आर्थिक हालात में कोई संपादक या मालिक करोडों के वारे -न्यारे करता रहे तो संकट तो उसके सामने कभी भी आ सकता है या कहे उसकी पूंछ तो हमेशा सत्ता के पांव तले दबी ही रहेगी। तो फिर मीडिया की एक सर्वमान्य परिभाषा राजनीतिक सत्ता के लिये बेहतर हालात बनाने के इतर क्या हो सकती है । ऐसे हालात तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में खूब देखे गये।

खासतौर से पूंजी पर टिके मीडिया व्यवसाय को जिस बारिकी से आर्थिक सुधार तले मनमोहन सिंह ले आये उसमें झटके में मीडिया की पत्रकारिता धंधे में बदली इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन नया सवाल मीडिया के दायरे में उस पत्रकारिता का है जो राजनीतिक शून्यता में खूद को भी शून्य मान रहा है। यानी राजनीतिक विकल्प नहीं है तो फिर मीडिया भी कौन सी पत्रकारिता करे। और पत्रकारिता हवा में सत्ता के खिलाफ हो ही क्यों जबकि उसे कोई राजनीतिक दल थामने वाला है ही नहीं। यह सवाल बड़े बड़े संपादको के दिल में है कि लिख कर कौन सा खूंटा उखाड लेंग । क्योंकि मोदी का कोई विकल्प तो है ही नहीं। और मोदी मौजूदा संसदीय राजनीति के संकट के दौर में खुद विकल्प नहीं है। ऐसे में पत्रकारिता खामोश रह कर ही की जाये तो बेहतर है।

दरअसल यह हालात पहली बार दो सवाल साफ तौर पर खडा कर रहे हैं। पहला, मीडिया को हर हाल में एक राजनीतिक ठौर चाहिये और दूसरा पत्रकारिता सत्ता को डिगाने के लिये कभी नहीं होती बल्कि सत्ता किसकी बनानी है उसके लिये होती है। यानी दोनों हालातों में मीडिया को राजनीति या राजनेताओं के दरबार में चाकरी करनी ही है । इस हालात में एक तीसरा पक्ष है कि क्या देश की समूची ताकत ही राजनीतिक सत्ता में तो सिमट नहीं गयी है। और इस लकीर को संपादक-मालिक अपनी पहल से ही मान्यता दे रहे हैं। क्योंकि मीडिया के भीतर ही नहीं राजनीतिक गलियारे में भी आवाज यही गूंजती है कि एक वक्त के बाद संपादक या मालिक या कद्दावर पत्रकार को तो राजनीति का दामन थामना ही है। यानी मीडिया ने भी मान लिया है कि मीडिया के हालात बदतर होने के बाद हर किसी को राजनीति ही करनी है। संपादक हो या मालिक दोनो को संसद में ही जा कर हालात को संभालना या सहेजना होगा।  यानी चुनाव लड़ने या राज्यसभा के रास्ते संसद तक पहुंच कर कहीं ज्यादा बेहतर हालात किसी पत्रकार के हो ना हो लेकिन साख गंवाने के बाद साख गंवा चुकी राजनीति के चौखट पर माथे टेकने से पत्रकार की साख लौट सकती है या बढ़ सकती है। यह अजीबोगरीब तर्क मौजूदा
वक्त की नब्ज है। यानी जिस मान को पत्रकारिता करते हुये कोई संपादक नीचे गिराता है उसे उठाने का रास्ता राजनीति का वह मैदान ही बचता है जो राजनीति कभी मीडिया को अपने दरबार में नतमस्तक करती है। ध्यान दें तो पत्रकारिता किसी भी हालात में हो ही नहीं रही है। और यह सवाल जानबूझकर उछाला हुआ सा लगता है कि मनमोहन सरकार के दौर में और मोदी सरकार के दौर में कोई बहुंत बड़ा अंतर आ गया है। दरअसल मीडिया को राजनीतिक सत्ता के दरबार का चाकर किसने और कब कैसे बनाया यह संपादकों की कडी के साथ साथ मीडिया संस्थानों की बढ़ती इमारतों से भी समझा जा सकता है और कद्दावर या समझदार, पैना लिखने वाले संपादकों की राजनीतिक दलों से जुडने के बाद किसी साध्वी या योगी के बयानो को बातूनी अंदाज में व्याख्या करने से भी समझा जा सकता है और मनमोहन सिंह के दौर में कभी विश्व बैंक के मोहरों की राजनीति को देश के लिये हितकारी बनाने वाले सलाहकार पत्रकारों के जरीये भी देखा-परखा जा सकता है। यह वाकई मुश्किल सवाल है कि मौजूदा वक्त में जो कद्दावर पत्रकार सत्ता से चिपटे हुये है, गुनहगार वे हैं या जो पत्रकार इससे पहले की सत्ता के करीब थे गुनहगार वे रहे। हो सकता है गुनहगार दोनों ना लगे और यह सवाल ज्यादा मौजूं लगे कि आखिर पत्रकार सिर्फ पत्रकार होकर ही रिटायर्ड कैसे हो जाये। या फिर मीडिया लोकतंत्र के पहले खम्भे से गलबहिया डाले बगैर अपने चौथे खम्भे के होने का एहसास कैसे कराये। दरअसल यह सारे सवाल 16 मई 2014 के बाद बदले हैं। क्योंकि बीते २०-२२ बरस की पत्रकारिता पर आर्थिक सुधार के बाजारवाद का असर था इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन अन्ना आंदोलन के बाद से २०१४ के लोकसभा चुनाव में पारंपरिक मीडिया को ठेंका दिखाते हुये सामानांतर सोशल मीडिया की भूमिका का प्रभाव जिस तेजी से आंदोलन से लेकर जनादेश तक को सफल बनाने में हुआ उसने पहली बार इसके संकेत भी दे दिये समाचार पत्र या न्यूज चैनल खबरों की पत्रकारिता कर नहीं सकते। और राजनीति को प्रभावित करने वाले विचार इन दोनों माध्यमों के संपादकों के पास तबतक हो नहीं सकते जबतक राजनीति का मैदान सियासी टकराव के दौर में ना आ जाये। यानी राजनीतिक टकराव मीडिया को आर्थिक लाभ देता है। और जनादेश की सियासत मीडिया को पंगु बनायेगी ही ।

तो सवाल है कि दोनों हालात जनता के कटघरे में तो एक से ही होंगे। ऐसे में बिना पूंजी, बिना मुनाफे की सोच पाले सोशल मीडिया धारधार होगा इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन सोशल मीडिया बिना जिम्मेदारी या हवा को आंधी बनाने का खुला हथियार भी हो सकता है। जिसके खतरे सतह पर जमे राजनीति के कीचड़ को विकास भी करार दे सकते है और भ्रष्टचार की परिभाषा को धर्म तले आस्था से जोड कर राजनीतिक सत्ता को सियासी पनाह भी दे सकते है । ऐसे में खतरा सिर्फ यह नहीं है कि मीडिया की परिभाषा बदल जाये या पत्रकारिता के तेवर परंपरिक पत्रकारिता को ही खत्म कर दे। खतरा यह भी है मौजूदा संसदीय राजनीति के पारंपरिक तौर तरीको की साख उस लोकतंत्र को ही खत्म कर दें जो देश में तानाशाही व्यवस्था पर लगाम लगाती रही है । एक वक्त इंदिरा गांधी ने जनसमर्थन से पहले काग्रेस को अपने पल्लू में बांधा और फिर कांग्रेसी चापलूस इंदिरा इज इंडिया कहने से नहीं कतराये। और मौजूदा वक्त में विकल्प तलाशते विपक्ष को सत्तादारी बीजेपी में कोई खोट नजर नहीं आ रहा , एक वक्त हिन्दुत्व के धुरधर अच्छे लग रहे हैं। लेकिन जनादेश के घोड़े पर सवार प्रधानमंत्री मोदी खलनायक लग रहे हैं। यह सारे रास्ते आखिर में लोकतंत्र की नयी परिभाषा तो गढेंगे ही। क्योंकि तबतक निगरानी रखने वाला चौथा स्तम्भ भी अपनी परिभाषा बदल चुका होगा। मुश्किल यह है कि लोकतंत्र के हर स्तम्भ ने इस दौर को जन-आकाक्षांओं के हवाले कर अपनी अपनी पोटली बांध ली है।

लेखक पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका लिखा यह विश्लेषण जनसत्ता अखबार में छप चुका है. इसके पहले का पार्ट पढ़ें….

पूंजीपरस्त याराना का यह अद्भुत नजारा और ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी (2)

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क्या 16 मई के बाद मीडिया बदल गया? (1)

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क्या 16 मई के बाद मीडिया बदल गया? (पार्ट-1)

16 मई 2014 की तारीख के बाद क्या भारतीय मीडिया पूंजी और खौफ तले दफ्न हो गया। यह सवाल सीधा है लेकिन इसका जवाब किश्तों में है। मसलन कांग्रेस की एकाकी सत्ता के तीस बरस बाद जैसे ही नरेन्द्र मोदी की एकाकी सत्ता जनादेश से निकली वैसे ही मीडिया हतप्रभ हो गया। क्योंकि तीस बरस के दौर में दिल्ली में सडा गला लोकतंत्र था। जो वोट पाने के बाद सत्ता में बने रहने के लिये बिना रीढ़ के होने और दिखने को ही सफल करार देता था। इस लोकतंत्र ने किसी को आरक्षण की सुविधा दिया। इस लोकतंत्र ने किसी में हिन्दुत्व का राग जगाया । इस लोकतंत्र में कोई तबका सत्ता का पसंदीदा हो गया तो किसी ने पसंदीदा तबके की आजादी पर ही सवालिया निशान लगाया। इसी लोकतंत्र ने कारपोरेट को लूट के हर हथियार दे दिये। इसी लोकतंत्र ने मीडिया को भी दलाल बना दिया। पूंजी और मुनाफा इसी लोकतंत्र की सबसे पसंदीदा तालिम हो गयी। इसी लोकतंत्र में पीने के पानी से लेकर पढ़ाई और इलाज से लेकर नौकरी तक से जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों ने पल्ला झाड़ लिया। इसी लोकतंत्र ने नागरिकों को नागरिक से उपभोक्ता बने तबके के सामने गुलाम बना दिया।

इस लोकतंत्र पर पत्रकारों की कलम भी चली और कलम भी बिकी। पत्रकारिता मीडिया घरानों में बदली। मीडिया घराने ताकतवर हुये तो झटके में सत्ता साधने की राजनीति और कारपोरेट के मुनाफे के बीच पत्रकारिता झूली भी और हमला करने से भी नहीं चूकी। लगा मीडिया धारदार हो रही है क्योंकि संसदीय सत्ता अपने अंतर्रविरोध में इतनी खो गयी कि घोटाले और राजस्व की लूट देश का सिस्टम बन गया। सरकारी नीतिया लूटने के रास्ते खोलने के लिये बनने लगी। हर संस्थान ने लूटा। भागेदारी मीडिया में भी हुई। कामनवेल्थ गेम्स से लेकर 2 जी स्पेक्ट्रम और बेल्लारी से झारखंड तक में खनन संपदा की लूट से लेकर कोयला खानों के बंदरबाट का खुला खेल पॉलिसी के तहत खेला गया जिसमें मीडिया संस्थानों की भागेदारी भी सामने आयी। लेकिन पत्रकारिता ने इन मुद्दों को उठाया भी और भ्रष्ट होती सियासत को आईना भी दिखाया। और तो और कमजोर होती राजनीतिक सत्ता को कारपोरेट ने गवर्नेंस का पाठ भी पढ़ाने का खुला प्रयास 2011-12 के दौर में देश के पीएम मनमोहन सिंह को चार बार पत्र लिखकर किया । ऐसे मोड़ पर लोकसभा चुनाव के जनादेश ने उस मीडिया को सकते में ला दिया जिसके सामने बीते तीस बरस के संसदीय राजनीतिक सत्ता के अंतर्विरोध में काफी कुछ पाना था और काफी कुछ गंवाना भी था। क्योंकि इस दौर में कई पत्रकार मीडिया घरानो में हिस्सेदार बन गये और मीडिया घरानों के कई हिस्सेदार पत्रकार बन गये। ध्यान दें तो मीडिया का विकास जिस तेजी से तकनीकी माध्यमों को जरिये इस दौर में होता चला गया उसके सामने वह सियासी राजनीति भी छोटी पड़ने लगी जो आम लोगों के एक एक वोट से सत्ता पाती । क्योंकि झटके में वोट की ताकत को डिगाने के लिये मीडिया एक ऐसे दोधारी हथियार के तौर पर उभरा जिसमें सत्ता दिलाना और सत्ता से बेदखल कराने की भूमिका निभाना सौदेबाजी का सियासी खेल बना दिया गया। तो दाग दोनों जगह लगे। राजनेता दागदार दिखे। मीडिया घराने मुनाफा कमाने के धंधेबाज दिखे । नेता के लिये वोट डालने वाले वोटर हो या मीडिया के पाठक या व्यूवर। इस सच को जाना समझा सभी ने। लेकिन विकल्प की खोज की ताकत ना तो मीडिया या कहे पत्रकारों के पास रही ना ईमानदार नेताओ के पास। ऐसे में १६ मई के जनादेश से पहले चुनावी बिसात पर मीडिया वजीर से कैसे प्यादा बना यह प्रचार के चुनावी तंत्र में पैसे के खेल ने आसानी से बता दिया। लेकिन यह खेल तो चुनावी राजनीति में हमेशा खेला जाता रहा है। हर बार की तरह 2014 में भी यही खेल खेला जा रहा है माना यही गया।

लेकिन यह किसी को समझ नहीं आया कि जो पूंजी चुनावी राजनीति के जरीये लोकतंत्र के चौथे खम्भे को कुंद कर सकती है। जो पूंजी हर सत्ता या संस्थानों के सामने विकल्प बनाने के लिये बेहतरीन हथियार बन सकती है वही पूंजी लोकतंत्र जनादेश के साथ खड़े होकर लोकतंत्र को अपनी जरुरत के हिसाब से क्यों नहीं चला सकती। दरअसल 16 मई के जनादेश के बाद पहली बार मीडिया का वह अंतर्रविरोध खुल कर सामने आया जिसने राजनीति के अंतर्विरोध को छुपा दिया। यानी सियासी राजनीति के जिस खेल में देश की सत्ता बीते 30 बरस में भ्रष्ट होती चली गयी और मीडिया ने अपने अंतर्विरोध छुपा कर राजनीति के अंतर्विरोध को ही उभारा। वही राजनीति जब जनादेश के साथ सत्ता में आयी तो संकट मीडिया के सामने आया कि अब सत्ताधारियों की गुलामी कर अपनी साख बनाये या सत्ताधारियों पर निगरानी रख अपनी रिपोर्टों से जनता को समझाये कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ नहीं होती है। लेकिन इसके लिये पत्रकारीय ताकत का होना जरुरी है और पत्रकारिता ही जब मीडिया घरानो की चौखट पर सत्ताधारियों के लिये पायदान में बदल जाये तो रास्ता जायेगा किधर। यानी पत्रकारीय पायदान की जरुर मीडिया घरानों को सत्ता के लिये पडी तो सत्ता को पत्रकारीय पायदान की जरुरत अपनी अंखड सत्ता को दिखाने-बताने या प्रचार के लिये पड़ी। इस पत्रकारीय पायदान की जरुरत ने इसकी कीमत भी बढ़ा दी। और सत्ता से निकट जाने के लिये पायदान पर कब्जा करने की मुहिम कारपोरेट कल्चर का हिस्सा बनने लगी। इसीलिये 16 मई के जनादेश ने हर उस परिभाषा को बदला जो बीते 30 बरस के दौर में गढ़ी गई। पत्राकरीय स्वतंत्रता का पैमाना बदला । मीडिया घराने चलाने के लिये पूंजी बनाने के तरीके बदले। सत्ता और मीडिया के बीच पाठक या व्यूवर की सोच को बदला। झटके में उस तबके का गुस्सा मीडिया का साथ छोड सत्ता के साथ जा खड़ा हुआ जो बीते ३० बरस से नैतिकता का पाठ मीडिया से पढ़ रहा ता लेकिन मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिये उसके पास कोई हथियार नहीं था। ऐसे में जिस तरह 16 मई के जनादेश ने राजनीतिक सत्ता के उस दाग को छुपा दिया जो भ्रष्ट और आपराधिक होती राजनीति को लेकर देश का सच बन चुका है। उसी तरह गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी विहिन पत्रकारिता का दाग भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति तले दब गया। तीन बड़े बदलाव खुकर सामने आये। पहला जनादेश के सामने कोई तर्क मायने नहीं रखता है। दूसरा राजनीतिक सत्ता की ताकत के आगे लोकतंत्र का हर पाया विकलांग है। और तीसरा विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण गवर्नेंस है। यानी जो पत्रकारिता लगातार विकल्प की तलाश में वैचारिक तौर पर देश को खड़ा करने के हालात पैदा करती है उसे खुद सियासी सत्ता की लड़ाई लडनी होगी बिना इसके कोई रास्ता देश में नहीं है।

यह हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसका अंदाजा 16 मई के बाद सत्ता में आयी बीजेपी के नये अध्यक्ष बने अमित शाह के इस अंदाज से समझा जा सकता है कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन बचेगा या नहीं इसके कयास लगाये जा रहे थे तब आरएसएस के शिवसेना के साथ गठबंधन बनाये रखने की खबर से अपनी सियासी सौदेबाजी का दांव कमजोर पड़ने पर बीजेपी अध्यक्ष खबर देने वाले रिपोर्टर को फोन पर यह धमकी देने से नहीं चूकते हैं कि यह खबर वापस ले लो या फिर इसका अगले दिन इसके लिये भुगतने को तैयार हो जाओ। इतना ही नहीं खबर को राजनीति का हिस्सा बताकर राजनीति के मैदान में आकर हाथ आजमाने का सुझाव भी दिया जाता है। यानी धमकी तो पत्रकारों को मिलती रही है लेकिन कारपोरेट की छांव में मीडिया और पत्रकारिता को पायदान बनाने के बाद राजनीतिक सत्ता का पहला संदेश यही है कि चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाओ तो ही आपकी बात सही है। तो क्या 16 मई के बाद देश की हवा में यहसे बड़ा परिवर्तन यह भी आ गया है कि ढहते हुये सस्थानों को खड़ा करने की जगह मरता हुआ बता कर उसे विकल्प करार दिया जा सकता है। यहां कोई भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि मीडिया को दबाकर सियासत कैसे हो सकती है। लेकिन समझना यह भी होगा कि पहली बार मीडिया को दबाने या ना दबाने से आगे की बहस हो रही है। सीबीआई, सीवीसी, कैग, चुनाव आयोग, जजों की नियुक्ति सरीखे दर्जेनों संस्थान है जिनके दामन पर दाग 16 मई से पहले चुनाव प्रचार के दौर में बार बार लगाया गया। मीडिया भी दागदार है यह आवाज भी मीडिया ट्रेडर के तौर उठायी गयी। यानी जिस राजनीति के भ्रष्ट और आपराधिक होने तक का जिक्र १९९२-९३ में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में किया गया और संसद के भीतर पहुंचने वाले दागदारों की कतार में कोई कमी १६ मई  २०१४ के जनादेश के बाद भी नहीं आयी उस राजनीतिक सत्ता की चौखट पर इस दौर में हर संस्था बेमानी करार दे दी गयी। तो सवाल कई हैं।

पहला लोकतंत्र का मतलब अब चुनाव जीत कर साबित करना हो चला है कि वह ठीक है। यानी पत्रकार, वकील, टीचर, समाजसेवी या कोई भी जो चुनाव लडना नहीं चाहता है और अपने नजरिये से अपनी बात कहता है, उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि सत्ता के पास बहुमत का जनादेश है । दूसरा, संवैधानिक सत्ता के लिये बहुमत का मतलब जब कइयों के संघर्ष में जीतना भर है तो बाकि विरोध करने वाले चाहे अलग अलग हो लेकिन वह संख्याबल में ज्यादा हो तो फिर उनका कोई हक नहीं बनता है। यह सवाल राजनीतिक सत्ता के संघर्ष को लेकर भी है जहा सत्ताधारी को इस बार 31 फीसदी वोट मिले है और यह सवाल पत्रकारों को लेकर भी है जो पत्रकारिता तो करते हैं और उनकी तादाद भी मीडिया हाउस में काम करने वालों से ज्यादा है लेकिन वह उनकी पत्राकरिता को कोई महत्व नहीं दिया जायेगा और उन्हें भी उसी कटघरे में खड़ा किया जायेगा, जहां पत्रकार पायदान बना दिया जा रहा है। और इसके सामानांतर तकनीकी विकास को ही विकल्प बनाने का प्रयास होगा चाहे देश की भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थिति उसके अनुकुल ना हो। यानी मौसम बिगड़े । रोजगार ना मिले । चंद हथेलियो पर ही सारा मुनाफा सिमटे । समाज में खाई और ज्यादा बढ़े। विकास की तकनीकि धारा गांव को खत्म कर दे। विकास के नाम पर उपभोक्ताओं का समूह बनाये रखने या उसे बढ़ाने पर जोर हो। और यह सब होते हुये, देखते हुये पत्रकारिता सरकारो का गुणगान करें और इसे सकारात्मक पत्रकारिता मान लिया जाये। तो फिर 16 मई से पहले और 16 मई के बाद पत्रकारिता कैसे और कितनी बदली है इसका एहसास भी कहां होगा।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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रही सही कसर पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने पूरी कर दी, आर या पार करके!

Abhishek Srivastava : हिंदू राष्‍ट्र संबंधी बयानबाज़ी ने फ्रांसिस डिसूज़ा से लेकर नज़मा हेपतुल्‍ला तक वाया मोहन भागवत लंबा सफ़र तय कर लिया, लेकिन इसमें एक कसर बाकी रह गई थी जिसे आज पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने पूरा कर दिया। प्रसूनजी बोले कि इतने बयान आ रहे हैं, आरएसएस की विचाधारा को फैलाया जा रहा है, तो क्‍यों नहीं सरकार इस संबंध में संविधान में एक संशोधन कर देती है?

ऐसा नहीं है कि प्रधानसेवकजी के मन में संविधान संशोधन जैसी कोई बात नहीं होगी, लेकिन एक पत्रकार उन्‍हें उनके एजेंडे पर नुस्‍खा क्‍यों सुझाए? और ये ‘आर या पार’ क्‍या है? अब तक तमाम हिंदूवादी सनक के बावजूद संघ ने ‘आर या पार’ की मंशा ज़ाहिर नहीं की है। उसका प्रोजेक्‍ट 2025 तक का है। प्रसूनजी को इतनी जल्‍दी क्‍यों है भाई?

संविधान संशोधन की सलाह देने के बाद प्रसूनजी रिवर्स लव जिहाद के कुछ फिल्‍मी मामले दिखाते हैं गानों के साथ। उदाहरणों समेत सुपर्स भी Pankaj भाई की 26 तारीख वाली पोस्‍ट से उद्धृत है- ‘लव के गुनहगार इधर भी हैं उधर भी’। आधा घंटा कट जाता है। 10तक पूरा। अगर आपके पास कहने के लिए कुछ रह नहीं गया है तो कटिए। नागपुर से चुनाव लडि़ए भाजपा के टिकट पर? फिर करवाइए संविधान संशोधन। पत्रकार बनकर क्‍यों जनता को बरगला रहे हैं?

अब ये मत कह दीजिएगा कि पूरा प्रोग्राम व्‍यंजना में था जो मुझे समझ नहीं आया।

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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