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अंग्रेजी अखबार के वो संपादक अपने सामने महिला पत्रकार को बिठाकर देर तक क्लीवेज निहारते थे!

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी… मोटाएगा मालिक… इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी और मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं!

Raghvendra Dubey : अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्द तो उन्होंने हटा लिया लेकिन, मोटी खाल में छिपा जनेऊ, जब-तब सही मौके पर दिख ही जाता है। सांस्कृतिक प्रिवलेज्ड वे, पूंजी के एजेंट हैं और दलाली में माहिर। उनकी जिंदगी का हर क्षण उत्सव है। शाम की तरंगित बैठकों में वे छत की ओर देख कर कहते हैं– …जिंदगी मुझ पर बहुत मेहरबान रही। मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी… मोटाएगा मालिक… इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी और मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं!

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Raghvendra Dubey : अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्द तो उन्होंने हटा लिया लेकिन, मोटी खाल में छिपा जनेऊ, जब-तब सही मौके पर दिख ही जाता है। सांस्कृतिक प्रिवलेज्ड वे, पूंजी के एजेंट हैं और दलाली में माहिर। उनकी जिंदगी का हर क्षण उत्सव है। शाम की तरंगित बैठकों में वे छत की ओर देख कर कहते हैं– …जिंदगी मुझ पर बहुत मेहरबान रही। मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

वह पहले जहां थे, कोई उनसे मिलना चाह रहा था। उसे, उनके पीए ने बताया कि वह फलां तारीख (15 दिन बाद की) को फोन करके पूछ ले कि साहब से कब समय मिल सकता है। बहुत मुश्किल और सामान्य लोगों के लिए तकरीबन असंभव, उनकी उपलब्धता भी दिल्ली में चटख और लंबी कहानी है। जो आतंक, रहस्य और रईसी की छोटी-छोटी अंतरकथाओं से प्रवाह पाती है।

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एक साहब किसी अखबार में कार्यकारी संपादक हैं। मालिक संपादक से वार्तालाप के दौरान उनकी रीढ़ में अद्भुत लचक पैदा हो जाती है।

रीजनल या नेशनल मीट के दौरान (जैसा कि देखा गया है) उनकी नजर हर क्षण मालिक की आंख की पुतलियों की ओर होती है। वह हर इशारा समझते हैं। पुतली फिरी नहीं कि वह दौड़कर मालिक की कुर्सी के बगल में कच्च से घुटनों के बल बैठ जाते हैं और अपना कान उनके मुंह से सटा देते हैं। किसी का ‘काम लगवा दें’ जनाब।

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एक संपादक ने तो दरअसल मालिक के करतूत की सजा भुगती। जेल गये। एक अखबार समूह में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों में से दो-एक एवज में जेल जाने के लिये ही होते हैं।

याद आ रहा है विभिन्न शहरों में अलग-अलग अखबारों की लांचिंग के समय का मंजर। एक संपादक ने अपने अखबार के नाम का स्टिकर, खुली छाती वाली अपनी कोट के दोनों ओर सामने, पीठ पर, बांहों पर, कलाई पर चिपका रखी है।

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सेंटर पर डांसर बुलाई गयी है और कुछ गुंडे भी। प्रतिस्पर्धी अखबार ने भी अपनी सेना जुटा ली।

नगाड़ों और बैंड के कानफाडू शोर के बीच पत्रकार नाम की मजदूर बिरादरी, आमने-सामने की खूखांर और एक-दूसरे के रक्त पिपासु पलटन में बदल जाती है।

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लाठियां मंगवा ली गई हैं। दोनों ओर अवैध असलहे भी हैं। धांय …. धांय .. यह लीजिये गोली भी चली।

मालिक जो वस्तुतः एक ही होते हैं, कई मायनों में, अपनी-अपनी सेना के शौर्य प्रदर्शन से खुश हैं। एक आदमी बस इसलिए संपादक बना दिया गया क्योंकि उसने प्रतिस्पर्धी को डराने के लिए धुआंधार फायरिंग कराई। और एक तो बस इसलिए कि वह हाकरों का नेता था।

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मीडिया के इस ढांचे में सबसे ज्यादा प्रताड़ित और बेचैन असल पत्रकार हैं। एक हिस्सा चाँदी काट रहा है, दूसरा भूजा फांक रहा है। पता नहीं कैसे मात्र 10-12 साल की ही नौकरी में कोई पत्रकार किसी लीडिंग चैनल में पार्टनर हो जाता है या अपना खुद का चैनल और अखबार ला देता है।

हम असल पत्रकार अपना दुख किसको ई-मेल करें। पूंजी तो मालिक की है क्या फर्क पड़ता है रोशनाई, हमारे खून की हो।

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रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ ने ठीक कहा है— हम दोनों ओर से पूरे मनोयोग से लड़ेंगे साथी।

क्यों आलोक जोशी जी, हमारी नियति भी यही है न?

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बखूबी जानता हूं, उनके पीछे संस्थान की पूरी ताकत खड़ी है। राजनीति और नेताओं से कुत्सित रिश्ते भी। लेकिन, देवरिया, बलिया, गोरखपुर और बनारस के लोग चोटिया कर लड़ना जानते हैं। फिर 63-64 की उम्र में मेरे पास गंवाने को क्या है? तकरीबन 36 की उम्र में आया पत्रकारिता में। आठ-10 साल पॉलिटिकल एक्टिविज्म, रंगकर्म और शुरूवाती दौर में अच्छी चल निकली 6 साल की वकालत छोड़ कर। उन दिनों देवरिया में एक जज थे, आर. सी. चतुर्वेदी। जिला जज संगम लाल पाण्डेय। चतुर्वेदी जी जैसे कड़क जज, मुझे बेटे का प्यार देते थे। माथुर चौबे (मूलतः मथुरा के चौबे) लेकिन मैनपुरी के रहने वाले थे। तब जागरण गोरखपुर में संपादक थे, यशस्वी पत्रकार डा . सदाशिव द्विवेदी। शब्द वही अर्थ देने लगते थे, जो वह चाहते थे।

सोचता हूं अगर उन्होंने मुझ 36 पार के व्यक्ति को, अपने साथ रखने से इनकार कर दिया होता, तो क्या होता? रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की जोरदार सिफारिश के बावजूद किसी ने 48 साल की उम्र में मुझे स्टेट ब्यूरो में रखने से इनकार कर दिया होता तो क्या होता? बिहार में मैंने इस छोर से उस छोर तक आम लदी, डोंगी में बैठकर, जिद्दी और करार तोड़ती बेलगाम नदियों से 8-8 किलोमीटर तक की यात्रा की। बाढ़ के साथ जी रहे लोगों को देखने के लिये। जिनका सपना आर्द्र हो चुका था। कांवरियों के साथ 100 किमी. की पैदल यात्रा की। अयोध्या और बाबरी ध्वंस के दौर की ग्राउंड लेवल रिपोर्टिंग के दौरान की ताड़ना-प्रताड़ना कई दफे लिख कह चुका हूं।

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उसी कम तनख्वाह में संस्थान की ओर से आयोजित लिट्रेचर फेस्टिवल, फिल्म फेस्टिवल भी मुझ अकेले के ही जिम्मे होता था। ‘गंगा संसद’ भी। वो आंच और जोखिम लेने का हौसला मुझमें आज भी है, लेकिन उस औपनिवेशिक कानून का क्या करूं जो 58 साल के एक सेकेंड पहले तक हमें सक्षम और एक सेकेंड बाद अक्षम मान लेता है।

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अब तक के 30 साल के करियर में कितना भूत लेखन किया, संपादक और निदेशक की बात न्यायसंगत या वजनदार बनाने के लिये कितनी रफूगीरी की, नहीं बता सकता। लेकिन, वह पाप मेरे माथे भी है, नाहक। बिना कुछ पाये।

बड़ा नाश किया अनपढ़, गुंडे और मालिक या सरकार का तलवा चाटने वाले कुछ संपादकों ने। हमें या हमारे जैसों को इनके ही बीच रहना है और मुट्ठियां ताने मैदान में भी हैं क्योंकि मालिक ने कहा है- ”अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है”।

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एक कार्यकारी संपादक का सधा वाक्य होता है– ”कुछ समझा भी करो…।”

जो संपादक ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला सकते हैं उनकी पसंद देखिये। तब कम्प्यूटर पर खुद ही टाइप कर लेना अभी नहीं शुरू हुआ था। वह लंबा-छरहरा-गोरा लड़का याद है जो समाचार संपादक के कमरे में जाकर अपनी रिवाल्वर लोड और अनलोड करता था। वह संपादक जी की पहली पसंद है। सुना है वह भी किसी यूनिट का संपादक हो गया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े और अच्छी समझ के लिए मशहूर एक पत्रकार के भी बारे में लिखूंगा। बता दूं कि वे किसी जाति के हों, जो अपने नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं लगाते, बड़े जातिवादी हैं। सरनेम हटा लेने से ही वे जाति विघटित नहीं हो जाते। और, दिल्ली तो कुछ ऐसे क्षद्म और अधकचरे बुद्धिजीवियों से आज कल भर गयी है।

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ये संपादक अखबारों में नयी संस्कृति (दरअसल कुसंस्कृति) के नये साहूकार हैं। बीते दो दशकों में परवान चढ़ी चलन के ये, या तो डॉन हैं या कामातुर लपकहे। जो किसी को रातों-रात स्टार बना सकते हैं। बाजार की तूती वाले इस दौर में उनकी मर्द दबंगई और बेझिझक हुई है, कभी मालिक यानि निदेशक या वाइस प्रेसिडेंट के लिये और कभी अपने लिये। पहले अपने लिये। पद के लिये ऊपर चढ़ते जाने की यह भी एक सीढ़ी है।

पत्रकारीय कौशल, उसके लिये जरूरी संवेदना या नागरिक – सामाजिक हैसियत से ज्यादा, इनकी निगाह किसी की आंख, देह रचना, खुले रंग और गोगेल्स पर होती है। खास बात यह कि ऐसी चीजें चटख कानाफूसी बनती हैं और अंततः महिला पत्रकार के खिलाफ ही जाती हैं। वे बाद में गड़बड़ औरत करार देकर निकाल भी दी जाती हैं।

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–उसमें स्पार्क है, उसकी मदद करो

— डाउन द लाइन कुछ अच्छे लोग तैयार करना तुम्हारी भी की-रोल जिम्मेदारी है। लगता है तुमने कुछ पढ़ना-लिखना कम कर दिया है।

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— जी …

और मैं यह कह कर ठंडे कमरे से बाहर चला आया था। उस कमरे की ठंड हालांकि किसी घिन की तरह मेरी देह से बहुत देर तक चिपकी रही।

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लखनऊ में एक अंग्रेजी अखबार के संपादक आज तक नहीं भूले हैं। मेरे खासे परिचित हैं। वह जब-तब, एक महिला पत्रकार को बुला कर, उसे सामने बैठने को कह कर वक्ष की घाटी (क्लीवेज) और गोलाईयां देर तक निहारते रहते थे।

उस महिला को भी इसका भान था लेकिन, कई सहूलियतों की वजह से वह यह जस्ट फन, अफोर्ड कर सकती थी। उसमें पेशेवराना दक्षता थी। पत्रकारिता को अब ऐसे ही प्रोफेशनल्स चाहिये।

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स्पॉट रिपोर्टिंग के दौरान धधकती धूप में जले और धुरियाये रिपोर्टर की देह से संपादक जी को प्याज और लहसुन की बदबू आती थी।

— जाओ मिश्र जी (चीफ रिपोर्टर या ब्यूरो हेड) को दे दो (खबर या रिपोर्ट की कॉपी)

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— जी…

— और सुनो थोड़ा प्रजेन्टेबुल बनो, इस तरह नहीं चलेगा। अखबार का हर कर्मचारी उसका ब्रांड दूत होता है।

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— जी…

उस निहायत कम तनख्वाह पाने वाले रिपोर्टर ने सब्जी और नून-तेल से कटौती कर अपने लिए एक ब्रांडेड शर्ट खरीदी।

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उस दिन पखवारे वाली मीटिंग के दौरान वह नहा-धोकर, वही शर्ट पहन कर आया।

निदेशक की निगाह बार-बार उसकी ही ओर जाती थी।

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”–आजकल मॉडलिंग करने लगे हो क्या? पत्रकारिता करो… वरना लात मार कर निकाल दिये जाओगे। और तुम जानते हो लात कहां पड़ती है।”

संपादक, जी भैया … जी भैया … कह कर बिछा जा रहा था।

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इस डाइरेक्टर की पहनी हुई शर्ट संपादकीय बैठक में नीलाम की जाती है और चतुर संपादक कहता है– ”इसकी बोली कौन लगा सकता है? यह अनमोल है।”

वह संपादक आफिस आने और अपनी कैबिन में घुसने के बाद मेज पर रखे शीशे के नीचे भगवानों की फोटो को हाथ से छू-छू कर प्रणाम करता है। शीशे में अपनी मांग सवांरता है। वह राज्य के संपादकों में सबसे ज्यादा समझदार था।

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— वे सनकी हैं थोड़ा। दोनों। एक किसानी की बात करता है और उसकी अर्थ व्यवस्था की। दूसरा मार्क्स, सार्त्र, ग्राम्सी और देरिदा की।

वे दोनों 50 के ऊपर हो चले थे। अखबार को जो चाहिए नहीं दे पा रहे थे। सुना है निकाल दिये गए।

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चूंकि वे ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर नहीं झोंक सकते, इसलिए अब भाड़ झोंक रहे हैं।

असल पत्रकार अब भाड़ ही झोकेंगे।

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और मालिक ने कहा- अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है। इसलिए मुट्ठियां ताने मैदान में भी होंगे।

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी। मोटाएगा मालिक। इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं।

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दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


इसके पहले वाला हिस्सा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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