मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे!

…जब संपादक राजेंद्र माथुर ने ब्यूरो चीफ पद पर तैनाती करते हुए रामशरण जोशी की तनख्वाह अपने से ज्यादा तय कर दी थी!

Raghvendra Dubey : एक स्टेट हेड (राज्य संपादक) की बहुत खिंचाई तो इसलिए नहीं करुंगा क्योंकि उन्होंने मुझे मौका दिया। अपने मन का लिखने-पढ़ने का। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि मैंने उन्हें ‘अकबर’ कहना और प्रचारित करना शुरू किया जो नवरत्न पाल सकता था। उन पर जिल्ले इलाही होने का नशा चढ़ता गया और मैं अपनी वाली करता गया।

(मुगल बादशाहों ने अपने रुतबे के लिये यह संबोधन इज़ाद किया था)

उन्होंने बहुतों को नौकरियां दीं।

लेकिन अपने गृह नगर से ऐसे लोगों को भी संपादकीय टीम में लेते आये जिनमें से एक ऑटो के लिये सवारियां चिल्लाता था— एक सवारी.. एक सवारी…।

एक किसी साईं भरोसे चिट फंड कम्पनी में काम करता था। एक किसी निजी प्राइमरी स्कूल में ठेके पर मास्टर था।

एक को दारोग़ा बनना था। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा थी। उसके बाप भी दारोगा थे।

एक किसी अखबार में स्ट्रिंगर था और उसके दो सैलून थे।

दोनों उस राज्य संपादक की मेहरबानी से आज संपादक हैं।

दारोग़ा बनने का सपना रखने वाला जो अब संपादक है, सत्य कथाएं पढ़ता है और शहर के एक बुजुर्ग और नामी जेवर व्यवसायी के पैर छूता है। इसलिये कि दीवाली पर उसे चांदी की गिन्नियां मिल जायें। वह हर दीवाली लाखों की गिफ्ट लेकर घर जाता है। कार्यकारी संपादक का बहुत खास है और स्टेट हेड चूंकि रिटायर हो गए, इसलिये उनको कभी फोन तक नहीं करता। तोता चश्म है या फूल सूरजमुखी का, नहीं जानता।

स्टेट हेड के लिये वे दिन, जब वे जिसे चाहें, किसी को सड़क से उठा कर सितारों की पांत में बिठा सकते थे, अब गहन अंधेरे की स्मृतियां हैं। अपनों से मिले घाव अबतक रिसते हैं।
उन्हें सेवा विस्तार न मिल सके, इसकी सुपारी दूसरे कार्यकारी संपादक ने ली। जो मरकजी हुकूमत और संस्थान के बीच अच्छे रिश्तों की सेतु हैं।

एक बिल्डर उनका बड़ा प्रसंशक है।

एक बात याद आती है।

यशस्वी पत्रकार स्व. जयप्रकाश शाही को गोरखपुर में उनके गांव के लोगों ने, तब काबिल पत्रकार माना, जब उनकी बाइलाइन पढ़ी– ‘सुखोई विमान से जयप्रकाश शाही’।
तब मुलायम सिंह यादव जी रक्षा मंत्री थे।

गांव वाले कहते थे– ”बाप रे, जहजिए से खबर लिख दे ता।”

जब मैं लखनऊ में था, देवरिया-गोरखपुर के लोग किसी न किसी काम से आते रहते थे।

–कहां क्वाटर बा?

–अमीनाबाद में लेले बानी एगो कोठरी

–सरकारी रऊवां के ना मिलल?

–अब्बे ना

और मेरे ना कहते ही गांव-जवार में सफल पत्रकार होने की मेरी रेटिंग गिर जाती थी।

अब सफल पत्रकार वह माना जाता है जो अफसरों से अपने घर में एयर कन्डीशन लगवा ले। फ्रीज पा ले।

वो और ज्यादा बड़े पत्रकार हैं जो भूखंड खरीद रहे हैं, मॉल बनवा रहे हैं।

समाज भी खासा बदला है। क्या अपना समाज ही पत्रकारों को करप्ट होने के लिए नहीं विवश कर रहा।

xxx

एक बार, बक्सर (बिहार) में शिवपूजन सहाय स्मृति व्याख्यानमाला में, मैं भी एक प्रमुख वक्ता था। इस तरह की व्याख्यानमाला, संगोष्ठियों और सेमिनार में (पटना, भोपाल, कोलकाता तक) कई यशस्वी लेखकों और पत्रकारों के साथ मंच साझा करने का अवसर मिला है।

बक्सर में मैं, आदरणीय राम शरण जोशी जी के साथ था। शाम को फुर्सत में वह अपनी पत्रकारीय यात्रा बताने लगे।

जंगल-जंगल अपनी फरारी के खासे दिनों बाद, उन्हें राजेन्द्र माथुर जी का संदेश मिला।

तब माथुर जी नई दुनिया के संपादक थे। अब जोशी जी से ही सुनें– …. ब्यूरो चीफ के पद के लिये मेरा इंटरव्यू लेने कुल पांच लोग और सभी दिग्गज, बैठे थे। मलकानी, राहुल वारपुते और खुद माथुर जी। मुझसे दो घण्टे तक तो मेरी राजनीतिक रुझान और वैचारिक प्रतिबद्धता के बारे में जाना गया। यह भी पूछा गया कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूं। घण्टों बातचीत के बाद मेरा चयन हुआ और माथुर जी ने मेरा वेतन, खुद से कुछ ज्यादा निर्धारित कर दिया। अब एक दूसरी बहस शुरू हो गई । ब्यूरो चीफ का वेतन संपादक से ज्यादा कैसे हो सकता है।

माथुर जी ने मुस्कराते हुए कहा था– ”जोशी जी किसी तरह तो अरण्य से लौटे हैं। मैं नहीं चाहता ये फिर वहीं लौट जायें। फिर मैं इन्हें बुर्जुआ बना रहा हूं, इन्हें बांध रहा हूं। मुझे ऐसा कर लेने दीजिये।”

तब बाकी लोग चुप हो गये।

अब न माथुर जी नहीं रहे और रामशरण जोशी जी किसी अखबार में नहीं हैं।

मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे। अव्वलन तो नौकरी नहीं देंगे, और देंगे भी तो ऐसी जगह बिठा देंगे जहां से आप अपना श्रेष्ठ दे ही नहीं सकते। फिर आपको नाकारा घोषित कर देंगे।

संपादक बनने और बनाने की पूरी प्रक्रिया ही उलट चुकी है।

संपादक पद के लिए संपादन, उत्कृष्ट लेखन, अखबार को हर वर्ग आम, बौद्धिक, किसान, मजदूर और ब्यूरोक्रेट के लिए भी जरूरी पठनीय सामग्री से सजा सकने की क्षमता, अब कोई कसौटी नहीं रही।

माने-जाने जन बुद्धिधर्मी अभय कुमार दुबे, आलोक तोमर, यशस्वी पत्रकार स्व. जय प्रकाश शाही का व्यक्तित्व आज के या कभी के किसी समूह संपादक से बहुत बड़ा रहा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना या श्रीकांत वर्मा भी संपादक नहीं थे।

दिनमान का वह दिन भी याद है जब उसके लिए कालजयी कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु, पटना में बाढ़ की त्रासद कथा लिखते थे।

हिन्दी की आधुनिक पत्रकारिता ने बीते दशकों में जो उर्ध्व यात्रा की, अब ढलान पर है। तेजी से अपने पतन की ओर। और ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला देने वाले संपादकों के बूते।

अरे गुंडा हैं तो गैंगवार में उतरें।

पोलैंड में तानाशाही के दिनों में अखबार और दृश्य मीडिया पर सरकार और वर्चस्वशील समूहों का कब्जा हो गया।

टीवी सरकारी भोंपू हो गये। तब लोगों ने टीवी का मुंह अपने घर की खिड़की की ओर कर दिया था। वे टीवी को उधर ही चलने देते और घर छोड़कर सड़क पर आ जाते थे।
भारत में भी ऐसा हो सकता है।

शायद ऐसा न भी हो। क्योंकि सुरेन्द्र प्रताप सिंह के बाद टीवी मीडिया में आम और परेशान लोगों के भरोसे की एक शख्सियत तो है। रवीश कुमार।

थू… गोदी मीडिया पर।

xxx

–किसानी और किसान से कितना पैसा आता है अखबार को?

–जी ..

–जी क्या ?

–और ये साईंनाथ….?

–जी … ‘द हिन्दू’ के एडिटर रूरल अफेयर …

–कितना बिकता है यह अखबार यहां? हम लार्जेस्ट सरकुलेटेड….

–तुम्हारी तनख्वाह कहां से आती है? पता है?

–उस पूंजी और उसके स्रोत की इज्जत करना सीखो…।

संपादक की मौजूदगी में मालिक / डाइरेक्टर उस विशेष संवाददाता को समझा रहा था जो, राज्य में भूमि सुधार न लागू होने से सामंती क्रूरता के सीधे-सीधे और वीभत्स वर्ग विभाजन पर रिपोर्ट तैयार कर रहा था। कई किस्तों के लिये तैयार इस रिपोर्ट में असल किसानों की जोत घटने और खेती बहुत घाटे का उद्यम होते जाने से पलायन की बात थी।

गुनाह इस रिपोर्टर का यह भी था कि वह पी. साईंनाथ को अपना आदर्श मानता था।

— भैया जो कह रहे हैं समझा करो। तुम्हारे ही भले की बात कह रहे हैं।

(स्थानीय संपादक ने कहा)

मुझे लगता है जिस दिन मुर्गा बनकर, हर उस शख्स ने जिसने कसम ली होगी कि वह आइंदा उस पूंजी का हित पोषण करेगा जिससे उसे तनख्वाह मिलती है, समाचार संपादक के लायक हो गया।

जिसने यह कसम ले ली होगी कि देश और समाज के व्यापक सन्दर्भों से जुड़ने की बैचैनी का वह गला घोंट देगा, संपादकीय प्रभारी होने के अर्ह हो गया।

अब यह न पूछियेगा, तब स्टेट हेड कौन हुआ होगा?

एक संपादक से मैंने कहा भी– बाहर किसी को अपना पद मत बताइयेगा। केवल पत्रकार कहियेगा। वरना जिसे आप अपना पद बताएंगे, वह जान जायेगा कि आपका लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं है।

(कुछ अखबारों के संपादकों के बारे में यह सामान्य अवधारणा है। हां एक-दो अपवाद भी हैं। जो सन्दर्भ समृद्ध और पढ़े-लिखे थे। इसीलिये कहीं 10 साल नहीं रह सके। बस दो या तीन साल अधिकतम)

इन अखबारों के संपादक यह जान गए हैं– ”अबे भो… अच्छा-बुरा तय करने वाले हम कौन होते हैं? हम वह हर चीज परोसेंगे जिसकी मार्केट डिमांड है।”

ऐसे ही अखबार में एक बार बड़ा बवाल मचा।

हिन्दी पत्रकारिता के शलाका व्यक्तित्व परम आदरणीय प्रभाष जोशी जी का देहावसान हुआ था।

एक भावुक पत्रकार ने इसपर अच्छी खबर बनाई। तब तक इस अखबार के दिल्ली स्थित मुख्यालय से तत्काल मेल और फोन आया। प्रभाष जी के देहावसान की खबर नहीं जायेगी। अगर जाये भी तो भीतर के पन्नों में कहीं संक्षेप में।

यह खबर सबसे पहले वाले डाक एडिशन में जा चुकी थी। हजार कॉपी छपी थी। मशीन रुकवाई गई।

यह बात दिल्ली तक पहुंच ही गयी।

वहां से बार-बार पूछा जा रहा था– कौन है अपने यहां प्रभाष जोशी का चेला?

स्थानीय संपादक पसीने-पसीने

–नहीं सर, कोई उनका चेला नहीं है। गलती हो गई। दिल्ली का मेल थोड़ी देर से मिला.

यह अखबार प्रभाष जोशी जी के पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाने से बहुत नाराज था। जोशी जी ने इस अखबार को इंगित भी किया था।

वह रिपोर्टर जिसने उनके देहावसान की खबर लिखी थी, अखबार की कैंटीन में फफक-फफक कर रो रहा था।

मेरी भी आंख डबडबा आयी।

हिन्दी के कई अखबारों में सम्पादक होने की पहली और बुनियादी शर्त अमानवीय होना है।

तभी तो कोई सम्पादक होटल मैनेजर क्या, किसी को झापड़ मार सकता है।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


इसके पहले वाले दो पार्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

पार्ट वन

पार्ट टू

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अंग्रेजी अखबार के वो संपादक अपने सामने महिला पत्रकार को बिठाकर देर तक क्लीवेज निहारते थे!

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी… मोटाएगा मालिक… इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी और मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं!

Raghvendra Dubey : अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्द तो उन्होंने हटा लिया लेकिन, मोटी खाल में छिपा जनेऊ, जब-तब सही मौके पर दिख ही जाता है। सांस्कृतिक प्रिवलेज्ड वे, पूंजी के एजेंट हैं और दलाली में माहिर। उनकी जिंदगी का हर क्षण उत्सव है। शाम की तरंगित बैठकों में वे छत की ओर देख कर कहते हैं– …जिंदगी मुझ पर बहुत मेहरबान रही। मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

वह पहले जहां थे, कोई उनसे मिलना चाह रहा था। उसे, उनके पीए ने बताया कि वह फलां तारीख (15 दिन बाद की) को फोन करके पूछ ले कि साहब से कब समय मिल सकता है। बहुत मुश्किल और सामान्य लोगों के लिए तकरीबन असंभव, उनकी उपलब्धता भी दिल्ली में चटख और लंबी कहानी है। जो आतंक, रहस्य और रईसी की छोटी-छोटी अंतरकथाओं से प्रवाह पाती है।

एक साहब किसी अखबार में कार्यकारी संपादक हैं। मालिक संपादक से वार्तालाप के दौरान उनकी रीढ़ में अद्भुत लचक पैदा हो जाती है।

रीजनल या नेशनल मीट के दौरान (जैसा कि देखा गया है) उनकी नजर हर क्षण मालिक की आंख की पुतलियों की ओर होती है। वह हर इशारा समझते हैं। पुतली फिरी नहीं कि वह दौड़कर मालिक की कुर्सी के बगल में कच्च से घुटनों के बल बैठ जाते हैं और अपना कान उनके मुंह से सटा देते हैं। किसी का ‘काम लगवा दें’ जनाब।

एक संपादक ने तो दरअसल मालिक के करतूत की सजा भुगती। जेल गये। एक अखबार समूह में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों में से दो-एक एवज में जेल जाने के लिये ही होते हैं।

याद आ रहा है विभिन्न शहरों में अलग-अलग अखबारों की लांचिंग के समय का मंजर। एक संपादक ने अपने अखबार के नाम का स्टिकर, खुली छाती वाली अपनी कोट के दोनों ओर सामने, पीठ पर, बांहों पर, कलाई पर चिपका रखी है।

सेंटर पर डांसर बुलाई गयी है और कुछ गुंडे भी। प्रतिस्पर्धी अखबार ने भी अपनी सेना जुटा ली।

नगाड़ों और बैंड के कानफाडू शोर के बीच पत्रकार नाम की मजदूर बिरादरी, आमने-सामने की खूखांर और एक-दूसरे के रक्त पिपासु पलटन में बदल जाती है।

लाठियां मंगवा ली गई हैं। दोनों ओर अवैध असलहे भी हैं। धांय …. धांय .. यह लीजिये गोली भी चली।

मालिक जो वस्तुतः एक ही होते हैं, कई मायनों में, अपनी-अपनी सेना के शौर्य प्रदर्शन से खुश हैं। एक आदमी बस इसलिए संपादक बना दिया गया क्योंकि उसने प्रतिस्पर्धी को डराने के लिए धुआंधार फायरिंग कराई। और एक तो बस इसलिए कि वह हाकरों का नेता था।

मीडिया के इस ढांचे में सबसे ज्यादा प्रताड़ित और बेचैन असल पत्रकार हैं। एक हिस्सा चाँदी काट रहा है, दूसरा भूजा फांक रहा है। पता नहीं कैसे मात्र 10-12 साल की ही नौकरी में कोई पत्रकार किसी लीडिंग चैनल में पार्टनर हो जाता है या अपना खुद का चैनल और अखबार ला देता है।

हम असल पत्रकार अपना दुख किसको ई-मेल करें। पूंजी तो मालिक की है क्या फर्क पड़ता है रोशनाई, हमारे खून की हो।

रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ ने ठीक कहा है— हम दोनों ओर से पूरे मनोयोग से लड़ेंगे साथी।

क्यों आलोक जोशी जी, हमारी नियति भी यही है न?

बखूबी जानता हूं, उनके पीछे संस्थान की पूरी ताकत खड़ी है। राजनीति और नेताओं से कुत्सित रिश्ते भी। लेकिन, देवरिया, बलिया, गोरखपुर और बनारस के लोग चोटिया कर लड़ना जानते हैं। फिर 63-64 की उम्र में मेरे पास गंवाने को क्या है? तकरीबन 36 की उम्र में आया पत्रकारिता में। आठ-10 साल पॉलिटिकल एक्टिविज्म, रंगकर्म और शुरूवाती दौर में अच्छी चल निकली 6 साल की वकालत छोड़ कर। उन दिनों देवरिया में एक जज थे, आर. सी. चतुर्वेदी। जिला जज संगम लाल पाण्डेय। चतुर्वेदी जी जैसे कड़क जज, मुझे बेटे का प्यार देते थे। माथुर चौबे (मूलतः मथुरा के चौबे) लेकिन मैनपुरी के रहने वाले थे। तब जागरण गोरखपुर में संपादक थे, यशस्वी पत्रकार डा . सदाशिव द्विवेदी। शब्द वही अर्थ देने लगते थे, जो वह चाहते थे।

सोचता हूं अगर उन्होंने मुझ 36 पार के व्यक्ति को, अपने साथ रखने से इनकार कर दिया होता, तो क्या होता? रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की जोरदार सिफारिश के बावजूद किसी ने 48 साल की उम्र में मुझे स्टेट ब्यूरो में रखने से इनकार कर दिया होता तो क्या होता? बिहार में मैंने इस छोर से उस छोर तक आम लदी, डोंगी में बैठकर, जिद्दी और करार तोड़ती बेलगाम नदियों से 8-8 किलोमीटर तक की यात्रा की। बाढ़ के साथ जी रहे लोगों को देखने के लिये। जिनका सपना आर्द्र हो चुका था। कांवरियों के साथ 100 किमी. की पैदल यात्रा की। अयोध्या और बाबरी ध्वंस के दौर की ग्राउंड लेवल रिपोर्टिंग के दौरान की ताड़ना-प्रताड़ना कई दफे लिख कह चुका हूं।

उसी कम तनख्वाह में संस्थान की ओर से आयोजित लिट्रेचर फेस्टिवल, फिल्म फेस्टिवल भी मुझ अकेले के ही जिम्मे होता था। ‘गंगा संसद’ भी। वो आंच और जोखिम लेने का हौसला मुझमें आज भी है, लेकिन उस औपनिवेशिक कानून का क्या करूं जो 58 साल के एक सेकेंड पहले तक हमें सक्षम और एक सेकेंड बाद अक्षम मान लेता है।

अब तक के 30 साल के करियर में कितना भूत लेखन किया, संपादक और निदेशक की बात न्यायसंगत या वजनदार बनाने के लिये कितनी रफूगीरी की, नहीं बता सकता। लेकिन, वह पाप मेरे माथे भी है, नाहक। बिना कुछ पाये।

बड़ा नाश किया अनपढ़, गुंडे और मालिक या सरकार का तलवा चाटने वाले कुछ संपादकों ने। हमें या हमारे जैसों को इनके ही बीच रहना है और मुट्ठियां ताने मैदान में भी हैं क्योंकि मालिक ने कहा है- ”अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है”।

एक कार्यकारी संपादक का सधा वाक्य होता है– ”कुछ समझा भी करो…।”

जो संपादक ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला सकते हैं उनकी पसंद देखिये। तब कम्प्यूटर पर खुद ही टाइप कर लेना अभी नहीं शुरू हुआ था। वह लंबा-छरहरा-गोरा लड़का याद है जो समाचार संपादक के कमरे में जाकर अपनी रिवाल्वर लोड और अनलोड करता था। वह संपादक जी की पहली पसंद है। सुना है वह भी किसी यूनिट का संपादक हो गया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े और अच्छी समझ के लिए मशहूर एक पत्रकार के भी बारे में लिखूंगा। बता दूं कि वे किसी जाति के हों, जो अपने नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं लगाते, बड़े जातिवादी हैं। सरनेम हटा लेने से ही वे जाति विघटित नहीं हो जाते। और, दिल्ली तो कुछ ऐसे क्षद्म और अधकचरे बुद्धिजीवियों से आज कल भर गयी है।

ये संपादक अखबारों में नयी संस्कृति (दरअसल कुसंस्कृति) के नये साहूकार हैं। बीते दो दशकों में परवान चढ़ी चलन के ये, या तो डॉन हैं या कामातुर लपकहे। जो किसी को रातों-रात स्टार बना सकते हैं। बाजार की तूती वाले इस दौर में उनकी मर्द दबंगई और बेझिझक हुई है, कभी मालिक यानि निदेशक या वाइस प्रेसिडेंट के लिये और कभी अपने लिये। पहले अपने लिये। पद के लिये ऊपर चढ़ते जाने की यह भी एक सीढ़ी है।

पत्रकारीय कौशल, उसके लिये जरूरी संवेदना या नागरिक – सामाजिक हैसियत से ज्यादा, इनकी निगाह किसी की आंख, देह रचना, खुले रंग और गोगेल्स पर होती है। खास बात यह कि ऐसी चीजें चटख कानाफूसी बनती हैं और अंततः महिला पत्रकार के खिलाफ ही जाती हैं। वे बाद में गड़बड़ औरत करार देकर निकाल भी दी जाती हैं।

–उसमें स्पार्क है, उसकी मदद करो

— डाउन द लाइन कुछ अच्छे लोग तैयार करना तुम्हारी भी की-रोल जिम्मेदारी है। लगता है तुमने कुछ पढ़ना-लिखना कम कर दिया है।

— जी …

और मैं यह कह कर ठंडे कमरे से बाहर चला आया था। उस कमरे की ठंड हालांकि किसी घिन की तरह मेरी देह से बहुत देर तक चिपकी रही।

लखनऊ में एक अंग्रेजी अखबार के संपादक आज तक नहीं भूले हैं। मेरे खासे परिचित हैं। वह जब-तब, एक महिला पत्रकार को बुला कर, उसे सामने बैठने को कह कर वक्ष की घाटी (क्लीवेज) और गोलाईयां देर तक निहारते रहते थे।

उस महिला को भी इसका भान था लेकिन, कई सहूलियतों की वजह से वह यह जस्ट फन, अफोर्ड कर सकती थी। उसमें पेशेवराना दक्षता थी। पत्रकारिता को अब ऐसे ही प्रोफेशनल्स चाहिये।

स्पॉट रिपोर्टिंग के दौरान धधकती धूप में जले और धुरियाये रिपोर्टर की देह से संपादक जी को प्याज और लहसुन की बदबू आती थी।

— जाओ मिश्र जी (चीफ रिपोर्टर या ब्यूरो हेड) को दे दो (खबर या रिपोर्ट की कॉपी)

— जी…

— और सुनो थोड़ा प्रजेन्टेबुल बनो, इस तरह नहीं चलेगा। अखबार का हर कर्मचारी उसका ब्रांड दूत होता है।

— जी…

उस निहायत कम तनख्वाह पाने वाले रिपोर्टर ने सब्जी और नून-तेल से कटौती कर अपने लिए एक ब्रांडेड शर्ट खरीदी।

उस दिन पखवारे वाली मीटिंग के दौरान वह नहा-धोकर, वही शर्ट पहन कर आया।

निदेशक की निगाह बार-बार उसकी ही ओर जाती थी।

”–आजकल मॉडलिंग करने लगे हो क्या? पत्रकारिता करो… वरना लात मार कर निकाल दिये जाओगे। और तुम जानते हो लात कहां पड़ती है।”

संपादक, जी भैया … जी भैया … कह कर बिछा जा रहा था।

इस डाइरेक्टर की पहनी हुई शर्ट संपादकीय बैठक में नीलाम की जाती है और चतुर संपादक कहता है– ”इसकी बोली कौन लगा सकता है? यह अनमोल है।”

वह संपादक आफिस आने और अपनी कैबिन में घुसने के बाद मेज पर रखे शीशे के नीचे भगवानों की फोटो को हाथ से छू-छू कर प्रणाम करता है। शीशे में अपनी मांग सवांरता है। वह राज्य के संपादकों में सबसे ज्यादा समझदार था।

— वे सनकी हैं थोड़ा। दोनों। एक किसानी की बात करता है और उसकी अर्थ व्यवस्था की। दूसरा मार्क्स, सार्त्र, ग्राम्सी और देरिदा की।

वे दोनों 50 के ऊपर हो चले थे। अखबार को जो चाहिए नहीं दे पा रहे थे। सुना है निकाल दिये गए।

चूंकि वे ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर नहीं झोंक सकते, इसलिए अब भाड़ झोंक रहे हैं।

असल पत्रकार अब भाड़ ही झोकेंगे।

और मालिक ने कहा- अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है। इसलिए मुट्ठियां ताने मैदान में भी होंगे।

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी। मोटाएगा मालिक। इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


इसके पहले वाला हिस्सा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैं संपादक विनोद शुक्ल के लिए थोड़ी बेहतर नस्ल के कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं था : राघवेंद्र दुबे

Raghvendra Dubey : रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की 10 जून की एक पोस्ट याद आयी। उन्होंने लिखा है– 1) मालिक ने कहा हम पर हमला हुआ है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। हम मुट्ठियां ताने मैदान में। 2) मालिक ने कहा राष्ट्रविरोधी ताकतें सर उठा रही हैं। हम मुट्ठियां ताने मैदान में।

याद आते हैं दैनिक जागरण लखनऊ के दिन .. 1992 से 94 के बीच के। तब आफिस हजरतगंज में हुआ करता था। स्थानीय संपादक विनोद शुक्ल तब मालिकों वाली हैसियत में हुआ करते थे या दिखाते थे। बहुत कम दिनों में ही मैं अपनी ऑफ बीट और मानवीय संस्पर्श की स्टोरीज के लिए खासा चर्चित हो चुका था। कुछ राजनीतिक और नौकरशाह मेरे लिखे की नोटिस लेने लगे थे और स्व. शुक्ल को फोन भी करते थे। यह जानने के लिये कि वह मुझे कहां से उठा लाये?

एक दिन मैं शुक्ल जी के साथ ही आफिस से निकला। दो – तीन उनके मुलाकाती और आ गये। मेरी तारीफ और हौसला आफजाई करने की ही नीयत से (उनका यही तरीका था) उन्होंने सामने वाले से मेरा परिचय कराया। मेरा कंधा थपथपाते कहा– …यह रहा मेरा बुलडॉग… (चेहरे पर हिंसक और आक्रामक भाव लाने के लिए जबड़ों को भींचते हुए)… जिसको कहूं फाड़ डाले। ‘हम सब’ नहीं लिख सकता लेकिन मैं तो उनके लिए थोड़ी बेहतर नस्ल के कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं था। यह भी उनके अच्छे मूड पर निर्भर था। वरना किसी छण वह मुझसे मेरे गले का पट्टा छीनकर, मुझे आवारा कुत्ता भी करार दे सकते थे। आखिर पत्रकार मालिक के हितों की चौकसी न करे, उसके लिए भूंकना और दुम हिलाना छोड़ दे तो करेगा क्या?

सर हम तो बजनियां हैं। जो सुर कहोगे निकाल देंगे।

काका ने अच्छा लिखा है। इसीलिये वह काका हैं। आजकल उनसे बात नहीं हो रही है। पहले बात होती थी इसलिये उन्हें तो पता है कि मैं किस हाल हूं। उनका नहीं पता।

आजकल अखबारों में मालिकों के ठीक बाद, मालिक जैसा व्यवहार करती दूसरी कतार तो और क्रूर है । वह मालिक से वफादारी दिखाने में किसी की गर्दन छपक सकती है। वे इसी और मात्र इसी योग्यता पर संपादक या स्टेट हेड बनाये जाते हैं। इसके बाद वाली कतार की कन्डीशनिंग ही इस तरह की जाती है कि वे मालिक (कम्पनी) के दुश्मन को अपना दुश्मन और उसके हितैषी को अपना हितैषी समझें। वे आज्ञाकारी मूढ़ हों।

कभी-कभी पत्रकारीय उसूलों और एकेडमिक्स पर प्रायोजित चर्चा के लिए भी एक चेहरा रखा जाता है। उसे प्रमोट कभी नहीं किया जाता। उसे अराजक और एंटी सिस्टम माना जाता है। लेकिन कहा जाता है संस्थान की बौद्धिक संपदा। ये खिताब मुझे भी मिला है। विनोद शुक्ल जी से अब तक सलीके में इतना अंतर तो आया है कि अब बुलडॉग को बौद्धिक संपदा कहा जाने लगा। बदले दौर में कुत्ता स्टेट्स सिंबल और प्राइड पजेशन हो गया। कितनी गफलत में है पत्रकार।

उनका दावा था कि वह कौओं को हंस में बदल देते थे। मैं बाद में उनका बुलडॉग, जब गोरखपुर से बुलाया गया था (लखनऊ दैनिक जागरण, 1991 में) शायद कौआ ही था। अब मैं विनोद शुक्ल जी के खांचे और काट में हंस बन रहा था। उन्हें ‘हार्ड टास्क मास्टर’ कहा जाता था और यह भी कि नकेल डाल कर किसी से जो और जैसा वह चाहते थे लिखवा लेने की कला उनमें थी। बाद में हम उनकी इच्छा शक्ति का माध्यम, तोता भी थे। मैं आफिस में कई-कई बार उनके चरण छूता था। उन्हें लोग भैया कहते थे। उस समय भी मुझे अहसास था कि मैं पत्रकार होने के अलावा सब कुछ था। बुलडॉग , कौआ, हंस और तोता।

एक मालिक हैसियत (मालिक नहीं) संपादक विनोद शुक्ल में गजब का जादू था। वह किसी को, जिसमें चाहते, उस जानवर या चिड़िया में ढाल लेते थे। उनकी तारीफ में एक बात और, बहुत दिनों तक कही गयी। वह सच भी थी। कई अखबार अपनी बदहाली के दौर से गुजरने लगे, कुछ बंद भी हुए। इस दौरान कई स्टार रिपोर्टर या काबिल समाचार संपादकों, ने दैनिक जागरण में अपने दिन बिताये। किसी ने कम समय तक किसी ने ज्यादा। वे भी जिनके नैरेशन की तारीफ बाद में महाश्वेता जी तक कर चुकी थीं। वे भी, व्यापार और अर्थ जगत की जिनकी जानकारियों और सन्दर्भों का लोहा माना जाता है। वे भी जो उस समय हमलोगों के आवेश रहे। उनसे शुक्ल जी के चर्चित झगड़े भी हुये। और भी बहुत से लोग।

बाबरी मस्जिद ध्वंस (6 दिसम्बर 1992) के दौरान हमें कारसेवक बनाया जा रहा था, जो संभव नहीं हो सका। यह लिखना बहुत मुनासिब नहीं लगता कि एक उच्च पदस्थ आइपीएस भविष्यवक्ता के कहने पर शुक्ल जी, हनुमान जी को हर शनिवार महावीरी (चमेली का तेल और सिंदूर) चढ़ाने लगे थे। जिमखाना क्लब में देर तक बैठ जाने के कारण, इस काम में किसी-किसी शनिवार व्यतिक्रम भी हो जाता था। योग्य और मानवीय संपादक अनिल भास्कर ने अपनी पोस्ट में लिखा है– ”…. निचले पायदानों से चिपके पत्रकार हवा के विपरीत जाने का दम बस नहीं साध पा रहे।”

अनिल जी, जैसा कि आप ने लिखा भी है, वे बेचारे उन संपादकों से हांके जा रहे हैं, जिनका पैकेज उनके संपादकीय आचरण से बड़ा है। विनोद शुक्ल कोई एक व्यक्ति नहीं संपादक संस्था में क्षरण, प्रबन्धकीय आधिपत्य, आदमीयत और पत्रकारीय मूल्यों के नेपथ्य में ठेल दिये जाने की कुसंस्कृति का नाम है। यही समय देश में आर्थिक पुनरुद्धार और उदारीकरण यानि बाजार वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था की आक्रामक शुरुआत का है। शुक्ल जी की संस्कृति संक्रमित भी हुई। आज के कई संपादक और प्रधान संपादक तक में। एक संपादक रिपोर्टरों को गाली देते हैं। उनकी क़ाबिलियत यह है कि वे ‘गुंडा’ हैं। ढाबे के बुझे चूल्हे को फायर झोंक कर (तड़तड़ गोलियों से) जला सकते हैं।

रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ ने लिखा है– ‘…हम दोनों तरफ से पूरे मनोयोग से लड़ेंगे, लौटेंगे तभी जब मलिकार लोग आपस में सुलह-सफाई कर लेंगे..’. सोच रहा हूं तमाम असल पत्रकारों की सुबह (सूरज) कैसी होगी जिसमें उन्हें मरना ही होगा। तय है मरना। वही कुछ इने-गिने (कथित बड़े नाम संपादक) हमारी इयत्ता के भी सौदागर हैं, जो पूरी पत्रकारिता का भी सौदा कर चुके हैं, दोनों ओर से। हम मुट्ठियां ताने मैदान में हैं। अंधेरगर्दी के तागों से बने नये क्षितिज को देखें। पत्रकारिता के लिये ‘जल्दीबाजी का साहित्य’, ‘रफ ड्राफ्ट ऑफ हिस्ट्री’, नैसर्गिक प्रतिपक्ष आदि शब्द तो कबके बेमतलब हो चुके हैं। वे मालिक के हित में योद्धा हैं। यह उनके जैसे तमाम का सहर्ष स्वीकार या खुद ही ओढ़ लिया गया दायित्व है।

इसीलिये अपने मातहतों की ओर वे निरंकुश राजा की नजर से देखते हैं। मालिक की खुशी के लिए उन्होंने अखबार को प्रतिभा के वध स्थल में बदल दिया है। उनकी दुर्बोध भाषा ने जीवन और आदमीयत के लिये जरूरी सारे शब्द पचा लिये हैं। ‘मेटामोरफेसिस’ के नायक की तरह जो, खुद को कॉकरोच में बदल सकता है, ऐसे ही लोगों पर दुलार का परफ्यूम स्प्रे करते हैं। आखिर उन्हें भी तो मालिक के सामने हमेशा ‘जी हुजूर’ की मुद्रा में खड़ा होना होता है। इस तरह उन्हें भी हाथ-पैर पसारने (दलाली से कमाने) का अवसर मिल जाता है। वह संपादक जो कभी ढाबे के बुझे चूल्हे को फायर झोंक कर जला सकते थे, उनके खनन माफियाओं से मधुर और व्यवसायिक रिश्ते हैं। वे अखबार को फैक्ट्री की तरह चलाते हैं और पत्रकारों को कामगार की तरह हांकते हैं। वह पहले जहां थे वहां कुछ बड़ी जगहों को छोड़, बाकी पदों पर 40 या उससे अधिक की उम्र के लोगों की नियुक्तियों पर पाबंदी लगवा दी। ऐसा इसलिये कि भूल से भी कोई ऐसा न आ जाय जिसके आगे वो फीके पड़ जाएं। शावकों के बीच विद्वान और प्रेरणा पुरुष बने रहना आसान था।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: