‘राजस्थान के दलित’ को सीआईसी बनाने का चुनावी लाभ लेने की कोशिश!

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कांग्रेस नेता को अंधेरे में रखने की खबर नहीं छपी, प्रधान प्रचारक का झूठ खूब छपा

संजय कुमार सिंह

इंडियन एक्सप्रेस में आज पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, Congress skipped CIC selection meeting as they hate Dalits: Modi (नरेन्द्र मोदी ने कहा, कांग्रेस सीआईसी के चुनाव की बैठक से अलग रही क्योंकि वे दलितों से घृणा करते हैं)। “ये जो हमारी सरकार है – आज देखिये उसके कुछ कारनामे और कार्यशैली!” में आपने कल यहां पढ़ा होगा, “इंडियन एक्सप्रेस ने लीड खबर छापी है कि हीरा लाल समारिया को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की शपथ दिलाई गई और शीर्षक में ही अखबार ने बताया है कि चुनाव समिति में रहे कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति को लिखा है कि उन्हें अंधेरे में रखा गया। उन्होंने बैठक का समय पुनर्निधारित करने का आग्रह किया था पर उन्हें सूचना ही नहीं दी गई। यह सरकार की कार्यशैली है और महत्वपूर्ण नियुक्तियों के संबंध में है और यह कोई नई बात नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को महत्व दिया। यह अच्छी बात है।”

आज की खबर के उपशीर्षक में कांग्रेस नेता और चुनाव समिति के सदस्य अधीर रंजन चौधरी का पक्ष है पर वह इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता है। मैं बाकी की बात करूंगा। उम्मीद है अभी तक आप मामला समझ गये होंगे और आज की खबर की चर्चा इसीलिए कर रहा हूं। मोटे तौर पर हुआ यह है (खबरों के अनुसार) कि अधीर रंजन चौधरी ने बैठक का समय (संभवतः दिन भी) पुनर्निधारित करने की मांग की थी और उन्हें अंधेरे में रखकर बैठक कर ली गई, चुनाव हो गया और कल शपथग्रहण की खबर के साथ छपा था कि अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर शिकायत की है। पहले हुए चुनावों में भी ऐसा होता रहा है और अधीर रंजन चौधरी समिति में हुए भी तो वे अल्पमत में रहे और चुनाव उसी का हुआ जिसे सरकार ने पसंद किया।

वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट ने जब एक नियुक्ति को अवैध ठहराया और कहा कि तय तारीख तक अधिकारी का विकल्प चुन लिया जाये तथा संबंधित अधिकारी को रिटायरमेंट के बाद और सेवा विस्तार नहीं दिया जाये तब भी सरकार सेवा विस्तार करवाने सुप्रीम कोर्ट गई और विस्तार करवाया भी। ऐसे में सरकार के काम पर क्या टिप्पणी करना। इसके अलावा कि दस साल में कुछ नया नहीं है। जब चुनाव प्रचार और जुमलों में नहीं है तो काम में होना भी नहीं है। लेकिन संघ परिवार के प्रधान प्रचारक ने कांग्रेस के खिलाफ एक नया प्रचार कर दिया है। प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक या प्रधान प्रचारक ने जो किया मैं उसपर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा पर यह ‘खबर’ कैसे गढ़ी गई और कैसे छपी है उसकी चर्चा करूंगा।

कहने की जरूरत नहीं है कि कल की खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर थी और मैं यही मान रहा था कि बाकी अखबारों में अंदर के पन्ने पर होगी या नहीं होगी। कल मेरी चिन्ता यह नहीं थी कि यह खबर किसी और अखबार में है कि नहीं। अमूमन नहीं ही होती है। इसलिए नहीं होती तो भी कोई खास बात नहीं थी। वैसे भी इंडियन एक्सप्रेस में बाईलाइन के साथ थी इसलिए संभव है मनोज सीजी की एक्सक्लूसिव खबर हो। अब मीडिया का जो हाल है उसमें सबको पता है कि कौन खबर कहां छपेगी और कहां नहीं ऐसे में लीक और विज्ञप्ति पर भी बाईलाइन लग रही है। हालांकि, अभी वह मुद्दा नहीं है। आज की खबर पढ़ते ही मुझे समझ में आ गया कि प्रधान प्रचारक ने किसी चुनावी भाषण में कहा होगा और यह खबर खूब छपी होगी। लेकिन आम मतदाता तो हीरो की बात पर यकीन करेंगे ही। यह अलग बात है कि उनके झूठ की अब कोई गिनती भी नहीं रखता।  

इंडियन एक्सप्रेस की पूरी खबर पढ़ने से इस बात की पुष्टि हो गई कि प्रधानप्रचारक ने चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में एक रैली में कही है। उन्होंने कहा, भाजपा ने जब आदिवासी बेटी को देश का राष्ट्रपति बनाने का निर्णय़ किया तो कांग्रेस ने इसका विरोध किया। भाजपा एससी, एसटी और ओबीसी की चाहतों का सम्मान करती है। यहां यह याद दिला दूं कि झारखंड में भाजपा की सरकार थी तो किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था और यही हाल छत्तीसगढ़ में भी रहा। झारखंड के मुख्यमंत्री रहे रघुवर दास भाजपा के ही बागी से चुनाव हार गये और हाल में उन्हें राज्यपाल बना दिया गया जबकि उनपर कई आरोप हैं। छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री रमन सिंह अभी मुश्किल में हैं। इन तथ्यों के बावजूद प्रधान प्रचारक ने रैली में कहा और आज प्रधानमंत्री के हवाले से अखबारों में छपा है कि कांग्रेस दलित विरोधी है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर का संबंधित हिस्सा हिन्दी में इस प्रकार होगा, आज आपने अपने अखबारों में पढ़ा होगा कि देश में पहली बार मैंने अपना चुनाव कार्यक्रम रद्द कर दिया और दिल्ली में एक बैठक में शामिल हुआ – हमलोगों ने फैसला किया कि ‘राजस्थान के एक दलित’ को मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया जाए। कांग्रेस के लोगों को देखिये, उन्हें मीटिंग में आना था, उन्हें समय से काफी पहले बुलाया गया था। हमलोगों ने उनसे फोन पर बात की थी। पर जैसे ही उन्हें पता चला कि एक दलित मुख्य सूचना आयुक्त बनने जा रहे हैं, उनलोगों ने बैठक का बायकाट कर दिया। वे दलितों से इतनी नफरत करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस के बायकाट की ‘खबर’ के अलावा भाषण का यह अंश ‘राजस्थान के दलित’ की नियुक्ति का चुनावी लाभ लेने का प्रयास लग रहा है। वैसे भी, आप जानते हैं कि राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव है। ऐसे में राजस्थान के दलित की नियुक्ति और मध्य प्रदेश में उसका प्रचार चुनावी लाभ लेने की कोशिश नहीं तो क्या है। बेशक, एक सरकारी नियुक्ति को इस तरह चुनावी बनाना अनैतिक है उसपर से विपक्ष के बारे में झूठ बोलना स्वार्थ की अति है।

मैं यह नहीं कहूंगा कि रैली में कही गई बातों को क्रॉस चेक करके छापा जाना चाहिये पर मुझे लगता है कि राष्ट्रपति को अधीर रंजन चौधरी की चिट्ठी की खबर अखबारों में छपी होती तो लोगों को मामला पहले से पता होता तो शायद प्रधान प्रचारक बोलते नहीं या बोलते तो अखबारों में इतना महत्व नहीं मिलता। आज खबर देखने के बाद मैंने इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक गूगल किया तो पता चला कि यह खबर कई अखबारों में छपी है जबकि कल वाला शीर्षक गूगल करने पर पता चला कि ज्यादातर ने वह खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपने के बाद पोर्टल पर पबलिश की थी। इसका मतलब और कारण समझना मुश्किल नहीं है। साफ शब्दों में कहूं तो सीआईसी की नियुक्ति से संबंधित बैठक में एक सदस्य और कांग्रेस के प्रतिनिधि की चिट्ठी को अखबारों ने कम महत्व दिया और रैली में प्रधान प्रचारक ने जो कहा उसे बिना क्रॉसचेक किये  छाप दिया। यह है भाजपा की राजनीति और चुनाव को लेकर मीडिया का पक्षपात। कायदे से लेवल प्लेइंग फील्ड होना चाहिए पर सत्तारूढ़ दल को फायदा ही फायदा है और वह इलेक्ट्रल बांड से चंदे में तो है ही, झूठ बोलने का लाभ भी है।

गूगल के अनुसार यह खबर आज इंडियन एक्सप्रेस के अलावा दि हिन्दू (कांग्रेस जानबूझकर सीआईसी चुनने की बैठक से अलग रही), टाइम्स ऑफ इंडिया (नए सीआईसी दलित हैं इसलिए कांग्रेस बैठक में शामिल नहीं हुई), इकनोमिक टाइम्स (कांग्रेस के सीआईसी के शपथग्रहण में शामिल नहीं होने उसकी दलित विरोधी मानसिकता का पता चलता है), द स्टेट्समैन (सीआईसी के चुनाव में शामिल नहीं होने के कारण मोदी ने कांग्रेस को ‘दलित विरोधी’ कहा) के साथ पीटीआई ने भी की है। ये खबरें तीन घंटे (इंडियन एक्सप्रेस) पहले से लेकर 19 घंटे पहले तक अपलोड की गई हैं। पीटीआई ने 17 घंटे पहले अपलोड किया है। यानी कल के भाषण के बाद से काम शुरू हो गया था।

आइये अब देखूं कि कल की इंडियन एक्सप्रेस की मूल खबर कब किसने अपलोड की। लिखना शुरू करने से पहले कोई दस बजे मैंने देखा था तो कोई भी खबर 24 घंटे से पुरानी नहीं थी और इसीलिए मैंने लिखा कि सब इंडियन एक्सप्रेस के बाद की हैं यानी एक्सप्रेस का छपा हुआ अंक बाजार में आने के बाद अपलोड की गई थी। आज मैंने इंडियन एक्सप्रेस के कल के शीर्षक, Was kept in dark on appointment of new CIC: Adhir writes to President को दिन में 12 बजे गूगल किया तो पता चला कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर को 23 घंटे पहले, टाइम्स ऑफ इंडिया ने 5 घंटे पहले, द वायर ने 23 घंटे पहले, स्टेट्समैन ने 19 घंटे पहले पोस्ट किया था। यह सिर्फ अनुमान के लिए है और यहां यह बताना जरूरी है कि मैंने सिर्फ गूगल सर्च में पहले पन्ने पर जो खबरें आईं उन्हीं का उल्लेख किया है और शीर्षक अलग होने से खबर आगे के पन्ने पर हो सकती हैं और किसी अखबार में कोई खबर छपी या नहीं छपी अथवा कब छपी यह सब देखने, जानने, समझने और बताने का यह कोई मानक तरीका नहीं है। फिर भी एक अंदाजा तो लगेगा ही।

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