‘ये जो पब्लिक है सब जानती है राजदीप’

अनिल सिंह-

हमारे पूरब में एक कहावत है, ”सूपवा बोले त बोले, चलनियां क्‍या बोले, जिसमें खुदे बहत्‍तर छेद.’ यह कहावत भारतीय मीडिया के तथाकथित बड़े नाम राजदीप सरदेसाई पर बहुत फिट बैठती है. वह एक काली टी-शर्ट लिये अपनी फोटो ट्वीट करते हैं, जिस पर लिखा है- ”यह टी-शर्ट सफेद है – इंडियन मीडिया.” इस ट्वीट के साथ वह लिखते हैं, ”जब आपकी बेटी आपको नये साल पर यह टी-शर्ट देती है तो आप सब कह सकते हैं : बेटियों के लिये धन्‍यवाद भगवान!! यह सुपर 2021 है : यह अभी शुरू हुआ है!

पर यह ट्वीट करते हुए वह भूल जाते हैं कि इस दौर की शुरुआत करने वाले महारथियों में उनका भी बड़ा नाम है. उनके इस ट्वीट के जवाब में उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार मृत्‍युंजय कुमार तंज कसते हुए लिखते हैं, ”कैश फ़ॉर वोट से लेकर CWG तक सब पर UPA को क्लीन चिट देने वाले आज की मीडिया पर तंज कस रहे हैं. Irony ने बॉक्सिंग ग्लव्ज़ पहन लिए हैं!”

इस सवाल से राजदीप लिखते हैं, ”मैं वैसे रिप्लाई नहीं करता लेकिन जब कोई व्यक्ति जो responsible जगह पर बैठा हो ग़लत और बेबुनियाद बात करता है तो जवाब देना अनिवार्य होता है. आप archives में जाकर देखिए कितने stories हमने UPA के कार्यकाल घोटालों पर किए. अगली बार तथ्यों पर बात करे! हर पत्रकार बिकाऊ नहीं होता sirji!” उनकी यह बिलबिलाहट बताती है कि उन्‍हें चोट इतनी गहरी लगी है कि जवाब देने को मजबूर हो गये.

भारतीय मीडिया को नीचा दिखाने का कंपेन चल रहा है. कई पाकिस्‍तानी पत्रकार भी इसी टी-शर्ट के साथ ट्वीट कर भारतीय मीडिया पर निशाना साध रहे हैं. अपने ट्वीट से नीचा दिखाने वाले राजदीप यह भूल जाते हैं कि वह भी उसी मीडिया के हिस्‍सा हैं, जो काला को सफेद कहता है. उसी मीडिया को बेचकर वह इस मुकाम तक पहुंचे हैं. यह हिप्‍पोक्रेसी ही है कि अपने चादर को सफेद और दूसरे की चादर को काला बताने वाले राजदीप आईबीएन7 के चीफ के रूप में यूपीए सरकार में कैश फॉर वोट के स्टिंग को नहीं दिखाया था. क्‍या तब भारतीय मीडिया काला को सफेद नहीं बता रही थी?

राजदीप एक तरफ पूरे भारतीय मीडिया को झूठा भी बताना चाहते हैं और सफाई भी देते हैं कि हर पत्रकार बिकाऊ नहीं होता, तो भाई क्‍या यह सर्टिफिकेट केवल वही दे सकता है, जो किसी पार्टी की जीत पर काजू कतली बांटे और स्‍टूडियो में नाच करते नचनियां बन जाये या फिर हम जैसा एक अदना सा कलमकार भी किसी प्रकार का सर्टिफिकेट जारी कर सकता है? वैसे भी, अमेरिका के मेडिसन स्‍कवायर पर आम जनता की गाली और लात खाना तो कम से कम हम जैसे अदने पत्रकारों की किस्‍मत में भी नहीं है!

राजदीप सरदेसाई की पत्रकारिता की यात्रा को शुरू से लेकर अब तक देखें तो बहुत साफ दिखता है कि वह शुरू से ही एजेंडे की पत्रकारिता कर रहे थे. एक खास सरकार और पार्टी लाभ पहुंचाने वाली पत्रकारिता कर रहे थे. कोई उनके चरित्र पर सवाल उठा देता है तो वह जरूरत से ज्यादा तिलमिला जाते हैं और अपने बड़े होने का एहसास कराने लगते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में अब लोग हर बड़े पत्रकार की सच्‍चाई जान और समझ चुके हैं. अंबानी, राज ठाकरे के इंटरव्‍यू के अपने वीडियो तो कम से कम उन्‍हें एक बार जरूर देखने ही चाहिए भारतीय मीडिया पर आरोप लगाने के कैंपेन का हिस्‍सा बनने से पहले.

सोशल मीडिया उन्‍हीं के ट्वीट पर आये जवाब से इसका अंदाजा भी लगने लगता है. दिलीप पंचोली नामक यूजर लिखते हैं कि अब वह मॉम-डैड तो लिख नहीं सकती थी, इसलिये इंडियन मीडिया लिखकर काम चला लिया. आशीष वशिष्‍ठ नामक यूजर लिखते हैं कि wow, She gave a perfect message to you. सोनू मैथिल नामक यूजर लिखते हैं कि She explained about your journalism propaganda.

जब राजदीप ने Twitter पर सीएम योगी के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार के जवाब में अपनी निष्पक्ष स्टोरी देखने के लिए आर्काइव्स देखने की सलाह दी तो यूजर्स ने खूब मजे लिए. यूजर Rajat mishra ने लिखा कि Archives में जाएंगे तो सिर्फ आपकी स्टोरी ही नहीं मिलेगी… ब्लैकमेलिंग वाले स्टिंग भी मिलेंगे, संसद हमले को शानदार पल बताने वाला बयान भी मिलेगा और ज्यादा खोजेंगे तो राज ठाकरे और प्रणव दा वाले वीडियो जैसे ना जाने कितने वीडियो मिलेंगे तो महराज आप तो कम से कम तथ्यों की बात न करिये.

एक अन्य यूजर ने लिखा कि राजदीप सरदेसाई लोगों को राय दे रहे हैं, दुनिया जानती है जब बिकाऊ पत्रकारिता का नाम आएगा जब सरदेसाई का नाम जरूर आएगा. आपके बिकाऊ होने के बहुत से प्रमाण हैं बताइएगा दिखा देंगे. कुणाल नामक यूजर लिखते हैं कि कांग्रेस कार्यकाल में जब कोई मीडिया की आलोचना करता था तो राजदीप जी कहते थे, don’t shoot the messenger, और अब जब अपनी पसंद की सरकार नही आई तो हर समय मीडिया को blame करते हैं. ये जो पब्लिक है सब जानती है राजदीप.

अनिल सिंह मूलतः चंदौली के निवासी हैं। दिल्ली में कई बरस पत्रकारिता करने के बाद अब लखनऊ में मीडिया फ़ील्ड में सक्रिय हैं।

  • भड़ास तक अपनी बात पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

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