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साहित्य

राजेन्द्र यादव जी भी गज़ब प्रेमी थे, एक प्रेमिका को अपनी दूसरी प्रेमिका की बातें बताते रहते थे!

देखो मेरे पास बहुत सारी बातें हैं। मैं जीवनभर एकतरफा बातें कर सकती हूं, बिना शिकायत किए… पर मैं भी तो इंसान हूं न, मेरा भी तो मन करता है कि कोई हालचाल पूछे, अपना बताए। पर तुम हो कि मौनी बाबा बने बैठे हो।

तो तुम्हें अपने प्यार से इतर एक कहानी सुनाती हूं…

शालिनी श्रीनेत-

जो स्त्रियां आत्मकथा लिखती हैं वो छिनाल होती हैं। नहीं-नहीं… मैं नहीं कह रही… मैत्रेयी पुष्पा जी ने लिखी हैं, अपने संस्मरण में ‘वो सफर था कि मुकाम था’ में कि वर्धा के कुलपति रहे विभूति नारायण ने एक इन्टरव्यू में कहा था कि जो स्त्रियां आत्मकथा लिखती हैं वो छिनाल होती हैं, ये इंटरव्यू ‘नया ज्ञानोदय’ में छपा जिसके संपादक रविन्द्र कालिया जी थे।

अब तुम गौर करना इस बात पर कि हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने अपने संपादकीय में लिखा कि विभूति नारायण ने मैत्रेयी जी को छिनाल कहा था, जबकि विभूति नारायण ने नाम नहीं लिया था। मैत्रेयी जी ने किताब में लिखा है कि उन्होंने सवाल पूछा राजेंद्र जी से कि विभूति नारायण ने तो नाम नहीं लिया था किसी स्त्री का, तो आपने मेरा नाम क्यों छाप दिया?

तुम्हें क्या लगता है? राजेंद्र जी ने ऐसा क्यों लिखा होगा? इसीलिए न कि विभूति नारायण जी ने उनसे कहा होगा…

पर यार, मैत्रेयी जी तो राजेन्द्र यादव जी से प्रेम करती थीं, उनको अपनी सहेली कहती थीं, उनके साथ साहित्यिक यात्राएं करती थीं

उनको ऐसा नहीं करना चाहिए था। कुछ नहीं तो अपने प्रेम का ख्याल रख लेते।

उन्हें इस तरह नहीं लिखना चाहिए था हंस का संपादकीय बहुत लोग पढ़ते हैं। बदनामी तो हुई ही होगी।

मुझे यकीन है तुम कभी मुझे बदनाम नहीं करोगे। भले महीनों ना मिलो

मैत्रेयी जी की प्रेम-प्रगाढ़ता देखो उनका साथ नहीं छोडीं, छिनाल शब्द इस्तेमाल पर धरना-प्रदर्शन हुआ। इसने आंदोलन का रूप लिया। मन्नू भंडारी ने अपने कदम पीछे खींच लिए। जाहिर है पति के सपोर्ट में खड़ी हुई होंगी।

लेकिन अच्छी बात ये रही कि बहुत सारी लेखिकाएं साथ आईं जैसे -कृष्णा सोबती, अर्चना वर्मा, मृदुला गर्ग, सविता सिंह, विमल थोराट, अनामिका, अल्पना मिश्र, रमणिका गुप्ता, अनिता भारती, गीता श्री और रेखा अवस्थी। भाषा सिंह भी साथ रहीं।

मैत्रेयी जी कहती हैं कि ज्ञानपीठ पर प्रदर्शन हुआ। इनकी मांग ये थी कि विभूति नारायण और रविंद्र कालिया जी इस्तीफा दें। विभूति नारायण और रविंद्र कालिया के खिलाफ देश भर से युवा जुटते रहे।

पर अपना समाज पितृसत्तात्मक है उसका एक नमूना यहां भी देखने मिला…

प्रथम महिला राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल से उम्मीदें थीं पर बहुत जल्दी टूट गयीं। कपिल सिब्बल तक जब तक पहुंचती उससे पहले ही विभूति नारायण जी पहुंचे हुए थे। मकसद था माफ़ी मांग कर किस्सा ख़त्म करने का।

अब तुम्हीं बताओ कैसे कोई भरोसा करे किसी पर? जब इतने पढ़े-लिखे लोग किसी स्त्री का चीरहरण कर रहे हैं…

खैर, इस आत्मकथा में एक तरफ मैत्रेयी जी राजेन्द्र जी को अपनी सहेली और प्रेमी कहती हैं, मगर दूसरी तरफ एक बात बार-बार खटकती है किताब पढ़ते हुए- खराब आंख और पैर की विकलांगता को इतनी बार वर्णित किया है कि लगता है कि वो बताना चाहती हो की राजेंद्र जी शरीर से आकर्षक नहीं थे पर अपने प्रभाव में सबको लिए रहते थे।

जबकि प्रेम में आदमी अंधा और बहरा हो जाता है तुमसे अच्छी तरह कौन जान सकता है? इन बातों का क्या मतलब?

कभी वो प्रेम की बातें करती हैं तो कभी उनकी ऐय्याशियों की, तो कभी उनकी आंख पर काला चश्मा, चलने में सहारा देने वाली छड़ी तो कभी सिगार को कहती हैं कि पाइप पीते थे।

कितना अनोखा प्रेम था कि उनके गृहस्थ जीवन पर भी बात करती हैं और आरोप भी लगाती हैं। कई बार मन्नू भंडारी का पक्ष लेती नजर आती हैं तो कई जगह इल्जाम लगाती…

एक जगह कहती हैं कि आप पिता तो बने पर पिता की जिम्मेदारियां नहीं याद रहीं आपको। गजब का प्रेम था उनकी प्रेमिका मीता (बदला हुआ नाम) की बात भी करती हैं कहती हैं मीता को बेदखल कर दिया यादव परिवार ने।

राजेन्द्र जी भी गज़ब प्रेमी थे एक प्रेमिका (मैत्रेयी) से अपनी दूसरी प्रेमिका मीता की बातें बताते रहते थे। एक जगह मैत्रेयी जी पूछती है प्यार मीता से किया और शादी मन्नू भंडारी से क्यों?

नया ज्ञानोदय ने बेवफाई अंक निकाला।

लगातार ऐसी गतिविधियां होती रही जो कि महिला विरोधी थीं जबकि कहा जाता महिलाएं ज्यादा लेखक राजेन्द्र यादव के समय में बनी।

एक बात का बड़ा सूकून है कि तुम साहित्यकार नहीं हो नहीं तो ये किताब पढ़ने के बाद मैं तुम पर शक करने लगती।

इस किताब ने बहुतों की बखिया उधेड़ी है, लेखिका एक जगह कमलेश्वर की बात करते हुए कहती हैं कि दो-दो स्त्रियां तो उनकी संतान लिए फिर रही हैं, ऐसी चर्चा साहित्यकारों के बीच में।

मुझे नहीं मालूम तुम मैत्रेयी जी को कितना जानते हो, जानते ही हो या नहीं।

शिव कुमार शिव को कभी व्यापारी तो कभी ठेकेदार कहती हैं और कहती हैं कि उसे लगता है कि राजेन्द्र यादव लेखक बना देंगे… जबकि शिव कुमार शिव साहित्यकार बन गये और अब तो उनके बच्चे उनके नाम से पुरस्कार भी शुरू कर दिए हैं।

हंस की वसीयत मतलब उसका उत्तराधिकारी कौन होगा? कई नाम आये और खारिज हुए। फाइनली राजेन्द्र जी ने चल-अचल और हंस की विरासत बेटी के नाम चढ़वा दी। वे परिवार का निषेध करते-करते परिवारवाद के मुखिया बन गये।

बहुत कुछ रोचक तो बहुत कुछ अचंभित करने वाले तथ्य हैं इस किताब में। हालांकि एक लेखिका कहती हैं कि सब सच नहीं है। ये जानने के लिए मैंने एक ऐसे दोस्त को फोन किया जो मैत्रेयी जी को बहुत नजदीक से जानते हैं, उन्होंने कहा सब सच लिखा है।

देखो वैसे तो तुम किताबें कम खरीदते और पढ़ते हो पर इसे पढ़ लेना, मैं तुम्हें ऑनलाइन आर्डर करके भेज दूंगी। पता भेज दो। भंडाफोड़ू लेखन किया है लेखिका ने… ऐसे लोगों के नाम हैं जिन्हें हम सिर्फ अच्छे लेखन के लिए जानते है पर लेखिका ने बखिया उधेड़ दिया है।

प्रेम देखो जरा, एक बार राजेन्द्र जी ने मैत्रेयी जी को गांव भेजा कि जाओ वहां के लोगों से बात करो और किताब लिखो। मैत्रेयी जी ने उनकी बात मानी भी, गईं, घूमीं, सबसे बाते कीं और इदन्नमम लिख डाली जिस पर आरोप लगा कि राजेंद्र यादव ने ही लिखा है।

जरा तुम सोचो कोई स्त्री लिखती है तो हमारा समाज कह देता है कि किसी पुरुष के सहयोग से ही लिखा होगा। इन पर बहुत आरोप लगे। मेरा मानना है कि कोई भी लेखक स्वतः बनता है, कोई प्रमोट भले कर दे।

लास्ट में 28 अक्टूबर 2013 की बात करते हुए कहती हैं कि फोन पर एक मैसेज दिखा- राजेंद्र जी नहीं रहे… उनको विश्वास नहीं हो रहा था पर ये भी यकीन था कि विवेक मैसेज किये हैं तो झूठा नहीं हो सकता है।

लेखिका राजेन्द्र जी के बारे में भली-भांति जानती हैं कि वो कैसी सोच रखते थे कर्मकांड को लेकर। उनकी चिंता ये भी कि राजेंद्रजी कर्मकाण्ड को पाखंड मानते थे. अपने संपादकीय में पूजा-पाठ का विरोध करते थे पर उनका अंतिम संस्कार पूजा और मंत्रोच्चार के बाद हुआ।

अजीब प्रेम था मैत्रेयी जी राजेन्द्र यादव का…

अपने डाक्टर पति से राजेन्द्र जी की दवाई कराती, सलाह दिलाती, अस्पताल में एडमिट कराती, मगर राजेन्द्र जी को हमेशा सवालों के घेरे में रखती रहीं।

लम्बा नहीं लिख रही हूं नहीं तो तुम पढ़ नहीं पाओगे। जब किताब पढ़ोगे तो सारी राजनीति पता ही चल जायेगी। पता जल्द से जल्द भेजना। इन्तजार करूंगी…

जब समय मिले ये जरूर बताना कि ये चिट्ठी कैसी लगी।

तुम तो जानते ही हो हम जैसी लड़कियों महिलाओं को मैत्रेयी जी अठन्नी चवन्नी कहती हैं पर इन सब बातों को ताक पर रखकर किताब पढ़ने के बाद मैंने मेत्रेयी जी को फोन किया पर उन्होंने फोन उठाया नहीं। बहुत सारे सवाल है मेरे पास उनसे पूछने लिए और उत्सुकता है जानने की।

हालांकि मैं ये जानती हूं कि अगर फोन पर बात कर लेती तो सोशल मीडिया पर तुरंत लिख देतीं कि चवन्नी छाप लड़की का फोन आया था, बावजूद मैंने फोन किया…

तुम्हारा प्यार जो न कराए… तुम्हारे इन्तजार में… दिन शुभ हो..

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