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नवभारत टाइम्स के रविवार संस्करण के संपादक राजेश मित्तल हुए रिटायर : उनमें पता नहीं कौन सी संतई है जो एक भी इंसान गरियाने वाला नहीं मिला!

मनोज अभिज्ञान-

आज पत्रकारिता के एक सुनहरे अध्याय का औपचारिक पटाक्षेप हुआ है। श्री राजेश मित्तल जी ‘Navbharat Times’ के रविवार संस्करण के संपादक के रूप में अपने लंबे और समृद्ध सफर के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। यह औपचारिक सेवानिवृत्ति उस विरासत का पड़ाव है जिसने दशकों तक पाठकों की सोच, संवेदना और दृष्टि को आकार दिया। आज जब राजेश मित्तल जी अपने लंबे और गरिमामय पत्रकारिता-सफ़र के बाद ‘Navbharat Times’ के रविवार संस्करण से विदा ले रहे हैं, तो यह ऐसे अध्याय का विराम है, जिसकी गूँज आने वाले समय तक महसूस की जाएगी। उनका काम केवल संपादन नहीं था, बल्कि शब्दों को जीवन देना, विचारों को स्वरूप देना और पाठकों के मन में संवाद की ज्योति जगाना था। उन्होंने हर पन्ने को इस तरह सजाया कि पाठक केवल जानकारी ही नहीं, बल्कि दृष्टि भी पाते थे।

पत्रकारिता में उनका होना हमेशा किसी भरोसे की तरह रहा—जहाँ सच्चाई, संतुलन और संवेदनशीलता कभी समझौता नहीं करते। Sunday Edition को उन्होंने महज़ प्रकाशन नहीं रहने दिया, बल्कि विचारों का आईना बना दिया। उनकी लेखनी और संपादकीय दृष्टि में वही सहजता रही, जो पाठक को छूकर उसके भीतर तक उतर जाए। वे सिर्फ संपादक नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक के तौर पर कार्यरत रहे, जो लेखकों की कलम को संवारते और पाठकों के मन को समृद्ध करते रहे।

व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह अनुभव अविस्मरणीय है कि उन्होंने बिना किसी आग्रह या परिचय के मेरे लेख को अपने प्रतिष्ठित संस्करण में स्थान दिया। यह निर्णय उनकी निष्पक्षता और उदारता का सबसे सुंदर प्रमाण है। उस पल मुझे लगा कि सच्ची पत्रकारिता रिश्तों या आग्रहों से नहीं, बल्कि विचारों की गहराई और सच्चाई से संचालित होती है। यह मेरे लिए केवल प्रकाशन नहीं था, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक था जो संपादक और लेखक के बीच आत्मीय धारा की तरह बहता है।

आज जब वे नए जीवन-अध्याय की ओर बढ़ रहे हैं, तो उन्हें धन्यवाद कहना केवल औपचारिकता होगी। उनके प्रति आभार हृदय की उस गहराई से है, जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं। मेरी कामना है कि उनकी आगे की यात्रा वैसी ही गरिमा, संतोष और उज्ज्वल प्रकाश से भरी हो, जैसी उन्होंने अब तक दूसरों के जीवन और विचारों में बाँटी है। राजेश मित्तल जी का नाम केवल संपादक के रूप में नहीं, बल्कि पत्रकारिता की उस परंपरा के रूप में याद रखा जाएगा, जो सच्चाई को सजाती नहीं, बल्कि उसे उसके सबसे सुंदर और ईमानदार रूप में सामने रखती है।


खेल खत्म, पईसा हजम
नवभारत टाइम्स में आखिरी दिन

37 बरस हो गए थे नवभारत टाइम्स में काम करते-करते
21 बरस का था जब सन 1988 में ट्रेनी के तौर पर आया था और ट्रेनिंग आखिर चक चली

पहली और शायद आखिरी नौकरी
कुछ तय नहीं, आगे क्या करना है।

क्या 37 बरस गुजारना कोई उपलब्धि है?
नहीं
एक ही जगह इतना लंबा वक्त गुजारना कोई बड़ी बात नहीं
अहम यह है कि इस दौरान किया क्या

सोचा था, 50 का होने पर बस कर दूंगा, थम जाऊंगा, पर…

कुछ और कमा लूं तो चलूं
कुछ और बटोर लूं तो चलूं
जिम्मेदारियां निभा लूं तो चलूं
तामझाम समेट लूं तो चलूं
कुछ अरमान पूरे कर लूं तो चलूं

चले जाने की घड़ी आ गई, अब क्या चलूं!

-राजेश मित्तल


सत्येंद्र पीएस-

नवभारत टाइम्स संडे एडिशन के संपादक राजेश मित्तल सेवा निवृत्त हो गए। नवभारत टाइम्स में 1988 में ट्रेनी के रूप में नौकरी शुरू किया, उसके बाद कहीं गए ही नहीं। 37 साल तक वहीं काम किया और संपादक पद से रिटायर हो गए।

अमूमन लोग यथास्थिति वादी नहीं होते और नौकरी चेंज ही करते रहते हैं। एक ही संस्थान में बने रहने पर संस्थान मान लेते हैं कि बंदा नाकाबिल है। सेलरी नहीं बढ़ती, पद नहीं बढ़ता। तरह तरह मजाक बनाया जाता है।

मित्तल जी एक ही संस्थान में जमे रहे और बढ़ते भी रहे और शीर्ष पद से रिटायर हुए। उनके सामने कितने संपादक आए, मैनेजर आए और चले गए लेकिन मित्तल जी की निष्ठा नहीं डिगी। वह जम गए तो जमे ही रहे।

मुझसे करीब पांच या सात साल पहले नजदीकी बनी और फिर हम लोग अच्छे मित्र बन गए। हफ्ते पंद्रह दिन में न मिलते तो एक खालीपन और सूनापन सा लगता था। हम लोग साथ साथ काठमांडू गए, भोपाल गए। ध्यान, योग से लेकर खूब घुमक्कड़ी की। मित्र बने तबसे हम चिपके ही रहे।

पत्रकारिता इतनी मजेदार चीज है कि सीनियर्स को हमेशा जूनियर गालियां ही देते हैं। इस फील्ड में जो सीनियर होते हैं उन्हें ज्ञान की गलतफहमी होती है और जूनियर जो आते हैं, उनको चिरकुट समझते हैं कि हम तो कुलदीप नैयर और खुशवंत सिंह हैं ही, ये फ्रस्ट्रेटेड बंदा बहुत डिस्टर्बिंग है! कुल मिलाकर मुझे शायद ही कोई संपादक मिला, जिसको जूनियर बहिनिया महतरिया न करते हों और कुछ तो मरने के बाद भी गरियाए जा रहे है।

मित्तल जी में पता नहीं कौन सी संतई है कि एक भी इंसान उनको गरियाने वाला नहीं मिला। कई लोगों को मैने प्रोवोक भी किया कि शुरू हो जाएं! लेकिन किसी ने गरियाया नहीं, बल्कि प्रशंसा ही की।

अभी हाल में बहुत देर तक हम साथ बैठे रहे। मित्तल जी ने पूछा कि 37 साल एक ही काम किया। अब बताइए कि क्या करना चाहिए। मुझे समझ में न आया कि क्या कहें। स्वाभाविक है कि उन्होंने खुद प्लान किया होगा कि करना क्या है! हां, नवभारत टाइम्स अपने कूल कूल संपादक को बहुत मिस करेगा।

ये फोटो शायद भोपाल में मैने खींची थी। मित्तल जी जब भी मुझसे मिले, हमेशा छोटे बच्चे से लगते हैं। कभी लगा ही नहीं कि वह रिटायर होने की उम्र में हैं। उनके पास किताबों का जखीरा है। धर्म अध्यात्म में उनकी जबरदस्त रुचि है। उम्मीद है कि अब वह पहाड़ों पर, नदियों और झरनों के साथ प्रकृति के बीच ज्यादा रहेंगे, ऐसा ही उनका स्वभाव है। आगे की यात्रा के लिए ढेरों शुभकामनाएं।


The Perfect Editor… Rajesh Mittal Sir ने आज नवभारत से विदा ली। अपने पाठकों की परवाह करना कोई उनसे सीखे। हाज़िर जवाब, बेहद विनम्र, हंसमुख, कमाल का ज्ञान और अपने प्रोफेशन को लेकर बेहद ईमानदार शख़्स। संडे एडिशन सर का जबरदस्त होता था। उसकी कई स्टोरी लोगों ने जमा कर करके रखीं हैं।

प्रिय सर को नए सफर के लिए ढेरों शुभकामनाएं और बधाई!

-अबरार मुल्तानी

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