भौतिक सुखों की अनदेखी कर समर्पण के साथ पत्रकारिता करते जाना भी साधना है!

राजीव मंडल के सम्मान पर उनके मित्र आलोक पराड़कर की पोस्ट पढ़ें-

आलोक पराड़कर

राजीव मंडल मेरे 20 साल पुराने दोस्त हैं। वर्ष 2002से, जब हम लखनऊ के ‘दैनिक जागरण’ में साथ काम किया करते थे। वे अखिलेश (अखिलेश प्रताप सिंह, अब दिल्ली में पत्रकार) और सत्येन्द्र (सत्येन्द्र सिंह, इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार) के साथ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की बगल की एक गली में रहते थे।

मैं इंदिरा नगर में अकेले रहता था लेकिन अक्सर दोपहर में इनके पास आ जाता था। इसकी वजह यह भी थी कि मंडल खाना बहुत अच्छा बनाते थे। पनीर की सब्जी को कुकर में पकाते। घर से लाए गरम मसाले की महक हमारी भूख बढ़ा देती थी। अक्सर नए प्रयोग भी बताते। कभी कहते कि चावल पकाते समय कपड़े में बांधकर धनिया की पत्ती रख दो, देखो कैसे हरा रंग आता है। कभी कहते कि पॉलीथिन की पन्नी में अंडे को फोड़कर कुकर में पकाओ,देखो कैसी डिश तैयार होती है। मैंने कभी इन प्रयोगों को आजमाया नहीं लेकिन इनकी कल्पना जरूर करता था। अच्छे खाने का शौक होते हुए भी खाना बनाने में मैं अनाड़ी ही रहा।

यह साथ ज्यादा दिन नहीं रहा। फेरबदल हुए, हमारे संस्थान बदल गए। ये सभी दिल्ली चले गए। अखिलेश और सत्येन्द्र से संपर्क टूट-सा गया। इस बीच सत्येन्द्र की बीमारी का पता भी चला लेकिन मंडल हमेशा संपर्क में रहे। वे लंबे समय से ‘राष्ट्रीय सहारा’ में हैं और गाजियाबाद में घर लेकर मां के साथ रहते हैं। परिवार झारखंड में है। मां को इसलिए साथ रखते हैं कि दिल्ली-नोएडा में उनकी अच्छी चिकित्सा होती रहे।

मैं जब भी दिल्ली जाता हूं, नोएडा में उनसे जरूर मिलता हूं। वे लंबे समय से ‘राष्ट्रीय सहारा’ के संपादकीय पृष्ठों की जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं और संस्थान की मुश्किल के दौर में भी पूरी मेहनत और प्रतिभा के साथ डटे हुए हैं।

चुपचाप काम करते रहने वाले, अन्तर्मुखी मंडल ने कल आधी रात में मुझे व्हाट्सऐप पर कुछ चित्र भेजे। ये चित्र एक स्मृतिचिह्न और सम्मान पत्र के थे। उन्हें काका साहेब कालेलकर की 135 वीं जयंती पर पत्रकारिता में योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। उन्हें सम्मानित करते हुए लिखा गया है- ‘राष्ट्रीय सहारा’ के संपादकीय पृष्ठ के प्रभारी के रूप में कार्यरत राजीव मंडल पत्रकारिता में स्वतंत्रता, जनतांत्रिक सरोकारों और मूल्यों को मजबूती देने की दिशा में निरंतर प्रयासरत-संघर्षरत हैं।

बधाई मित्र। भौतिक सुखों की अक्सर अनदेखी करते हुए, परिवार से दूर, समर्पित होकर मेहनत के साथ पत्रकारिता करते जाना भी साधना है। साधना का सम्मान होना चाहिए , देर से ही सही!



 

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