बेबाक लेखिका रमणिका गुप्ता ने अपने जीवन के हर आयाम को सामने रखने में कोई संकोच नहीं किया

दुखद खबर। ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी जुझारू पत्रिका की संपादक रमणिका गुप्ता अब हमारे बीच में नहीं हैं। यह नब्बे वर्ष की थीं। लंबे समय से बीमार चल रही थी। रमणिका गुप्ता की अनेक पुस्तकें हम सब के बीच में धरोहर के रूप में हमेशा रहेंगी। अपनी आखिरी सांस तक वह दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के लिए प्रतिबद्ध रहीं।

दिल्ली की डिफेंस फॉलोनी का उनका घर सबके लिए खुला था। दूसरे शहरों से आने वाले अनेक लोग वहीं आकर रुका करते थे। वर्षों पहले श्रेष्ठ अनुवाद पत्रिका के रूप में उन्होंने मेरी पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’ का ही चयन किया था और दिल्ली बुला कर राजेंद्र भवन में सम्नानित भी किया था। रमणिका गुप्ता बेबाक लेखिका के रूप में पहचानी जाती थीं।

उन्होंने अपने जीवन के हर आयाम को सामने रखने में कोई संकोच नहीं किया। एक एक्टिविस्ट की तरह काम करती रहीं। राजनीति में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी। वह एक बार विधायक भी रहीं। दलित विमर्श को ले करके उन्होंने पूरे देश में एक वातावरण बनाया। ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी पत्रिका के माध्यम से शोषण और अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद करने का काम रमणिका जी हिम्मत के साथ करती रहीं। उनके साहित्य और पत्रकारिता संबंधी अनदान हम भूल नहीं सकतें। उनको शत शत नमन।

पत्रकार और साहित्यकार गिरीश पंकज की फेसबुक वॉल से.



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