नक्सल आंदोलन में सक्रिय रामेश्वर पांडेय को पत्रकारिता में मानव जी ले आए!

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निशीथ जोशी-

रामेश्वर पांडेय जी की आत्मा के देह त्याग की सूचना आज सुबह जब ऑफिस जाने के तैयारी कर रहे तो भाई राजू मिश्रा की पोस्ट से मिली । यकीन ही नहीं हुआ। हमने पुष्टि करने के लिए राजू जी को फोन लगाया। बात की। श्री राजीव थपलियाल से बात की तो उन्होंने भी एक पोस्ट से पुष्टि की बात कही। श्रीमती जी को यह बता कर ऑफिस पहुंचे तो श्री शेष मणि शुक्ल को बताया। थोड़ी देर उन पर ही चर्चा होती रही। फिर तो फेस बुक पर तमाम लोगों की पोस्ट की झड़ी लग गई। यह है रामेश्वर पांडेय के लिए उन लोगों का प्रेम जिन्होंने उनके साथ काम किया, सीखा, जिनको वे पत्रकारिता के क्षेत्र में लाए। संरक्षण दिया। रात में श्री अरविंद श्रीवास्तव का फोन आया, ” मेरे पिता समान थे वे। उन्होंने ही सिखाया। अब किसके सामने अपना दुख कम करूं। फिर सोचा बड़े भाई से बात करें। इसलिए आपको फोन लगा दिया। काफी देर तक पांडेय जी पर बात होती रही। उनके परिवार के बारे में चर्चा हुई। अमर उजाला देहरादून के कुछ साथियों से भी देर तक उन पर चर्चा चली।

समझ में नहीं आ रहा था कि लिखें क्या? क्योंकि स्मृतियों का एक संसार है उनके साथ का। उनको हम सदा भाई साहब कहा और बड़े भाई की तरह ही सम्मान दिया। पांडेय जी से पहली मुलाकात लखनऊ में हुई थी। जब शाने सहारा बंद हो गया था और श्री अजय कुमार ने उनको इलाहाबाद में माया पत्रिका में भेजा था। फिर हमारी एक कवर स्टोरी बाबा जयगुरुदेव को उन्होंने रिराइट किया। हम उनकी कॉपी राइटिंग के मुरीद हो गए। उसके पहले पिता श्री रमेश जोशी, श्री अशोक शुक्ला और श्री अजय कुमार जी सत्यकथा लिखने के गुर सीखे थे। 1980 में भारत अखबार में चीफ रिपोर्टर श्री राजेंद्र श्रीवास्तव ने रिपोर्टिंग करने की कला बताई थी।

हम लखनऊ में थे जब भी इलाहाबाद जाते तो मित्र प्रकाशन के दफ्तर जाते। पांडेय जी कॉपी राइटिंग के बारे में कुछ न कुछ बता ही देते थे। कालांतर में हम सहारा समूह का अखबार राष्ट्रीय सहारा शुरू करने दिल्ली चले गए। वहां भी पांडेय जी से मुलाकात हुई। वे राष्ट्रीय सहारा में आना चाहते थे लेकिन सुब्रत रॉय ने मना कर दिया मिलने से भी। शाने सहारा बंद होने को लेकर नाराज थे। फिर पांडेय जी से भेंट ,1999 में हुई अमर उजाला मेरठ दफ्तर में। जब श्री अतुल माहेश्वरी जी ने बुलवाया था हमको। हमने लुधियाना ब्यूरो में ज्वाइन कर लिया। रामेश्वर पांडेय जी संपादक बन कर जालंधर आ गए। फिर तो मुलाकात होती ही रही। अमर उजाला के मालिक श्री अतुल माहेश्वरी के बहुत प्रिय पात्रों में एक थे पांडेय जी।

एक बार लुधियाना में क्राइम रिपोर्टर श्री संजय मिश्रा से एक बड़ी खबर मिस हो गई। पांडेय जी का फोन आ गया। हमसे पूछा संजय से बात हुई इस बारे में। हमने कहा नहीं। जब संजय जी स्वयं इतनी ग्लानि महसूस कर रहे हैं तो हम क्या कहें। उन्होंने कहा एक दम ठीक किया। उस दिन के बाद संजय मिश्र ने जो क्राइम रिपोर्टिंग की लुधियाना में वह एक नजीर बनी। जुलाई 2000 में हमारे पिता श्री रमेश जोशी ने लुधियाना में शरीर त्याग दिया। स्वयं रामेश्वर पांडेय जी जालंधर से आए। बहुत देर तक अंतिम संस्कार में शामिल रहे। उस समय उन्होंने कहा था कि आज हिंदी पत्रकारिता का एक अध्याय समाप्त हो गया है। आज सुबह पांडेय जी के निधन की सूचना मिलते ही हमारी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि आज हिंदी पत्रकारिता का एक अध्याय समाप्त हो गया। पिता श्री के वह बहुत प्रिय थे और उनका सम्मान भी बहुत करते थे।

पांडेय जी से हमारे कुछ सैद्धांतिक मतभेद भी रहे लेकिन मन भेद कभी नहीं रहा। जब वे लखनऊ में थे तो एक बार लंबी वार्ता हुई थी मिलने का वायदा भी किया था लेकिन वे चले गए। जाने कितने पत्रकार उनके यहां शरण पाते थे। पांडेय जी एक समय में चारु मजूमदार के साथ नक्सल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे उनको वहां से निकाल कर पत्रकारिता में लाने का श्रेय मानव जी को जाता है। कुछ विशेष कारण से हम मानव जी के बारे में अधीन जानकारी नहीं दे रहे हैं लेकिन उन महान आत्मा को भी शत शत नमन जिन्होंने रामेश्वर पांडेय जी के भीतर छिपे उस पत्रकार और एक अच्छे इंसान को खोज निकाला था। पांडेय जी को शत शत नमन। ईश्वर और महान गुरुजनों से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को अपने हृदय में स्थान दें और परिजनों के साथ ही उनके शिष्यों, मित्रों और सहयोगियों को शक्ति। पांडेय जी पर सुबह से बहुत कुछ पढ़ा है कितना बड़ा संसार था उनका इसका सहज अंदाज लगाना संभव नहीं है। हजारों लोगों के लिए रोजी रोटी का साधन वे बने। अमर उजाला जालंधर की टीम के लिए उन्होंने छांट छांट कर और तराश कर टीम को एकत्र किया था। अब सब यादों में ही जीवित हैं वे दिन।

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Comments on “नक्सल आंदोलन में सक्रिय रामेश्वर पांडेय को पत्रकारिता में मानव जी ले आए!

  • Shambhunath Shukla says:

    रामेश्वर पांडे काका अच्छे पत्रकार थे। उनके निधन से दुख हुआ। यह अलग बात है किंतु वे चारू मजूमदार के साथ कब रहे? इसकी पुष्टि कैसे हो? संभव है वे छात्र जीवन में नक्सल आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते रहे हों। मैं 2010 में जब लखनऊ के दैनिक जागरण में उनसे मिला तो उनके रवैये से वे मुझे उनमें चारू की छवि नहीं दिखी।।

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  • Raj Shekhar says:

    रामेश्वर पांडे जी की उम्र 66 साल थी। इसका मतलब है कि उनका जन्म 1957 में हुआ था। नक्सल आंदोलन 1967 में शुरू हुआ। उस समय पांडे जी उम्र 9-10 साल रही होगी ‌‌ । 1 972 में चारू मजूमदार की मौत हो गई थी। चारू मजूमदार की मौत के समय इनकी उम्र 14 साल के आसपास रही होगी ‌।

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