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सुख-दुख

संपादक और साहित्यकार रवींद्र श्रीवास्तव जी ने धरती पर आने के लिए 1 अप्रैल ही क्यों चुना!

केके उपाध्याय-

जन्मदिवस की बधाई, रवीन्द्र जी पूरा कॉकटेल है जनाब…

रवीन्द्र श्रीवास्तव यानी कॉकटेल। कॉकटेल इसलिए कि वे ता-उम्र संपादक रहे। साहित्यकार वे हैं। कविता उनके कंठ पर विराजित है। कविता ऐसी कि पूरा सौंदर्य शब्दों में नृत्य करता है। वे मंचीय कवि नहीं है। शब्दों का पूरा संसार है मगर सरस्वती नाचती है यहां।

कभी धुर वामपंथी लगते हैं। कभी-कभी दक्षिणपंथी भी नज़र आने लगते हैं। दोनों में से कोई नहीं है। धारा के विपरीत चलने का स्वभाव है। मित्रता जी भर कर निभाते हैं। दुश्मनी उससे भी बढ़कर। खाने के बेहद शौकीन। डॉक्टर की सभी सलाह मानते हैं।

बस खाने पर रोक -टोक छोड़कर। यह क़तई मंजूर नहीं। एक बेहतरीन इंसान। मेरे जीवन के उतार-चढ़ाव में इनका बेहद योगदान है। जब कभी गिरने को था। सँभाला भी। सहारा भी दिया। आज जो थोड़ा बहुत हूँ उसमें इनका बड़ा योगदान है।

किसी की ख़ुशी के लिए कभी अपनों का साथ नहीं छोड़ा। अलबत्ता उन लोगों को छोड़ दिया जो चाहते थे कि अपने प्रियजन को छोड़ो। लिखने बैठ जाएँ तो पूरा संसार रच दें। गपशप करें तो युवा भी शरमा जाए।

साठी में चल रहे हैं। मन मगर बचपन है। दिल जवान है। रोमांस भरा पड़ा है। सौंदर्य भाषा में भी है। ज़ुबान पर भी। वे नाराज़ भी होंगे तो पता नहीं चलने देते। अह्हा -अह्हा ….जब वे लय में बोलते हैं तो अच्छे-अच्छे पिघल जाते हैं।

कभी गंभीर। कभी अल्हड़। यही हैं रवीन्द्र जी की चिर जवानी का राज। वे आल्हादित हों तो मन झूम जाए। राग मचल जाए। आज तक समझ नहीं आया धरती पर आने के लिए 1 April ही क्यों चुना। जब झाँका तो पता चला दुनिया को मूर्ख बनाने के लिए शायद?

तब से लेकर अब तक यह एक पहेली है। पहेली ही रहेगी। अनसुलझी। गुत्थम गुत्था। सुलाझाने की कोशिश भी कि तो खुद उलझ जाओगे। बेहतरीन कुटिल हंसी के धनी रवीन्द्र जी का आज जन्मदिवस है।

लिखने को क्या क्या लिखूँ? कुछ अनलिखा भी समझिए। यशोगान लिख भी नहीं रहा। वहीं कहा जो देखा। महसूस किया। जाना भी। पहचाना भी। जन्मदिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

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