विजय सिंह ठकुराय-
इन दिनों चर्चा में आये एक अन्य युवा “विकास यादव” के बारे में पढ़ने को मिला, जिसने मुझे बड़ा प्रभावित किया।
बेसिकली रॉ के एजेंट विकास को अमरीका-कनाडा में बसे एक खालिस्तान अलगाववादी पन्नू को निपटाने का काम सौंपा गया। ये पन्नू भाई साहब बेसिकली भारत के एक हिस्से को तोड़ कर अलग सिक्ख लैंड चाहते हैं – जो कि बेसिकली संभव नहीं है। दुनिया में जितने देश बनने थे, पहले ही बन चुके हैं। अब किसी नए देश की संभावना न्यूनतम है – हिंसा के सहारे तो कतई नहीं।
वैसे अलगाव की मांग में कुछ बुरा नहीं होता। आदमी का बच्चा जो चाहें मांग ले – कौन रोक सकता है?
आप शांति से अलग देश मांगिये – देश आपकी बात सुनेगा, इग्नोर करेगा। ऐतिहासिक रूप से मांग जायज हो तो हो सकता है कि जनमत इत्यादि पर विचार हो। पर आप अपनी बात हिंसक तरीके से रखेंगे तो देश अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए आपसे टेढ़े तरीके से निपटेगा। दुनिया में यही होता आया है – कोई नयी बात नहीं है।
विकास यादव की टीम ने जिनसे पन्नू को निपटाने का सौदा किया, वे अमेरिकन एजेंट्स निकल गए। भांडा फूट गया। रूस से गलबहियां बढ़ा रहे भारत को दबाब में लेने का अच्छा मौका देख अमरीका ने फटाफट विकास को वांटेड घोषित कर दिया।
आनन-फानन में भारत को विकास से पल्ला झाड़ना पड़ा। बैक डेट में दो एफआईआर लॉज कर के बोल दिया कि ये तो पहले से बदमाश आदमी है। इससे हमारा क्या लेना देना?
बहरहाल, दुनिया का यही चलन है। जब एक देश का सिपाही खुफिया विभाग की शपथ लेता है तो उसे पता होता है कि जिस दिन वो पकड़ा गया – खेल खत्म। उसके अपने उसको पहचानने से मना कर देंगे। आगे की जिंदगी तमाम अनिश्चितता और असुरक्षा बोध से ही कटेगी।
शायद इसलिए एक सिपाही ही देश का सच्चा नायक होता है। सिपाही मैदान में अक्सर गिरते भी हैं, चोट खाते हैं, जख्म लगते हैं, पकड़े जाते हैं, तमाम जीवन देश के नाम कर देने के बाद अचानक से उपेक्षित भी किये जा सकते हैं – फिर भी अपने कर्तव्यपथ पर अड़े रहते हैं।
बहरहाल, विकास के सहारे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरने की कोशिश की जा रही है। मुझे लगता है कि अब सीधा स्टैंड लेने की जरूरत है कि अगर तुम इराक-अफगानिस्तान तक में घुस कर अपने दुश्मन निपटा सकते हो, तो हमें भी यह करने का पूरा हक है। मुझे उम्मीद है कि हमारे साहब इस मामले को ठीक से हैंडल करेंगे और अपने इस सिपाही की प्रत्यक्ष तौर पर न भी सही, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से हमेशा रक्षा करें – बस किसी कूटनीति के चक्कर में बलि का बकरा न बना दे।
Sorry to say… ऐसा बस इसलिए कहना पड़ा क्योंकि अपने साहेब की पाल्टी अपने सच्चे सिपाहियों अथवा निष्ठावान कार्यकर्ताओं का साथ अक्सर मझधार में ही छोड़ देने के लिए कुख्यात है।
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