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रिलायंस द्वारा ONGC की गैस चुराने और उसमें मोदी सरकार की क्या लीपापोती रही? पूरी कहानी पढ़िए

गिरीश मालवीय-

देश के संसाधनों पर पहला हक अंबानी अडानी का है… जी हां असली सच तो यही है खबर आई है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुकेश अंबानी को ओएनजीसी के कुएं से कथित तौर पर 1.55 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की प्राकृतिक गैस चोरी करने के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को नोटिस जारी किया है।

एकतरफा रूप से ठेका दिया जाना तो फिर भी माना जा सकता है लेकिन चोरी तो बहुत बड़ा आरोप है लेकिन भारत के सबसे बड़े अमीर घराने पर ऐसा आरोप की जांच सामने आने पर भी देश का मीडिया चुप बना हुआ है।

कोई भी पूरा मामला क्या है वो बता नहीं रहा है ?….

आंध्र प्रदेश की दो प्रमुख नदियों कृष्णा और गोदावरी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन कच्चे तेल और गैस की खान माना जाता है 1997-98 में केंद्रीय सरकार न्यू एक्सप्लोरेशन और लाइसेंस पॉलिसी (नेल्प) लेकर आई। इस पॉलिसी का मुख्य मकसद तेल खदान क्षेत्र में लीज के आधार पर सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक समान अवसर देना था इस पॉलिसी से रिलायंस का प्रवेश तेल और गैस के अथाह भंडार वाले इस क्षेत्र में हो गया।

रिलायंस ने गोदावरी बेसिन तेल क्षेत्र में अपना अधिकार बनाना शुरू किया जहाँ ONGC पहले से खुदाई कर रहा था।

धीरे-धीरे रिलायंस ने यह कहना शुरू किया कि उसे इस क्षेत्र में करोड़ों घनमीटर प्रतिदिन उत्पादन करने वाले कुएं मिल गए हैं इन खबरों से रिलायंस के शेयर आसमान पर जा पहुंचे।

2008 में रिलायंस ने तेल और अप्रैल 2009 में गैस का उत्पादन शुरू किया गया था। लेकिन हकीकत यह थी कि रिलायंस को अपनी घोषणाओं के विपरीत बेहद कम तेल और गैस इन क्षेत्रों से प्राप्त हो रही थीं ओर पास के क्षेत्र में स्थित ONGC अपने कुओं से भरपूर मात्रा में तेल गैस का उत्पादन कर रहा था।

2011 में केजी बेसिन में रिलायंस इंडस्ट्रीज की परियोजना से गैस उत्पादन में गिरावट आई और सरकार ने रिलायंस को गैर-प्राथमिक क्षेत्रों को गैस की आपूर्ति बंद करने का आदेश दिया लेकिन रिलायंस ने इस्पात उत्पादन करने वाले समूहों को साथ मे लेकर सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया पेट्रोलियम मंत्रालय और रिलायंस में यह विवाद गहराता चला गया पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना था कि रिलायंस को कैग द्वारा ऑडिट कराना होगा लेकिन रिलायंस इसके लिए तैयार नहीं हुआ उसने इस क्षेत्र में अपने वादे के मुताबिक अरबों करोड़ का निवेश करने से इनकार कर दिया।

2013 में रिलायंस और ओएनजीसी के बीच गैस चोरी को लेकर विवाद की थोड़ी–थोड़ी भनक मिलना शुरू हो गयी थी।

अब इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आपके सामने आना वाला है वो है इस केस की टाइमिंग …………..आपको याद होगा कि मई 2014 में भारत में लोकसभा के चुनाव हुए थे 16 मई को यह फैसला आने वाला था कि सत्ता किसके हाथ लगने वाली हैं उसके ठीक एक दिन पहले ओएनजीसी ने 15 मई, 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया जिसमें यह आरोप लगाया कि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने उसके गैस ब्लॉक से हजारों करोड़ रुपये की गैस चोरी की है।

ओएनजीसी का कहना था कि रिलायंस ने जानबूझकर दोनों ब्लॉकों की सीमा के बिलकुल करीब से गैस निकाली, जिसके चलते ओएनजीसी के ब्लॉक की गैस आरआईएल के ब्लॉक में आ गयी।

ओएनजीसी के चेयरमैन डीके सर्राफ ने 20 मई 2014 को अपने बयान में कहा कि रिलायंस की चोरी के चलते उसे लगभग 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। 15 मई 2014 को ONGC ने जो केस दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किया था वह केस एक ऐतिहासिक केस था क्योंकि ओएनजीसी ने रिलायंस पर तो चोरी का आरोप लगाया ही था, उसने सरकार को भी आड़े हाथों लिया था।

ओएनजीसी का कहना था कि डीजीएच और पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा निगरानी नहीं किये जाने के कारण ही रिलायंस ने यह चोरी की। मतलब ONGC कह रहा था कि पहले पक्ष यानी रिलायंस ओर दूसरे पक्ष यानी सरकार ने मिलकर इस डकैती को अंजाम दिया है।

लेकिन ONGC को अपनी औकात मोदी सरकार ने 9 दिन के अंदर ही याद दिला दी। सरकार ने 23 मई को रिलायंस, ओएनजीसी और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों की एक बैठक करवायी और सबने मिलकर इस मामले के अध्ययन के लिए एक समिति बनाने का निर्णय लिया जिसमें रिलायंस ओर सरकारी प्रतिनिधि शामिल थे।

समिति ने मामले की जाँच का ठेका दुनिया की जानी मानी सलाहकार कम्पनी डिगॉलियर एण्ड मैकनॉटन (डीएण्डएम) को दिया। D & M ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ओएनजीसी के ब्लॉक से आरआईएल के ब्लॉक में 11,000 करोड़ रुपये की गैस गयी है। दूसरे, उसने यह सलाह भी दे डाली कि इन ब्लॉकों में बची गैस को रिलायंस से ही निकलवा लिया जाय जो इस काम को करने में माहिर है।

इस रिपोर्ट पर निर्णय देने के लिए मोदी सरकार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.पी. शाह समिति का गठन किया। समिति का काम इस मामले में हुई भूलचूक देखना और ओएनजीसी के मुआवजे के बारे में सिफरिश करना था।

शाह समिति ने इस मामले स्पष्ट रूप से कहा कि मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज को ओएनजीसी के क्षेत्र से गैस अपने ब्लाक में बह या खिसक कर आयी गैस के दोहन के लिए उसे सरकार को 1.55 अरब डॉलर भुगतान करना चाहिए रिपोर्ट के मुताबिक रिलायंस अनुचित तरीके से फायदे की स्थिति में रही है।

लेकिन पता नहीं मोदी सरकार की कौन सी गोट रिलायंस के पास दबी हुई थी कि उसने रिलायंस द्वारा इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए उसके द्वारा अंतराष्ट्रीय पंचाट में जाने के निर्णय को स्वीकार कर लिया।

सिंगापुर के लॉरेंस बू की अध्यक्षता वाले पंचाट पैनल ने 2-1 के बहुमत से RIL के पक्ष में फैसला दिया था। उसमें कहा गया था कि PSC में कहीं भी यह नहीं लिखा कि प्रवाहित (migrated) गैस को निकालकर बेचना गलत है।

इस फैसले के खिलाफ भारत सरकार की तरफ से दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। जब मुकेश अंबानी और मोदी सरकार के संबंध मधुर बने हुए थे तब मई 2023 में सिंगल जज बेंच ने रिलायंस के पक्ष में फैसला सुनाया था लेकिन बाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज की चूड़ी कसने की कोशिश में फ़रवरी 2025 में हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।

हाईकोर्ट के जस्टिस रेखा पल्लि और सौरभ बनर्जी की बेंच ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि 2018 का पंचाट का फैसला भारत की “सार्वजनिक नीति” के खिलाफ था, इसलिए इसे खारिज किया जाता है बाद भारत सरकार की तरफ से रिलायंस इंस्ट्रीज को फ्रेश डिमांड नोटिस भेजा गया।

इसी मामले को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई जिसमें अदालत से सीबीआई जांच का अनुरोध किया गया न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति रंजीत सिंह भोंसले की पीठ के समक्ष जितेंद्र मारू की याचिका पर सुनवाई नवम्बर 2025 में हुई इस याचिका में दावा किया गया कि कथित षड्यंत्र मुंबई में रचा गया था, जिससे सीबीआई को जांच का अधिकार प्राप्त हो गया इसी आधार पर अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को नोटिस जारी किया है।

यह है पूरा मामला ……जिससे स्पष्ट है कि इतना स्पष्ट मामला होने के बाद भी ओर इतने साल गुजर जाने पर भी मोदी सरकार का रवैया मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज की गैस चोरी को लेकर ढीला ढाला ही है।

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1 Comment

1 Comment

  1. Deepu

    November 13, 2025 at 3:22 pm

    Your facts are very interesting, can you plz explain this also:

    1. As mentioed by you that this all happen in 2009-2013,have you mentioned anywhere whose govt was there at that time.

    2. You said in case filed on May 2014 ONGC said this theft was with the assistance by govt. and Petroleum Ministry, so which govt and Minister was assisting.

    3.You said Shah committee constructed by Modi Govt recommended 1.55 billion dollars from Relaince to ONGC, then how was it favouring Reliance by forming this Shah Committee?

    4.Going to international tribunal is a company’s right but Modi govt did not accept that order and went to High Court so how was it favouring Reliance?

    5. Even when govt lost the case in single bench order it appealed it in double bench and got the order in it’s favour so how was it helping Relaince?

    Plz clarify.

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