मुस्लिम महिला रिपोर्टर के सवाल पूछते ही बुरी तरह भड़के संघ नेता इंद्रेश कुमार, देखें वीडियो

मौका था ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू अरबी फारसी विश्वविद्यालय के चतुर्थ दीक्षांत समारोह का… मुख्य अतिथि के रूप में उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा मौजूद रहे… अध्यक्षता राज्यपाल आनंदीबेन पटेल कर रहीं थीं…

इस मौके पर राज्यपाल ने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू अरबी फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदलने की पेशकश रखी… दीक्षांत समारोह में शामिल होने आए आरएसएस के नेता डॉक्टर इंद्रेश कुमार से इसी नाम बदलने को लेकर एपीएन न्यूज चैनल की महिला रिपोर्टर नगमा शेख ने एक सवाल पूछ दिया….

सवाल पूछने से पहले संघ नेता चैनल की तारीफ कर रहे थे… सवाल पूछते ही उनके सुर बदल गए…. महिला रिपोर्टर का सवाल था कि क्या नाम बदलने की राजनीति से प्रदेश का डेवलपमेंट होगा… यह सवाल सुनते ही भड़क उठे इंद्रेश कुमार….

ये संघ नेता पहले तो चैनल की तारीफ कर रहे थे… लेकिन थोड़ा टेढ़ा सवाल सुनने के बाद चैनल पर संप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाने लगे और मुस्लिम महिला रिपोर्टर की सोच को तुच्छ करार देने लगे….

सवाल उठता है कि क्या अब मीडिया को सवाल करने का भी हक़ नहीं रह गया है?

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बदायूं से हिन्दी खबर चैनल के रिपोर्टर राजकमल गुप्ता उपरोक्त वीडियो को देखने के बाद लिखते हैं-

ग्रेजुएशन के बाद अपने करिअर को लेकर असमंजस में था। पर जुनून था कि ऐसा करूँगा जिससे पैसे के साथ साथ पहचान मिले, सम्मान मिले। तभी पत्रकारिता करने का मन में ख्याल आया और सोचा पत्रकार बन कर देश की सेवा करने का मौका मिलेगा। फिर क्या मास मीडिया में दाखिला लिया और लगे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के गुर सीखने।

सच मानिए जब कोर्स पूरा किया तो इतना जुनून इतना बढ़ गया था कि अब न्यूज़ चैनल की आईडी आ जाये और न्यूज़ चैनल की स्क्रीन पर दिखने लगे और ऐसी ख़बर बनाये जिसका जबरदस्त असर हो। न्यूज़ चैनल में बतौर स्ट्रिंगर से रिपोर्टर बन गए और रोज नये नये आइडियाज़ से स्टोरी भेजने लगे। गिरते पड़ते हमने केवल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 14 साल बिता दिए। वो क्या युग टीवी पत्रकारिता का था। उस वक्त जो खबरें नेशनल या रीजनल चैनल पर दिखती थीं, असर होता था। किसी नेता की बाइट ले ली तो समझ लीजिए फोन कर कर दुखी करता था कि भाई खबर कब चलेगी।

किसी अधिकारी से उस विभाग के गड़बड़झाले पर बाइट कर ली तो समझ लीजिये पूरे विभाग पर नकेल कस देता था। पर अब क्या हो गया टीवी पत्रकारों के सवालों को। क्या सवाल पूछना भी अब गुनाह हो गया है?

हिन्दी ख़बर चैनल में लोक सभा चुनाव में मेरे साथ रिपोर्टिंग कर चुकी नगमा शेख़ इस समय एपीएन चैनल में रिपोर्टर हैं। बहुत ही सहज सरल व्यकितत्व वाली महिला रिपोर्टर ने जब ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू अरबी फारसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान जब वहां मौजूद आरएसएस के जाने माने चेहरे डॉ इन्द्रेश कुमार से जब उनकी तारीफ की तो पहले तो वो बहुत खुश हुए और चैनल को बधाई दी, चैनल को साम्प्रदायिकता और कुरीति को दूर करने वाला चैनल बताया… पर जब उनसे विश्वविधालय के नाम बदलने का सवाल पूछा तो वे भड़क गए और महिला रिपोर्टर को शरारती तक कह डाला…

लेकिन फिर भी महिला रिपोर्टर का धैर्य काबिले तारीफ है… उन्होंने सयंम नहीं खोया और सवाल का उत्तर जानने की कोशिश करती रहीं… डॉ इन्द्रेश कुमार ने कुछ ही पल में चैनल को ही साम्प्रदायिकता फैलाने वाली मानसिकता वाला करार दिया और उठ कर चल दिये। क्या यह टीवी जर्नलिज़्म का अंत तो नहीं… अब रिपोर्टर को वही प्रश्न करने होंगे जो नेता चाहेगा? नहीं तो वो सरेआम बेइज्जती करेगा… रीजनल चैनलों पर वैसे भी आर्थिक संकट चल रहा है…. तो क्या मीडिया अब पूरी तरह से सत्ता की गुलामी करे? चौथे स्तंभ को मत हिलाइये वरना लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। पत्रकारों को उनके मौलिक अधिकार और कर्तव्य निभाने दीजिये।

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