राजेन्द्र द्विवेदी-
सहारा एक ग्रुप ही नहीं, एक ब्रांड था। सहारा ग्रुप से जुड़ने के लिए देश के सभी क्षेत्रों के सफलतम व्यक्ति अपने को गौरवान्वित महसूस करते थे। सहारा हर वर्ष एक डायरी प्रकाशित करता था, जिसमें ग्रुप से जुड़े सभी प्रमुख व्यक्तियों का नाम मिल जाएगा। ऐसा कोई क्षेत्र बचा नहीं था, जिस क्षेत्र के सफलतम व्यक्ति शामिल न हों।
1 फरवरी 1978 को सहारा इंडिया परिवार की स्थापना से लेकर अक्टूबर 2025 तक सहारा का सफर बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा, लेकिन अंत इतनी जल्दी होगा, ऐसा सोचा नहीं जा सकता था। क्योंकि यह ग्रुप जिस तेजी के साथ आगे बढ़ा, उसी तेजी के साथ धाराशायी भी हुआ। 1990 से लेकर 2005 तक सहारा ने पैरा बैंकिंग के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में इतनी तेजी से पैर पसारा कि मैन पावर के मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा ग्रुप बन गया। दावा यह किया जा रहा था कि देश का हर पांचवां व्यक्ति किसी न किसी तरह से सहारा से जुड़ा हुआ है। निश्चित रूप से कंपनी के मुखिया सुब्रत राय, जिन्हें सहाराश्री के नाम से जाना जाता था, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अगर उनके द्वारा लॉन्च किया गया एक भी प्रोडक्ट — चाहे वह हाउसिंग, सहारा क्यू, मेडिकल, शिक्षा, मीडिया — किसी में भी सफल होता, तो आज जो स्थिति है वैसी नहीं होती।
इसका उदाहरण यह है कि आज बाबा रामदेव जिस पतंजलि प्रोडक्ट के आधार पर बहुत बड़े उद्योगपति बन गए हैं, करोड़ों का कारोबार हो रहा है, उसकी असली सोच और मूल जड़ में सहारा क्यू रहा, जो सफल नहीं हुआ, लेकिन उस सोच और विजन पर रामदेव बाबा से रामदेव उद्योगपति बन गए।
देश के 265 से अधिक स्थानों पर एक साथ देश नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा रियल एस्टेट लॉन्च किया गया। यह भी ग्रुप के जीनियस का दूसरा उदाहरण है। सहारा के इस बुरे हाल में भी इतनी अधिक प्रॉपर्टी है कि यदि सरकार ईमानदारी से मार्केट रेट पर सहारा की संपत्ति को नीलाम करे, तो कर्मचारी से लेकर करोड़ों गरीबों के एक-एक पैसे का भुगतान हो जाएगा। लेकिन सरकार गरीबों के भुगतान के प्रति गंभीर नहीं है। जिन 88 प्रॉपर्टी का सौदा अडानी ग्रुप से होने के लिए उच्चतम न्यायालय से अनुमति मांगी गई है, उनमें से एक बड़ी प्रॉपर्टी बेच दी जाए तो सभी कर्मचारियों का एक-एक पैसे का भुगतान हो जाएगा। सहारा से कोई ऐसा राजनीतिक दल बचा नहीं है जिसने लाभ न उठाया हो। लेकिन स्थितियाँ बदलीं और आज जो मैंने देखा, वह कल्पना से परे है।
सहारा शहर के दो प्रमुख गेट हैं — एक मुख्य द्वार, जिस पर “सहारा शहर” लिखा है, दूसरा प्रमुख गेट, जिससे गाड़ियाँ सहारा शहर के अंदर प्रवेश करती थीं। यह शहर देश ही नहीं, दुनिया में चर्चा का विषय रहा है।
दो दशक पूर्व, मार्च 2004 में ग्रुप के मुखिया सुब्रत राय सहारा के बेटे की शादी में जहाँ तक मुझे जानकारी है, गांधी परिवार और मायावती को छोड़कर देश के सभी दलों के नेता — जिनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहा राव से लेकर फिल्म, खेल, उद्योग, मीडिया जगत व अन्य विभिन्न क्षेत्रों के सफलतम व्यक्ति शामिल थे — ऐसा कोई नहीं था जो उपस्थित न हुआ हो।
सहारा शहर के जिन गेटों से ये सेलिब्रिटीज़ शामिल हुए थे, उन्हीं गेटों पर नगर निगम ने अपने कब्ज़े का बोर्ड लगा दिया और सहारा शहर को सील कर दिया। दुर्भाग्य देखिए कि जिस ग्रुप का इतना बड़ा साम्राज्य और संबंध रहा हो, उसके न रहने के बाद उनकी धर्मपत्नी को मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सहारा शहर के पिछले गेट से जाना पड़ा। यह समय का चक्र है।
हमने “रहस्यमयी और जीनियस ग्रुप” क्यों लिखा है, इसका कारण यह है कि सहारा ग्रुप स्थापना से लेकर आज तक तमाम गतिविधियों में रहस्यमयी बना रहा। दूसरा, “जीनियस ग्रुप” और “जीनियस मैन” मैं सुब्रत राय सहारा को इसलिए कहता हूँ क्योंकि यह मेरे शब्द नहीं, पूर्व निर्वाचन आयुक्त टी. एन. शेषन के शब्द हैं।
टी. एन. शेषन ने सुब्रत राय सहारा और सहारा ग्रुप को लेकर टिप्पणी की थी कि “यह एक मल्टी-डायमेंशनल कार्य करने वाला जीनियस ग्रुप है। सुब्रत राय एक जीनियस मैन हैं। राय इतने जीनियस हैं कि वे दुनिया के किसी भी सफलतम व्यक्ति को अपने साथ ग्रुप से जोड़ सकते हैं, लेकिन सम्मान देकर उसे साथ में रख नहीं सकते। यह उनकी कमजोरी है।”
इसी टिप्पणी के आधार पर “जीनियस” लिखा गया है। टी. एन. शेषन की यह टिप्पणी काफी हद तक सही साबित भी हुई। क्योंकि सहारा से जुड़ने में सभी क्षेत्रों के सफलतम व्यक्ति शामिल हुए, लेकिन वे काफी दिनों तक साथ में रह नहीं पाए। 2004 की शादी में शामिल हुए कुछ फोटोग्राफ्स से अंदाज़ा लग जाएगा कि सुब्रत राय सहारा एक समय में कितने सफल और ताकतवर व्यक्ति थे। मेरी पुस्तक भी “एक जीनियस ग्रुप का दुखद अंत” शीघ्र आ रही है।
लेखक लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं।


