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सहारा की बागडोर आंदोलनकारियों के हाथ में दे दी जाए तो ये मरती हुई संस्था बच जाएगी!

चरण सिंह राजपूत-

सहारा में लंबा समय बिताने की वजह से आज जब संस्था डूब रही है तो मुझे भी पीड़ा हो रही है। निश्चित रूप से उच्च प्रबंधन ने सहारा अधिकारियों पर जमकर पैसा खर्च किया है और कर्मचारी बेचारा शोषित ही रहा है। यदि आज भी उच्च प्रबंधन अपनी गलती मानकर उसमें सुधार कर ले तो आज भी संस्था खड़ी हो सकती है और इनका भी बचाव हो जाएगा।

मालिकान यह समझ लें कि यदि आंदोलनकारियों को कुछ बकाया और उनका वेतन देकर संस्था की बागडोर आंदोलनकारियों के हाथ में दे दी जाए तो संस्था भी बच जाएगी और मालिकान खुद भी। सबसे पहले मीडिया पर ध्यान दिया जाए। टर्मिनेट किए गए कर्मचारियों से गलती की माफी मांगकर उनको उनका पैसा दिया जाए, नोएडा के परिसर में आंदोलन कर रहे कर्मचारियों से जेबी राय, स्वप्ना राय, सीमांतो राय या सीमांतो राय में से कोई एक या सभी आकर मिलें और इन आंदोलनकारियों का कुछ भुगतान कराएं। मेरा मानना है कि सहारा कर्मचारी आज भी संस्था के लिए जान लगा देंगे।

उच्च प्रबंधन को अपनी नीयत साफ करनी पड़ेगी। संपत्ति बेचकर कर्मचारियों का भुगतान करना पड़ेगा। मैंने खुद तिहाड़ जेल में सुब्रत राय से मिलते हुए कहा था कि हम लोग आपसे पैसे मांगने नहीं आएंगे। मीडिया हम चला लेंगे पर सुब्रत राय ने मुस्कराकर मामले की गंभीरता को कम कर दिया था। मैंने तो सेबी के खिलाफ भी मोर्चा खोलने की बात की थी।

पर सुब्रत राय तो अधिकारियों, ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और अय्याशी पर पैसा लुटाता था। संस्था को दलाल, चोर उचक्के लूटते रहे पर जिन कर्मचारियों ने संस्था को फर्श से अर्श पर पहुंचाया उनको बेवकूफ ही बनाया जाता रहा। यदि उस समय हम पर विश्वास कर पैसा दिया जाता तो आज स्थिति दूसरी ही होता। संस्था और अपने को बचाना का उच्च प्रबंधन के पास एक ही मौका है कि कुछ भुगतान कर आंदोलनकारियों को संस्था सौंप दें और शुरुआत मीडिया से ही की जाए।

सबसे पहले सुमित राय को मीडिया हेड पद से हटाया जाए। इस व्यक्ति की वजह से आज मीडिया बंदी की कगार पर है। आंदोलनकारियों से मिलकर पारदर्शिता के साथ संपत्ति को बेचा जाए और कर्मचारियों और निवेशकों का भुगतान कराया जाए। सरकार से भी 25000 करोड़ रुपए मांगा जाएगा।

उच्च प्रबंधन को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि आंदोलनकारियों से मिले बिना न संस्था बचेगी और न ही वे खुद। जेल में सड़ने से बचना है तो आंदोलनकारियों से संपर्क साधो। अपनी गलती मानकर समझौता करो और संस्था को आगे बढ़ाओ। इधर उधर लुटाने के बजाय अपने कर्मचारियों और निवेशकों को साधो। मान सम्मान भी बच जाएगा और वे खुद भी।

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