
संजय कुमार सिंह
नवोदय टाइम्स में आज एक खबर है, एलजी ने पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी लिखी बांग्लादेशियों पर सख्ती करें। वैसे तो यह एक सामान्य प्रशासनिक पत्र हो सकता था लेकिन चुनाव के समय हिन्दू-मुसलमान के साथ बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला उठाये जाने के मद्देनजर यह सामान्य नहीं है। यह चिट्ठी हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग है और भले बाकी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं छपी है पर अखबारों में तो छपी ही होगी और इसका जो प्रभाव पड़ना है वह पड़ेगा ही। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जो हेडलाइन मैनजेमेंट पहले पन्ने पर दिखता था वह अब कम है। इसका कारण बाद में मुद्दा बनेगा अभी तो मुद्दा यह है कि कोशिशें जारी हैं और उसमें राज्यपाल भी सक्रिय हैं। दूसरी ओर राहुल गांधी ने कहा कि हम भाजपा से नहीं राज सत्ता से लड़ रहे हैं तो एफआईआर हो गई। झारखंड के मामले में राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने की खबर आज ही है लेकिन अभी ऐसे कई मामले हैं। लगता नहीं है कि माहौल राहुल गांधी को विपक्ष के नेता के रूप में खुलकर काम करने की आजादी (या देने की कोशिश) का है। कायदे से देश में ऐसी स्थितियां रहनी चाहिये कि कोई भी चुनाव लड़ सके पर चुनाव लड़ना न सिर्फ मुश्किल हो गया है, डरावना भी है।
प्रधानमंत्री के बेलगाम भाषणों पर कार्रवाई आप जानते हैं। एक विशेष उदाहरण निर्वाचित मुख्यमंत्री और न सिर्फ उनसे बेहतर शिक्षित बल्कि व्यवहार में भी उनसे बेहतर दिखने वाले अरविन्द केजरीवाल का है। नरेन्द्र मोदी ने उन्हें ‘अनुभवी चोर’ कहने की हिमाकत की। सबूत नहीं है, जमानत मिल गई और फिर गिरफ्तार करने की तैयारिया हैं। पद पर बैठे लोगों को तो छोड़िये किसी आम आदमी ने भी एतराज नहीं किया। कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन राहुल गांधी ने पूछा भर था कि चोरों के नाम …. क्यों होते हैं तो नाम विशेष के एक व्यक्ति ने मुकदमा कर दिया। अदालतों को कार्रवाई के लिए समय मिल गया। उनका सदस्यता चली गई और संघ परिवार की व्यवस्था ने यह स्थापित कर दिया कि चुनाव लड़ना मुश्किल है। इसे हमारे (या हम जैसों के लिए) छोड़ दिया जाना चाहिये। व्यवस्था ऐसी नहीं है या बनाई नहीं जा सकी है कि अरविन्द केजरीवाल को अनुभवी चोर कहने के लिए कोई आईआईटी वाला या राजस्व सेवा का कोई पूर्व-मौजूदा अधिकारी मुकदमा कर सके जैसे राहुल गांधी के खिलाफ होता है। फिर भी लोगों को सरकार, उसका लोकतंत्र और संविधान से छेड़छाड़ न करने का उसका भरोसा पसंद है। ईवीएम से शिकायत नहीं है।
आज तो यही कि कि आरजी कर अस्पताल मामले में भाजपा ने कितना हंगामा मचाया था कितने आरोप लगाये थे पर अब साफ हो गया है कि अपराधी एक ही था या जांच एजेंसियां इतनी निकम्मी हैं जो साबित नहीं कर पाईं लेकिन विपक्षी राजनेताओं के पीछे छोड़ दी जाती हैं। ऐसी सरकार की ऐसी कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया था। वह भी तब जब सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी ही उसे देख रही थी। ये भाजपा की राजनीति और उसके सत्ता में होने की खासियतें हैं और ऐसे में मुझे पूरी तरह लग रहा है कि दिल्ली चुनाव की घोषणा से पहले कुमार विश्वास ने बेटे का नाम तैमूर रखने के लिए (कई साल बाद) जो सब कहा उसका राजनीतिक मकसद था। भले वह कुमार विश्वास की निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षा या सक्रियता के कारण अनायास हो गया हो। कायदे से सरकार और चुनाव आयोग को उसपर कार्रवाई करनी चाहिये थी। नहीं हुई और जब सैफ अली खान पर हमला हो गया तो सन्नाटा छा गया। पर्याप्त समय तक यही स्थिति रहने के बाद खबर भी तब छपी जब इस मामले के कथित अभियुक्त की गिरफ्तारी हो गई और यह प्रचार करना उपयुक्त समझा गया कि हमलावर हिन्दू नाम से रहने वाला बांग्लादेशी मुसलमान है और कुमार विश्वास के कहने से उकसाया हुआ नहीं हो सकता है।
इस मामले में खबर यह (भी) थी कि देश और सरकार की तमाम सुरक्षा व्यवस्था और 56 ईंची ताकतों के बावजूद बांग्लादेशी नागरिक सीमा पार करके मुंबई तक पहुंच जाते हैं और पॉश या सुरक्षित कहे जाने वाले मुंबई के नागरिक पर उनके घर में घुसकर हमला कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के लिए घर में घुसकर मारूंगा कहा था और उनके प्रधानमंत्री रहते स्थिति यह है कि एक बांग्लादेशी नागरिक चोरी के उद्देश्य से 12वीं मंजिल पर एसी डक्ट या बाथरूम के शाफ्ट की असामान्य और मुश्किल सीढ़ियों से चढ़ जाता है और पकड़े जाने पर रसोई के चाकू से हमला करता है। यही हथियार उसके पास होने का पता अभी तक चला है। इस पुलिसिया कहानी पर विश्वास करने से यह तो तय हो जाता है कि हमले का कारण कुमार विश्वास का भड़काना नहीं है और इसका दूसरा मतलब है कि उसका राजनीतिक फायदा भाजपा को नहीं हुआ है। नुकसान हुआ होता तो सत्तारूढ़ भाजपा कहां किसे छोड़ने वाली थी पर वह अलग मुद्दा है।
ऐसे में राज्यपाल की आज की चिट्ठी पूरी तरह राजनीतिक है और जब प्रधानमंत्री ऐसी राजनीति करते रहे हैं तो राज्यपाल क्यों न करें या संभवतः इसीलिये रखे गये होंगे। यह सरकारी वेतन पर प्रचारक रखे जाने या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा प्रचारक का काम करने का मामला है पर यह अभी मुद्दा नहीं है। मेरा मुद्दा यह है कि इस स्थिति में खबर क्या है और यह पत्रकारों-संपादकों को क्यों नहीं समझ में आ रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि बांग्लादेशी घुसपैठ और घुसपैठियों का अपराध न तो नया मामला है और ना छोटा मोटा। (अब) सिर्फ दिल्ली में आप को वोट देने तक सीमित तो नहीं ही है। मुंबई में घटना होने के बाद इसकी चिन्ता दिल्ली में, जहां चुनाव है, के राज्यपाल को ही क्यों होती है। अगर हुई तो यह खबर नहीं है? क्या दिल्ली में बांग्लादेशियों पर सख्ती करना पर्याप्त होगा? उन्हें सीमा पार करने से रोकना और पार करने वालों को वापस भेजने (या कैद करने) के साथ यह भी जरूरी है कि उन्हें सीमाई राज्यों से दूर जाने से रोका जा सके। यह दिलचस्प है कि भाजपा की मानें तो बंगाल सरकार घुसपैठ कराती है (सीमा सुरक्षा बल उसके नियंत्रण में) और दिल्ली की आम आदमी पार्टी उन्हें वोटर बनाती है (बीच के राज्यों में भाजपा की सरकार है। जहां नहीं है वहां केंद्र सरकार का नियंत्रण नहीं है ऐसा तो नहीं ही कहा जा सकता है। क्यों नहीं पश्चिम बंगाल भाजपा अवैध बांग्लादेशियों को वहीं रोकती है और अवैध वोटर आई कार्ड का खुलासा करती है जैसा दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने किया। इससे पता चल जायेगा कि कौन किसके अवैध वोटर आईकार्ड बनवाता है और अनिल मसीह की तरह बच जाता है। यह मीडिया का काम है लेकिन वह सरकारी प्रचार को ही खबर बनाने पर आमादा है और जो खबर है उसे नजरअंदाज करता है। जैसे आज एलजी के पत्र को किया गया है।
बांगलादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भाजपा का गढ़ा हुआ है और यह मीडिया के सहयोग से ही संभव हुआ है। अब तैमूर नाम के बहाने न सही, सैफ पर हमले में बांग्लादेशी का नाम आने के बाद भाजपा सरकार को बचाव में होना चाहिये था कि वह जिसके लिए बंगाल की तृणमूल और दिल्ली की आप सरकार को जिम्मेदार ठहराती थी वह भाजपा शासित महाराष्ट्र में वारदात कर गया। यह कानून व्यवस्था की स्थिति पर सख्त टिप्पणी है लेकिन भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने में लगी है और एलजी का पत्र इसी क्रम में है कि दिल्ली में आप सरकार ने उन्हें बसा रखा है सो सख्ती की जाये। सच्चाई यह है कि दिल्ली पुलिस के सहयोग से या इस मामले से आंख फेरे बिना यह संभव ही नहीं है और अगर अभी तक पुलिस ने सख्ती नहीं की तो क्या ऐसा निर्देश था ताकि चुनाव के समय आरोप लगाये जा सके। ये सब सवाल उठाना अखबारों का काम है लेकिन वे रोज निराश कर रहे हैं। इस लिहाज से मुझे लगता है कि दिल्ली चुनाव से पहले कुमार विश्वास की टिप्पणी, सैफ अली खान पर हमला, हमलावर का बांग्लादेशी मुसलमान होना और उसका प्रचार सब भाजपा के खिलाफ है। बशर्ते मीडिया अपना काम ढंग से करता। मीडिया अपनी तरफ से तो नहीं ही बताता है जहां और जब मामला साफ होता है तब भी रेखांकित नहीं करता है। इसलिए सैफ की खबर अभी और संभवतः मतदान तक नजर रखने लायक है। इसलिये आज भी इसी खबर को देखा जाये। आप तय कीजिये कि ऐसी खबरों से अखबार अपनी जिम्मेदारी कितनी अच्छी तरह निभा रहे हैं। वरना भाजपा और नरेन्द्र मोदी विकास के चाहे जो दावे करें 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर जी रहे हैं यह भी सरकार ही बताती है।
इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, सैफ पर हमले के आरोपी ने बंगाल के निवासी के आधार कार्ड पर सिम लिया था। मुझे लगता है कि यह शीर्षक भी बंगाल को बदनाम करने के लिए है, भले संयोग हो। अगर कोई सीमा पार से आयेगा तो पहली जरूरत फोन क्यों होगी, आधार क्यों नहीं? फोन अगर बंगाल के निवासी के सहयोग से मिल गया तो अभी तक यह नहीं बताया गया है कि उसका अपना आधार बना या नहीं, नहीं तो क्यों और अगर वह आठ महीने से बिना आधार रह ही रहा था, फोन से डिजिटल भुगतान कर ही रहा था तो आधार जरूरी क्यों है। और है या नहीं, पकड़ा क्यों नहीं गया। सीमा पार कर बंगाल पहुंचा, बंगाल में उसका परिचित था इसलिए उसने वहां से सिम लिया। वरना नियम पूरे देश में एक ही है। उसका परिचित मुंबई में होता तो वहीं लेता और कोलकाता वाला अगर बांग्लादेशी है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना केंद्र सरकार का ही काम है। यहां बंगाल के राज्यपाल को भी चिट्ठी लिखना चाहिये। उसके पास नौकरी नहीं थी लेकिन वह डिजिटल भुगतान कर रहा था और नौकरी के लिए जरूरी आधार के बिना रह रहा था। फिर भी जांच की जरूरत महाराष्ट्र या मुंबई के राज्यपाल को नहीं लगी लेकिन दिल्ली के राज्यपाल को लगी। कारण आप जानते हैं, महाराष्ट्र में चुनाव हो चुके हैं। वैसे भी, सुबह जगाकर शपथ दिलाने के लिए मजबूर किये जाने बाद नौकरी भी छोड़ चुके हैं। अब दूसरे हैं। इसमें खबर यह भी है कि आठ महीने से मुंबई में रह रहा था, दूसरे नाम का फोन भी चला रहा था, किसी से कोई संबंध-परिचय नहीं था लेकिन पकड़ा नहीं जा सका।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, पुलिस ने कहा, सैफ के घर में घुसने वाले की उंगलियों के निशान 19 जगहों पर मिले। मुझे नहीं लगता कि यह खबर है या किसी आम पाठक की इसमें कोई दिलचस्पी होगी। इसमें गिरफ्तारी का घटनाक्रम या क्रोनोलॉजी भी है। इसके आधार पर पुलिस ने ‘फकीर’ की पहचान सीसीटीवी से की। उसका फोन नंबर उसके पूर्व नियोक्ता से मिला और उसे निगरानी पर रख दिया गया। यहां दो बाते हैं – फकीर और उसका पूर्व नियोक्ता। पूर्व नियोक्ता ने बिना आधार एक गैर मुंबई या महाराष्ट्र निवासी को काम पर रखा था तो वह खुद आगे आया होगा या उसे पुलिस ने किसी और तरह से पकड़ा। अपराध के बाद जब उसे पता था कि फोन किसी और के नाम का है और सब जानते हैं कि फोन से ही अपराधी पकड़े जाते हैं तो वह अपने उसी फोन का उपयोग करता या उसे फेंक कर किसी और नाम से जीने लगता। आधार, पैन, वोटर आईकार्ड तो उसके पास वैसे नहीं थे। पाठक यह सब जानकर क्या करेगा? पुलिस का काम है कि वह बताये। रिपोर्टर संपादक को चाहिये कि वह वही बताये जो पाठकों के काम का है। तथ्यों में यह भी कि उंगलियों के निशान अभी मिलाये जाने हैं। कल उसका नाम मोहम्मद शरीफुल इस्लाम शहजाद छपा था आज शरीफुल इस्लाम फकीर छपा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सिंगल कॉलम में है। यहां शीर्षक है, सैफ की मजबूत पकड़ से छूटने के लिए पीठ में चाकू मारा। द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज की खबर है, सैफ को अस्पताल से छुट्टी मिलने में देर, ज्यादा समय अस्पताल में रहेंगे। द टेलीग्राफ में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, पुलिस नहीं मानती कि वीडियो में देखे गये और गिरफ्तार हमलावरों का चेहरा नहीं मिलता है। आप जानते हैं कि पुलिस और इस कारण सरकार और इस कारण सत्तारूढ़ भाजपा पर सैफ के हमलावर को पकड़ने का दबाव था। पकड़ना महाराष्ट्र पुलिस को था इसलिए जो भी कहानी आनी थी उसे भाजपा के खिलाफ नहीं होना था और होती भी तो छपना वही था जिससे भाजपा को लाभ होता। आप देख लीजिये, पुराने अखबार पलट जाइये। वही हो रहा है और यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि पुलिस से उससे मिलते-जुलते व्यक्ति को गिरफ्तार कर कहानी तो नहीं गढ़ ली। इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस में 19 जनवरी को छपी खबर उललेखनीय है। खबर के अनुसार एक संदिग्ध जो मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से कोलकाता के शालीमार रेलवे स्टेशन तक चलने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में सवार था के बारे में दोपहर 12.24 बजे दुर्ग रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ पोस्ट के इंस्पेक्टर संजीव सिन्हा को खबर मिली। यह सूचना जुहू थाने के एक सहायक पुलिस इंस्पेक्टर से मिली थी। उस समय ट्रेन गोंदिया और राजनांदगांव स्टेशनों के बीच थी।
आरपीएफ की दुर्ग इकाई ने राजनांदगांव जिले में आरपीएफ पोस्ट को सूचना दी, लेकिन संदिग्ध का पता नहीं चल सका। सिन्हा ने कहा, “दुर्ग स्टेशन पर दो टीमें बनाई गईं और जब ट्रेन आई, तो संदिग्ध व्यक्ति जनरल डिब्बे में बैठा मिला। उसकी तस्वीर मुंबई पुलिस को भेजी गई, जिसने संदिग्ध के रूप में उसकी पहचान की पुष्टि की।” उसे आरपीएफ पोस्ट लाया गया और मुंबई पुलिस अधिकारियों को वीडियो कॉल किया गया। सिन्हा ने कहा, “उसे दुर्ग में आरपीएफ पोस्ट पर उचित सुरक्षा में रखा गया है।” मुंबई पुलिस की एक टीम शनिवार रात को छत्तीसगढ़ पहुंचने वाली थी। शुक्रवार को पुलिस ने बांद्रा में एक और व्यक्ति को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए लाया। हालांकि, पांच घंटे बाद उसे छोड़ दिया गया क्योंकि पुलिस ने पाया कि उस व्यक्ति का मामले से कोई संबंध नहीं था। पुलिस सूत्रों ने बताया कि उसे इसलिए उठाया गया क्योंकि वह आरोपी से मिलता-जुलता था, जो सैफ की बिल्डिंग में लगे सीसीटीवी में कैद हुआ था और उसका छोटे-मोटे अपराधों का इतिहास रहा है। अधिकारियों ने बताया कि शनिवार के मामले में भी दुर्ग से उठाए गए व्यक्ति का आपराधिक रिकॉर्ड है। एक अधिकारी ने कहा, “इसके अलावा, उसके हुलिए सतगुरु शरवन के सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे व्यक्ति से मिलते-जुलते हैं, जहां सैफ रहता है।”
जब पुलिस की एक टीम उसके कोलाबा स्थित घर गई, तो उन्होंने पाया कि वह वहां नहीं था। अधिकारी ने कहा, “हमारे पास उसका फोन नंबर था, इसलिए हमने उसके कॉल डेटा रिकॉर्ड का पता लगाया और पाया कि वह छत्तीसगढ़ में था।” अब तक यह पता चला है कि बांद्रा के लकी जंक्शन इलाके में देखे जाने के बाद, आरोपी संभवतः एक लोकल ट्रेन में सवार हुआ, दादर गया, दादर (पश्चिम) रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म 1 के पास एक दुकान से मोबाइल फोन कवर खरीदा और कबूतरखाना की ओर चला गया। सूत्रों ने बताया कि सुबह 9.04 बजे मोबाइल शॉप पर लगे सीसीटीवी कैमरे में उसकी हरकतें रिकॉर्ड हो गईं। पुलिस आरोपी को फोन कवर बेचने वाले व्यक्ति का बयान दर्ज कर सकती है। इसके बाद से कहानी बदल गई है। आपको यकीन है तो कीजिये लेकिन बांग्लादेशी घुसपैठिये का भी मामला हो तो कार्रवाई दिल्ली में ही नहीं, मुंबई में ही जरूरी है और सिर्फ चुनाव लड़ने का काम करने वाली सरकार ऐसे काम नहीं करेगी कि आपका भला हो। उसकी प्राथमिकता चुनाव जीतना है। अमर उजाला में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स की एक खबर की चर्चा कर चुका हूं। दूसरी खबर का शीर्षक है, सैफ पर हमला करने वाला बांग्लादेश भागने की फिराक में था। अगर वह भाग जाता, पुलिस थोड़ी सुस्त होती या वह थोड़ा और तेज होता तो कहानी दूसरी होती। लेकिन भागने के फेर में था और भाग सकता था – खबर है। और इस बात की संभावना बताती है कि बांग्लादेश से कोई आये और वारदात करके चला जाये। पुलिस यहां लाठी पटकती रहेगी। जो भी हो, यह व्यवस्था की पोल खोलता है। 56 ईंची वाले मोदी राज की व्यवस्था। इसमें बताया गया है कि उसने फोन करके अपने भाई से दस्तावेज मंगाये थे। इससे पता चलता है कि अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेश फोन करते हैं और फोन की निगरानी करके भी अवैध बांग्लादेशियों का पता लगाया जा सकता है पर वह सब सरकार या मीडिया के निशाने पर है ही नहीं।


