यशवंत सिंह-
कभी-कभी जीवन हमें ऐसे दृश्य दिखाता है, जो मनोरंजन की दुनिया की चमक-दमक के पीछे छिपे सबसे बड़े सच से परिचित करा देते हैं। एक तरफ करोड़ों दिलों की धड़कन सलमान ख़ान हैं, दूसरी तरफ अपनी आवाज़ से कई पीढ़ियों की भावनाओं को सुर देने वाली अलका याज्ञनिक। एक के पास अपार शोहरत है, दूसरे के पास अनगिनत सम्मान। लेकिन दोनों एक ऐसी सच्चाई के सामने खड़े हैं, जिसके आगे न प्रसिद्धि काम आती है, न पैसा, न शक्ति।
दुख किसी को नहीं छोड़ता।
23 जून का वह दृश्य बहुतों की आँखें नम कर गया। जब अलका याज्ञनिक पद्म सम्मान ग्रहण करने के लिए व्हीलचेयर पर मंच तक पहुँचीं, पूरा सभागार तालियों से गूंज रहा था। विडंबना देखिए—तालियाँ उन्हीं के लिए थीं, लेकिन वह उन्हें सुन नहीं पा रही थीं।
जिस आवाज़ ने दशकों तक करोड़ों लोगों को रुलाया, हँसाया और प्रेम का अहसास कराया, वही स्वर आज दो वर्षों से एक दुर्लभ बीमारी के कारण गहरे संघर्ष से गुजर रहा है।
अलका याज्ञनिक सेंसरीन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस से पीड़ित हैं। यह कान की अंदरूनी नस से जुड़ी गंभीर बीमारी है, जिसमें सुनने की क्षमता अचानक या धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। कई मामलों में समय पर उपचार मिलने पर सुधार संभव होता है, लेकिन यदि शुरुआती 24 घंटे निकल जाएँ तो सुनने की शक्ति वापस आने की संभावना काफी कम हो जाती है।
अगर किसी व्यक्ति को अचानक सुनाई देना बंद हो जाए, या कान में लगातार घंटी (टिनिटस) जैसी आवाज़ आने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। यह उन बीमारियों में से है जहाँ समय ही सबसे बड़ी दवा बन सकता है।
उधर सलमान ख़ान वर्षों से तीन बेहद गंभीर और दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझ रहे हैं—ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया, ब्रेन एन्यूरिज्म और आर्टेरियोवेनस मैलफॉर्मेशन (AVM)।
ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया को चिकित्सा विज्ञान सबसे असहनीय दर्द देने वाली बीमारियों में गिनता है। इसमें चेहरे पर बिजली के झटके जैसा दर्द उठता है। बोलना, खाना, दाँत साफ करना जैसी साधारण क्रियाएँ भी यातना बन जाती हैं।
ब्रेन एन्यूरिज्म में मस्तिष्क की रक्तवाहिका कमजोर होकर फूल जाती है और उसके फटने पर जानलेवा रक्तस्राव का खतरा रहता है।
एवीएम (AVM) दिमाग की रक्तवाहिकाओं की जन्मजात विकृति है, जो सिरदर्द, दौरे और ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर स्थितियाँ पैदा कर सकती है।
इन सबके बावजूद सलमान लगातार काम कर रहे हैं। अलका मुस्कुराकर सम्मान स्वीकार कर रही हैं।
यहीं से जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है— यदि इतने सफल, इतने प्रसिद्ध और इतने संपन्न लोग भी दुख से मुक्त नहीं हैं, तो फिर मनुष्य आखिर किस चीज़ के पीछे भाग रहा है?
यही प्रश्न ढाई हजार वर्ष पहले राजकुमार सिद्धार्थ के मन में भी उठा था। उन्होंने देखा—रोग है, वृद्धावस्था है, मृत्यु है। तब उन्होंने समझा कि संसार का प्रत्येक सुख अस्थायी है। उसी खोज ने उन्हें गौतम बुद्ध बना दिया।
बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश में कहा कि जीवन का पहला सत्य है—दुःख।
इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन केवल पीड़ा है, बल्कि यह कि जो कुछ भी बदलने वाला है, उससे चिपकाव अंततः दुख देता है। शरीर बदलेगा, स्वास्थ्य बदलेगा, रिश्ते बदलेंगे, प्रसिद्धि बदलेगी, आवाज़ बदल सकती है, चेहरा बदल सकता है।
- दूसरा सत्य—दुःख का कारण तृष्णा और आसक्ति है।
- तीसरा सत्य—दुःख का अंत संभव है।
- और चौथा सत्य—उस अंत का मार्ग है।
इसी मार्ग का एक अत्यंत व्यावहारिक अभ्यास है विपश्यना। विपश्यना का अर्थ है—वस्तुओं को जैसा वे वास्तव में हैं, वैसा देखना।
जब साधक शांत बैठकर बिना प्रतिक्रिया दिए अपनी साँसों और शरीर में उठती संवेदनाओं का साक्षी बनता है, तब धीरे-धीरे उसे अनुभव होने लगता है कि हर अनुभूति आती है और चली जाती है। दर्द भी स्थायी नहीं, सुख भी स्थायी नहीं। शरीर बदल रहा है, मन बदल रहा है, भावनाएँ बदल रही हैं।
यहीं से स्वीकार का जन्म होता है। और स्वीकार से संघर्ष कम होता है। संघर्ष कम होता है तो मानसिक पीड़ा भी कम होने लगती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि विपश्यना कैंसर, बहरेपन या न्यूरोलॉजिकल रोगों को समाप्त कर देती है। चिकित्सा का स्थान चिकित्सा ही ले सकती है। लेकिन मन को दुख के साथ जीने की क्षमता देना, भय और घबराहट को कम करना, वर्तमान क्षण में टिकना—यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
शायद इसलिए बुद्ध ने कहा था कि बाहरी परिस्थितियों पर हमारा अधिकार सीमित है, लेकिन उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया पर हमारा अधिकार हो सकता है।
आज अलका याज्ञनिक और सलमान ख़ान की खबरें केवल फिल्मी दुनिया की खबरें नहीं हैं। वे जीवन का आईना हैं।
वे याद दिलाती हैं कि धन, यश, पुरस्कार और लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे मनुष्य को रोग, पीड़ा और मृत्यु से मुक्त नहीं कर सकते।
इसलिए शायद जीवन का सबसे बड़ा निवेश बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि मन की स्थिरता है।
और शायद सबसे बड़ी उपलब्धि प्रसिद्ध होना नहीं, बल्कि दुख के बीच भी भीतर से शांत रहना है।
कुछ देर रुककर सोचिए— हम जिस बात के लिए आज इतना परेशान हैं, क्या वह भी कुछ वर्षों बाद उतनी ही बड़ी लगेगी? या फिर जीवन हमें भी किसी दिन यही सिखाएगा कि दुख से भागना नहीं, उसे समझना ही मुक्ति की शुरुआत है।



