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सुख-दुख

4PM वाले संजय शर्मा मरते मरते बचे!

संजय शर्मा-

मैं इस प्रयोग के बारे में शायद अभी बात नहीं करता, अगर कल रात मेरी ज़िंदगी में वो वाकया ना घटा होता.

मैं काफ़ी समय से एक प्रयोग कर रहा हूँ. हर रात सोने से पहले खुद से कहता हूँ कि आज की रात मेरी ज़िंदगी की आखिरी रात है, इसीलिए मैं चैन से, सुकून से सोऊँगा. और हर सुबह जागते ही खुद से कहता हूँ कि ये दिन मेरी ज़िंदगी का आखिरी दिन है, इसीलिए मैं इसे पूरी तरह खुशी में बिताऊँगा..

इस प्रयोग के सकारात्मक परिणाम मुझे लगातार मिल रहे थे. मैं चौबीस घंटे खुश रहने की कोशिश में सफल भी हो रहा था. भले ही भीतर कितने ही भूचाल क्यों न चल रहे हों.

लेकिन कल रात, जब मौत ने सिरहाने पर दस्तक दी, तो सुबह उठते ही एक सवाल ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया: अगर मैं आज सुबह नहीं उठता, तो कौन मेरे बारे में क्या कहता!

बहुत सारे चेहरे सामने आते रहे, वो जो मुझे बहुत पसंद करते हैं, और वो भी जो मुझे नापसंद करते हैं. सोचता रहा कि आज मेरे न होने पर मेरे करीबी ये दिन कैसे बिताते! और फिर कल, और एक और कल… मैं उनके ख़यालों में कितना रहता!

यक़ीनन, ये प्रयोग मुझे जीवन के कई गहरे अर्थ समझा रहा है. मैं खुद को लगातार समझा पा रहा हूँ कि जीवन और मृत्यु में अधिक प्रिय कौन है!

सच कहूँ तो मुझे तो हमेशा मृत्यु ही अधिक आकर्षित करती रही है. आज सुबह जब पता चला कि मेरी शुगर रात में 50 तक गिर गई थी, और ChatGPT ने बताया कि अगर 10 और नीचे चली जाती, तो लोग कहते.. एक थे संजय शर्मा…

इन दिनों चारों तरफ़ अचानक होती मौतों को देखकर लगता है कि ज़िंदगी एक भ्रम से ज़्यादा कुछ नहीं. खैर, मैं तो हमेशा से चाहता हूँ एक ऐसी ही मौत… कि एक रात सोऊँ… और फिर सुबह ना उठूँ..

ज़िंदगी बेवफ़ा है, एक दिन ठुकराएगी…
मौत महबूबा है, अपने साथ लेकर जाएगी.

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