संजीव पालिवाल-
जब मेरी पहली किताब ‘नैना’ आयी थी तब मुझे ये नहीं पता था कि लिखने का मतलब क्या है? हम क्यों लिखते हैं? लिखने की गंभीरता क्या होती है? लेखन को मैं समझता नहीं था।
मैंने कई बार ऊलजलूल बात कह दी। जैसे मैं साहित्य के लिये नहीं लिखता.. मैं जनता के लिये लिखता हूं.. या मैं पैसा कमाने के लिये लिखता हूं। मुझे पैसा चाहिये.. आज सोचता हूं तो खुद पर हंसी आती है। मुझे ज़रा भी समझ नहीं थी कि लेखक क्या होता है।
छह साल और चार किताबें छपने के बाद, पांचवीं जब आने को तैयार है तब समझ आया कि लेखन हवाबाज़ी नहीं होता। लेखक और लेखन का महत्व होता है। जॉनर चाहे जो हो.. उसे हम अपराध कथा कहें या रोमांस या फिर सामाजिक..
और मुझमें ये समझ विकसित करने में मेरे दोस्तों, पाठकों, सहयोगियों और प्रकाशकों का योगदान रहा है। लेकिन सबसे बड़ा योगदान Chitra Mudgal जी और Prabha Khaitan Foundation का है।
आज बात चित्रा मुद्गल जी की। प्रभा खेतान फाउंडेशन के बारे में बात कल करूंगा।
कई साल बाद कल मैं और Jai Prakash Pandey ji चित्रा जी से मिलने गये। कितनी आत्मीयता से वो मिलीं कि बता नहीं सकता। मैं अपनी दो किताबें ‘ये इश्क़ नहीं आसां’ और ‘मुंबई नाइट्स’ लेकर गया था। उन्हें दोनो किताबें भेंट कीं।
चित्रा जी ने कहा कि हां, मैं इंतज़ार ही कर रही थी तुम्हारी किताबों का। बहुत अच्छा लिख रहे हो। फिर वो उठकर अपने कमरे में गयीं और एक लिफ़ाफ़ा लेकर आयीं उसमें दो पांच सौ के नोट थे। और मेरे हाथ में थमा दिये। मैं हतप्रभ। उन्हें याद था कि मेरी दो किताबें आयीं हैं। लिफ़ाफ़ा तैयार रखा था। मेरे पास शब्द नहीं हैं इस स्नेह के। आंसू निकल रहे थे। खुद को रोक लिया।
पहले भी नैना और पिशाच के वक्त चित्रा जी ने मुझे ऐसे ही पांच सौ – पांच सौ रुपये दिये हैं। वो नोट मैंने संभाल कर रखे हैं। खर्च ही नहीं किये। हिम्मत ही नहीं है। अब चार किताबों के चार नोट मेरे पास हैं।
नैना और पिशाच उन्होंने पढ़े थे। लंबी पोस्ट भी लिखी थी। अब बताइये कि दुनिया का कौन सा प्रकाशक मुझे इतनी कीमत किसी किताब की दे सकता है? या जो भी पैसे मुझे किताबों से मिले हैं वो इनसे ज्यादा हो सकते हैं?
इस प्रेम का कोई मोल नहीं है। कृतज्ञ हूं मैं। लेखन ने मुझे ये दिया है। इस लेखन का कोई मूल्य नहीं हो सकता। भगवान चित्रा मुद्गल जी को लंबी उम्र दे। उन्हें सेहतमंद रखे।


तस्वीर में दिखाये गये चारों नोट मुझे चित्रा मुद्गल जी से ही मिले हैं। सहेज लिये हैं मैंने।
इस निःस्वार्थ प्रेम ने मुझे समझाया लिखना क्या होता है। लिखने की अहमियत क्या होती है। क्यों लेखन मज़ाक नहीं हो सकता। बड़प्पन क्या होता है। सराहना कैसी होती है। उत्साह कैसे बढ़ाया जाता है।
आप सबका बहुत-बहुत आभार। धन्यवाद। चित्रा जी को चरण स्पर्श।


