संजय कुमार सिंह-
एक ईमानदार अधिकारी को याद करना बनता है जिसे 2014 में भाजपा के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने एम्स के सीवीओ (चीफ विजिलेंस ऑफिसर) के पद से हटा दिया था। संजीव चतुर्वेदी की दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में नियुक्ति 2012 में हुई थी। इस पद पर रहते हुए उन्होंने एम्स के कई घोटाले उजागर किए थे। भ्रष्टाचार के 200 मामलों की जांच शुरू की थी। इनमें खरीद घोटाले से लेकर नियुक्ति में गड़बड़ी तक के मामले शामिल थे।
जिन लोगों के नाम सामने आए, उनमें 1982 बैच के हिमाचल प्रदेश कैडर के IAS ऑफिसर विनीत चौधरी भी थे जो AIIMS में पूर्व डिप्टी डायरेक्टर (एडमिन) थे। हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकार ने बाद में इन्हें मुख्य सचिव नियुक्त किया था। CVO के तौर पर, चतुर्वेदी को डेप्यूटेड अधिकारियों के विजिलेंस स्टेटस पर रिपोर्ट करने का अधिकार था।
अगस्त 2014 में, उन्होंने हिमाचल प्रदेश के चीफ़ सेक्रेटरी को चौधरी के खिलाफ पेंडिंग CBI और डिपार्टमेंटल मामलों के बारे में एक गोपनीय पत्र भेजा, जो उनकी देखरेख में की गई जांच पर आधारित था। भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहतर और प्रभावी कार्रवाई के लिए उन्हें मंजूनाथ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। संजीव चतुर्वेदी को सीवीओ के पद से हटाने के लिए तर्क दिया गया था कि सीवीओ के पद पर इनकी नियुक्ति बगैर इजाजत हुई थी।
सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि बिना इजाजत नियुक्त संजीव चतुर्वेदी दो साल सीवीओ के पद पर कैसे रहे। यही नहीं, एम्स और खुद सीवीसी को पद से एतराज नहीं था तो सरकार को क्या परेशानी। यह अलग बात है कि 9 नवंबर को हर्षवर्धन भी स्वास्थ्य मंत्री के पद से हटा दिए गए थे। नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की ही तरह एक गैर डॉक्टर, जेपी नड्डा को स्वास्थ्य मंत्री बनाया था।
टाइम्स ऑफ इंडिया में हाल में खबर थी कि देश भर की अदालतों में संजीव चतुर्वेदी की याचिकाओं का अंबार लग रहा है और अभी तक 16 जजों ने उनके मामलों में सुनवाई करने से खुद को अलग कर लिया है। यह एक असाधारण मामला है और इन 16 जजों में जिला अदालतों, हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी शामिल हैं।
कोई एक दशक तक इस तरह अलग-थलग कर दिए जाने के बाद उत्तराकंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने उनके सभी मामले स्वयं सुनने की सहमति दी थी। खबर के अनुसार चतुर्वेदी अदालतों में अकेले जाते हैं, कई बार अपने मामलों में खुद बहस करते हैं। पांच साल में उनके 12 तबादले हुए हैं, 2007 में उन्हें निलंबित भी किया गया था जिसे राष्ट्रपति के आदेश पर 2008 में पलटा गया। 2014 में सीवीओ के पद से हटाए जाने के बाद हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने 2016 में उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की शिकायत दर्ज कराई। 2018 में ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ समन जारी किया।
अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 197 सरकारी कर्मचारियों को बिना मंज़ूरी के सरकारी कामों के लिए मुक़दमे से बचाती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 सरकारी बातचीत को मानहानि से छूट देती है। इन दोनों प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने बार-बार सही ठहराया है। हालांकि, जब चतुर्वेदी हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट गए, तो चीफ़ जस्टिस संजय करोल ने कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में पाया कि हाईकोर्ट चतुर्वेदी की दलीलों पर विचार करने में नाकाम रहा था – लेकिन ट्रायल रोकने के बजाय, उसने मामले को उसी बेंच को वापस भेज दिया। उसी हाईकोर्ट ने दूसरे मामलों में, अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सुरक्षा दी थी। अपनी जान को खतरा बताते हुए, चतुर्वेदी ने कैडर ट्रांसफर का अनुरोध किया था, जिसे अगस्त 2015 में मंज़ूरी मिल गई थी। बेशक, नई चुनौतियाँ इंतज़ार कर रही थीं। 2016 में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन्हें वित्तीय वर्ष 2015-16 के लिए ‘ज़ीरो’ अप्रेज़ल दिया।
उन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। तब के चीफ़ जस्टिस के एम जोसेफ ने 1997 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (एल चंद्रकुमार) का हवाला देते हुए याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसमें कहा गया था कि सर्विस मामलों को ट्रिब्यूनल के ज़रिए ही निपटाया जाना चाहिए। हालांकि, रिकॉर्ड बताते हैं कि जोसेफ ने पहले भी इसी तरह की याचिकाएँ सुनी थीं – और जल्द ही सुनवाई फिर से शुरू कर दी थी – जिसमें जांच के तहत IFS अधिकारियों की याचिकाएँ भी शामिल थीं। चतुर्वेदी ने फिर सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल से संपर्क किया, जिसने सितंबर 2017 में अप्रेज़ल रिपोर्ट पर रोक लगा दी। यह रोक अभी भी जारी है क्योंकि केंद्र सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है। इस बीच, एक नया पैटर्न सामने आया: जजों ने खुद को अलग करना शुरू कर दिया।
कुल सोलह, जजों ने खुद को मामले से अलग कर लिया है। कुछ ने केस फ़ाइलें पढ़ने के बाद, कुछ ने शुरुआती सुनवाई के दौरान। ज़्यादातर ने कोई कारण नहीं बताया। चतुर्वेदी के पास इस ट्रेंड को चुनौती देने का कोई कानूनी रास्ता नहीं है। 2015 में जब उन्हें रमन मैगसायसे अवार्ड मिला था तो वे 40 साल के थे और सबसे कम उम्र में यह सम्मान पाने वाले भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी हैं। इनसे पहले किरण बेदी और टीएन शेषन को यह सम्मान ज्यादा उम्र में मिला था।
नरेन्द्र मोदी की सरकार कांग्रेस को भ्रष्ट प्रचारित करके, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ के दावे के साथ सत्ता में आई थी। 11 साल के उसके शासन में दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर शानदार दफ्तर बना, सड़क के दूसरी ओर गेस्ट हाउस का भवन और झंडेवालान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का नया मुख्यालय “केशव कुंज” बनकर तैयार है। इनमें 13 मंजिल के तीन आधुनिक टावर हैं जहां कार्यालय, आवासीय क्वार्टर, सभागार, पुस्तकालय और अस्पताल जैसी सुविधाएँ हैं। नया परिसर करीब 150 करोड़ रुपये की लागत से बना है और इसमें 75,000 से अधिक लोगों के दान का योगदान है। इसे 2018-2024 के बीच बनाया गया है।
भाजपा के उस समय के अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा ने नवंबर 2022 में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए नगालैंड के कोहिमा में नए बने पार्टी के 237वें कार्यालय का उद्घाटन किया था। इस मौके पर उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पार्टी के उस समय के राष्ट्रीय अध्यक्ष, अमित शाह को देशभर के हर जिले में पार्टी कार्यालय बनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद बने मेगा प्लान के तहत देशभर के जिलों और राज्य मुख्यालयों में कुल 512 कार्यालय बनने थे 2022 में 153 कार्यालयों का निर्माण जारी था।
हाल में आपने भाजपा के पास जमा धन, 14500 करोड़ रुपए की बहुचर्चित प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में घपले पर सीएजी की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बांड योजना को खारिज किए जाने के बाद चुनावी ट्रस्ट द्वारा दिए जाने वाले चंदे में तीन गुना वृद्धि की खबरें सुनी होगी। 3811 करोड़ रुपए के चुनावी चंदे में 82 प्रतिशत यानी 3112 करोड़ भाजपा को मिला है। आठ प्रतिशत से कम कांग्रेस को और बाकी में दूसरी सभी पार्टियां हैं। कइयों ने तो कांग्रेस को कुछ नहीं दिया है।
इतवार को इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार इलेक्टोरल बांड को खारिज किए जाने के बाद के पहले पूरे वर्ष 2024-25 में भाजपा को 6,088 करोड़ रुपए मिले और यह दर्जन भर विपक्षी दलों में मिले कुल पैसे का साढ़े चार गुना है। इसमें कांग्रेस के 522 करोड़ रुपए शामिल हैं जो इससे पहले वाले साल के मुकाबले आधे हो गए हैं। हाल में खबर थी कि सरकार ने सेमी कंडक्टर प्रोजेक्ट के लिए पचास फीसदी सबसिडी का एलान करते हुए आवेदन माँगे थे।
टाटा को दो बड़े प्रोजेक्ट मिले – एक गुजरात के धोलेरा में 91,000 करोड़ का फैब्रिकेशन प्लांट और दूसरा असम में 27,000 करोड़ की असेंबली यूनिट। इसके साथ यह भी खबर थी कि फरवरी 2024 में टाटा को 44,000 करोड़ की सब्सिडी के साथ दो प्रोजेक्ट को मंज़ूरी मिली और अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले टाटा के प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने बीजेपी को 758 करोड़ रुपये दिये। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले यह किसी एक समूह द्वारा किसी दल को दिया गया सबसे बड़ा चंदा था।
इसके अलावा 10-11 राजनीतिक दलों को 2019-20 से 2023-24 तक कुल लगभग ₹4,300 करोड़ से ज़्यादा दान/चंदा प्राप्त करने की खबर है। इन दलों में से कई गुजरात से हैं और इनके नाम आम परिचित पार्टियों में से नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन दलों ने कुछ ही चुनावों में हिस्सा लिया या बहुत ही कम खर्च दिखाया लेकिन दान में इतनी भारी रकम दिखाई गई — जो संदेह पैदा करता है कि पैसा कहाँ से आया और किसने दिया? लेकिन इसकी जांच या किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। घपलों-घोटालों की कई खबरें हैं जिनकी जांच नहीं हुई दूसरी ओर, हाल में खबर थी कि आम आदमी पार्टी के नेता सत्येंद्र जैन समेत 14 अन्य के खिलाफ ईडी ने चार्जशीट दायर की है। इन सभी पर 17.70 करोड़ रुपए की मनीलांड्रिंग का आरोप है। इसकी जांच चल रही है।
खबर के अनुसार यह घोटाला और कथित मनीलांड्रिंग का काम 2000 करोड़ रुपए के एक ठेके में हुआ है और इसे कमीशन माना जाए तो एक प्रतिशत भी नहीं है। इसके साथ मैंने लिखा और कहा है कि एक प्रतिशत तो सांसद निधि को खर्च करने में कमीशन मिल जाएगा। घोटाला तो बहुत कम है और पीएमएलए का मामला क्यों है समझना मुश्किल नहीं है।
इसके बाद अखबारों में खबर छपी कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के सहयोगी जीतन राम माझी ने कहा है, ‘कमीशन तसीलिए… 10 नहीं तो 5 परसेंट ही लीजिए’। उन्होंने यह भी कहा है, “हर एमपी-एमएलए कमीशन लेता है। कम से कम कमीशन का रुपया तसीलिए… कोई 10 परसेंट नहीं देता है तो 5 परसेंट लीजिए। पांच परसेंट पर ही काम कीजिए… कहने का मतलब है कि मेरे पास ताकत है और हम कर सकते हैं… सिर्फ मन बनाना चाहिए।” माझी ने 2015 में मुख्य मंत्री रहते हुए भी कहा था, हां, मुझे मिला है कमीशन।
अपने एक बयान में उन्होंने राज्य के पुल निर्माण कार्य में कमीशन खोरी होने का आरोप लगाया था और स्वीकार किया था कि कमीशन की कुछ राशि उन्हें भी मिली है। आपको याद होगा, 2016 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान कोलकाता में एक निर्माणाधीन पुल गिरने को प्रधानमंत्री ने ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कहा था। बाद में उत्तर प्रदेश के बनारस समेत बिहार में कई पुल गिरे ज्यादातर नए बने थे और अब प्रधानमंत्री ऐक्ट ऑफ फ्रॉड की बात नहीं करते हैं। इस तरह, ईमानदारी का ढोंग और दिखावा करने तथा दूसरों को भ्रष्टाचारी बताने के लिए भाजपा सरकार और ईडी ने जो किया सो किया पर भाजपा के सहयोगी की यह स्वीकारोक्ति बताती है कि देश में 10 साल से चल क्या रहा है। यही वाशिंग मशीन पार्टी का सच है।



अनन्त वर्मा
December 24, 2025 at 11:16 pm
ये रिपोर्ट पुरी तरह खिचड़ी है मै पहले भी लिख चुका हूं संजय सर कभी भी एक प्वाइंट पर रह नहीं पाते ह़ै और उनके लेखन में सब कुछ एक जगह होकर गुड गोबर हो जाता है।
और भडास का संपादक मण्डल संजय सर के लिखे को ब्रह्म वाक्य मानकर उनके लिखी खिचड़ी को पाठकों को परोस देता है