सौमित्र रॉय-
जब तमाम अखबार सत्ता के आगे बिक गए तो एक संकर्षण ठाकुर जी अपनी रीढ़ सीधी रखकर चलते रहे। मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि संपादक को पहले एक रिपोर्टर होना चाहिए। सत्ता और सिस्टम की गहरी समझ तभी हेडलाइन में दिखती है।
संकर्षण जी, बेहतरीन रिपोर्टर थे। इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हुए उन्होंने नरेंद्र मोदी का उद्भव और कांग्रेस का प्रभाव देखा।
टेलीग्राफ ने उनकी विश्लेषण क्षमता को आसमान दे दिया और जो वे इंडियन एक्सप्रेस में नहीं कर पाए, यहां कर दिखाया।



प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में 151वे नंबर तक आ पहुंचे भारत में पत्रकारों की प्रतिभा को कैनवास देने का काम संस्थान करता है।
बंगाल का माहौल भी कुछ ऐसा है कि अखबार बड़े जतन से सहेजे जाते हैं, उन पर चर्चा होती है।
संकर्षण जी का जाना रीढ़ को खोजते पत्रकारिता जगत में सत्ता से भिड़ने वाले का निष्प्राण होना है।
अमृत बाजार पत्रिका का यह अंग्रेजी संस्करण संकर्षण जी की बदौलत देशभर में लोकप्रिय हुआ। उनकी धरोहर को थामना अब आसान नहीं होगा। सब खत्म हो रहा है। शून्य की ओर धंसता हुआ। बेहद हताश करने वाला समय है।
संकर्षण ठाकुर से पहली बार मुलाकात 1988 में दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस में हुई थी। मुझे याद है कि 3 पंडित पंत मार्ग पर हेमवती नंदन बहुगुणा जी की प्रेस कांफ्रेंस थी। उसमें हम उम्र के हम दोनों ही थे। बहुगुणा जी हम दोनों को नाम से पुकारते थे। उसके बाद लगभग तीन दशकों तक संकर्षण से नियमित भेंट मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। टीवी डिबेट में कई बार साथ भी बैठे। उनमें मुद्दों को समझने, समझाने, लिखने और रोचक भाषा में परोसने की अदभुत क्षमता थी। एक समर्पित पत्रकार का असमय जाना निश्चित ही बड़ी क्षति है। बेहद अफसोस है कि लेखन व पत्रकारिता की उनकी यात्रा को बीच में विराम लग गया। विनम्र श्रंद्धाजलि। -उमाकांत लखेड़ा
अजय सिंह-
सोमवार की सुबह वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर के न रहने की खबर लेकर आई । इस खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि अभी उनकी उम्र ही क्या थी । अपने परिचितों से पता करना शुरू किया तो पता चला की खबर सही है । उनके साथ बिताये अपने रिश्तो का मन बेहद व्यथित हो गया ।
एक क्षण में उनके साथ बिताए हुए एक-एक पल चलचित्र की तरह आंखों के सामने आने लगे कि कैसे 2008 में मैं जब बनारस से बिहार में NDTV की तरफ से कोसी की बाढ़ कवर करने के लिए गया था तो उनसे मुलाकात हुई थी ।

बाद में मेरा ट्रांसफर बिहार एनडीटीवी में हो गया लिहाजा उनसे मुलाकात का सिलसिला तब और बढ़ गया क्योंकि जब वो बिहार आते थे तो उनका पहला पड़ाव एनडीटीवी का दफ्तर ही हुआ करता था । ऐसा इसलिए भी था क्योंकि NDTV और टेलीग्राफ का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में अगल बगल था ।
संकर्षण ठाकुर जितने बड़े पत्रकार थे उतने ही सहज और हमारे जैसे बहुत छोटे पत्रकार को भी अपने समक्ष रखकर आंकना उनकी खूबी थी । 2010 में बिहार से पुनः बनारस आ गया लेकिन संकर्षण ठाकुर से रिश्ते वैसे ही बने रहे ।
2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस चुनाव लड़ने आए तो देश और दुनिया की सारी मीडिया का जमावड़ा बनारस में होने लगा । उसमें संकर्षण ठाकुर भी बनारस आते थे और बहुत सी खबरों पर बिना किसी लाग लपेट की मुझसे राय मशवरा करते थे । और उसे मसवरे को न सिर्फ मानते थे बल्कि उसे अपनी खबरों में जगह भी देते थे। यह उनका बड़प्पन था और मेरे लिए बड़ी बात ।
हर चुनाव में वह बनारस और पूर्वांचल की राजनीति पर मुझसे लंबी बातें करते थे और जानकारी भी लेते थे । उन्होंने कभी ये एहसास ही नही होने दिया कि वो इतने बड़े पत्रकार है । यही उनके जीवन की विशेषता थी ।
आज वो भले ही विदेह हो गये हो लेकिन ऐसे लोग कहीं जाते नही हैं वो हमेशा हमारे बीच अपने सहजता और सरलता के साथ बिताये हुवे पलों के एहसास में जिंदा रहेंगे । अब उनकी यश काया हम सब के साथ होगी ।
प्रभु उनको अपने चरणों मे स्थान दे ।। ॐ शांति।।


