गाजीपुर से टेक्सास तक : ग्रामीण पत्रकार का IPS बेटा पुलिसिंग में प्रयोगों से बना अंतरराष्ट्रीय अवार्डी!

यशवंत सिंह-

कुछ एक की कहानियां कई पीढ़ियों को इंस्पायर करती हैं. वे अपने इलाके की दंतकथाओं में शुमार हो जाते हैं. वे जीते जी मिथक बन जाते हैं. संतोष सिंह एक ऐसे ही नौजवान हैं. ठेठ देसी परिवेश से निकला ये नौजवान बहुत कम उम्र में सफलता का वो परचम लहरा रहा है जहां पहुंचना ज्यादातर युवाओं का सपना होता है.

Santosh Singh

संतोष से अपना परिचय इत्तफाकन है. फेसबुक के सौजन्य से. पर निकले हम लोग बिलकुल करीबी. इनका हमारा गांव लगभग अगल-बगल है. कुछ किलोमीटर की दूरी पर.

बीएचयू के एक फेसबुक ग्रुप पर संतोष ने अपना परिचय दिया हुआ था. उनकी प्रोफाइल देखा तो गाजीपुर के निकले. फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा. मैसेंजर में बातचीत शुरू हुई. गांव घर बताते पूछते पता लगा कि अगल बगल के हैं हम लोग.

इसी बीच संतोष ने कुछ एक न्यूज क्लिप साझा किया जिसमें दो आईपीएस अफसरों के अमेरिका में सम्मानित किए जाने के निर्णय की जानकारी थी. एक संतोष सिंह को, दूसरे अमित कुमार को.

छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर संतोष सिंह इस वक्त छत्तीसगढ़ के एक जिले के पुलिस कप्तान हैं. पिछले दिनों अपन गाजीपुर थे तो एक रोज फोन पर संतोष जी से लंबी बातचीत शुरू हुई. उनके जीवन और करियर के सफर को लेकर बहुत सारी जानकारियां मिलीं.

गाजीपुर जिले के देवकली गांव निवासी संतोष सिंह ने शुरुआती शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल से ली. इनके पिता अशोक सिंह कुशवाहा लंबे समय तक दैनिक जागरण के ग्रामीण पत्रकार रहे. बीच में कुछ समय के लिए उन्हें जिला मुख्यालय में ब्यूरो चीफ का काम करने का भी मौका मिला. जाहिर है, सीमित संसाधनों में पले पढ़े संतोष के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना एक चैलेंज था. इसीलिए उन्होंने ज्यादा लंबा चौड़ा सपना देखने की बजाय मास्टर बनने का छोटा सा, बेहद आसान सा सपना देखा.

संतोष साइंस मैथ के मेधावी छात्र थे. पर उच्च शिक्षा में उन्होंने जान बूझ कर राजनीति शास्त्र का अध्ययन किया. इस विषय में ऐसा रमे कि बीएचयू में एमए के गोल्डमेडलिस्ट घोषित किए गए.

संतोष को पढ़ने का जुनून था तो उनके पत्रकार पिता अशोक हर हाल में बेटे को पढ़ाने का संकल्प लिए बैठे थे. नतीजा हुआ कि संतोष बीएचयू से एमए में गोल्डमेडल पाने के बाद जेएनयू की तरफ बढ़ चले.

तेज दिमाग देसज बच्चों के लिए जेएनयू की सपनीली दुनिया जीवन का निर्णायक मोड़ साबित होती है. संतोष के लिए भी जेएनयू बहुत क्रांतिकारी साबित हुआ. हर किस्म की क्रांति की बातें सिखाने वाले जेएनयू में रहते हुए संतोष ने वामपंथ के हर रंग देखे. आईएएस आईपीएस अफसर बनते छात्रों को करीब से देखा जाना. बस किसी एक दिन एक पल में दिमाग बदल गया. संतोष को अब मास्टर नहीं सबसे बड़ा वाला अफसर बनना था.

कुछ दिन भूमिगत होकर पढ़ाई की. एग्जाम दिया. सेलेक्ट हो गए. आईपीएस बन गए. छत्तीसगढ़ कैडर मिला. इस प्रदेश से ऐसा प्यार हुआ कि संतोष को छत्तीसगढ़ सबसे प्यारा प्रदेश लगने लगा.

संतोष ने गांव, गरीबी, पुलिस, प्रशासन, प्रबंधन-कुप्रबंधन सबको बहुत नजदीक से देखा है. मिट्टी से जुड़े रहे शख्स को समस्याएं समझानी नहीं होतीं. वे समस्याओं को जिया हुआ होता है. इसलिए उसको किसी समस्या का समाधान निकालने में वक्त नहीं लगता.

कब किसी ने सोचा होगा कि पुलिसिंग को बच्चों से कनेक्ट किया जाए. सोचा भी होगा तो ऐसी बातें एकेडमिक लेवल पर होती होंगी. पुलिस से संबंधित आयोगों की सिफारिशों वाली कूड़ा फांकती फाइलों में पड़ी होंगी. पर संतोष ने इसे कर दिखाया.

वे कहते हैं- हम लोगों ने खुद भी बचपन में महसूस किया है. पुलिस के प्रति बच्चों के मन में एक भय का भाव होता है. बच्चे कई किस्म से शोषित प्रताड़ित किए जाते हैं लेकिन पुलिस के प्रति एक आशंका वाले भाव के चलते ये पीड़ित बच्चे पुलिस के पास जाने की सोच भी नहीं पाते. इसी कारण हम लोगों ने चाइल्ड फ्रेंडली पुलिसिंग का प्रयोग शुरू किया जो उम्मीद से ज्यादा सफल रहा.

मैं चाइल्ड फ्रेंडली पुलिसिंग के डिटेल जानने को उत्सुक हुआ. संतोष ने फोन पर जो कुछ बताया समझाया वह चकित करने वाला था. मैंने उनसे अनुरोध किया चाइल्ड फ्रेंडली पुलिसिंग को लेकर उनके जो प्रयोग हैं उस पर वह डिटेल में एक आर्टकिल लिखें ताकि ये अच्छी चीजें दूसरे प्रदेशों तक पहुंचे.

यूपी में पुलिस वाले मास्क न लगाने पर आम जन को लठियाते दिखे तो उधर संतोष सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने लाखों मास्क आम जन में वितरित किया.

संतोष क्रिएटिव हैं. कल्पनाशील हैं. प्रयोगधर्मी हैं. नक्सल बेल्ट में जमीन पर चल रहे युद्ध के एक योद्धा हैं. वे बहुत कुछ जानते हैं. बहुत कुछ देखें हैं. बहुत सारा झेले भी हैं. ऐसे भी पल आए जब जीवन और मौत में बस कुछ सांसों का फासला था.

जेएनयू में किसिम किसिम के लेफ़्टिस्टों और लेफ़्ट सिंपैथाइजरों के बीच रहे संतोष आज स्टेट के साथ डटकर खड़े हैं. उनसे नक्सल युद्ध के बारे में विस्तार से समझना चाहा. बहुत सारी बातें हुईं. उनका एक सवाल अब भी परेशान कर रहा है. उन्होंने बताया- जब मुठभेड़ में नक्सली मारे जाते हैं तो उनके पास एक झोला, कुछ साबुन की टिकिया, कम्युनिस्ट लिट्रेचर, पानी की बोतल, कुछ एक जोड़ी कपड़े, कुछ दवाएं, थोड़े से पैसे मिलते हैं. आखिर हजार करोड़ से ज्यादा की उगाही / चंदा / लेवी / मदद राशि जो नक्सलियों के पास जाता है, वह आखिर खर्च कहां होता है? वो राशि न तो गरीब आदिवासियों के विकास पर खर्च की जाती है, न उससे सड़क स्कूल बनाया जाता है, न उससे अस्पताल खोला जाता है… न उसे नक्सली लड़ाकों में वितरित किया जाता है. तो ये पैसा जाता कहां है.

मेरी उत्सुकता बढ़ गई. उन्होंने जवाब देने की बजाय मुझसे कहा कि यशवंत जी आप खुद स्टूडेंट लाइफ में लेफ्ट विंग में कार्यरत रहे हैं, पता करिए कि इतना भारी भरकम पैसा जाता कहां है. पहले आप जवाब खोज लीजिए, फिर मैं बताऊंगा कि आपका जवाब कितना सही है, और सही जवाब है क्या…

खैर, बातें होती रहेंगी. बहस विमर्श तर्क लोकतंत्र की शान है जान है, इसे चलते रहना चाहिए. इसे जारी रखना चाहिए. नक्सलवाद पनपने के जेनुइन कारणों की इमानदारी से पड़ताल भी करते हैं संतोष. वे बेहद गरीब आदिवासियों के जीवन को नजदीक से देख चुके हैं. वहां देश आजाद होने के बाद कई दशकों तक विकास की रोशनी तक न पहुंची. आदिवासियों के पास जो जल जंगल जमीन थे, उसे भी हड़पा जाता रहा. कंट्रोलिंग एजेंसियां वन विभाग, पुलिस आदि का काम आदिवासियों को धमकाने तक सीमित था. ऐसे में उनके पास जो ताकत बनकर आए, उनके हो गए आदिवासी. पर आज तस्वीर बदल गई है. सरकारें सड़क, अस्पताल, स्कूल आदि लेकर पहुंची हैं. पर अब नक्सली ही नहीं चाहते कि ये सब पहुंचे. इसलिए वे सड़क खोदते मिल जाएंगे, स्कूल तोड़ते मिल जाएंगे, अस्पताल उड़ाते मिल जाएंगे. टेलीकाम टावर नष्ट करते मिल जाएंगे. सैकड़ों युवाओं को सरेंडर करा चुके संतोष के पास नक्सलवाद को समझने, नक्सलवाद पर बात करने के लिए बहुत कुछ है.

जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर एमफिल करने वाले संतोष को आज उनके कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय जगत से वाहवाही मिल रही है. जमीन पर अभिनव प्रयोग करने वाले संतोष को पाजिटिव पुलिसिंग के लिए दुनिया भर के चुनिंदा अफसरों की लिस्ट में शामिल किया गया है. उन्हें क्यों, किसने, किसलिए, कहां, कब सम्मानित किया जाएगा, इसका विवरण नीचे अटैच है. हम तो बस इसलिए खुश हैं कि अपने गांव के बगल का एक लड़का जिला गाजीपुर का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर रहा है. युवा संतोष के लिए ये सफलता तो बस एक शुरुआत है. आने वाले दिनों में वे अपनी कल्पनाशीलता और प्रयोगधर्मिता के जरिए आम जन के जीवन में घुसे पड़े दुखों भयों को कम कर सकेंगे, तो ही उनकी पढ़ाई लिखाई उनकी अफसरी उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मानों का मतलब मकसद सार्थक होगा. साथ ही गाजीपुर वासियों को अपने जिले के इस बेटे की सफलता पर ‘संतोष’ होगा.

सफल संतोष कथा!

पुलिस अधीक्षक कोरिया, संतोष सिंह का अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ चीफ्स ऑफ पुलिस (आईएसीपी) ने “आईएसीपी अवार्ड 2021” के लिए किया चयन। विश्व के 6 देशों के 40 पुलिस अधिकारियों को दिया जाएगा ये सम्मान। पुलिसिंग में किए गए अच्छे कार्यों के आकलन के आधार पर दिया जाता है यह अवार्ड।

पुलिस अधीक्षक कोरिया, संतोष कुमार सिंह को अमेरिका में स्थित अंतर्राष्ट्रीय पुलिसिंग संस्था आईएसीपी (इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ चीफ्स ऑफ पुलिस) ने “आईएसीपी अवार्ड, 2021″ से सम्मानित करने की घोषणा की है। इस पुलिस संगठन में विश्व के 165 देशों के पुलिस अधिकारी शामिल हैं। संतोष सिंह को यह अवार्ड ’40 अंडर 40′ कैटेगरी में दिया जा रहा है। यह विश्व के 40 वर्ष से कम आयु के ऐसे पुलिस अधिकारी जिन्होंने बेहतर नेतृत्व क्षमता के साथ पुलिसिंग कार्यों में नये प्रयोगों एवं अच्छे कार्यों से परिवर्तन लाने का प्रयास किया है, उन्हें दिया जाता है।

सिंह को उनके द्वारा पिछले आठ वर्षों में बेहतर पुलिसिंग व पुलिस की छवि सुधारने में किये गये कार्यों के आकलन के आधार पर यह अवार्ड दिया जा रहा है। इस बार विश्व के 6 देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, यूएई, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, कोरिया और भारत के 40 पुलिस अधिकारियों को इस अवार्ड से सम्मानित किया जायेगा। इसमें देश से उत्तरप्रदेश कैडर के आईपीएस अमित कुमार का नाम भी शामिल है। द आईएसीपी प्रतिवर्ष इस तरह के अवार्डस सितंबर माह में अपने वार्षिक समारोह में घोषित करता है और अगले साल के समारोह में अवार्ड पाने वाले को अपने मुख्यालय टेक्सास में व्यक्तिगत रूप से बुलाकर सम्मानित करता है। अधिकारियों को अक्टूबर 2022 में टेक्सास, अमेरिका में यह अवार्ड प्रदान किया जायेगा। पूर्व में छत्तीसगढ़ से डीआईजी ईओडब्ल्यू आरिफ शेख को यह अवार्ड प्राप्त हुआ है।

उल्लेखनीय है कि संतोष सिंह ने बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय तक सराहनीय काम किया है। महासमुंद पदस्थापना के दौरान बाल हितैषी पुलिसिंग को मजबूत करते हुये लगभग एक लाख बच्चों को सेल्फ-डिफेंस का प्रशिक्षण दिलवाया, जो कि एक विश्व रिकार्ड के रूप में दर्ज हुआ। इन कार्यों हेतु उप-राष्ट्रपति वैंकेया नायडू के हाथों दिल्ली के विज्ञान भवन में दिसंबर 2018 में ‘चैंपियंस ऑफ चेंज’ अवार्ड मिला। रायगढ़ पदस्थापना के दौरान रायगढ़ पुलिस ने अपराध नियंत्रण के साथ कोविड में प्रशंसनीय कार्य किया। पुलिस हेल्प-डेस्क के माध्यम से जरूरतमंदों को कोविड के प्रथम चरण में लगभग एक लाख और द्वितीय चरण में चालीस हजार सूखा राशन व फूड पैकेट्स उपलब्ध कराया गया। रायगढ़ पुलिस ने जनसहयोग से मॉस्क-जागरूकता के चर्चित अभियान ‘एक रक्षा-सूत्र मास्क का’ के तहत पिछले वर्ष रक्षाबंधन के दिन, एक ही दिन में 12.37 लाख मॉस्क बंटवाकर विश्व रिकार्ड बनाया, जो गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड, एशिया बुक ऑफ रिकार्ड व इण्डिया बुक ऑफ रिकार्ड आदि में दर्ज हुआ। कोरिया में इनके नेतृत्व में निजात अभियान के तहत नारकोटिक्स व ड्रग्स के विरुद्ध पुलिस द्वारा सख्त वैधानिक कार्यवाही व जन-जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। संतोष सिंह ने दोस्तों, पुलिस विभाग के सहकर्मियों और सीनियर्स का धन्यवाद ज्ञापित किया है, जिनके सहयोग और योगदान से यह अवार्ड मिला है।

लेखक यशवंत गाजीपुर के रहने वाले हैं, पंद्रह बरस से दिल्ली-एनसीआर में रहकर भड़ास निकाल रहे हैं.

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One comment on “गाजीपुर से टेक्सास तक : ग्रामीण पत्रकार का IPS बेटा पुलिसिंग में प्रयोगों से बना अंतरराष्ट्रीय अवार्डी!”

  • उस्मान बेग says:

    संतोष सिंह जैसा दूसरा एसपी हमारे रायगढ़ को मिल पाना नामुमकिन है
    आप पर गर्व है

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