
म्यामार सीमा पर बाड़ लगाने का मतलब 1968 से चल रही व्यवस्था को खत्म करना – टाइम्स ऑफ इंडिया
संजय कुमार सिंह
भारत-म्यामार सीमा पर बाड़ लगाने की खबर आज सभी अखबारों में है। अभी तक जब पाकिस्तान सीमा से आने वाले आतंकवादियों को नहीं रोका जा सका है तब म्यामार सीमा पर बाड़ लगाने से और कुछ हो ना हो, तार बनाने वाली कंपनी और बाड़ लगाने वाले ठेकेदारों को काम जरूर मिलेगा। उसपर आने से पहले बता दूं कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, सरकार म्यामांर के साथ निर्बाध आवाजाही के करार को खत्म करेगी। मैं इसी संपादकीय विवेक की बात करता हूं। एक ही खबर के दो बिल्कुल अलग शीर्षक हो सकते हैं। ठीक है कि अखबारों / संपादकों पर सरकार का विरोध न करने या खिलाफ खबर नहीं छापने का दबाव होगा। पर शीर्षक तो वही लगेगा जो खबर होगी। बाड़ लगाने की खबर से मेरे दिमाग में तार बनाने वाली कंपनी के चल निकलने की बात आई तो सच यह भी है कि सरकार 1968 से चली आ रही व्यवस्था को खत्म करने जा रही है। यह साधारण बात नहीं है और निश्चित रूप से यह भी खबर है।
इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। दोनों के शीर्षक में कहा गया है कि ऐसा अमित शाह ने कहा है। पर इंडियन एक्सप्रेस ने उपशीर्षक में बताया है कि अमित शाह ने निर्बाध आवाजाही की व्यवस्था को खत्म करने के संकेत दिये। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर की शुरुआत ही इस जानकारी से होती है और आप कह सकते हैं कि सीमा पर बाड़ लगाने का मतलब यही है कि निर्बाध आवाजाही खत्म होती और दोनों एक ही बात है। लेकिन पाकिस्तान सीमा से तुलना करें तो ऐसा नहीं है और पाकिस्तान से भले निर्बाध आवाजाही का करार नहीं है आतंकियों का निर्बाध आना-जाना नहीं रुका है। सरकार उसे नहीं रोक पाई है या रोक भी दिया हो तो म्यामार से निर्बाध आवाजाही को रोकना वह नहीं है जो पाकिस्तान से बाड़ लगाकर भी नहीं रोका जा सकता है। इसलिए मुझे लगता है कि खबर टाइम्स ऑफ इंडिया की महत्वपूर्ण है, भले उसने लीड मंदिर की खबर को ही बनाया है।
यह अलग बात है कि द हिन्दू ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से ईडी की पूछताछ की खबर को लीड बनाया है। यह दिलचस्प है कि संपादक बदलने के बाद द टेलीग्राफ में भी मंदिर ही लीड है और मंदिर, प्राण-प्रतिष्ठा, उपवास-तीर्थ, यजमानी, शु्द्धिकरण, आशीर्वाद की खबरों के साथ बटर-चिकन की खबर सेकेंड लीड है। नवोदय टाइम्स ने भी पहले पन्ने पर छापा है, बटर चिकन के साथ दाल मखनी किसने ईजाद की, हाईकोर्ट में तय होगा। यहां झारखंड में ईडी की खबर सिंगल कॉलम में है पर अमर उजाला में बटर चिकन नहीं है। जाहिर है, सबकी अपनी पसंद है अपना विवेक है और इसमें खास बात यह समानता है कि राहुल गांधी तथा न्याय यात्रा की खबर आज भी नहीं है। मेरा मानना है कि सरकार के समर्थन या किसी के विरोध की मजबूरी नहीं हो तो 67 दिन की यात्रा की खबर अंदर के पन्ने पर कहां क्या है, यह सूचना पहले पेज होनी ही चाहिये। खबर के साथ न्याय एक चीज है, किसी का समर्थन और विरोध बिल्कुल अलग। और न्याय करना हो तो पंच परमेश्वर होना और अलग।
अखबार जो कर रहे हैं उसका पता इससे भी चलता है कि आज के अखबारों में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह की सूचना है जिसमें इस मौके पर खुशी मनाने और राम लला का स्वागत करने की अपील की गई है। विज्ञापन के रूप में यह द हिन्दू में पहले पन्ने पर है। इसी राम जन्म तीर्थ क्षेत्र से मुझे भी, ‘विश्व के भक्तों से निवेदन’ मिला है। इसमें कहा गया है, “इस अवसर पर अयोध्या में अभूतपूर्व आनंद का वातावरण होगा आप भी प्राण प्रतिष्ठा के दिन अपने ग्राम, मोहल्ले, कॉलोनी में स्थित किसी मंदिर में आस-पड़ोस के राम भक्तों को एकत्रित करके भजन कीर्तन करें, टेलीविजन अथवा कोई पर्दा लगाकर अयोध्या का प्राण प्रतिष्ठा समारोह समाज के लोगों को दिखायें, शंखध्वनि, घंटानाद, आरती करें, प्रसाद वितरण करे।“ मुझे तो यह अपील ही गैर जरूरी और अनुचित लगती है। खासतौर से सत्तारूढ़ दल के समर्थकों की ओर से है इसलिए पर अभी वह मुद्दा नहीं है।
राम लीला का मंचन
अभी मुद्दा यह है कि अखबारों में छपी खबरों के अनुसार दिल्ली सरकार या आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि इस मौके पर उसने भारत मंडपम में विशेष राम लीला का मंचन कराने की अनुमति मांगी तो केंद्र सरकार से यह अनुमति नहीं मिली (नवोदय टाइम्स)। यह खबर कल ही छपी थी। मेरा सवाल है कि खुशी मनाने की अपील करना, उसपर नाम, पता विवरण नहीं होना, मुद्रक का नाम भी नहीं होना सब ठीक है? इसके बाद अगर भारत मंडपम में राम लीला के मंचन की इजाजत दे दी जाती तो केंद्र सरकार का कुछ बिगड़ना नहीं था। या हो भी तो वह बताया जाना चाहिये थे। दूसरे, ज्यादा लोग इस मौके पर राम लीला का मंचन देख पाते। पर वह नहीं होने दिया गया। लेकिन खबर? क्या यह साधारण बात है। क्या यह ईडी की शाखा वाली सरकार के समर्थन में चुप रहना या खबर को दबाना नहीं है?
तार कंपनी की कमाई
अब किसी तार कंपनी की कमाई की चर्चा इसलिए कि आज ही खबर है कि संजय सिंह और मनीष सिसोदिया को जमानत फिर नहीं मिली। अदालत ने उनकी न्यायिक हिरासत की अवधि फिर 3 फरवरी तक बढ़ा दी है। मेरा मानना है कि मनीष सिसोदिया निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, पांच साल के लिए चुने गए हैं, अपना काम करेंगे तो फिर चुने जायेंगे। देश को एक अच्छा राजनेता मिलेगा। अगर उनका काम खराब है, भ्रष्ट हैं तो देश में सूचना का जो तंत्र है, नेताओं के आकलन का जो तरीका है वह उनपर भी लागू होगा। उन्हें काम करने, प्रतनिधित्व के लिए चुना गया है उनपर मुकदमा (अगर चलना भी है) तो कार्यकाल खत्म होने बाद चल सकता है। अभी वे भ्रष्टाचार नहीं करें इसकी व्यवस्था की जा सकती है उसपर नजर रखा जा सकता है। पर जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधत्व करने के लिये चुनाव है।
ऐसे में अगर केंद्र सरकार (और उसके नेतृत्व में ईडी या सीबीआई को) लग रहा है कि मनीष सिसोदिया या आप सरकार ने भ्रष्टाचार किया है तो उसकी जांच उसके अच्छे या बुरे काम करने के बाद भी हो सकती है जैसे केंद्र सरकार के स्वघोषित अच्छे कामों की होगी या जिसपर फिलहाल कोई रोक नहीं है। बर्मा सीमा पर बाड़ लगाना करोड़ों-अरबों का काम है। पाकिस्तान के साथ बाड़ लगाने की समस्या है, बाकी है या नहीं वह अलग बात है और बाड़ लगाने के बावजूद उसकी कामयाबी पर संदेह है। ऐसे में म्यामार सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा तार कंपनी के शेयरों की कीमत बढ़ा सकती है ठेका कंपनियों का शेयर बढ़ सकता है। न भी बढ़ा हो तो मुझे याद है जमशेदपुर में एक तार कंपनी है। कंपनी टाटा मोटर्स के बगल में या उससे लगी हुई है। उसकी कॉलोनी भी टाटा मोटर्स की कॉलोनी से लगी हुई है। कंपनी का नाम था, इंडियन स्टील एंड वायर प्रोडक्टस लिमिटेड।
कंपनी बहुत फायदे में नहीं थी, उसकी कॉलोनी हमारी टेल्को कॉलोनी के मुकाबले खराब, रख-रखाव में कमजोर और कम पैसे वालों की लगती थी। और जाहिर है कंपनी के पास काम भले रहा हो, कमाई बहुत अच्छी नहीं थी। शायद 1971 में बांग्लादेश अलग होने के बाद या कुछ और साल बाद किसी मौके पर मुझसे उम्र में बड़े एक परिचित ने कहा था सरकार सीमा पर बाड़ लगाने का फैसला करेगी तो कंपनी को बहुत काम मिलेगा और तब कंपनी की स्थिति अच्छी हो जाएगी। टाटा मोटर्स कमा रही थी क्योंकि उसे खूब काम मिल रहा था उसके बनाए ट्रक और बसों के चेसिस दुनिया भर में बिक रहे थे और वह क्षमता से ज्यादा उत्पादन कर रहा था। धंधा- व्यापार-कारोबार की मेरी शुरुआती सीख यही थी। टाटा समूह के बारे में मेरा मानना है कि उसका काम काफी राफ-साफ होता है और जनहित सर्वोपरि है। मुझे याद है, टाटा समूह ने विमानसेवा कंपनी शुरू करने की काफी कोशिश की एक बार जब लगा था कि टाटा समूह को इजाजत मिल जायेगी तो अचानक खबर आई थी कि टाटा समूह ने हाथ खींच लिये। बाद में रतन टाटा के हवाले से यह कहा-सुना गया कि सरकार हमसे वह अपेक्षा कर रही थी जो हम नहीं करते।
भाजपा की सरकार बनने के बाद टाटा समूह के ट्रस्ट के खिलाफ कार्रवाई और फिर बांह मरोड़ने की खबरों के बाद अंततः टाटा को एय़र इंडिया मिल जाना और टाटा से सरकार के संबंध, झारखंड के मुख्यमंत्री, जमशेदपुर पूर्व के विधायक रघुवर दास पर भ्रष्टाचार के आरोप, उनका चुनाव हार जाना, उन्हें राज्यपाल बनाया जाना और दूसरी ओर रतन टाटा से सरकार के संबंध यहां तक कि उन्हें अयोध्या के लिए निमंत्रण टाटा समूह से इस सरकार की करीबी का संकेत देता है। जहां तक जमशेदपुर की तार कंपनी की बात है वह अब टाटा स्टील की सहायिका है। मैं नहीं कह रहा कि यह घोषणा टाटा के फायदे के लिए है या एयर इंडिया के सौदे में कोई गड़बड़ी लग रही है। पर सरकार के इस काम से टाटा को (या तार बनाने वाली दूसरी कंपनियों को) फायदा होगा। मकसद इन्हें फायदा करना है या सीमा सुरक्षित करना। जब आम आदमी पार्टी की उत्पाद शुल्क नीति की जांच हो सकती है तो भारतीय जनता पार्टी की विदेश नीति या पड़ोसियों से संबंध का मामला देश और जनता को ज्यादा प्रभावित करेगा भले उसमें भ्रष्टाचार न हो।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, सीमा पर बाड़ की खबर द टेलीग्राफ में नई दिल्ली डेटलाइन से इमरान अहमद सिद्दीक की है, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को कहा कि भारत म्यांमार के साथ अपनी सीमा पर बाड़ लगाएगा और मुक्त आवाजाही समझौते को बंद कर देगा, उन्होंने कहा कि सीमा को “बांग्लादेश सीमा की तरह संरक्षित किया जाएगा”। असम के तेजपुर में नवगठित असम पुलिस कमांडो के पांच बटालियन के पहले बैच की पासिंग आउट परेड को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, “भारत-म्यांमार सीमा को बांग्लादेश सीमा की तरह संरक्षित किया जाएगा। केंद्र म्यांमार के साथ निर्बाध आवाजाही रोक देगा।” मुक्त आवाजाही व्यवस्था (एफएमआर) भारत-म्यांमार सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों को (इस समय) बिना वीजा के एक-दूसरे के क्षेत्र में 16 किमी तक जाने और दो सप्ताह तक रहने की अनुमति देती है, क्योंकि उनमें से कई सीमा पार पारिवारिक और जातीय संबंध साझा करते हैं। सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों का कहना है कि पिछले तीन महीनों में 500 से अधिक म्यांमार सैनिक भारत में घुस आए हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब मिजोरम और नगालैंड के अधिकारियों ने अपील की है कि दोनों तरफ के आदिवासियों को पासपोर्ट या वीजा के बिना 16 किलोमीटर तक आने-जाने की सुविधा जारी रखी जाये। खबर के अनुसार 1968 में जब इस व्यवस्था की घोषणा हुई थी तो 40 किलोमीटर निर्बाध आने-जाने की सुविधा थी। 2004 में इसे 16 किलोमीटर किया गया था और तीन निर्धारित जगहों से सीमित कर दिया गया। 2018 में भारत और म्यामार ने इसपर करार किये।
अरुण शौरी के खिलाफ मामला और स्टे
जहां तक सरकार के विरोधियों की बात है, इंडियन एक्सप्रेस की 18 सितंबर 2020 की एक खबर के अनुसार, राजस्थान के जोधपुर जिले की एक विशेष सीबीआई कोर्ट ने आपराधिक मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। यह 2002 में एक लक्जरी होटल की बिक्री के संबंध में था और तब कहा गया था कि पहली नजर में आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी का मामला साबित होता है। अरुण शौरी विनिवेश मंत्री थे। मामला अगस्त 2014 में दर्ज हुआ था और तब उनका नाम नहीं था। आप जानते हैं कि भाजपा नेता और मशहूर पत्रकार अरुण शौरी नरेन्द्र मोदी सरकार के विरोधी हुआ करते थे। 22 अक्तूबर 2020 की एक खबर के अनुसार राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे स्टे कर दिया और अगले आदेश तक किसी भी कार्रवाई से रोक दिया था। इससे पहले, दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बीमार अरुण शौरी से मिलने पुणे अस्पताल गये थे। खबर थी कि यह तय कार्यक्रम के अनुसार नहीं था और अस्पताल से वे सीधे हवाई अड्डे रवाना हो गये थे। कहने की जरूरत नहीं है कि यह वाशिंग मशीन पार्टी की अन्य कहानियों से अलग है।
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