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सेतु प्रकाशन ने पैसे देने के मामले में वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा को जवाब दिया!

सेतु प्रकाशन ने वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप जी के रुपये देने संबंधी मामले में कहा:-

एक अप्रिय प्रसंग के सन्दर्भ में सेतु प्रकाशन को स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है। इस प्रसंग के लिए सेतु प्रकाशन अपने सभी लेखकों और पाठकों से क्षमा प्रार्थी है।

आदरणीय श्री आनंद स्वरुप वर्मा, सबसे पहले तो मैं आपके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ। आपकी शिकायत के सन्दर्भ में सेतु प्रकाशन यह कहना चाहता है कि Mass Psychology of Fascism के अनुवाद का कार्य आपने तकरीबन चार-साढ़े चार वर्ष पूर्व लिया था और इसके एवज में आपने 60,000/- रुपये भी अग्रिम भुगतान के रुप में लिये थे। यह आपके दूसरे प्रोजेक्ट की वजह से (जो आपने बाद में लिये) टलता गया। आप इसे टालते रहे। मैंने कई बार इस बाबत आपसे बात भी की। परन्तु आप इसे हँसकर जल्द करने का आश्वासन देकर मुझे आश्वस्त करते रहे।

बीच में तकरीबन छः आठ महीने पहले प्रमोद जी का प्रकरण आया, मैंने उसपर भी अपनी सहमति व्यक्त की। इसके बावजूद सेतु प्रकाशन तक आज तक भी एक पन्ना नहीं आया। आपने जिन दो-तीन किताबों का जिक्र किया है उसका पूर्ण भुगतान आपको किया जा चुका है।

आप मेरे बड़े हैं। आप पर मेरा असीम प्रेम और अधिकार है और इसी तरह अपने ऊपर भी आपका अधिकार मानता हूँ। आपने एक रकम की आवश्यकता, अपनी बीमारी के मद्देनज़र बतायी थी और मैंने कहा था कि दिल्ली से बाहर हूँ, लौटकर जल्द ही भिजवाता हूँ। इस महीने कुछ पारिवारिक कारणों से और अन्य कारणों से मुझे शहर से बाहर ज़्यादा रहना पड़ा। जैसा मैंने कहा था मैं वापस आकर वह रकम भिजवाता हूँ।

यह बेहद अफसोस की बात है कि आपके और मेरे संबंधों के बीच इस तरह की स्थिति उत्पन्न हुई। आशा है आप इस सन्दर्भ को समझेंगे।

सादर।

इस सन्दर्भ में यह सेतु प्रकाशन की तरफ से पहली और आखिरी स्पष्टीकरण है।


आनंद स्वरूप वर्मा जी का जवाब-

अमिताभ जी, क्यों आप ऐसा कर रहे हैं। मैंने मुख्य रूप से आपके लिए तीन पुस्तकों का अनुवाद किया– पार्थ चटर्जी की राष्ट्रवाद से संबंधित पुस्तक, नाइजीरियाई लेखक फेस्टस ईयायी के उपन्यास का अनुवाद और यह पुस्तक जिस पर अभी चर्चा हो रही है। हर पांडुलिपि के साथ मैंने ₹20 हजार एडवांस में लिए थे जो काम की मेरी शर्त होती है।

अलग-अलग समय पर दिए गए इन तीनों पुस्तकों के अनुवाद का एडवांस ₹60 हजार होता है जिसे आपने अभी इस तरह प्रस्तुत किया है जैसे मैंने एक पुस्तक के लिए 60 हजार ले लिया हो। यह भ्रम फैलाना है।

इसमें कोई शक नहीं कि मैं पुस्तक के मद में एडवांस के रूप में इस समय 20 हजार ले चुका हूं जब मैंने पांडुलिपि ली थी। मैं अभी कुछ और पैसे चाहता था क्योंकि मुझे जरूरत थी।

जहां तक विलंब की बात है आपको याद होगा के इसके रेट को लेकर हमारे और आपके बीच लंबे समय तक बातचीत चलती रही और इस बीच आपके लिए मैंने नाइजीरियाई उपन्यास का अनुवाद किया।

पैसों को लेकर आज तक मैंने न तो कोई गलतबयानी की है न बेईमानी। महज 15-20 हजार के लिए आपने मुझे जितना त्रस्त किया उसको बयान करूं तो लोग हैरान रह जाएंगे।

मुझे बस इतना ही कहना है।

इस पोस्ट पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं भी नीचे पढ़ें….


दिगंबर-
क्या कहूँ? ये रकम आपके लिए क्या है? आपने बेहिसाब जिन्दगी जी है और बनिए हिसाब लगा रहे हैं!

मुक्तिबोध ने कहा था – मौत का सौदागर हमसे जिन्दगी जीने का ब्याज माँग रहा है!

विष्णु शर्मा-
आनंद जी के साथ ऐसा करना बदतमीजी है. उनके जैसी शख्सियत को यहां यूं लिखना पड़ रहा है, बहुत झकझोर देने वाली बात है. उस पर सेतु का चालाकी भरा स्पष्टीकरण/बयान! आनंद जी के ध्यानाकर्षण के जवाब में उनको बदनाम करने की साजिश करने से पहले प्रकाशक को सालों के संबंध का जरा भी ध्यान नहीं रहा? प्रकाशक के बयान के बाद इसके लेखकों को खबरदार हो जाना चाहिए कि जो व्यक्ति आनंद जी के खिलाफ साजिश कर सकता है, क्या वह उनको पांव की जूती भी मानता होगा?

सुरेश नौटियाल-
Hindi publication system is based on lies. The publishers never let you know the exact number of copies published, never give you royalty honestly, and mostly treat you like their servants. Sad but true. This is one reason why Hindi Literature is far behind the Literature of other Indian and foreign languages.

दयाशंकर राय-
यह प्रकाशक का निहायत ही ओछापन कहा जायेगा कि वह पैसे के भुगतान को लेकर विभ्रम फैला रहा है गोया 60 हजार इस पुस्तक के एवज में दिए गए हों..! वह भी ऐसी दशा में जब अनुवादक बुरी सेहत के चलते अस्पताल में हो..! यह एक तरह की मानसिकता प्रताड़ना भी है..! और हिंदी के औसत लेखकों की दुनिया और उनकी समझदारी देखिये कि प्रकाशक की सफाई आते ही उसे सर्टिफिकेट देने में लग गए..! कुछ तो अनुवादक को ही सब्र सिखा रहे हैं..! जबकि प्रकाशक की भाषा से दंभ की भी गंध आ रही है..!

यह पाखंड और दोहरा चरित्र ही दरअसल हिंदी की लेखकीय दुनिया को बौद्धिक रूप से दरिद्र बनाये हुए है। कल प्रकाशक की अंतर्विरोधी और दंभ वाली भाषा पर कुछ लिखूंगा।

कैलाश प्रकाश सिंह-
सेतु प्रकाशन से काफी अच्छी पुस्तकें प्रकाशित की गई हैं। इस प्रकाशक के सलाहकार जो भी रहे हैं उनकी पसंद बहुत अच्छी है। समस्या यह है कि इतनी बेहतरीन पुस्तकों के प्रकाशन में जो कागज लगाए गए हैं वे अखबारी कागज हैं जो मुश्किल से एक साल में गल जाते हैं।

मुझे लाइब्रेरी के लिए यहाँ से प्रकाशित पुस्तकें रखवानी थीं, लाइब्रेरियन ने पुस्तकों के कागज की हालत देख कर मना कर दिया। कहना ये है कि अच्छी पुस्तकें लोग खरीदते हैं, चाहे मूल्य अधिक क्यों न हो। प्रकाशक छपाई और घटिया कागज लगा कर, मूल्य अधिक रखकर पुस्तकें बेचकर अच्छी कमाई कर लेते हैं।

फिर भी लेखक को पैसा देने में आनाकानी करते हैं।

मूल खबर…

वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा का पैसा नहीं दे रहा सेतु प्रकाशन!

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