शीतल पी सिंह-
Make in India का हाल देखिए-

ऐसा नहीं है कि सब जगह फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं। बीजेपी के नेतृत्व में तैनात सभी दलों के ITcells और विलक्षण किस्म के असाधारण मीडिया की कुशलता के चलते हम दुनियां के सबसे ज़्यादा झूठ फैलाने वाले मुल्क बन गये हैं! बधाई!

आय असमानता के मामले में मोदीजी के नेतृत्व में भारत ने सौ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। अंग्रेजों के शासन में भी इतनी असमानता नहीं थी।

डंका न सिर्फ बज रहा है बल्कि अब गूंज भी रहा है! पिछले साल फरवरी में हमने 21 लाख वाहन बेचे थे और इस फरवरी में केवल 17 लाख वाहन बिके। मतलब वाहनों की बिक्री में -17% की कमी आई है। लेकिन जीडीपी वृद्धि 6.2% की दर से हुई है।
हमारी जीडीपी के विकास का सूत्र जल्द ही दुनिया के आठवें आश्चर्य के रूप में माना जाएगा!
यह आँकड़ा इसलिए बाहर आया क्योंकि इसे वाहन उद्योग की संस्था प्रकाशित करती है वरना बहुत सी सूचनाएं तो हमें संपादित स्वर में ही मिलती हैं!

भारत की अर्थव्यवस्था मोदीजी के सुयोग्य नेतृत्व के द्वारा लिए गये आर्थिक फैसलों से उत्पन्न संकट में गहराई से डूबती लग रही है। नित नये संकेतों के आने से यह पुष्ट होता जा रहा है।
वर्ष 2024 तक केवल 5 वर्षों में सोने के आभूषण गिरवी रखने के ज़रिए लिए गए ऋण में 300% की वृद्धि हुई है। सोने के आभूषण को गिरवी रखकर उठाए गए ऋण ने पहली बार रु. 1 लाख करोड़ का आंकड़ा पार किया।
फरवरी 2025 में, आरबीआई के आंकड़ों से पता चला कि सोने के ऋण में 71.3% की वृद्धि हुई है। जबकि अन्य सभी क्षेत्रों में बैंक ऋण धीमा हो गया है, चाहे वह आवास ऋण हो या वाहनों का ऋण, सोने के ऋण जैसे संकट ऋण अपने चरम पर हैं। न केवल यही, बल्कि सिबिल-नीति आयोग की रिपोर्ट से पता चलता है कि सोने के ऋण महिलाओं को जारी किए गए सभी ऋण का लगभग 40% हिस्सा हैं, और पिछले पांच वर्षों में अपने गहने गिरवी रखने के लिए मजबूर महिलाओं की संख्या में 22% से अधिक की वृद्धि हुई है।
मोदी सरकार ने एक बार फिर से अर्थव्यवस्था को संभालने में अपनी संपूर्ण अक्षमता का प्रदर्शन किया है। बिगड़ते हालातों में भारत की महिलाएं इसकी कीमत चुका रही हैं।

गरीबी का अभाव, शून्य भुखमरी, अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निरंतर आर्थिक विकास – ये सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के मुख्य घटक हैं, जिन्हें नीति आयोग नियमित रूप से जारी करता है।
तमिलनाडु और केरल के प्रदर्शन पर नजर डालें, जो एसडीजी सूचकांक में शीर्ष पर हैं। यह दोनों राज्य भाजपा द्वारा सबसे अधिक आलोचना का सामना करते हैं, लेकिन नीति आयोग की अपनी रिपोर्ट के अनुसार, ये दोनों राज्य एसडीजी मापदंडों में शीर्ष पर हैं।
तमिलनाडु और केरल ने एसडीजी सूचकांक में 80.2 अंक हासिल किए हैं, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इन राज्यों ने स्वास्थ्य, शिक्षा, और आर्थिक विकास जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। गुजरात माडल की बहुत चर्चा की जाती है लेकिन वह इस तालिका में अनेक राज्यों से पीछे है और राष्ट्रीय औसत से सिर्फ़ दो अंक ही अधिक है।
हिंदी पट्टी के राज्य निराश करते हैं और बिहार तो खैर बुरी हालत में है ही। राष्ट्रीय औसत को बिगाड़ने में इनका उल्लेखनीय योगदान है।
यह दक्षिण के दोनों राज्यों की उपलब्धि है कि वे एसडीजी मापदंडों में शीर्ष पर हैं, और यह वहां की राजनीतिक पार्टियों की नीतियों और कार्यक्रमों की सफलता को दर्शाता है।

शेयर बाजार क्यों गिर रहे हैं? क्योंकि एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) पैसा निकाल रहे हैं।
एफआईआई पैसा क्यों निकाल रहे हैं? क्योंकि उन्हें भारत आकर्षक निवेश स्थल नहीं लगता।
भारत उन्हें आकर्षक क्यों नहीं लगता? क्योंकि भारतीय शेयर अधिक मूल्य वाले और कम प्रदर्शन वाले हैं। भारतीय शेयर कम प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? क्योंकि बाजार में उपभोक्ता मांग कमजोर है।
उपभोक्ता मांग कमजोर क्यों है? क्योंकि आम लोगों के पास खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है।
आम लोगों के पास पैसा क्यों नहीं है? क्योंकि वेतन नहीं बढ़ रहे, महंगाई अधिक है, और अप्रत्यक्ष कर उनकी आय को कम कर रहे हैं।
सरकार उच्च अप्रत्यक्ष करों (जीएसटी, पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क) पर क्यों निर्भर है? क्योंकि उन्हें अधिक राजस्व की आवश्यकता है, लेकिन वे अमीरों पर कर नहीं लगाना चाहते।
सरकार अमीरों पर कर क्यों नहीं लगाना चाहती? क्योंकि अमीर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को धन दे रहे हैं। अमीर भाजपा और मोदी को धन क्यों दे रहे हैं? क्योंकि उन्हें इसके बदले में अनुकूल नीतियां, कम कर, और नियामक लाभ मिलते हैं।
सरकार अमीरों को सामान्य नागरिकों पर क्यों तरजीह देती है? क्योंकि उनकी राजनीतिक जीविता कॉर्पोरेट दान, मीडिया नियंत्रण, और चुनाव खर्च पर निर्भर करती है।
चुनाव खर्च इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि आधुनिक चुनाव विशाल प्रचार, विज्ञापन, और सोशल मीडिया प्रभाव के माध्यम से जनमत को आकार देने पर निर्भर करते हैं।
प्रचार की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि इसके बिना, लोग बेरोजगारी, महंगाई, और असमानता जैसे वास्तविक आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, भावनात्मक या विचारधारात्मक कथनों के बजाय।



