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साहित्य

श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी – एक रपट : लेखक के अच्छे लेखन के लिए एक अदद प्रेमिका जरूरी है!

अनूप शुक्ल-


कल दिल्ली के साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में श्रीलाल शुक्ल जी की जन्म शताब्दी के मौके पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत हुई । दिन भर का कार्यक्रम। श्रीलाल जी से लखनऊ में उनके घर में कई बार मिलने का, बतियाने का सौभाग्य मिला मुझे। पहली मुलाक़ात पिछली सदी के आख़िरी साल के दिनों की थी। बातचीत के बाद चलते समय उनके फ़ोटो लिए तो उन्होंने संकोच भरी आवाज में आग्रह किया था -“अनूप जी, इस फोटो की कॉपी मुझे भेजियेगा।”

बाद में मुझे पता चला कि जिस दिन श्रीलाल जी मुलाकात हुई थी उस दिन उनका जन्मदिन था। मैंने उनको फ़ोटो भेजते हुए उनको अपनी अज्ञानता का जिक्र करते हुए उनको जन्मदिन की बधाई दी थी। उन्होंने फोटो भेजने के लिए धन्यवाद देते हुए पोस्टकार्ड भेजा था।

इसके बाद श्रीलाल जी से कई मुलाक़ातें हुईं। एक बार कानपुर मेरे घर भी आए थे। साथ में मार्कंडेय जी और कमलेश अवस्थी जी भी थीं। घर में खाना खाने के बाद चलते समय घर के बगीचे में उगाई गई हल्दी उनको भेंट की थी तो उन्होंने प्रसन्न आवाज में कहा था -“इससे पवित्र और क्या हो सकता है?”

श्रीलाल शुक्ल जी की जन्मशती के बहाने उनसे जुड़ा यह प्रसंग ‘उसी घराने’ का जिसमें लोग किसी बड़े इंसान के बारे में बताते हुए सबसे पहले उससे अपनी नजदीकी के बारे में विस्तार से बताते हैं। यादों में उसके साथ इतना ज़्यादा चिपक जाते हैं कि महान व्यक्ति के बजाय उसको याद करने वाला ज़्यादा (बड़ा) दिखने लगता है। वो मुझे इतना चाहते थे, इतना मानते थे , इतना महत्व देते थे। संस्मरण का यह अंदाज़ जिसके बारे में बताया जा रहा है उससे ज़्यादा अपने को बताने की कोशिश का होता है।

बहरहाल, बात श्रीलाल जी पर केंद्रित कार्यक्रम के बारे में। कार्यक्रम दस बजे से था। उस समय तक कम लोग आए थे लेकिन कार्यक्रम तय समय पर शुरू हो गया। श्रीलाल जी पर केंद्रित वृत्तचित्त शुरू हो गया। 28 मिनट के इस वृत्तचित्त में श्रीलाल जी जुड़ी स्मृतियाँ और उनके बारे में उनसे जुड़े लोगों के संक्षिप्त वक्तव्य थे। श्रीलाल शुक्ल जी नातिन नंदिनी ने रोचक अंदाज़ में बताया कि जब भी उसने ‘रागदरबारी’ पढ़ना शुरू किया तब उन्होंने रोक दिया यह कहते कि “यह फालतू का लेखन है।” वक्तव्य रिकार्ड करने ऐसा उसके साथ तीन बार हो चुका था ।

कुछ ऐसा ही श्रीलाल जी कई बार अलग-अलग लोगों से कहते थे। मेरे द्वारा रागदरबारी का जिक्र करने पर मुझसे भी उन्होंने एक बार कहा था -“रागदरबारी तो मेरा बदमाशी का लेखन है।”

स्वागत भाषण के बाद गोविंद मिश्र जी ने श्रीलाल जी से जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। उन्होंने कहा -“श्रीलाल जी पर केंद्रित वृत्तचित्र देखते हुए लगा वे अभी भी हमारे बीच हैं।”

गोविंद मिश्र जी ने अपने प्रति श्रीलाल जी के स्नेह का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे एक बार बांदा में उनके(गोविंद मिश्र जी के) सम्मान समारोह में शिरकत के लिए श्रीलाल जी सूट-टाई में पहुंचे थे। वहाँ बैठने का इंतज़ाम बुंदेली अंदाज में तख्त पर था। लोगों ने गोविंद जी से आत्मीयता जताते हुए लंबे-लंबे व्याख्यान दिए। श्रीलाल जी धैर्य पूर्वक उनको सुनते रहे।

श्रीलाल शुक्ल जी के सौन्दर्य प्रेम का जिक्र करते हुए गोविंद मिश्र जी ने ‘रागदरबारी’ को साहित्य अकादमी सम्मान पाने के बाद हुई पार्टी का क़िस्सा सुनाया। पार्टी में जाने से पहले एकाध पैग ले चुके श्रीलाल जी पार्टी में किसी सुंदर महिला को देखकर बार-बार पूछ रहे थे -“who is she, who is she?”

गोविंद मिश्र जी का यह संस्मरण सुनते हुए मुझे श्रीलाल जी का वह कथन याद आया जिसमें उन्होंने लिखा था -“लेखक के अच्छे लेखन के लिए एक अदद प्रेमिका जरूरी है ।” श्रीलाल जी के इस कथन के जबाब में उनसे शायद किसी ने यह भी पूछा था -“लेखिका के अच्छी लेखन के लिए प्रेमी का भी बंदोबस्त होना चाहिए।”

गोविंद जी ने श्रीलाल जी और उनकी पत्नी के आपसी प्रेम का जिक्र करते हुए बताया कि जब गिरिजा जी बीमार थीं तो श्रीलाल जी ने उनकी देखभाल के लिए कहीं आना-जाना, लिखना-पढ़ना सब बंद कर दिया था। इस पर वे कहतीं थीं -“ये कहीं आयेंगे,जाएँगे नहीं , लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे नहीं तो लिखेगे कैसे?”

श्रीलाल शुक्ल जी की बीमारी के दौरान एक मुलाकात का जिक्र करते हुए गोविंद जी ने बताया -“श्रीलाल जी बीमार थे। उनके पीने-पिलाने पर रोक थी। उनकी बहू इस बात का ख्याल रखती थी कि वे शराब न पी सकें। मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने पूछा -“कुछ मंगवाया जाये?” इस मैंने कहा -“आपको पीना मना है घर में। बहू टोकेगी।” इस पर श्रीलाल जी ने कहा -“मुझे मना है लेकिन तुमको एलाऊ कर देगी (बहू) । तुम हैसियत वाले हो।”

गोविंद मिश्र जी के रिटायर होने पर श्रीलाल जी ने उनको “काजल की कोठरी से बेदाग़” निकल आने की बधाई दी थी। एक पत्रिका का संपादक बनने के बाद उनकी सलाह -“एक लेखक को डेढ़ साल से अधिक संपादक नहीं रहना चाहिए।” का जिक्र करते हुए बताया कि संयोग यह रहा कि “मैं पत्रिका के संपादक के दायित्व से डेढ़ साल से पहले ही मुक्त हो गया।”

गोविंद मिश्र जी ने जब इस बात का जिक्र किया तब शायद उन्होंने ही या किसी श्रोता ने अखिलेश जी का का जिक्र करते हुए कहा -“इनको तो डेढ़ साल से ऊपर हो गया संपादकी करते हुए।” वहीं प्रेम जनमेजय जी भी वहीं बैठे शायद सोच रहे होंगे -“हमको भी तो बीस साल से ऊपर हो गए व्यंग्य यात्रा की संपादकी करते हुए।”

गोविंद जी ने श्रीलाल जी से अपने जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा -“मेरे लिए वे हमेशा जीवित हैं।”

बीज वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित प्रो रामेश्वर राय जी ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा -“मुझको बीज वक्तव्य देने के लिए कहा गया है। लेकिन बीज वक्तव्य तो गोविंद जी दे चुके हैं। बीज पेड़ भी बन गया है। मैं तो बस उसके बढ़ने के लिए थोड़ा खाद -पानी डालूँगा। “

प्रो रामेश्वर राय जी कहा -“मेरा श्रीलाल जी से व्यक्तिगत परिचय नहीं रहा। यह अच्छा ही है। रचनाकार से व्यक्तिगत परिचय होने पर , उससे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित होने के कारण, उसके लेखन पर राय प्रभावित होती है।”

प्रो राय ने श्रीलाल शुक्ल जी के लेखन पर विस्तार से चर्चा की। ‘रागदरबारी’ और ‘विश्रामपुर का संत’ के चरित्रों के बारे में चर्चा की।

प्रोफेसर रामेश्वर राय जी को सुनना अपने आप में अद्भुत अनुभव है। संगत में पहली बार उनकी बातचीत सुनकर उनके वक्तव्य, बातचीत खोज-खोजकर सुने। उन जैसे शिक्षकों को कभी रिटायर नहीं होना चाहिए। उनके हर वक्तव्य को नेट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

प्रो रामेश्वर राय जी श्रीलाल जी की रचनाओं पर अपनी प्रभावी आवाज में सारगर्भित चर्चा कर रहे थे कि क़रीब चालीस मिनट के उनके वक्तव्य के बाद सामने बैठे संचालक ने उनको ‘वाइंड अप’ करने का इशारा किया। वक्तव्य ख़त्म करने का इशारा होते ही ऐसा लगा जैसे चालीस हज़ार फीट की ऊंचाई पर उड़ता हुआ जहाज़ अचानक दस-पाँच हज़ार फीट पर उतर आए। बाद में प्रो रामेश्वर राय जी ने अपना वक्तव्य समेट कर ख़त्म करते हुए बताया -“मैं श्रीलाल शुक्ल जी पर केवल 2% ही बोल पाया।”

बाद में चाय के दौरान प्रो रामेश्वर राय जी के कुछ छात्र-छात्राओं से बात हुई। बच्चों ने बताया कि प्रोफेसर रामेश्वर राय जी के लेक्चर में दूसरे विषयों के छात्र भी आते हैं। प्रो राय का जिक्र करते हुए प्रभात रंजन जी ने अपनी एक पोस्ट में लिखा था -“दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में दो तरह के लोगों ने हिंदी की पढ़ाई की- एक जिनको रामेश्वर राय ने पढ़ाया और दूसरे जो उनसे नहीं पढ़ पाये। पैंतीस साल पहले मैं भी उनका छात्र था।”

प्रभात रंजन जी की बात को विस्तार देते हुए मैं लिखना चाहता हूँ -” दुनिया में दो तरह श्रोता हैं। एक वे जिन्होंने उनको सुना है, दूसरे वे जिन्होंने उनको नहीं सुना है। यह मेरी उपलब्धि है कि मैंने उनको सुना है।”

प्रो रामेश्वर राय जी का पिछला वक्तव्य सुनकर मनीश कुमार ने लिखा था -“मनोहर श्याम जोशी व्याख्यानमाला में ‘ प्रो. रामेश्वर राय ‘ का समृद्ध व्याख्यान सुनकर ऐसा लगा, मानो समंदर की गहराई से मछलियाँ भी निकलकर इस भावयुक्त भाषा-प्रवाह में अपनी जीवनशक्तियाँ तलाश रही हों।”

श्रीलाल शुक्ल जी पुत्री विनीता माथुर जी ने अपने पिता से जुड़ी यादें साझा कीं। अपने इलाहाबाद पढ़ने जाते समय श्रीलाल जी के भावुक होकर रो पड़ने का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने उनसे पूछा -“पापा, आप इतने भावुक क्यों हो रहे?” इस पर श्रीलाल जी ने उनसे कहा था -“मुझे लगता है अब इसके बाद तुम्हारे साथ इतना रहना नहीं हो पायेगा।” बाद में ऐसा ही हुआ।

विनीता जी ने बताया कि उनके पापा के ही कारण उनको विश्व साहित्य के अच्छे रचनाकारों को पढ़ने की रुचि हुई और वे अच्छी रचनाओं से वाक़िफ़ हो पायीं।

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष कौशिक जी ने कहा -” श्रीलाल शुक्ल जी का स्मरण करना ऋषि ऋण अदा करने जैसा है।”

साहित्य अकादमी की उपाध्यक्षा डा कुमुद शर्मा जी ने सभी वक्ताओं का आभार प्रकट करने के पहले श्रीलाल जी के बारे में अपनी यादें करते हुए वक्तव्य दिया।

पहले सत्र के बाद चाय पान हुआ। लंबी लाइन में लगे लोग चाय और नाश्ते लेकर आपस में गपियाते, बतियाते रहे। बिस्कुट ख़त्म हो गए थे, चाय आधी। लेकिन बिस्कुट फिर आए , चाय चलती रही। सबको मिली।

चाय सत्र के बाद श्रीलाल शुक्ल जी के ‘कृती व्यक्तित्व’ पर चर्चा करते हुए अखिलेश जी, शैलेंद्र सागर जी और ममता कालिया जी ने अपने संस्मरण सुनाये।

अखिलेश जी ने श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़े कई रोचक, संवेदनशील और अनूठे संस्मरण सुनाये। समकालीन लेखकों में अखिलेश जी शायद ऐसे रचनाकार हैं जिनका सबसे लंबा व्यक्तिगत और रचनात्मक संपर्क श्रीलाल जी से रहा है। अखिलेश जी की तद्भव पत्रिका का प्रवेशांक श्रीलाल शुक्ल जी पर केंद्रित था। अपने आप में अनूठा अंक है यह।

अखिलेश जी ने श्रीलाल जी की मिलन सारिता का जिक्र करते हुए कहा :

” श्रीलाल जी को लोगों से मिलने-जुलने का शौक था। जो भी आता उससे मिलते। गांव घर से, देश से मिलने लोग उनके यहाँ आते। एक बार वे लोगों से मिलते हुए थक गए थे। बाहर लोग उनसे मिलने के लिए बैठे थे। उन लोगों को कहलवा दिया गया कि श्रीलाल जी घर पर नहीं हैं। इस बीच मैं भी गया उनसे मिलने। मुझसे भी कहा गया -“घर में नहीं हैं।” मैं यह कहते हुए वापस लौट आया कि आयें तो बता दीजियेगा कि अखिलेश आए थे मिलने।

मैं गेट तक पहुँचा ही था कि अंदर से उनका नौकर आया और कहा कि अभी आ जाएँगे। आप अंदर आ जाइए। जब मैं अंदर पहुँचा तो वहाँ श्रीलाल जी बैठे थे। बोले -“मैं आज लोगों से मिलते हुए थक गया हूँ इसलिए कहलवा दिया कि मैं घर पर नहीं हूँ।”

श्रीलाल जी की आदत थी कि जो कोई भी उनसे मिलने जाता उसको गेट तक छोड़ने बाहर आते थे। घंटे -डेढ़ घंटे बात करने के बाद जब मैं वापस निकला तो हमको बाहर तक छोड़ने आए। उनसे मिलने आए लोग, जिनसे कहला दिया गया था कि श्रीलाल जी घर पर नहीं हैं , अभी भी बाहर बैठे उनका इंतज़ार कर रहे थे। श्रीलाल जी उनको देखकर जिस तरह झेंपे उसका वर्णन मुश्किल है। “

श्रीलाल जी व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :

” उनका जीवन उनके उपन्यास राग-विराग की तरह था। एक तरफ़ वे जीवन के हर क्षण का आनंद उस क्षण से जुड़कर उठाते थे दूसरी तरफ़ जीवन के हर आकर्षण से उचाट हो जाते थे। संगीत सुनना उनका शौक था। लेकिन उसको पुराने रेडियो/टेपरिकार्डर पर सुनते थे। जब मैंने उनसे कहा कि नया, अच्छा सेट ले लीजिये तो उन्होंने कहा -“ऐसे ही ठीक है।”

आमने-सामने घंटों बतियाने वाले श्रीलाल जी को टेलीफ़ोन पर लंबी बातचीत करना पसंद नहीं था। टेलोफ़ोन पर बात करते-करते अचानक फ़ोन रख देते। एक बार किसी शोध छात्रा ने उनको फ़ोन करके उनके साहित्य और कृतियों पर उनसे जानकारी लेनी चाही। श्रीलाल जी कुछ देर तो उससे बात करते रहे। इसके बाद यह कहते हुए फ़ोन रख दिया -“आप यह समझकर शोध करिए कि लेखक मर चुका है।”

पीने-पिलाने और इससे जुड़ी ख़ुद की इमेज के प्रति एक तरफ़ बेहद सतर्क और दूसरी तरफ़ एकदम बेपरवाह होने से जुड़े दो किस्से अखिलेश जी ने सुनाये।

पहले क़िस्सा तद्भभव के प्रवेशांक से जुड़ा था। रवींद्र कालिया और गोविंद मिश्र के संस्मरण में श्रीलाल जी के शराब पीने से जुड़े संस्मरण थे। श्रीलाल जी नहीं चाहते थे कि वे संस्मरण छापे जायें। उन्होंने कहा -“इनको निकाल दिया जाये।”

इस पर अखिलेश जी ने कहा -“इनको निकाला कैसे जाये? लिखने वाले ने लिखकर दिए हैं। क्या ये संस्मरण ग़लत हैं?”

इसपर श्रीलाल जी ने कहा -” इनको मेरे घर के लोग, बच्चे भी पढ़ेंगे तो मेरे बारे में क्या सोचेंगे।”

शराब से जुड़ी अपनी इमेज के प्रति इतने सतर्क और चिंतित श्रीलाल जी की इसके एकदम विपरीत याद साझा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :

” इंदौर में एक विश्वविद्यालय में कार्यक्रम था। श्रीलाल जी के साथ हम लोग पहुँचे। एक बीए में पढ़ने वाले छात्र ने उनके वहाँ पहुँचने पर आदर के साथ उनके पैर छुए। उन्होंने उससे कहा -“यहां आसपास कोई शराब की दुकान हो लेकर आओ।”

श्रीलाल जी की स्मरण शक्ति बहुत जबरदस्त थी। एक बार उज्जैन जाते हुए उन्होंने बारिश के मौसम में वर्षा से जुड़ा कोई श्लोक सुनाया। उनके साथ बैठे लोगों ने तारीफ़ की। उन्होंने एक और श्लोक सुना दिया। इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उनसे कहा गया -“आपको याददाश्त गजब की है।” कुछ और बात चली तो उन्होंने हाल ही में छपी हेमंत कुकरेती की कविता सुना दी। इससे अंदाज लगता है कि वे अपने समय के नए से नए कवि/लेखक को पढ़ते थे और उनकी रचनाओं को याद भी रखते थे।

वे नए से नए लेखक को पढ़कर उसकी रचनाओं पर अपनी राय भी देते थे। उत्साह वर्धन करते थे। एक बार अखिलेश जी ने कहा -“आप इतना कैसे कर लेते हैं, कैसे लोगों की ख़राब रचनाओं को भी पढ़कर उस पर अपनी राय व्यक्त कर लेते हैं?”

इस पर श्रीलाल जी ने कहा -“नए लेखक मेहनत करके लिखते हैं। उनका उत्साह वर्धन करना चाहिए।इसलिए मैं उनको पढ़ता और उनके बारे में लिखता हूँ।”

अखिलेश जी ने कहा -“श्रीलाल जी आस्तिक थे। पूजापाठ करते थे लेकिन दकियानूस नहीं थे।”

गिरिजाजी से जुड़ा संस्मरण साझा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :

“गिरिजा जी को भूलने की बीमारी हो गई थी। श्रीलाल जी सब कुछ भूलकर गिरिजा जी की सेवा करते थे। एक दिन मैंने देखा कि श्रीलाल जी रामचरित मानस की एक चौपाई को रुक-रुक कर उनको पढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। मैं कुछ बोला नहीं। लेकिन श्रीलाल जी ने कहा -“तुम सोच रहे होगे कि मैं इस उमर में इनको दुबारा सिखाने के लिए क्यों मेहनत कर रहा हूँ?” इस पर मैंने कहा -” नहीं ऐसा कुछ नहीं।” फिर श्रीलाल जी ने संस्कृत का श्लोक सुनाया जिसका मतलब है अगर कोई विद्या सीखनी हो यह सोचकर सीखनी चाहिए कि हम अजर -अमर हैं। “

अखिलेश जी के श्रीलाल जी से जुड़े रोचक संस्मरण सुनने के बाद शैलेंद्र सागर जी ने श्रीलाल जी से जुड़े अपने संस्मरण सुनाये। शैलेंद्र सागर जी ने अपना वक्तव्य लिखकर लाए थे। उन्होंने श्रीलाल जी से जुड़ी कई यादें साझा कीं। इनमें अधिकांश कथाक्रम के आयोजन से जुड़ी यादें थीं। श्रीलाल जी लगातार कथाक्रम से जुड़े रहे। शैलेंद्र जी ने बताया कि श्रीलाल जी कथाक्रम के आयोजनों से जुड़ी बैठकों में नियमित भाग लेते थे, सबकी बातें सुनते थे और अपनी तार्किक राय देते थे। अपनी राय थोपते नहीं थे। कई बार कथाक्रम के आयोजन में उनमने, असावधान दिखते तो लगता कि अपना संबोधन कैसे देंगे लेकिन जब वे बोलते तो सजग, सुचिंतित और तार्किक तरीके से अपनी बात रखते।

कृती व्यक्तित्व के अध्यक्ष के रूप में ममता जी ने श्रीलाल जी से जुड़ी तमाम यादें साझा कीं। इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान श्रीलाल जी का उनके यहाँ मिलना-जुलना, आना-जाना था। श्रीलाल जी की रागदरबारी प्रकाशित हुई तो उनके कई आलोचक मित्रों ने इसकी बहुत ख़राब आलोचना की। अश्क जी ने रवींद्र कालिया जी को उपन्यास पढ़ने को दिया तो उन्होंने पढ़कर उपन्यास की श्रीलाल जी से तारीफ़ की तो श्रीलाल जी ने पूछा -“क्या तुम सही कह रहे हो? सही में उपन्यास तुमको पसंद आया?”

इस पर रवींद्र कालिया जी ने कहा -“सही में उपन्यास बहुत अच्छा है।”

बाद में रागदरबारी हिंदी व्यंग्य का क्लासिक उपन्यास साबित हुआ। आज भी हिन्दी के सबसे अधिक बिकने वाले उपन्यासों में इसका शुमार है।

रवींद्र कालिया और श्रीलाल जी की मित्रता में लगाव और नोकझोंक के मजेदार किस्से ममता जी ने सुनाये। श्रीलाल जी के कई दोस्त परिमल से जुड़े थे , केशव चंद्र वर्मा, धर्मवीर भारती आदि। रवींद्र कालिया जी परिमलियन को उतना पसंद नहीं करते थे। दोनों के बीच नोक-झोंक चलती रहती। कभी ऐसा होता कि रवींद्र कालिया जी से बहस के बाद वे अपसेट हो जाते लेकिन फिर ममता जी और बच्चों से बातचीत करके खुश हो जाते। ममता जी ने अपनी एक कहानी में दो शैतान बच्चों का जिक्र किया था। श्रीलाल जी बच्चों/ममता जी से उन कहानी के पात्रों का ज़िक्र करके पूछते इनमें से वो कौन है?

श्रीलाल जी को इंटरव्यू देना पसंद नहीं था। एक बार ममता जी उनसे बातचीत करने आईं तो श्रीलाल जी ने एकदम शरीफ, आदर्श व्यक्ति की तरह सवालों के जवाब दिए। वे बड़ी ख़ुश हुईं। जब घर जाकर उन्होंने रवींद्र जी को इंटरव्यू के सवाल-जबाब दिखाए तो उन्होंने कहा -“तुमको श्रीलाल जी ने बेवकूफ बनाया है।”

बाद में श्रीलाल जी ममता जी को फ़ोन करके कहा -“वो इंटरव्यू फाड़ दो।” फिर उन्होंने ममता जी बातचीत की।

ममता कालिया जी जब बोलने खड़ी हुईं तो डायस से केवल उनका चेहरा दिख रहा था। कुछ देर बाद उनके लिए नीचे शायद छोटा स्टूल या मेज़ रखा गया। ममता जी अब श्रोताओ को साफ़ नज़र आने लगीं। नीचे स्टूल रखे जाते समय किसी ने कहा -“आपका क़द ऊँचा किया जा रहा है।”

इस पर ममता जी ने कहा -“लेखक का कद ऐसे नहीं ऊँचा होता। बहुत मेहनत करनी पड़ती है, बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं लेखन में क़द ऊँचा करने के लिए।”

तीसरे सत्र में श्रीलाल जी के उपन्यासों पर चर्चा हुई। नित्यानंद तिवारी जी ने अध्यक्षीय वक्तव्य सबसे पहले देते हुए श्रीलाल जी उपन्यासों पर चर्चा करते हुए अपनी पुरानी यादें भी साझा की।

‘व्यंग्य उपन्यास’ और ‘उपन्यास में व्यंग्य’ का अंतर बताते हुए नित्यानंद तिवारी जी ने कहा -“रागदरबारी में आद्योपान्त व्यंग्य है इसलिए यह एक व्यंग्य उपन्यास है। इसके पहले लिखे मैला आँचल में कई व्यंग्यात्मक प्रकरण हैं लेकिन यह व्यंग्य उपन्यास नहीं है।”

87 साल की उमर में श्रीलाल शुक्ल के लेखन पर चर्चा करते हुए नित्यानंद तिवारी जी कहा -“मैं इधर-उधर की बात करते हुए अपनी बात करूँगा।” इधर-उधर की बात करते हुए उनकी याददाश्त भी इधर-उधर होती रही। वे कुछ भूलते-याद करते बोलते रहे। लेकिन उनका भूलना-याद करना, बोलना और फिर भूलना – याद करना और फिर भूलना एक ऐसे बुजुर्ग का सहज आत्मीय व्याख्यान था जिसकी मौन उपस्थिति भी यादगार होती।

नित्यानंद जी ने कहा -“राग दरबारी जब लिखा गया था तब समाज में इतनी खराबी नहीं थी।” बाद में स्थितियां ज़्यादा ख़राब होती चली गयीं।

साहित्य और समाज के संबंध बताते हुए उन्होंने कहा -” ऐसा हो सकता है कि कोई ऐसा समाज हो जिसमें साहित्य न हो लेकिन बिना समाज के कोई साहित्य नहीं लिखा जा सकता।

अपनी बात कहकर नित्यानंद तिवारी जी चले गए। इसके बाद विनोद तिवारी जी ने श्रीलाल जी के उपन्यासों पर बात करने से पहले उनसे जुड़ा एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया।

विनोद जी ने बताया कि उनके विवाह के अवसर पर भेंट में आए लिफाफों में जो शुभकामनाएँ लिखीं थीं उन्होंने उनका कोलाज बनाया था। श्रीलाल शुक्ल जी ने अपनी शुभकामनायें व्यक्त करते हुए लिखा -“तुम्हारा वैवाहिक जीवन रामकथा सा दीर्घायु हो।”

विनोद तिवारी जी ने श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए बताया -“कोई कृति कालजयी तब बनती है जब वो बदलते समय के साथ भी प्रासंगिक बनी रहे। रागदरबारी में वर्णित गबन की, चुनाव जीतने की तरकीबें बदले रूप में आज भी लागू हैं। रागदरबारी में मशीन (घड़ी) के सहारे चुनाव जीतने की तरकीब आज बदले रूप में जारी है। रागदरबारी लोकतंत्र की विद्रूपता का प्रहसन है।

विनोद तिवारी जी के बाद प्रेम जमनेजय जी ने अपने विस्तृत व्याख्यान में श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़ी तमाम यादों को साझा किया। इसके साथ नामवर सिंह और नित्यानंद तिवारी जी को भी याद किया। श्रीलाल शुक्ल जी के साथ ‘हिंदी साहित्य के हास्य-व्यंग्य संकलन’ के प्रकाशन से जुड़ी यादों को भी साझा किया। यह भी बताया कि उनके और श्रीलाल शुक्ल जी के साझा संपादन में प्रकाशित इस किताब का तेईसवाँ संस्करण आया है। यह इस संकलन की उल्लेखनीय उपलब्धि है।

प्रेम जी को श्रीलाल जी के उपन्यास ‘मकान ‘ पर चर्चा करनी थी लेकिन वे ‘रागदरबारी’ पर चर्चा करने से अपने को रोक नहीं सके। रागदरबारी के मंदिर में माथा टेकने के बाद ही वे अपने ‘मकान’ की तरफ़ आये। इसके पहले और बाद में तथा बीच-बीच में भी वे अपनी ‘व्यंग्य यात्रा’ का जिक्र करते रहे।

व्यंग्य यात्रा और प्रेम जी एक-दूसरे से जिस तरह जुड़े हैं उसके चलते उनके द्वारा उसका इस तरह जिक्र करना सहज-स्वाभाविक है। प्रेम जी और सुभाष चंदर जी के व्यंग्य से जुड़े कई वक्तव्यों को सुनने के बाद मुझे लगता है कि अगर दोनों ‘व्यंग्य बुजुर्गों’ से मौज लेनी हो उनके बोलने पर या शर्त लगा देनी चाहिए की आप व्यंग्य यात्रा और हिंदी व्यंग्य के इतिहास का जिक्र नहीं करेंगे। इस पर शायद दोनों व्यंग्य-दिग्गज बोलने से मना कर दें कहते हुए -” फिर हम बोलेंगे क्या?”

प्रेम जी हमने चाय के दौरान जब उलाहना दिया कि आपने इतने लंबे उद्धरण क्यों पढ़े तो उन्होंने बताया -” यहाँ तमाम शोध छात्र भी हैं श्रोताओं में। शोध में उद्धरण जरूरी होते हैं।” इस पर हमने ध्यान दिया कि सही में तमाम छात्र किताब-कलम लिए नोट्स लेने के जुटे थे। कई बच्चे तो चाय और भोजन सत्र के दौरान प्रो रामेश्वर राय जी और विनोद तिवारी जी से अपनी शंकाओं का समाधान कर रहे थे। मेरे सामने एक बच्ची ने विनोद तिवारी जी ‘विरूपण’ का अर्थ पूछा। विनोद जी ने विस्तार से बताया भी।

बातचीत के दौरान प्रेम जनमेजय जी ने बताया कि श्रीलाल शुक्ल जी के जन्मशती आयोजन में उनके अनुरोध की भी भूमिका रही है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। मैं यह भी सोच रहा हूँ कि साहित्य अकादमी या राजकमल प्रकाशन श्रीलाल जी के जन्मदिन के मौके पर साल के आख़िरी दिन कोई आयोजन हर साल कराये तो कितना अच्छा हो।

आख़िरी सत्र में श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यासोत्तर साहित्य पर चर्चा हुई। शाम हो जाने के चलते कई श्रोता चले गए थे। उपन्यासोत्तर साहित्य पर श्रोतोत्तर चर्चा हुई। राजकुमार कर्दम जी , सुभाष चंदर जी और अध्यक्ष के रूप में रेखा अवस्थी जी ने श्रीलाल शुक्ल जी उपन्यासोत्तर साहित्य की चर्चा की। लेकिन लगभग सभी ने मुख्य कृति ‘रागदरबारी’ को याद करते हुए ही अपनी बता कही। राजकुमार कर्दम जी ने श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़ी अपनी कुछ यादें साझा करते हुए उनकी व्यंग्य कथाओं की चर्चा की।

सुभाष चंदर जी ने रागदरबारी से संबंधित अपने अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा -“राग दरबारी पर तो मैं दो दिन तक बोल सकता हूँ।” धमकी के रूप में बोले उनके इस कथन को सुनकर हमने सोचा -“शुक्र है कि सुभाष जी को रागदरबारी पर बोलने के लिए नहीं कहा गया।”

सुभाष जी ने श्रीलाल जी द्वारा लिखी कुन्ती का झोला, उमरावनगर में कुछ दिन आदि कहानियों का जिक्र करते हुए उनकी ख़ासियत की चर्चा की।

उपन्यासोत्तर साहित्य पर चर्चा करते हुए किसी ने उनके साथी लेखकों और साथ जुड़े लोगों के बारे में लिखे संस्मरण लेखों की चर्चा नहीं की। श्रीलाल जी ने कई यादगार संस्मरण भी लिखे हैं।

सुभाष चंदर जी के बाद रेखा अवस्थी जी ने भी विस्तार से श्रीलाल जी के समग्र लेखन पर अपनी बात रखी। उनके अनुसार शायद श्रीलाल जी व्यंग्य को विधा न मानकर एक प्रवृत्ति मानते थे।

समारोह के बाद चाय पर चर्चा करते हुए सुभाष चंदर जी ने दृढ़तापूर्वक यह स्थापित किया कि व्यंग्य एक मुक्कमल विधा है। चाय के साथ समोसे और पकौड़े का इंतज़ाम सुभाष जी का था, उनका नमक खाये होने के कारण उनके वक्तव्य का खंडन करने की जुर्रत तो हमने नहीं की लेकिन मजे लेने के संविधान प्रदत्त अधिकार का उपयोग करते हुए यह ज़रूर कहा -” व्यंग्य को विधा मानना आपके लिए मजबूरी है। आप ऐसा नहीं मानेगे तो आपका लिखा ‘हिंदी व्यंग्य साहित्य का इतिहास’ सवालों के घेरे में आ जाएगा।”

सबसे रोचक बातचीत दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों से हुई। बच्चों ने अपने गुरुओं के बारे में बताया। यह ही बताया कि लभभग सभी बच्चे पढ़ाई करते हुए कंप्टीशन की तैयारी में जुटे हैं।

साहित्यभवन में किताबघर का प्रकाशन भी है। हमने वहाँ से ‘डॉन क्विक्जोट’ का हिन्दी अनुवाद ख़रीदा। वहाँ पर आनलाइन भुगतान की व्यवस्था ने होने के कारण दोनों के पैसे कमलेश पांडेय जी ने दिये । इस फ्रेंच उपन्यास का अंग्रेजी संस्करण दस साल से भी ऊपर समय से अनपढ़ा रखा है। हिंदी अनुवाद शायद पढ़ लें। इस उपन्यास के बारे में परसाई जी के लेख में बीस -पचीस साल पहले पढ़ा था। पाँच सौ साल पहले लिखे उपन्यास के पढ़ने में पाँच-दस साल की देरी तो चलती है।

राग दरबारी का जिक्र करते हुए भी शायद कौशिक माधव जी ने कहा था -“साहित्य में बहुत कुछ ऐसा होता है जो पढ़ा देर से जाता है। समझा और भी देर से जाता है।”

समारोह के दौरान कई वक्ताओं ने अपने वक्तव्य पढ़कर दिए। उनको सुनते हुए मुझे लगा कि पढ़कर दिए गए वक्तव्य का पर्चा वक्तव्य के लिए बाली की तरह होता है। वक्तव्य की आधी ताक़त हर लेता है। लिखित वक्तव्य में भी अगर वक्ता अपना ही जिक्र करता है तो वक्तव्य का प्रभाव और भी आधा हो जाता है।हालांकि बिना पढ़े बोलने में काफ़ी कुछ भूलने का ख़तरा भी होता है।

कल किताब घर की दुकान से किताब खरीदते हुए हम लोगों (मैंने और कमलेश पांडेय जी ने) सुशील सिद्धार्थ जी को भी याद किया। वे होते तो श्रीलाल जी से जुड़ी कुछ यादें साझा करते। सुशील जी ने श्रीलाल जी के साथ बातचीत भी है।

इस तरह सुबह से लेकर शाम तक का एक दिन श्रीलाल शुक्ल जी की यादों के साथ बीता। उनकी रचनाओं की चर्चा सुनते हुए उनके उपन्यासों और लेखों को दुबारा पढ़ने का संकल्प लिया। इस दौरान कई मित्रों से मुलाकात भी हुई। रजनीकांत शुक्ल जी से तो एक बार पहले भी मिल चुके थे। ओम सप्रा जी से पहली बार मुलाकात हुई। ओम सप्रा जी ने अपनी दो किताबें भी भेंट की। सभी वक्ताओं से भी नमस्ते-बातचीत हुई।

यह रिपोर्ट याददाश्त के भरोसे लिखी है। असल में मैंने कई वक्ताओं के वक्तव्य के वीडियो बनाए थे। लेकिन न जाने क्या हुआ कि जिस मोबाइल में वीडियो बनाए थे वह चलते-चलते रूक गया और दुबारा स्टार्ट ही नहीं हुआ। बाद में उसको फ़ार्मेट करना पड़ा। सारे वीडियो ग़ायब हो गए। इसलिए कुछ गड़बड़ी हो गई हो लिखने में। बताए जाने पर उसे ठीक कर लेंगे।

पोस्ट पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।

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